आरज़ू लखनवी की रचनाएँ

हमारा ज़िक्र जो ज़ालिम की अंजुमन में नहीं

हमारा ज़िक्र जो ज़ालिम को अंजुमन में नही।
जभी तो दर्द का पहलू किसी सुख़न में नहीं॥

शहीदे-नाज़ की महशर में दे गवाही कौन?
कोई लहू का भी धब्बा मेरे कफ़न में नहीं॥

यह मेरी तौबानतीजा है बुख़लेसाक़ी का

यह मेरी तौबा नतीजा है बुखले-साक़ी का।
ज़रा-सी पी के कोई मुँह ख़राब क्या करता?

यही थी ज़ीस्त की लज़्ज़त यही थी इश्क़ की शान।
शिकायते-तपिशो-इज़्तराब क्या करता॥

मुझे मिटा तो दिया क़ब्ल अहदेपीरी के।
सलूक और दो रोज़ा शबाब क्या करता॥

यह बहरेइश्क का तूफ़ान और ज़रा-सा दिल।
जहाज़ उलट गये लाखों हुबाब क्या करता॥

पड़े न होते जो ग़फ़लत के ‘आरज़ू’! परदे।
खु़दा ही जाने यह जोशेशबाब क्या करता॥

मुझ ग़मज़दा के पास से सब रो के उठे हैं 

मुझ ग़मज़दा के पास से सब रो के उठे हैं।
हाँ आप इक ऐसे हैं कि ख़ूश होके उठे हैं॥

मुँह उठके तो सब धोते हैं ऐ दीदये-खूंबाज़।
बिस्तर से हम उठे हैं तो मुँह धोके उठे हैं॥

अब मुझको फ़ायदा हो दवा-ओ-दुआ से क्या

अब मुझ को फ़ायदा हो दवा-ओ-दुआ से क्या?
वो मुँह पे कह गए–“यह मर्ज़ लाइलाज है”॥

इज़्ज़त कुछ और शय है, नुमाइश कुछ और चीज़।
यूँ तो यहाँ खूरोस के सर पर भी ताज है॥

रहते न तुम अलग-थलग हम न गुज़रते आप से

रहते न तुम अलग-थलग हम न गुज़रते आप से।
चुपके से कहनेवाली बात कहनी पड़ी पुकार के॥

पूछी थी छेड़कर जो बात, कहने न दी वो बात भी।
तुमने खटकती फ़ाँस को छोड़ दिया उभार के॥

दो घड़ी को दे दे कोई अपनी आँखों की जो नींद

दो घडी़ को दे-दे कोई अपनी आँखों की जो नींद।
पाँव फैला दूँ गली में तेरी सोने के लिए॥

मिट भी सकती थी कहीं, बेरोये छाती की जलन।
आग को पिघला लिया फाहा भिगोने के लिए॥

ख़ुदारा! न दो बदगुमानी का मौका

खुदारा ! न दो बदगुमानी का मौक़ा।
कहलवा के औरों से पैग़ाम अपना॥

हविसकार आशिक भी ऐसा है जैसे–
वह बन्दा कि रख ले ख़ुदा नाम अपना॥

जिसमें कैफ़ेग़म नहीं, बाज़ आये ऐसे दिल से हम 

जिसमें कैफ़ेग़म नहीं, बाज़ आये ऐसे दिल से हम।
यह भी देना है कोई? मय तो न दी, साग़र दिया॥

‘आरज़ू’ इक रोज़ ढा देता मुझे मेरा ही ज़ोर।
यह भी उसकी कारसाज़ी दिल में जिसने डर दिया॥

एक दिल में ग़म ज़माने भर का, क्योंकर भर दिया।
ख़ूए-हमदर्दी ने कूज़े में समन्दर भर दिया॥

आँख थी साक़ी की जानिब, हाथ में जामेतिही।
मय तो किस्मत में कहाँ, अश्कों ने साग़र भर दिया॥

सरूरे-शब का नहीं, सुबह का ख़ुमार हूँ मैं

सरूरे-शब का नहीं, सुबह का ख़ुमार हूँ मैं।
निकल चुकी है जो गुलशन से वो बहार हूँ मैं॥

