आराधना शुक्ला की रचनाएँ

किस दुनिया से आये हो तुम

किस दुनिया से आये हो तुम पाषाणों में जीवन भरने

जूठे जल से किया आचमन
जप टूटी बैजंती माला
पीड़ाओं को कण्ठ लगाकर
तुलसी की मानस कर डाला
जीवन की सूनी वेदी पर प्राणों का मंगल-घट धरने
किस दुनिया से आये हो तुम पाषाणों में जीवन भरने

पुण्य-नेह का कुंकुम डाला
धूलिकणों से धुले माथ पर
अक्षय वर की पूंजी धर दी
वरदानों से रिक्त हाथ पर
अनपूजी मूरत पर बनकर श्रद्धा के सुमनों-सा झरने
किस दुनिया से आये हो तुम पाषाणों में जीवन भरने

गंगा-यमुना-सरस्वती सब
अलग-थलग होकर बहती थीं
अवचेतन होकर आतप में
मरुथल-सी निशि-दिन दहती थीं
संवेगों का तर्पण देकर श्वाँसों को संगम-तट करने
किस दुनिया से आये हो तुम पाषाणों में जीवन भरने

रीत चुके नयनों की सीपी-
में स्वप्नों के मोती भरके
मन की मुर्झाती काया पर
केसर का आलेपन करके
राधा नागर सा-मन लेकर मेरी भव बाधायें हरने
किस दुनिया से आये हो तुम पाषाणों में जीवन भरने

चिरैय्या खबरदार

शातिर हैं अब हवा के झोंके, कातिल बड़ी बयार
चिरैय्या खबरदार
नहीं घोसला रहा सुरक्षित, पिंजड़े में भी खतरा
कैसे जान सकेगी, किसका मन है कितना सुथरा
खंजर नीड़ के तिनके, काँटे पिंजड़े की दीवारें
हंसों के चेहरे में छिपती, नागों की फुफकारें
बाज़ तेरे हमदर्द बने हैं, गिद्ध हैं पहरेदार
चिरैय्या खबरदार
आसमान है मात्र भरम, ये सभी उड़ानें छल हैं
माना उड़ सकती है चिड़िया, पंखों में जो बल है
पर क्या होगा, जब उड़ान में पर नोचे जायेंगे
पीड़ित को ही नभ के स्वामी, दोषी बतलायेंगे
तलवार बना तू पंखों को, डैनों को कर हथियार
चिरैय्या खबरदार
आस लगाना किससे, क्या मझधार किनारा देंगे
राम स्वयं निर्वासित हैं, क्या तुझे सहारा देंगे
अतः तू अपनी रक्षा खुद कर, बहेलियों-जालों से
बाज़ों, गिद्धों से-जो ढँके हैं, हंसों की खालों से
साहिल तक पहुँचाएगी, बस हिम्मत की पतवार
चिरैय्या खबरदार

वो भंवरा पागल कहाँ गया 

सारी क्यारी पूछ रही है, एक कली से हँस-हँसकर
जो तुझ पर मंडराता था वो भंवरा पागल कहाँ गया

जब जलती-तपती धरती, वो दौड़ा-दौड़ा आता था
जेठ-अषाढ़ की कड़ी धूप में, छतरी सा तन जाता था
उमड़-घुमड़कर करे ठिठोली, गरजे कभी डराये वो
कभी धरा की प्यासी धरती को आँसू बन जाता था
बरखा में भींगी धरती झुलसी-झुलसी ये पूछ रही
मुझे भिंगाने वाला वो अवारा बादल कहाँ गया

देख हक़ीक़त जलती आँखें राहत दिलवाता था वो
बंजर आँखों की धरती में सपने बो जाता था वो
पहरेदारी कभी नज़र का टीका बनकर करता था
कभी बांध नदिया जैसी आँखों का बन जाता था वो
सुर्ख़ उनींदी अँखियाँ भींगे आँचल से ये पूछ रहीं
हमें सजाने वाला वो सुरमा वो काजल कहाँ गया

चाँदी की डोरी में बंध पैरों से लिपटा रहता था
छम-छम की बोली में पगला जानें क्या-क्या कहता था
आने वाले क़दमों की आहट की अगवानी करता
थिरकन-चटकन-बिछड़न-भटकन सबकुछ चुप-चुप सहता था
पायल से टूटा तो उसका मन भी छन से टूट था
पायल बिलखे पूछ रही वो घुंघरू घायल कहाँ गया

रिस गये हैं प्राण

रिस गये हैं प्राण, खाली देह की अंजुल
छोड़कर तुम यूँ गये ज्यों सर्प की केंचुल

आज हर संवेदना, सूना ह्रदय परित्यक्त करके
हो चली मृतप्राय मनसा शक्ति को निश्शक्त करके
डस रहा सब कामनायें, स्मृति-संकुल
छोड़कर तुम यूँ गये ज्यों सर्प की केंचुल

त्याग की ना धूप चाही, ना कोई माँगा समर्पण
पावसी बौछार ना ही रश्मियों का शुभ्र तर्पण
नेह-जल बिन सूखता उर-भूमि का तर्कुल
छोड़कर तुम यूँ गये ज्यों सर्प की केंचुल

सजल हिय की वीचि में परिताप के पंकज पिरोये
वार सीपी – शंख अपने, आतपी प्रस्तर समोये
देह-तटिनी प्राण के परित्याग को व्याकुल
छोड़कर तुम यूँ गये ज्यों सर्प की केंचुल

पलक-पुलिनों पर व्यथा बन अश्रुकण है आज फैली
प्रीति के पावन सरोवर की हुई है निधि विषैली
ताल में दम तोड़ता है राग का दादुल
छोड़कर तुम यूँ गये ज्यों सर्प की केंचुल

