आलम की रचनाएँ

ऐसौ बारौ बार याहि बाहरौ न जान दीजै

ऐसौ बारौ बार याहि बाहरौ न जान दीजै,
बार गए बौरी तुम बनिता सँगन की ।
ब्रज टोना टामन निपट टोनहाई डोलैं,
जसोदा मिटाउ टेव और के अँगन की ।
‘आलम’ लै राई लौन वारि फेरि डारि नारि,
बोलि धौं सुनाइ धुनि कनक कंगन की ।
छीर मुख लपटाये छार बकुटनि भरें, छीया,
नेंकु छबि देखो छँगन-मँगन की ।

कँज की सी कोर नैना ओरनि अरुन भई 

कँज की सी कोर नैना ओरनि अरुन भई,
कीधौं चम्पी सींब चपलाई ठहराति है।
भौहन चढ़ति डीठि नीचे कों ढरनि लागी,
डीठि परे पीठि दै सकुचि मुसकाति है ।
सजनी की सीख कछु सुनी अनसुनी करें,
साजन की बातें सुनि लाजन समाति है ।
रूप की उमँग तरुनाई को उठाव नयो,
छाती उठि आई लरिकाई उठी जाति है ।

चन्द को चकोर देखै निसि दिन करै लेखै 

चन्द को चकोर देखै निसि दिन करै लेखै,
चन्द बिन दिन-दिन लागत अन्धियारी है ।
आलम सुकवि कहै भले फल हेत गहे,
काँटे-सी कटीली बेलि ऐसी प्रीति प्यारी है ।
कारो कान्ह कहत गँवार ऐसी लागत है,
मेरे वाकी श्यामताई अति ही उजारी है ।
मन की अटक तहाँ रूप को बिचार कैसो,
रीझिबे को पैड़ो अरु बूझ कछु न्यारी है ।

झीनी सी झँगूली बीच झीनो आँगु झलकतु 

झीनी-सी झँगूली बीच झीनो आँगु झलकतु,
झुमरि-झुमरि झुकि ज्यों क्यों झूलै पलना ।
घुँघरू घुमत बनै घुँघुरा के छोर घने,
घुँघरारे बार मानों घन बारे चलना ।
आलम रसाल जुग लोचन बिसाल लोल,
ऐसे नन्दलाल अनदेखे कहूँ कल ना ।
बेर-बेर फेरि फेरि गोद लै-लै घेरि-घेरि,
टेरि-टेरि गावें गुन गोकुल की ललना ।

रात के उनींदे अरसाते

रात के उनींदे अरसाते,मदमाते राते
अति कजरारे दृग तेरे यों सुहात हैं.
तीखी तीखी कोरनि करोरि लेत काढ़े जिउ,
केते भए घायल औ केते तफलात हैं.
ज्यों ज्यों लै सलिल चख ‘सेख’धोवै बार बार,
त्यों त्यों बल बुंदन के बार झुकि जात हैं.
कैबर के भाले,कैधौं नाहर नहनवाले,
लोहू के पियासे कहूँ पानी तें आघात हैं?

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