करम पै तेरे नज़र की तो ढै गया वह गरूर।
बढ़ा था नाज़ कि हद का गुनहगार हूँ मैं॥

उठ खड़ा हो तो बगोला है, जो बैठे तो गु़बार 

उठ खडा़ हो तो बगोला है, जो बैठे तो गु़बार।
ख़ाक होकर भी वही शान है, दीवाने की॥

‘आरज़ू’! ख़त्म हक़ीक़त पै हुआ दौरे-मजाज़।
डाली काबे की बिना, आड़ से बुतख़ाने की॥

क्यों उसकी यह दिलजोई दिल जिसका दुखाना है 

क्यों उसकी यह दिलजोई दिल जिसका दुखाना है।
ठहरा के निशाने को क्या तीर लगाना है॥

अंदाज़े-तग़ाफ़ुल पर दिल चोट तो खा बैठा।
अब उनकी निशानी को, उनसे भी छुपाना है॥

कमताक़तिये-नालाँ अश्कों से मदद ले लें।
बेरब्त कहानी में, पेबन्द लगाना है॥

अलअमाँ मेरे ग़मकदे की शाम 

अलअमाँ मेरे ग़मकदे की शाम।
सुर्ख़ शोअ़ला सियाह हो जाये॥

पाक निकले वहाँ से कौन जहाँ ।
उज़्रख़्वाही गुनाह हो जाये॥

इन्तहाये-करम वो है कि जहाँ।
बेगुनाही गुनाह हो जाये॥

फिर ‘आरज़ू’ को दर से उठा, पहले यह बता

फिर ‘आरजू’ को दर से उठा, पहले यह बता।
आखिर ग़रीब जाये कहाँ और कहाँ रहे॥
— — —
था शौके़दीद ताब-ए-आदाबे-बज़्मेनाज़।
यानी बचा-बचा के नज़र देखते रहे॥

अहले-क़फ़स का ख़ौफ़ज़दा शौक़ क्या कहूँ?
सूएचमन समेट के पर देखते रहे॥

भले दिन आये तो आज़ार बन गया आराम 

भले दिन आये तो आज़ार बन गया आराम।
क़फ़स के तिनके भी काम आ गए नशेमन के॥

मिटा के फिर तो बनाने पर अब नहीं काबू।
वो सर झुकाए खड़े है, क़रीब मदफ़न के॥

हुस्ने-सीरत पर नज़र कर, हुस्ने-सूरत को न देख

हुस्ने-सीरत पर नज़र कर, हुस्ने-सूरत को न देख।
आदमी है नाम का गर ख़ू नहीं इन्सान की॥

ध्यान आता है कि टूटा था, ग़लमफ़हमी में अहद।
यादगार इक है तो धुंधली सी मगर किस शान की॥

आफ़त में पडे़ दर्द के इज़हार से हम और

आफ़त में पडे़ दर्द के इज़हार से हम और।
याद आ गये भूले हुए कुछ उसको सितम और॥

हम ‘आरज़ू’ इस शान से पहुँचे सरेमंज़िल।
ख़ुद लग़्ज़िशेपा ले गई दो-चार क़दम और॥

क़रीबेसुबह यह कहकर अज़ल ने आँख झपका दी

क़रीबेसुबह यह कहकर अज़ल ने आँख झपका दी।
“अरे ओ हिज्र के मारे, तुझे अब तक न ख़्वाब आया”॥

दिल उस आवाज़ के सदके़, यह मुश्किल में कहा किसने।
“न घबराना, न घबराना, मैं आया और शिताब आया॥

कोई क़त्ताल सूरत देख ली मरने लगे उस पर।
यह मौत इक ख़ुशनुमा परदे में आई या शबाब आया॥

मुअम्मा बन गया राज़ेमुहब्बत ‘आरज़ू’ यूँ ही।
वे मुझसे पूछते झिझके, मुझे कहते हिजाब आया॥