यह उपहार ले लो 

रंग अपने सब तुम्हें मैं सौंपती हूँ
हो सके तो आज यह उपहार ले लो

रंग है रक्तिम समर्पण का धवल रंग त्याग का है
पीत है संवेदना का, केसरी अनुराग का है
प्रेम का अक्षय असीमित कोष है यह
भावपूरित यह अमिट आगार ले लो

जागती पथराई आँखें, आज सोना चाहती हैं
अंजुरी में अश्रु के कुछ बीज बोना चाहती हैं
सौंप दो झूठे सपन नयनों को मेरे
और मेरे स्वप्न का संसार ले लो

परिधि से साँसों की होकर मुक्त जीवन, खो रहा है
बिन ‘हृदय’ के स्पन्दनों का मौन हो स्वर, रो रहा है
पल रहा उर में अपरिमित नेह प्रतिपल
इस अभागे नेह का विस्तार ले लो

जीवन-मरण 

दीप अनगिन जगमगाये पर तिमिर छाया घना है
इस धरा के लोक में जीवन-मरण उत्सव बना है

पीर का कारुण कथानक, पात्र भी पुतले चुने हैं
वास्तविकता है धरातल दृश्य आकाशी बुने हैं
सूत्रधर भी है अबूझा, और मंचन अनमना है
इस धरा के लोक में जीवन-मरण उत्सव बना है

बस तनिक सुख-मेघ बरसे, दामिनी दुख की सताये
यदि पवन आनंद दे तो कष्ट का आतप तपाये
कर्म की कुटिया कि जिसपर भाग्य का छप्पर तना है
इस धरा के लोक में जीवन-मरण उत्सव बना है

हर्ष के कंदील भीतर शोकमय सारंग जले है
वर्तिकाओं को ह्रदय की द्वेष की आँधी छले है
द्वार पर पीड़ा का तोरण अश्रुपूरित अल्पना है
इस धरा के लोक में जीवन-मरण उत्सव बना है

यातनाओं की नदी है, प्राण का यह कूल पकड़े
देह के जर्जर महल को त्रास की लहरें हैं जकड़े
और सीपी मन, कि जिसनें भाव का मोती जना है
इस धरा के लोक में जीवन-मरण उत्सव बना है

माँ पर दोहे

अम्मा, मम्मी, माँ कहो, मॉम कहो या मात।
धरती पर माँ ईश है, माँ अनुपम सौगात।।

दीपक, बाती, तेल है, माँ ही है उजियार।
बिजली, बादल, बूँद माँ, माँ बरखा की धार।।

नदिया, पानी, प्यास है, है माँ तृप्ति अशेष।
भक्त, भजन माँ भक्ति है, माँ भगवन का भेष।।

पंछी, पर, परवाज़ माँ, माँ नभ का विस्तार।
जग, जननी, माँ जीवनी, माँ जीवन का सार।।

क्यारी, कोंपल, पंखुड़ी, कोमल कुसुम अनूप।
माँ माटी निर्माण की, माँ ममता का कूप।।

कागज़, कलम, दवात माँ, माँ कविता माँ गीत।
माँ सुर, सरगम, साज़ है, माँ शाश्वत संगीत।।

रूपक, उपमा, श्लेष माँ, माँ अनुपम उपमान।
रामायण, गीता, शबद, माँ ही पाक क़ुरान।।

याद सताती है मुन्ना

चौबारा-चौखट किलसाते और बिराता छप्पर
तेरे पीछे दीवारें भी बहुत चिढ़ाती हैं मुन्ना
घर आ जा रे, मुझको तेरी याद सताती है मुन्ना

चिड़ियाँ तक ना आतीं घर में पसरा है सन्नाटा
इधर-उधर सब बेसुध ऊँघैं का मचिया का पाटा
जैसे-जैसे दिन ढ़लता बेचैनी बढ़ती जाये
किसको ख़ुद से फुर्सत जो मुझसे बोले-बतियाये

पिछली दफ़े तू ले आया था घड़ी अलारम वाली
वही घड़ी टिक-टिक करके मुझसे बतियाती है मुन्ना

दो दिन ते तपती बुखार मा देंही भई अँगीठी
बैठ सिरहाने खों-खों करते अदरक-लौंग-मुलेठी
दाँई आँख मा डेरा डाले पड़ा हुआ है माढ़ा
बदन पिराता गला बंद है कौन बनाये काढ़ा

कोई न लगाता कोलगेट अब डाँट-डपटकर मुझको
जब चूल्हे की लपटें मेरा हाथ जलाती हैं मुन्ना

जल के बिना सूखती तुलसी निकली नहीं कुचईया
खड़ी दुआरे देखे मुझको, गुर्राती है गईया
चादर ओढ़ पड़ी आँगन मा बूँद अकासी गिरती
झुलस रहा तन भींग रहा है भींग रही है धरती

चादर से होकर मुझतक आती पानी की बूँदे
माथे पर ठंडी-ठंडी पट्टी धर जातीं हैं मुन्ना

खाली गलियारा देखूँ तो आँखें भर आती हैं
तेज़ हवायें भरमाने को कुंडी खटकातीं हैं
सुलग रहे मन पर चढ़ जाती है यादों की सीलन
झूठे वादे लेकर तेरी चिट्ठी आ जाती है

दिन भर उखड़ रही साँसों की आँधी से लड़-लड़कर
देर रात इन आँखों की ढिबरी बुझ जाती है मुन्ना
घर आ जा रे मुझको तेरी याद सताती है मुन्ना

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