आलोकधन्वा की रचनाएँ

सूर्यास्त के आसमान

उतने सूर्यास्त के उतने आसमान
उनके उतने रंग
लम्बी सडकों पर शाम
धीरे बहुत धीरे छा रही शाम
होटलों के आसपास
खिली हुई रौशनी
लोगों की भीड़
दूर तक दिखाई देते उनके चेहरे
उनके कंधे जानी -पह्चानी आवाजें

कभी लिखेंगें कवि इसी देश में
इन्हें भी घटनाओं की तरह!

 

अचानक तुम आ जाओ 

इतनी रेलें चलती हैं
भारत में
कभी
कहीं से भी आ सकती हो
मेरे पास

कुछ दिन रहना इस घर में
जो उतना ही तुम्हारा भी है
तुम्हें देखने की प्यास है गहरी
तुम्हें सुनने की

कुछ दिन रहना
जैसे तुम गई नहीं कहीं

मेरे पास समय कम
होता जा रहा है
मेरी प्यारी दोस्त

घनी आबादी का देश मेरा
कितनी औरतें लौटती हैं
शाम होते ही
अपने-अपने घर
कई बार सचमुच लगता है
तुम उनमें ही कहीं
आ रही हो
वही दुबली देह
बारीक चारख़ाने की
सूती साड़ी
कन्धे से झूलता
झालर वाला झोला
और पैरों में चप्पलें
मैं कहता जूते पहनो खिलाड़ियों वाले
भाग-दौड़ में भरोसे के लायक

तुम्हें भी अपने काम में
ज़्यादा मन लगेगा
मुझसे फिर एक बार मिलकर
लौटने पर

दुख-सुख तो
आते जाते रहेंगे
सब कुछ पार्थिव है यहाँ
लेकिन मुलाक़ातें नहीं हैं
पार्थिव
इनकी ताज़गी
रहेगी यहीं
हवा में !
इनसे बनती हैं नई जगहें
एक बार और मिलने के बाद भी
एक बार और मिलने की इच्छा
पृथ्वी पर कभी ख़त्म नहीं होगी

 

शंख के बाहर

सूँढ़ जैसे लंबे इस शंख के भीतर गुज़र रहा हूँ
जल की कुल्हाड़ियाँ इसे चीर रही हैं और
मैं कुल्हाड़ियों को चीर रहा हूँ

शंख के बाहर माँ खड़ी है
कनपटी पर एक लम्बे बाघ की छाया लिये –
दहाड़ से माँ की त्वचा फट रही है और
नारियल की रस्सियों की तरह कठोर लहू बाहर आ रहा है
फिर भी वह केवल मेरे इंतज़ार में
अब तक माँ बनी हुई है कोई चीज़ कोई एकान्त नहीं हुई
माँ कभी भी एकांत नहीं हुई, जब से वह माँ हुई मेरी-
और मैं इस सूँढ़ जैसे शंख के भीतर गुज़र रहा हूँ !

धूप से जली भौंहें और शीत से लँगड़े हो गये पैर
असमय निधन लोहे के गोलों की तरह ठोस, हृदयहीन
चारों ओर निधन / बच्चों का निधन
दूध के बिना निधन / गेहूँ के बिना निधन
कौन रोकता है दूध को बच्चों तक आने में / गेहूँ को कौन रोकता है
बाहर निकालो इस आततायी को
 
शंख से बाहर पिता झुकते जा रहे हैं
मिट्टी की ओर रीढ़
अब उनकी सीधी कमर कभी नहीं देख सकूंगा
कविता में भी नहीं
माँड़ पीते-पीते, मकई खाते-खाते
पिता सन्ना टे से भर गये केवल
जगमगाते हुए चावल के साथ पिता के शब्दों को भी ले गया ज़मींदार !
मैं कवि हूँ ? क्या मैं सचमुच कवि हूँ ?
या महज़ काग़ज काटने वाला एक चाक़ू हूँ या
अख़बार से ढँका हुआ मैदान हूँ मैं कोई ?
शंख के बाहर बारूद के हथियार खड़े हैं।
और
हथियार के चारों ओर लोग हल चला रहे हैं।

(1973)

 

चेन्नई में कोयल

चेन्नई में कोयल बोल रही है
जबकि
मई का महीना आया हुआ है
समुद्र के किनारे बसे इस शहर में

कोयल बोल रही है अपनी बोली
क्या हिंदी
और क्या तमिल
उतने ही मीठे बोल
जैसे अवध की अमराई में !

कोयल उस ऋतु को बचा
रही है
जिसे हम कम जानते हैं उससे !

