आर्य भारत की रचनाएँ

तुम्हारी आँखों के ज्यामितीय बॉक्स में 

तुम्हारी आँखों के ज्यामितीय बॉक्स में,
मेरे जिस्म के जंगल से
तुम्हारी रूह की राजधानी तक के सफर के लिए,
बिछी है प्रेम की पटरियाँ
जिसपर सरपटदौड़ने के लिये तय्यार खड़ी है
अपनी जिन्दगी की रेल
मैं साथ लाऊंगा जंगलो से अपना जंगलीपन
जिसको एक समबन्धे चार सम्बन्धे तीन के अनुपात में विभाजित कर देना तुम
उछाल देना जरा आसमान में
‘चाहत का चांदा’अपनी आँखों से
जिससे मेरे चीड़ सरीखे लम्बें हाथों को,
सलाम दुआ करने आ जाए,
मेरे शाल सरीखे सीने पर
अपनी पलकों के पेंसिल से
आसुओं का रेखा चित्र अंकित कर देना,
जिसका अनुवाद करने को मेरा जड़-चेतन
परत दर परत पन्नों में तब्दील होने लगे,
मेरी जंगली झील की पुतरी पर
रख देना अपनी कल्पना का कम्पास
जिससे अपनी दृष्टि के अक्ष पर
घूम सकूँ 360 अंश
निकाल सकूं मथ कर
खुद का जीवन वृत्त
ऐसा करते अनायास ही
मेरे ख़ुर पंजों में
लपलपाती जुबान जीभ मे
खाल कपड़े में परिवर्तित हो जाएगा
और जंगली बू-बास
खो जायेगा
तुम्हारी आंखो के ज्यामितीय बाक्स में

आखिर कहाँ गये

प्रेमिकाओं से बिछुड़े हुए प्रेमी,
आखिर कहाँ गये?
इस सवाल के जेहन में उतरते ही,
चमकने लगतीहै ताजमहल की मीनारें,
खनकने लगती है जगजीत सिंह की आवाज,
और दूर कहीं समुद्र के नीचे
तैरने लगती हैं युगंधर की द्वारिका,
मछलियों की तरह मथुरा की खोज में
लेकिन फिर भी इन अभिशापित प्रेमियों का पता नही मिलता,
तब मैं इतिहास खंगालता हूँ ,
विश्वयुद्ध में मारे गये सैनिकों का इतिहास
क्यूबा में,घाना में,वियतनाम में,फलिस्तीन में,
नेफा में,बस्तर में और अक्साई चीन में,
मारे गये सैनिकों का इतिहास,
देखने लगता हूँ साइबेरिया का तापमान,
हिन्द महासागर की विशाल जल राशि,
प्रशांत महासागर का मेरियाना गर्त
गाजा पट्टी,अफ्रीका,कोरिया का भूगोल
पढने लगता हूँ विज्ञान
नाभिकीय विखंडन के सूत्र
जिससे समाप्त गयी हो नागासाकी की नस्ले,
लेकिन इन गुमशुदा प्रेमियों का पता बताने में
सारे के सारे पन्ने नाकाम हो जाते हैं,
लगता हैं अपने बिछुड़ने का किस्से के साथ
ये प्रेमी भी हाकिंस के ब्लैक होल में विलीन हो गये,
या चले गये किसी अनंत दिशा की ओर मंगल से वृहस्पति होते हुए,
आकाश गंगा के बाहर,
धरती पर किसी भी फैक्ट्री में बिना हड़ताल किये हुए,
इनको रोजगार के नाम पर कारतूस देने वालों,
मैं तुमसे पूछता हूँ ,
प्रेमिकाओं से बिछुड़े हुए ये प्रेमी
आखिर कहाँ गये?

