आर्य हरीश कोशलपुरी की रचनाएँ

ख़ाब में वो घुमाते रहे 

ख़ाब में वो घुमाते रहे
हम न फूले समाते रहे

ढेरों चेहरे बदल करके वो
सब्र को आजमाते रहे

पत्थरों से नही हम प्रिये
फूल से चोट खाते रहे

सुब्ह की फ़िक्र में उम्र भर
कोरे सूरज उगाते रहे

वैसे थीं हर तरफ नफ़रतें
प्रेम का गीत गाते रहे

माँग लीं रोटियाँ जो कहीं
मेरी गरदन दबाते रहे

नाम बह्रों का रटके क्या होगा

नाम बह्रों का रटके क्या होगा
कथ्य से यारों कटके क्या होगा

जिसमें हालाते हाज़रा हो नै
ऐसे गीतों से सटके क्या होगा

इतनी मंहगाई है ख़ुदारा की
दाम घट जाए घटके क्या होगा

पेट पालूँ या इश्क फरमाऊँ
दिल का सौदा है पटके क्या होगा

मीत पैसा तो ठग के आता है
ख़ेत में इतना खटके क्या होगा

बेंच देती है अपनी क़ुरबानी
ऐसी सीमा पे डटके क्या होगा

दौलत माल ख़जाना प्यारे

दौलत माल ख़जाना प्यारे
सब कुछ छोड़के जाना प्यारे

कुछ तो नेक कमाई कर लो
गाएं लोग तराना प्यारे

कोई ग़ैर न सब अपने हैं
बेज़ा ज़ुल्म न ढाना प्यारे

नाहक़ सोच बनाकर उलझे
कोई रंक न राना प्यारे

जब से बात, समझ आ जाए
सच का साथ निभाना प्यारे

मान नही अपमान बहुत है 

मान नही अपमान बहुत है
भेंट नही अनुदान बहुत है

गाँव समूचा घोंटने ख़ातिर
एक प्रभो परधान बहुत है

यार नही है ज़ेब में पैसा
माँल सजा सामान बहुत है

ढंग नही बस माँग रहे हो
सीख के देखो तान बहुत है

मान सहित जो तुमने खिलाया
एक तुम्हारा पान बहुत है

हर घड़ी सुधार देखकर 

हर घड़ी सुधार देखकर
पड़ रही दरार देखकर

थक गई है आँख बेसबब
आपका प्रचार देखकर

डाक्टर मरीज़ हो गए
संक्रमित बुख़ार देखकर

दिल दुखी है मन की बात से
आचरण फ़रार देखकर

आपका ये मापदंड भी
राजभर चमार देखकर

क़िस्म क़िस्म के ये हथकंडे
टूटते गंवार देखकर

आए दिन घोटाला होता

आए दिन घोटाला होता
गोरा मुखड़ा काला होता

निज पूँजी के चक्कर में ही
कैसा गड़बड़ झाला होता

असुरक्षित जीवन के नाते
धन धरती पर ताला होता

होता ग़र सब कुछ सामूही
हर हाथों में हाला होता

ज़रा सा मान मिला आत्म मुग्ध हो बैठे

ज़रा सा मान मिला आत्म मुग्ध हो बैठे
किसी से ठन जो गई आप क्रुद्ध हो बैठे

लड़ाई और बखेड़े सराय की ख़ातिर
अहम् ने पाँव पसारे औ युद्ध हो बैठे

किसी को वैर किसी को क्षमा सिखाकर तुम
ये दोहरा पाठ पढ़ाकर प्रबुद्ध हो बैठे

बना के राज महल मठ विहार कहते जी
बड़े आसान तरीक़े से बुद्ध हो बैठे

हज़ारों साल के बिगड़े हुए चलन के हित