 

भूल पाने की लड़ाई 

उसे भूलने की लड़ाई
लड़ता रहता हूँ
यह लड़ाई भी
दूसरी कठिन लड़ाइयों जैसी है

दुर्गम पथ जाते हैं उस ओर

उसके साथ गुजारे
दिनों के भीतर से
उठती आती है जो प्रतिध्वनि
साथ-साथ जाएगी आजीवन

इस रास्ते पर कोई
बाहरी मदद पहुँच नहीं सकती

उसकी आकस्मिक वापसी की छायाएँ
लम्बी होती जाती हैं
चाँद-तारों के नीचे

अभिशप्त और निर्जन हों जैसे
एक भुलाई जा रही स्त्री के प्यार
के सारे प्रसंग

उसके वे सभी रंग
जिनमें वह बेसुध
होती थी मेरे साथ
लगातार बिखरते रहते हैं
जैसे पहली बार
आज भी उसी तरह

मैं नहीं उन लोगों में
जो भुला पाते हैं प्यार की गई स्त्री को
और चैन से रहते हैं

उन दिनों मैं
एक अख़बार में कॉलम लिखता था
देर रात गए लिखता रहता था
मेज़ पर
वह कब की सो चुकी होती
अगर वह कभी अचानक जग जाती
मुझे लिखने नहीं देती
सेहत की बात करते हुए
मुझे खींच लेती बिस्तर में
रोशनी गुल करते हुए

आधी नींद में वह बोलती रहती कुछ
कोई आधा वाक्य
कोई आधा शब्द
उसकी आवाज़ धीमी होती जाती
और हम सो जाते

सुबह जब मैं जगता
तो पाता कि
वह मुझे निहार रही है
मैं कहता
तुम मुझे इस तरह क्या देखती हो
इतनी सुबह
देखा तो है रोज़
वह कहती
तुम मुझसे ज़्यादा सुन्दर हो
मैं कहता
यह भी कोई बात हुई

भोर से नम
मेरे छोटे घर में
वह काम करती हुई
किसी ओट में जाती
कभी सामने पड़ जाती

वह जितने दिन मेरे साथ रही
उससे ज़्यादा दिन हो गए
उसे गए !

 

सफेद रात

पुराने शहर की इस छत पर
पूरे चांद की रात
याद आ रही है वर्षों पहले की
जंगल की एक रात

जब चांद के नीचे
जंगल पुकार रहे थे जंगलों को
और बारहसिंगे
पीछे छूट गए बारहसिंगों को
निर्जन मोड पर ऊंची झाडियों मे
ओझल होते हुए

क्या वे सब अभी तक बचे हुए हैं
पीली मिट्टी के रास्ते और खरहे
महोगनी के घने पेड
तेज महक वाली कड़ी घास
देर तक गोधूलि ओस
रखवारे की झोपड़ी और
उसके ऊपर सात तारे
पूरे चांद की इस शहरी रात में
किसलिए आ रही है याद
जंगल की रात

छत से झांकता हूं नीचे
आधी रात बिखर रही है

दूर-दूर तक चांद की रोशनी

सबसे अधिक खींचते हैं फुटपाथ
खाली खुले आधी रात के बाद के फुटपाथ
जैसे आंगन छाए रहे मुझमें बचपन से ही
और खुली छतें बुलाती रहीं रात होते ही
कहीं भी रहूं
क्या है चांद के उजाले में
इस बिखरती हुई आधी रात में
एक असहायता
जो मुझे कुचलती है और एक उम्मीद
जो तकलीफ जैसी है
शहर में इस तरह बसे
कि परिवार का टूटना ही उसकी बुनियाद हो जैसे
न पुरखे साथ आए न गांव न जंगल न जानवर
शहर में बसने का क्या मतलब है
शहर में ही खत्म हो जाना?
एक विशाल शरणार्थी शिविर के दृश्य
हर कहीं उनके भविष्यहीन तंबू
हम कैसे सफर में शामिल हैं
कि हमारी शक्ल आज भी विस्थापितों जैसी
सिर्फ कहने के लिए कोई अपना शहर है
कोई अपना घर है
इसके भीतर भी हम भटकते ही रहते हैं

लखनऊ में बहुत कम बच रहा है लखनऊ
इलाहाबाद में बहुत कम इलाहाबाद
कानपुर और बनारस और पटना और अलीगढ़
अब इन्हीं शहरों में
कई तरह की हिंसा कई तरह के बाजार
कई तरह के सौदाई
इनके भीतर इनके आसपास
इनसे बहुत दूर बम्बई हैदराबाद अमृतसर
और श्रीनगर तक
हिंसा
और हिंसा की तैयारी
और हिंसा की ताकत

बहस चल नहीं पाती
हत्याएं होती हैं
फिर जो बहस चलती है
उनका भी अंत हत्याओं में होता है
भारत में जन्म लेने का
मैं भी कोई मतलब पाना चाहता था
अब वह भारत भी नहीं रहा
जिसमें जन्म लिया

क्या है इस पूरे चांद के उजाले में
इस बिखरती हुई आधी रात में
जो मेरी सांस
लाहौर और कराची और सिंध तक उलझती है?