अफीम का बेटा 

जब भी तुमसे प्यार की दो बात,
करने की लिए,
मैं सोचता हूँ,
याद आता हैं मुझे अपना –
सुनहला गाँव,
बरगद,नीम,जामुन,
आम,महुएं की कतारें,
ताल,बांगर,बांध,पोखर,
और अखाड़े
में सीखे वो दाव सारे,
याद आतें हैं हिरामन जो खड़े मेरे दुआरे,
दे रहें हैं कल दियारे की नीलामी की कोई अधिसूचना,
याद आता है मेरा स्कूल,
मेरी क्लास,
जिसमें-
“क्या तुम्हारे काम करते हैं पिताजी?”
प्रश्न ये मास्टर जी द्वारा पूछना,
मैं बताता हूँ की “सर किसान है वो”
और मन में फूट पड़ता हैं धुँआ,
चिलम से गांजे का,
बरसने लगते है मेरे बालपन पर
वो अफीमी आग्नेयास्त्र
जो,नागासाकी पर गिरने वाली मिसाइलों से जरा भी कम नही होते,
मैं तुमको क्या बताऊ
तब यही मैं सोचता हूँ,
काश तेरी जिन्दगी में हम नही होते,
तुम्हे मालुम हैं?
मुझको,मेरे गाँव में,
कहते बुलाते किस तरह हैं?
सभ्यता के इस सुनहले से शिखर पर विराजे,
मैं अपने बाप को पापा नही कहता,
न ही पिता जी कहता हूँ,
न ही बाबूजी,
बस यही सुनता हूँ लोगों से,
अबे ओ मुननवा का बेटा,
और साला मार कर मन,
मान लेता हूँ,
“मैं हूँ अफीम का बेटा”
अफीम क्या होता हैं ?
कैसा रंग होता है?
नहीं मालुम मुझको
बस तुम्हारी आँख में जब झांकता हूँ,
या तुम्हारा हाथ पकड़े,
चाँद-तारे ताकता हूँ,
याद आता हैं मुझे अपना सुनहला गाँव जिसके,
उत्तर में कबीरा वाला ताल हैं,
जिसके दक्खिन में,
पुड़ीयों वाला बिकता ‘माल’है,
उस ताल से इस माल की दुरी
कोई दो-ढाई मील होगी,
और इन्हीं एक फांसलों में
दौड़ती पापा की ‘हीरो’साइकिल होगी,
जो मेरे ख्वाब की पगडंडियो पर लडखडाती है,
जिसके आने की सुन आहट,
मेरी माँ की कलाई,चूड़ियाँ,
सब टूट जाती हैं,
तुम्हे मालुम है अफीम की कीमत?
नही न?
मुझे मालुम है,
दो-चार बिस्वा नही
पुरे पच्चीस बीघे
माँ के जेवर,घर के बर्तन
मेज,कुर्सी,गद्दे,गलीचे,
सब अगर बिक जाए तो तय्यार रहता है,
मेरी माँ का सिन्होरा,
और राशन कार्ड से कट जाता है
अफीमची का हरेक ब्यौरा,
पर नही कटता,
न ही घटता है,
अफीम का अपना जहर,
अफीमची के बाद भी रहता है मेरे नाम पर उसका असर

कुछ न कहना

तुम जहाँ हो चुप ही रहना
कुछ न कहना
मत बताना की हमारी प्रेमिका तुम हो
मत बताना की बहुत ही प्यार करता हूँ
चाय की हर चुस्कियों में
कुल्हड़ो पर होठ का सीत्कार भरता हूँ
जो मेरे प्रेम से उपजी हुई एक खोज है
जो मेरे होठ पर रक्खी हुई एक कल्पना की ओज है
सब छिपाना
स्त्रियाँ तो जन्म को भी गुप्त रखती आ रही है
मैं तो बस प्रेमी तुम्हारा
देह से स्पर्श मेरे
होठ से आदर्श मेरे
दृष्टि से हर हर्ष मेरे
तुम छुपाना
और एकाकी भरे माहौल में
बन कृष्ण मुझको पार्थ सा
झकझोर देना
तुम सदी के कलह से उपजी हुई
कविता में गीता हो
तुम समर के बोध से अनूदित
हमारी भव्य मीता हो
इसलिए सबकुछ छुपाना
जो हमारे बीच का आकाश है
उसमें उड़ाना मत
अपनी आत्मा की गंध
छुपाना ग्रह-नक्षत्रों को
जो तुमने हैं बनाये
छुपाना निर्वात
जिसमे प्रेम का गुरुत्व हमने है बहाए
मैं जानता हूँ इसलिए तुमसे मैं ऐसा कह रहा हूँ
बस तुम ही हो जो मुझको मुजरिम होने से
जेल जाने से
छुपा सकती हो
मुझको भुखमरी से
बचा सकती हो

तुम कोई कैदी नही हो

तुम कोई कैदी नही हो,
न मुकदमा न गवाही
न अदालत न ही कोई फैसला,
फिर क्यों तुम्हे
अपराधियों की भांति
करके बंद,लगा कर चौकसी ऊँचे दीवारों की
तुम्हारे हॉस्टल के गेट पर
लटका दिया है
लेट एंट्री का कोई थुलथुला ताला,

तुम्हारे ख्वाब के आकाश में
चमकने वाले ग्रह-नक्षत्रो को
तुम्हारे चन्द्रमा को,
बता कर अपहरणकर्ता
छत की चादर से तुम्हे महफूज आखिर कर दिया है,
तो क्या बस इसलिए की पास तेरे
सिनेमा से लेकर अखबार तक
सबमें दिखने वाली अप्सराओं की तरह,
उनुमक्त केश
मादक नयन
सुर्ख अधर
उभरे उरोज
लचकती कमर
प्रमत्त चाल
से बनी एक देह हैं,

या बस इसलिए की पास तेरे
सोने चांदी की बालियाँ,कंगन,खनकती चूड़ियाँ हैं
या कि शायद इसलिए कि पास तुमने,
कपास के खेतों से निकली
रुई के फाहों से निर्मित
श्वेत सैनेटरी पैड,ब्रा ब्लाउज
जैसा रहस्यमयी पोशाक रखा है,

तो फिर तुम छोड़ क्यों नही देती
निकल क्यों नही जाती
चूडियों के वृत्त से
पोशाकों के चित्र से
स्त्री के चरित्र से

क्यों नही किसी दिन
अपनी महिला संरक्षक के समक्ष
तोडकर चूड़ियाँ करती विधवा विलाप
उड़ा देती हवा में लहुलुहान सफेद कबूतर
खोल देती होस्टेल के सारे हुक
और दीवारों के सीनों पर लिख देती
अपने वक्ष का माप
आखिर देश भी 56 इंच के सीने से चला करता है

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