ज़रा सा वक़्त दिया और क्षुब्ध हो बैठे

नहा के नित्य पसीने अशुद्ध रहता मैं
रुधिर में आप नहा करके शुद्ध हो बैठे

कोयलों की कूँ कहीं तो कांव का मौसम

कोयलों की कूँ कहीं तो काँव का मौसम
हो चला है फिर गुलाबी गाँव का मौसम

बैठकर बातें चलो कर लें जवानी की
आम की अमराइयाँ हैं छाँव का मौसम

झूम कर गाले बजा लें ताल बासंती
है सुरों की रव ठुनकते पाँव का मौसम

उड़ चलें पछुवाँ पवन के संग अपने घर
शह्र में मिलता नही है गाँव का मौसम

सम्मिलन के पर्व पर दिल खोल कर मिल लें
चाहतें मन की बचा लें दाँव का मौसम

साधु को भी छूट मिलती है यहाँ कुछ दिन
ढूँढ ले तूँ भी ठिकाने ठाँव का मौसम

अजब देखा विरोधाभास यारो

अजब देखा विरोधाभास यारो
नदी के कंठ पर ही प्यास यारो

यहाँ अन्याय की दुनिया सजी है
लगे सहयोग में इजलास यारो

खड़े रहने को भी धरती नही है
उड़ो ख़ाली पड़ा आकाश यारो

बने हो ऐंठ में राणा के वंशज
पहाड़ों की चबाओ घास यारो

हमारे साथ के सब कह रहे हैं
लिखो पतझड़ को ही मधुमास यारो

कभी इस लेखनी को भी सराहो
ज़रा दिल से कहो शाबास यारो

कहाँ तक अश्क का सौदा करेंगे

कहाँ तक अश्क का सौदा करेंगे
हमारी जुस्तजू रोका करेंगे

दिवाने हैं मेरी बस्ती के ऐसे
उबलते शोर को बहरा करेंगे

वही मजबूरियाँ बेवश के आँसू
नज़ारे कब तलक देखा करेंगे

वो जिनकी मुट्ठियों में है ज़माना
वही तक़दीर का धन्धा करेंगे

दनुजता बाँट के या बम गिराके
खिले गुलशन को फिर सहरा करेंगे

ज़रूरतमंद को रोटी न दीजै
हमेशा जलज़ला देखा करेंगे

जहाँ जरूरत गूँगे लोग

जहाँ जरूरत गूँगे लोग
नही जरूरत भूंके लोग

खुशी मनाते निर्भर डे की
उबे दिखे हैं चूके लोग

दवा कराके हैं मायूस
मरज़ पुराना सूखे लोग

अधर कहाँ से होंगे सुर्ख़
नदी किनारे भूखे लोग

किसी समय आ करके देख
तरुण समय है सूखे लोग

सुख का आँचल गीला है

सुख का आँचल गीला है
दुख कैसा रंगीला है

दो एक चेहरा ताज़ा पर
ज़्यादातर तो पीला है

लूटो पाटो खुल करके
यह शासन की लीला है

प्यासे प्यासे रहते हो
क्यूँ अंदर रेतीला है

तुम पाकीज़ा पावन हो
केवल पापिन शीला है

कैसे भी हो काटो तुम
जब तक सिस्टम ढीला है

ग़र आपने ग़जलों की ज़ुल्फों को संवारा है

ग़र आपने ग़जलों की ज़ुल्फों को संवारा है
हमने भी उसे अपने अश्कों से पखारा है

इस देश की मिट्टी पर, चंदन पे या ख़ुशबू पर
हक़ जितना तुम्हारा है हक़ उतना हमारा है

क्यूं वक़्त की सच्चाई रख देता है काग़ज़ पर
इस नाते मेरे कवि का गर्दिश में सितारा है