क्या लाहौर बच रहा है?
वह अब किस मुल्क में है?
न भारत में न पाकिस्तान में
न उर्दू में न पंजाबी में
पूछो राष्ट्रनिर्माताओं से
क्या लाहौर फिर बस पाया?

जैसे यह अछूती
आज की शाम की सफेद रात
एक सचाई है
लाहौर भी मेरी सचाई है

कहां है वह
हरे आसमान वाला शहर बगदाद
ढूंढो उसे
अब वह अरब में कहां है?

पूछो युद्ध सरदारों से
इस सफेद हो रही रात मे
क्या वे बगदाद को फिर से बना सकते हैं?

वे तो खजूर का एक पेड भी नहीं उगा सकते
वे तो रेत में उतना भी पैदल नहीं चल सकते
जितना एक बच्चा ऊंट का चलता है
ढूह और गुबार से
अंतरिक्ष की तरह खेलता हुआ

क्या वे एक ऊंट बना सकते हैं?
एक गुम्बद एक तरबूज एक ऊंची सुराही
एक सोता
जो धीरे-धीरे चश्मा बना
एक गली
जो ऊंची दीवारों के साए में शहर घूमती थी
और गली में
सिर पर फिरोजी रूमाल बांधे एक लड़की
जो फिर कभी उस गली में नहीं दिखेगी

अब उसे याद करोगे
तो वह याद आएगी
अब तुम्हारी याद ही उसका बगदाद है
तुम्हारी याद ही उसकी गली है
उसकी उम्र है
उसका फिरोजी रूमाल है

जब भगत सिंह फांसी के तख्ते की ओर बढ़े
तो अहिंसा ही थी
उनका सबसे मुश्किल सरोकार
अगर उन्हें कुबूल होता
युद्ध सरदारों का न्याय
तो वे भी जीवित रह लेते
बरदाश्त कर लेते
धीरे-धीरे उजड़ते रोज मरते हुए
लाहौर की तरह
बनारस अमुतसर लखनऊ इलाहाबाद
कानपुर और श्रीनगर की तरह

 

पक्षी और तारे

पक्षी जा रहे हैं और तारे आ रहे हैं

कुछ ही मिनटों पहले
मेरी घिसी हुई पैंट सूर्यास्त से धुल चुकी है

देर तक मेरे सामने जो मैदान है
वह ओझल होता रहा
मेरे चलने से उसकी धूल उठती रही

इतने नम बैंजनी दाने मेरी परछाई में
गिरते बिखरते लगातार
कि जैसे मुझे आना ही नहीं चाहिए

 

फर्क 

देखना
एक दिन मैं भी उसी तरह शाम में
कुछ देर के लिए घूमने निकलूंगा
और वापस नहीं आ पाऊँगा !
 
समझा जायेगा कि
मैंने ख़ुद को ख़त्म किया !
 
नहीं, यह असंभव होगा
बिल्कुल झूठ होगा !
तुम भी मत यक़ीन कर लेना
तुम तो मुझे थोड़ा जानते हो !
तुम
जो अनगिनत बार
मेरी कमीज़ के ऊपर ऐन दिल के पास
लाल झंडे का बैज लगा चुके हो
तुम भी मत यक़ीन कर लेना।
 
अपने कमज़ोर से कमज़ोर क्षण में भी
तुम यह मत सोचना
कि मेरे दिमाग़ की मौत हुई होगी !
नहीं, कभी नहीं !
हत्याएँ और आत्महत्याएँ एक जैसी रख दी गयी हैं
इस आधे अँधेरे समय में।
फ़र्क़ कर लेना साथी !

(1992)

 

सात सौ साल पुराना छंद

पृथ्वी घूमती हुई गयी किस ओर
कि सेब में फूल आने लगे

छोटे-छोटे शहरों के चाँद
अलग-अलग याद आये
बारिश से ऊपर उठते हुए उनका क़रार

घास की पत्तियों में ठहर गयी बूँदें
बिखरने लगीं तमाम नींद में
 
धूप उतरी नींबू में

पहला प्यार जब राख हो गया
ख़ुद को बचाया उस साँवली नृत्य शिक्षिका ने
दंगे के ख़िलाफ़ दिखी वह प्रभातफेरी में फिर
शरीर और समुदाय एक हुआ