ज़माने से नाज़ अपने उठवानेवाले 

ज़माने से नाज़ अपने उठवानेवाले।
मुहब्बत का बोझ आप उठाना पड़ेगा॥

सज़ा तो बजा है, यह अन्धेर कैसा?
ख़ता को भी जो ख़ुद बताना पड़ेगा॥

मुहब्बत नहीं, आग से खेलना है।
लगाना पड़ेगा, बुझाना पड़ेगा॥

नैरंगियाँ चमन की तिलिस्मे-फ़रेब हैं 

नैरंगियाँ चमन की तिलिस्मे-फ़रेब हैं।
उस जा भटक रहा हूँ जहाँ आशियाँ न था॥

पाबंदियों ने खोल दी आँखें तो समझे हम।
आकर क़फ़स में बस गए थे आशियाँ न था॥

जो दर्द मिटते-मिटते भी मुझको मिटा गया।
क्या उसका पूछना कि कहाँ था कहाँ न था॥

अब तक वो चारासाज़िए-चश्मेकरम है याद।
फाहा वहाँ लगाते थे, चरका जहाँ न था॥

क़फ़स से ठोकरें खाती नज़र जिस नख़्लतक पहुंची

क़फ़स से ठोकरें खाती नज़र जिस नख़्ल तक पहुँची।
उसी पर लेके इक तिनका बिनाए-आशियाँ रख दी॥

सकूनेदिल नहीं जिस वक़्त से इस बज़्म में आये।
ज़रा-सी चीज़ घबराहट में क्या जानें कहाँ रख दी॥

बुरा हो इस मुहब्बत का हुए बरबाद घर लाखों।
वहीं से आग लग उठी यह चिंगारी जहाँ रख दी॥

किया फिर तुमने रोता देख कर दीदार का वादा।
फिर एक बहते हुए पानी में बुनियादे-मकां रख दी॥

दर्देदिल ‘आरज़ू’ दरवाज़ा-ए-काबे से बहत्तर था।
यह ओ गफ़लत के मारे! तूने पेशानी कहाँ रख दी॥

जो मेरी सरगुज़िश्त सुनते हैं 

जो मेरी सरगुज़िश्त सुनते हैं।
सर को दो-दो पहर यह धुनते हैं॥

कै़द में माजरा-ए-तनहाई।
आप कहते हैं, आप सुनते हैं॥

झूठे वादों का भी यकीन आ जाये।
कुछ वो इन तेवरों से कहते हैं॥

दिल का जिस शख़्स के पता पाया

दिल का जिस शख़्स के पता पाया।
उसको आफ़त में मुब्तला पाया॥

नफ़ा अपना हो कुच तो दो नुक़सान।
मुझको दुनिया से खो के क्या पाया॥

बेकसी में भी गुज़र ही जाएगी।
दिल को मैं और दिल मुझे समझा गया॥

आके क़ासिद ने कहा जो, वही अक्सर निकला

आके क़ासिद ने कहा जो, वही अकसर निकला।
नामाबर समझे थे हम, वह तो पयम्बर निकला॥

बाएगु़रबत कि हुई जिसके लिए खाना-खराब।
सुनके आवाज़ भी घर से न वह बाहर निकला॥

नादाँ की दोस्ती में जी का ज़रर न जाना

नादाँ की दोस्ती में जी का ज़रर न जाना।
इक काम कर तो बैठे, और हाय कर न जाना॥

नादानियाँ हज़ारों, दानाई इक यही है।
दुनिया को कुछ न जाना और उम्र भर न जाना॥

नादानियों से अपनी आफ़त में फ़ँस गया हूँ।
बेदादगर को मैंने बेदादगर न जाना॥

हिम्मते-कोताह से दिल तंगेज़िन्दाँ बन गया

हिम्मते-कोताह से दिल तंगेज़िन्दाँ बन गया।
वर्ना था घर से सिवा इस घर का हर गोशा वसीअ़॥

छोड़ दे दो गज़ ज़मीं, है दफ़्न जिसमें इक गरीब।
है तेरी मश्क़े-ख़िरामेनाज़ को दुनिया वसीअ़॥