हम माफ़ नही होंगे ग़ज़लों की अदालत में
हमने जो ग़ुनाहों की तस्वीर उतारा है

तर होते पसीने में ग़ज़लों के सिकंदर भी
ये शे, र जो कहता हूँ एहसान तुम्हारा है

हिंदी से या उरदू से छू करके इसे देखो
शीशे के बदन जैसा एहसास कुँवारा है

न फॉसी न यूं विष ग्रहन ढूँढना था 

न फाँसी न यूं विष ग्रहन ढूँढना था
चले कैसे जीवन जतन ढूंढना था

मिटे कैसे इंसानियत ढूंढते हैं
प्रकृति का सखे विष वमन ढूंढना था

न मजहब की चिंता न पंथों का चक्कर
धरा पर हमें वह चलन ढूंढना था

धरा हर बशर की जो रहती बराबर
तो किस बात का फिर ग़बन ढूंढना था

अरे ख़ुशबुओं क़ैद का है नतीज़ा
बहारों में वेश्यागमन ढूंढना था

सदाचार जब घर से बाहर न निकला
उसी कीच में फिर रतन ढूंढना था

सब्र टूटा अपावन हुए

सब्र टूटा अपावन हुए
राम से लोग रावन हुए

धूर्तों से सदाचार पढ़
आठ से लो अठावन हुए

दर्द का कोई हल ही न था
अश्क़ आंखों में सावन हुए

एक ही कंस था कृष्ण जी
बीस से आज बावन हुए

पूरी बसुधा न हो एक घर
सरहदों पे बिछावन हुए

आबे गंगा भी हैरत में है
देश में इतने पावन हुए

पाप का पुण्य का आधार बना रक्खा है

पाप का पुण्य का आधार बना रक्खा है
दुष्ट का देव का संसार बना रक्खा है

कोई पैदा नही होता यहाँ पापी होके
एक हालात ने बीमार बना रक्खा है

कर्मफल कुंडली क़ानून ही मजलूमों को
पुश्त से क़र्ज़ का हक़दार बना रक्खा है

गीत के ढेर ही लगते हैं यहाँ बेमौसम
क्षोभ ने पुस्तकी भंडार बना रक्खा है

बस वही सरहदों सीमाओं के रगड़े झगड़े
ख़ून ही पीने का व्यापार बना रक्खा है

कृष्ण ग़र आपकी चली होती 

कृष्ण ग़र आपकी चली होती
हर ग़ली प्रेम की ग़ली होती

कोई आशिक़ ज़ुदा नही होता
कोई राधा नही छली होती

शक़ को कोई जगह नही मिलती
कोई सीता नही जली होती

भूंख के पास रोटियाँ रहतीं
ज़ात की फ़स्ल भी दली होती

प्रेम की डोर में बंधे होते
खुरदुरी फ़र्श मखमली होती

कोई पंडित न मौलवी होता
सम्प्रदायिक न खलबली होती

बचेगी न गंगा गौरइया बचेगी 

बचेगी न गंगा गौरइया बचेगी
बचेगी न मोहन की गइया बचेगी

सुदेशी के जप से विदेशी के धन से
न पिंजरे की सोनल चिरइया बचेगी

किए जा रहे तुम तो जंगल सफाया
न छतनार छितुवन की छंइया बचेगी

मुहब्बत को घेरे में रक्खा गया है
मुहब्बत नही अब कन्हैया बचेगी

प्रबल आधुनिकता के तूफान में हैं
नही इस भंवर से ये नइया बचेगी

बचेगी न इज्ज़त कोई कुछ भी कर ले
बचेगी तो बस थू थू थैया बचेगी

हौसले की उड़ान रखते हैं 

हौसले की उड़ान रखते हैं
औ हथेली पे जान रखते हैं

दिल में रखते हैं प्यार का दरिया
लब पे मुरली की तान रखते हैं

सारी दुनिया में अम्न की ख़ातिर
हम इरादा महान रखते हैं

जानते हैं जवाब भी देना
पर ज़बाँ बेज़ुबान रखते हैं

एक पल का नही भरोसा है
आप इतना ग़ुमान रखते हैं

जब भी बोलें तो सोचकर बोलें
लफ़्ज तीरो कमान रखते हैं

मोटू मालामाल मिलेगा

मोटू मालामाल मिलेगा
मजदूरा बेहाल मिलेगा

बेकारों की फौज़ मिलेगी
भूखा पिचका गाल मिलेगा

बेंचो लाकर देश हमारे
ग्राहक मालामाल मिलेगा

हर मुद्दा उलझाने ख़ातिर
सारा अंतर्जाल मिलेगा

हर नुक्कड़ पर देख लो आके
विक्रम का बैताल मिलेगा

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