लंबी छुट्टी बीच में हीं ख़त्म कर
लौटी वह फिर काम पर
आयी अपनी छात्राओं के बीच
अभ्यास कराने सात सौ साल पुराने छंद का।

(1994)

 

समुद्र और चांद

जब समुद्र उठ रहा था चाँद की ओर
पश्चिम भारत के अंतिम किनारे पर
उस शाम मैंने उसे देखा

और चाँद
ट्राम के पहिए जितना बड़ा
और वह शहर कलकत्ता बहुत दूर
जहाँ ट्राम चलती है

समुद्र उठ रहा था चाँद की ओर
उस तरह सिर्फ़ घोड़े ही उठ सकते हैं
जैसे वे दिखते ही तब हैं
जब वे दौड़ते हैं

समुद्र उठ रहा था चाँद की ओर
मैं बिलकुल पास ही खड़ा था
एक ऐसा अकेलापन एक तनाव
रोने की भी इच्छा हुई
लेकिन रुलाई फूटी नहीं

और किस तरह रात आ रही थी
उतनी ऊँची लहरों में
कहीं दिख नहीं रही थी
मेरी पुरानी कमीज़ के सिवा

देर तक वहाँ टिकना मुश्किल था
बम्बई के भीतर लौट।

(1990)

 

ओस 

शहर के बाहर का
यह इलाक़ा

ज़्यादा जुती हुई ज़मीन
खेती की

मिट्टी की क्यारियाँ हैं
दूर तक
इन क्यारियों में बीज
हाथ से बोए गए हैं

कुछ देर पहले ज़रा-ज़रा
पानी का छिड़काव किया गया है !

इन क्यारियों की मिट्टी नम है

खुले में दूर से ही दिखाई
दे रही शाम आ रही है

कई रातों की ओस मदद करेगी
बीज से अंकुर फूटने में !

 

रेशमा

रेशमा हमारी क़ौम को
गाती हैं
किसी एक मुल्क को नहीं

जब वे गाती हैं
गंगा से सिन्धु तक
लहरें उठती हैं

वे कहाँ ले जाती हैं
किन अधूरी,
असफल प्रेम-कथाओं
की वेदनाओं में

वे ऐसे जिस्म को
जगाती हैं
जो सदियों पीछे छूट गए
ख़ाक से उठाती हैं
आँसुओं और कलियों से

वे ऐसी उदासी
और कशमकश में डालती हैं
मन को वीराना भी करती हैं

कई बार समझ में नहीं
आता
दुनिया छूटने लगती है पीछे
कुछ करते नहीं बनता

कई बार
क़ौमों और मुल्कों से भी
बाहर ले जाती हैं
क्या वे फिर से मनुष्य को
बनजारा बनाना चाहती
हैं ?

किनकी ज़रूरत है
वह अशांत प्रेम
जिसे वह गाती हैं !

मैं सुनता हूँ उन्हें
बार-बार

सुनता क्या हूँ
लौटता हूँ उनकी ओर
बार-बार
जो एक बार है
वह बदलता जाता है

उनकी आवाज़
ज़रा भीगी हुई है
वे क़रीब बुलाती हैं
हम जो रहते हैं
दूर-दूर !

 

नन्हीं बुलबुल के तराने

एक नन्हीं बुलबुल
गा रही है
इन घने गोल पेड़ों में
कहीं छुप-छुपकर
गा रही है रह-रहकर

पल दो पल के लिये
अचानक चुप हो जाती है
तब और भी व्याकुलता
जगाती है
तरानेां के बीच उसका मौन
कितना सुनाई देता है।

इन घने पेड़ों में वह
भीतर ही भीतर
छोटी छोटी उड़ाने भरती हैं
घनी टहनियों के
हरे पत्तों से
खूब हरे पत्तों के
झीने अँधेरे में
एक ज़रा कड़े पत्ते पर
वह टिक लेती है
जहाँ जहाँ हिलते हैं
तराने उस ओर से आते हैं

वह तबितय से गा रही है
अपने नये कंठ से
सुर को गीला करते हुये
अपनी चोंच को पूरा खोलकर

जितना हम आदमी उसे
सुनते हैं
आसपास के पेड़ों के पंक्षी
उसे सुनते हैं ज्यादा

नन्हीं बुलबुल जब सुनती है
साथ के पक्षियों को गाते
तब तो और भी मिठास
घोलती है अपने नये सुर में

यह जो हो रहा है
इस विजन में पक्षीगान
मुझ यायावर को
अनायास ही श्रोता बनाते हुए

मैं भी गुनगुनाने को होता हूँ
पुरानी धुनें
वे जो भोर के डूबते तारों
जैसे गीत!