है यह सब किस्मत की कोताही वगर्ना ‘आरज़ू’।
बढ़के दामाने-तलब से हाथ है उसका वसीअ़॥

तुम हो कि एक तर्ज़े-सितम पर नहीं क़रार

तुम हो कि एक तर्ज़े-सितम पर नहीं क़रार।
हम हैं कि पायेबन्द हरेक इम्तहाँ के हैं॥

हों सर्फ़ तीलियों में क़फ़स के तो ख़ौफ़ है।
तिनके जो मेरे उजड़े हुए आशियाँ के हैं॥

इक जाम-ए-बोसीदा हस्ती और रूह अज़ल से सौदाई 

इक जाम-ए-बोसीदा हस्ती[1] और रूह अज़ल[2] से सौदाई[3]
यह तंग लिबास न यूँ चढ़ता ख़ुद फाड़ के हमने पहना है॥

हिचकी में जो उखड़ी साँस अपनी घबरा के पुकारी याद उसकी।
“फिर जोड़ ले यह टूटा रिश्ता इक झटका और भी सहना है”॥

शब्दार्थ
  1. ऊपर जायें शरीर रूपी गली-सड़ी पोशाक
  2. ऊपर जायें प्रारम्भ
  3. ऊपर जायें दीवानी

आ गई मंज़िलें-मुराद, बांगेदरा को भूल जा

आ गई मंज़िले-मुराद, बाँगेदरा को भूल जा।
ज़ाते-खु़दा में यूँ हो महव, नामे-ख़ुदा को भूल जा॥

सबकी पस्न्द अलग-अलग, सबके जुदा-जुदा मज़ाक़।
जिसपै कि मर मिटा कोई, अब उस अदा को भूल जा॥

जो दर्द मिटते मिटते भी मुझको मिटा गया 

जो दर्द मिटने-मिटते भी मुझको मिटा गया।
क्या उसका पूछना कि कहाँ था कहाँ न था॥

अब तक चारासाज़िये-चश्मेकरम है याद।
फाहा वहाँ लगाते थे, चरका जहाँ न था॥

पलक झपकी कि मंज़र ख़त्म था बर्के-तजल्ली का

पलक झपकी कि मंज़र खत्म था बर्क़े-तजल्ली का।
ज़ता सी न्यामतेदीद, उसका भी यूँ रायगाँ जाना॥

समझ ले शमा से ऐ हमनशीं! आदाबे-ग़मख्वारी।
ज़बाँ कटवानेवाले का है, मन्सब राज़दाँ होना॥

साथ हर हिचकी के लब पर उनका नाम आया तो क्या?

साथ हर हिचकी के लब पर उनका नाम आया तो क्या?
जो समझ ही में न आये वो पयाम आया तो क्या?

मय से हूँ महरूप अब भी, जो शरीके-दौर हूँ।
पाए साक़ी से जो ठोकर खाके जाम आया तो क्या?

न यह कहो “तेरी तक़दीर का हूँ मै मालिक”

न यह कहो “तेरी तक़दीर का हूँ मैं मालिक।
बनो जो चाहो ख़ुदा के लिए, ख़ुदा न बनो॥

अगर है जुर्मे-मुहब्बत तो ख़ैर यूँ ही सही।
मगर तुम्हीं कहीं इस जुर्म की सज़ा न बनो॥

मिले भी कुछ तो है बेहतर तलब से इस्तग़ना[1]
बनो तो शाह बनो, ‘आरज़ू’! गदा[2] न बनो॥

शब्दार्थ
  1. ऊपर जायें सन्तोष
  2. ऊपर जायें भिक्षुक

सबब बग़ैर था हर जब्र क़ाबिले-इलज़ाम

सबब बग़ैर था हर जब्र क़ाबिले इल्ज़ाम।
बहाना ढूंढ लिया, देके अख्तियार मुझे॥

किया है आग लगाने को बन्द दरवाज़ा।
कि होंट सी के बनाया है राज़दार मुझे॥

नालाँ ख़ुद अपने दिल से हूँ दरबाँ को क्या कहूँ 

नालाँ ख़ुद अपने दिल से हूँ दरबाँ को क्या कहूँ।
जैसे बिठाया गया है, कोई पाँव तोड़ के॥

क्या जाने टपके आँख से किस वक़्त खू़नेदिल।
आँसू गिरा रहा हूँ जगह छोड़-छोड़ के॥

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