 

शृंगार

तुम भीगी रेत पर
इस तरह चलती हो
अपनी पिंडलियों से ऊपर
साड़ी उठाकर
जैसे पानी में चल रही हो !

क्या तुम जान-बूझ कर ऐसा
कर रही हो
क्या तुम शृंगार को
फिर से बसाना चाहती हो?

 

रंगरेज

एक पुरानी कार रंगी जा रही है
छलकने तक रंगी जायेगी।

(1991)

 

भूखा बच्‍चा

मैं उसका मस्तिष्क नहीं हूँ
मैं महज उस भूखे बच्चेस की आँत हूँ।
उस बच्चे की आत्मा गिर रही है ओस की तरह
जिस तरह बाँस के अँखुवे बंजर में तड़कते हुए ऊपर उठ रहे हैं
उस बच्चे का सिर हर सप्ताह हवा में ऊपर उठ रहा है
उस बच्चे के हाथ हर मिनट हवा में लम्बे हो रहे हैं
उस बच्चे की त्वचा कड़ी हो रही है
हर मिनट जैसे पत्तियाँ कड़ी हो रही हैं
और
उस बच्चे की पीठ चौड़ी हो रही है जैसे कि घास
और
घास हर मिनट पूरे वायुमंडल में प्रवेश कर रही है
लेकिन उस बच्चे के रक्त़संचार में
मैं सितुहा-भर धुँधला नमक भी नहीं हूँ
उस बच्चे के रक्तसंचार में
मैं केवल एक जलआकार हूँ
केवल एक जल उत्तेजना हूँ।

(1973)

 

शरद की रातें

शरद की रातें
इतनी हल्की और खुली
जैसे पूरी की पूरी शामें हों सुबह तक

जैसे इन शामों की रातें होंगी
किसी और मौसम में

 

बलराज साहनी 

‘गरम हवा’ में आखिरी बार देखा
बलराज साहनी को
जिसे खुद बलराज साहनी नहीं देख पाए

जब मैंने पढ़ी किताब
भीष्म साहनी की लिखी
‘मेरा भाई बलराज’
तो यह जाना कि
हमारे इस महान अभिनेता के मन में
कितना अवसाद था

वे शांतिनिकेतन में
प्रोफेसर भी रहे
और गांधी के
वर्धा आश्रम में भी रहे
गांधी के कहने पर
उन्होंने बीबीसी लंदन
में भी काम किया

लेकिन उनके मन की अशांति
उनके रास्तों को बदलती रही

जब वे बंबई के पृथ्वी थियेटर में आए
इप्टा के नाटकों में काम करने
जहां उनकी मुलाकात हुई
ए.के. हंगल और दूसरे
कई बड़े अभिनेताओं और पटकथा लेखकों और शायरों से

दो बीघा जमीन में
काम करते हुए
बलराज साहनी ने देखा
फिल्मों और समाज के किरदारों
के जटिल रिश्तों को
धीरे-धीरे वे
अपने भीतर की दुनिया से
बाहर बन रहे नए समाज
के बीच आने-जाने लगे

वे अक्सर
पाकिस्तान में मौजूद
अपने घर के बारे में
सोचते थे
और एक बार गए भी वहां
लेकिन लौटकर
बंबई आना ही था

अपने आखिरी दिनों में वे
फिल्मों के आर्क लाइट से बचते
और ज्यादा से ज्यादा अपना समय
जुहू के तट पर
अकेले घूमते हुए बिताते

हजारों लोग हैं
सीमा के दोनों ओर
जो गहरे तनावों के बीच
जीते हैं
और एक
बहुत धीमी मौत
मरते हुए जाते हैं

श्याम बेनेगल की फिल्म
‘ममो’ में
बार-बार भागती है
और छुपती है ममो
वह भारत में ही रहना चाहती है
लेकिन अंततः
भारत की पुलिस उसे पकड़ लेती है
और वह धकेल दी जाती है
पाकिस्तान के नक्शे में
भारत के समाज में
और पाकिस्तान के समाज में
कितने-कितने लोग हैं
जिन्होंने आज तक कबूल नहीं किया
इस विभाजन को

कहते हैं कि
एक बार जब
सत्यजीत राय और ऋत्विक घटक
हवाई जहाज से
कलकत्ता से ढाका जा रहे थे
हवाई जहाज की खिड़की से नीचे देखा
ऋत्विक घटक ने
बहती हुई पद्मा को
डबडबाई आंखों और भारी गले से
उन्होंने कहा पास बैठे
सत्यजीत राय से
मार्णिक वह देखो
बह रही है
हमारी पद्मा
दोनों आगे कुछ बोल नहीं पाए
सिर्फ देखा दोनों ने
बहती पद्मा को
बंगाल के विभाजन को
कभी कबूल नहीं किया दोनों ने

स्वाधीनता की लड़ाई से
हमारी कौम ने जो हासिल किया
उसे विभाजन में कितना खोया
यह हिसाब
बेहद तकलीफदेह है
जो आज भी जारी है.

 

नींद 

रात के आवारा
मेरी आत्मा के पास भी रुको
मुझे दो ऐसी नींद
जिस पर एक तिनके का भी दबाव ना हो

ऐसी नींद
जैसे चांद में पानी की घास

 

चौक 

उन स्त्रियों का वैभव मेरे साथ रहा
जिन्‍होंने मुझे चौक पार करना सिखाया।

मेरे मोहल्‍ले की थीं वे
हर सुबह काम पर जाती थीं
मेरा स्‍कूल उनके रास्‍ते में पड़ता था
माँ मुझे उनके हवाले कर देती थीं
छुटटी होने पर मैं उनका इन्‍तज़ार करता था
उन्‍होंने मुझे इन्‍तज़ार करना सिखाया

कस्‍बे के स्‍कूल में
मैंने पहली बार ही दाख़िला लिया था
कुछ दिनों बाद मैं
ख़ुद ही जाने लगा
और उसके भी कुछ दिनों बाद
कई लड़के मेरे दोस्‍त बन गए
तब हम साथ-साथ कई दूसरे रास्‍तों
से भी स्‍कूल आने-जाने लगे

लेकिन अब भी
उन थोड़े से दिनों के कई दशकों बाद भी
जब कभी मैं किसी बड़े शहर के
बेतरतीब चौक से गुज़रता हूँ
उन स्त्रियों की याद आती है
और मैं अपना दायाँ हाथ उनकी ओर
बढा देता हूँ
बायें हाथ से स्‍लेट को संभालता हूँ
जिसे मैं छोड़ आया था
बीस वर्षों के अख़बारों के पीछे।

 

छतों पर लड़कियां

अब भी
छतों पर आती हैं लड़कियाँ
मेरी ज़िंदगी पर पड़ती हैं उनकी परछाइयाँ।
गो कि लड़कियाँ आयी हैं उन लड़कों के लिए
जो नीचे गलियों में ताश खेल रहे हैं
नाले के ऊपर बनी सीढियों पर और
फ़ुटपाथ के खुले चायख़ानों की बेंचों पर
चाय पी रहे हैं
उस लड़के को घेर कर
जो बहुत मीठा बजा रहा है माउथ ऑर्गन पर
आवारा और श्री 420 की अमर धुनें।

पत्रिकाओं की एक ज़मीन पर बिछी दुकान
सामने खड़े-खड़े कुछ नौजवान अख़बार भी पढ़ रहे हैं।
उनमें सभी छात्र नहीं हैं
कुछ बेरोज़गार हैं और कुछ नौकरीपेशा,
और कुछ लफंगे भी

लेकिन उन सभी के ख़ून में
इंतज़ार है एक लड़की का !
उन्हें उम्मीद है उन घरों और उन छतों से
किसी शाम प्यार आयेगा !

(1992)

 

पगडंडी

वहाँ घने पेड़ हैं
उनमें पगडंडियाँ जाती हैं

ज़रा आगे ढलान शुरू होती है
जो उतरती है नदी के किनारे तक
वहाँ स्त्रियाँ हैं
घास काटती जाती हैं
आपस में बातें करते हुए
घने पेड़ों के बीच से ही उनकी
बातचीत सुनायी पड़ने लगती है।

(1996)

 

फूलों से भरी डाल

दुनिया से मेरे जाने की बात
सामने आ रही है
ठंडी सादगी से

यह सब इसलिए
कि शरीर मेरा थोड़ा हिल गया है
मैं तैयार तो कतई नहीं हूँ
अभी मेरी उम्र ही क्या है !

इस उम्र में तो लोग
घोड़ों की सवारी सीखते हैं
तैर कर नदी पार करते हैं
पानी से भरा मशक
खींच लेते हैं कुएँ से बाहर !

इस उम्र में तो लोग
किसी नेक और कोमल स्त्री
के पीछे-पीछे रुसवाई उठाते हैं
फूलों से भरी डाल
झकझोर डालते हैं
उसके ऊपर !

 

उड़ानें

कवि मरते हैं
जैसे पक्षी मरते हैं
गोधूलि में ओझल होते हुए !

सिर्फ़ उड़ानें बची
रह जाती हैं

दुनिया में आते ही
क्यों हैं
जहाँ इन्तज़ार बहुत
और साथ कम

स्त्रियाँ जब पुकारती हैं
अपने बच्चों को
उनकी याद आती है !

क्या एक ऐसी
दुनिया आ रही है
जहाँ कवि और पक्षी
फिर आएँगे ही नहीं !

 

रात

रात
रात
तारों भरी रात

मीर के सिरहाने
आहिस्ता बोलने की रात

 

आम के बाग़ 

आम के फले हुए पेड़ों
के बाग़ में
कब जाऊँगा ?

मुझे पता है कि
अवध, दीघा और मालदह में
घने बाग़ हैं आम के
लेकिन अब कितने और
कहाँ-कहाँ
अक्सर तो उनके उजड़ने की
ख़बरें आती रहती हैं ।

बचपन की रेल-यात्रा में
जगह-जगह दिखाई देते थे
आम के बाग़
बीसवीं सदी में

भागलपुर से नाथनगर के
बीच रेल उन दिनों जाती थी
आम के बाग़ों के बीच
दिन में गुज़रो
तब भी
रेल के डब्बे भर जाते
उनकी अँधेरी हरियाली
और ख़ुशबू से

हरा और दूधिया मालदह
दशहरी, सफेदा
बागपत का रटौल
डंटी के पास लाली वाले
कपूर की गंध के बीजू आम

गूदेदार आम अलग
खाने के लिए
और रस से भरे चूसने के लिए
अलग
ठंडे पानी में भिगोकर

आम खाने और चूसने
के स्वाद से भरे हैं
मेरे भी मन प्राण

हरी धरती से अभिन्न होने में
हज़ार-हज़ार चीज़ें
हाथ से तोड़कर खाने की सीधे
और आग पर पका कर भी

यह जो धरती है
मिट्टी की
जिसके ज़रा नीचे नमी
शुरू होने लगती है खोदते ही !

यह जो धरती
मेंढक और झींगुर
के घर जिसके भीतर
मेंढक और झींगुर की
आवाज़ों से रात में गूँजने वाली

यह जो धारण किये हुए है
सुदूर जन्म से ही मुझे
हम ने भी इसे सँवारा है !

यह भी उतनी ही असुरक्षित
जितना हम मनुष्य इन दिनों

आम जैसे रसीले फल के लिए
भाषा कम पड़ रही है
मेरे पास

भारतवासी होने का सौभाग्य
तो आम से भी बनता है !

 

गाय और बछड़ा

एक भूरी गाय
अपने बछड़े के साथ
बछड़ा क़रीब एक दिन का होगा
घास के मैदान में
जो धूप से भरा है

बछड़ा भी भूरा ही है
लेकिन उसका नन्हा
गीला मुख
ज़रा सफ़ेद

उसका पूरा शरीर ही गीला है
गाय उसे जीभ से चाट रही है

गाय थकी हुई है ज़रूर
प्रसव की पीड़ा से बाहर आई है
फिर भी
बछड़े को अपनी काली आँखों से
निहारती जाती है
और उसे चाटती जा रही है

बछड़े की आँखें उसकी माँ
से भी ज़्यादा काली हैं
अभी दुनिया की धूल से अछूती

बछड़ा खड़ा होने में लगा है
लेकिन
कमल के नाल जैसी कोमल
उसकी टाँगें
क्यों भला ले पाएँगी उसका भार !
वह आगे के पैरों से ज़ोर लगाता
है
उसके घुटने भी मुड़ रहे हैं
पहली पहली बार
ज़रा-सा उठने में गिरता
है कई बार घास पर
गाय और चरवाहा
दोनों उसे देखते हैं

सृष्टि के सबक हैं अपार
जिन्हें इस बछड़े को भी सीखना होगा
अभी तो वह आया ही है

मेरी शुभकामना
बछड़ा और उसकी माँ
दोनों की उम्र लम्बी हो

चरवाहा बछड़े को
अपनी गोद में लेकर
जा रहा है झोपड़ी में
गाय भी पीछे-पीछे दौड़ती
जा रही है ।

 

थियेटर

पार्क की बेंच का
कोई अंत नहीं है
वह सिर्फ़ टिकी भर है पार्क में
जब कि मौजूदगी है उसकी शहर के बाहर तक

पुल की रोशनियों का
कहीं अंत नहीं हैं
मेरी रातें उनसे भरी हैं
मुझे तो मृत्यु के सामने भी
वे याद आयेंगी

लंबी चोंच वाला छोटा पक्षी कठफोड़वा
मुश्किल से दिखाई पड़ा मुझे
दो-तीन बार
पिछले दस-‍बारह वर्षों में

वह फिर दिखाई देगा
इस बार थियेटर में

थियेटर का कोई अंत नहीं है
थियेटर किसी एक इमारत का नाम नहीं है।

(1996)

 

पानी 

आदमी तो आदमी
मैं तो पानी के बारे में भी सोचता था
कि पानी को भारत में बसना सिखाऊँगा

सोचता था
पानी होगा आसान
पूरब जैसा
पुआल के टोप जैसा
मोम की रोशनी जैसा

गोधूलि में उस पार तक
मुश्किल से दिखाई देगा
और एक ऐसे देश में भटकायेगा
जिसे अभी नक़्शे में आना है

ऊँचाई पर जाकर फूल रही लतर
जैसे उठती रही हवा में नामालूम गुंबद तक
यह मिट्टी के घड़े में भरा रहेगा
जब भी मुझे प्यास लगेगी

शरद में हो जायेगा और भी पतला
साफ़ और धीमा
किनारे पर उगे पेड़ की छाया में

सोचता था
यह सिर्फ़ शरीर के ही काम नहीं आयेगा
जो रात हमने नाव पर जगकर गुज़ारी
क्या उस रात पानी
सिर्फ़ शरीर तक आकर लौटता रहा ?

क्या-क्या बसाया हमने
जब से लिखना शुरू किया ?

उज़डते हुए बार-बार
उज़डने के बारे में लिखते हुए
पता नहीं वाणी का
कितना नुक़सान किया

पानी सिर्फ़ वही नहीं करता
जैसा उससे करने के लिए कहा जाता है
महज़ एक पौधे को सींचते हुए पानी
उसकी ज़रा-सी ज़मीन के भीतर भी
किस तरह जाता है

क्यात स्त्रियों की आवाज़ों में बच रही हैं
पानी की आवाज़ें
और दूसरी सब आवाज़ें कैसी हैं ?

दुखी और टूटे हुए हृदय में
सिर्फ़ पानी की रात है
वहीं है आशा और वहीं है
दुनिया में फिर से लौट आने की अकेली राह।

(1997)

 

जनता का आदमी 

बर्फ़ काटने वाली मशीन से आदमी काटने वाली मशीन तक
कौंधती हुई अमानवीय चमक के विरूद्ध
जलतें हुए गाँवों के बीच से गुज़रती है मेरी कविता;
तेज़ आग और नुकीली चीख़ों के साथ
जली हुई औरत के पास
सबसे पहले पहुँचती है मेरी कविता;
जबकिं ऐसा करते हुए मेरी कविता जगह-जगह से जल जाती है
और वे आज भी कविता का इस्तेमाल मुर्दागाड़ी की तरह कर रहे हैं
शब्दों के फेफड़ों में नये मुहावरों का ऑक्सी जन भर रहे हैं,
लेकिन जो कर्फ़्यू के भीतर पैदा हुआ,
जिसकी साँस लू की तरह गर्म है
उस नौजवान खान मज़दूर के मन में
एक बिल्कुल नयी बंदूक़ की तरह याद आती है मेरी कविता।
जब कविता के वर्जित प्रदेश में
मैं एकबारगी कई करोड़ आदमियों के साथ घुसा
तो उन तमाम कवियों को
मेरा आना एक अश्लील उत्पात-सा लगा
जो केवल अपनी सुविधाके लिए
अफ़ीम के पानी में अगले रविवार को चुरा लेना चाहते थे
अब मेरी कविता एक ली जा रही जान की तरह बुलाती है,
भाषा और लय के बिना, केवल अर्थ में-
उस गर्भवती औरत के साथ
जिसकी नाभि में सिर्फ़ इसलिए गोली मार दी गयी
कि कहीं एक ईमानदार आदमी पैदा न हो जाय।

सड़े हुए चूहों को निगलते-निगलते
जिनके कंठ में अटक गया है समय
जिनकी आँखों में अकड़ गये हैं मरी हुई याद के चकत्ते
वे सदा के लिए जंगलों में बस गये हैं –
आदमी से बचकर
क्यों कि उनकी जाँघ की सबसे पतली नस में
शब्द शुरू होकर
जाँघ की सबसे मोटी नस में शब्द समाप्त हो जाते हैं
भाषा की ताज़गी से वे अपनी नीयत को ढँक रहे हैं
बस एक बहस के तौर पर
वे श्रीकाकुलम जैसी जगहों का भी नाम ले लेते हैं,
वे अजीब तरह से सफल हुए हैं इस देश में
मरे हुए आदमियों के नाम से
वे जीवित आदमियों को बुला रहे हैं।

वे लोग पेशेवर ख़ूनी हैं
जो नंगी ख़बरों का गला घोंट देते हैं
अख़बार की सनसनीख़ेज़ सुर्खियों की आड़ में
वे बार-बार उस एक चेहरे के पालतू हैं
जिसके पेशाबघर का नक़्शा मेरे गाँव के नक़्शे से बड़ा है।

बर्फीली दरारों में पायी जाने वाली
उजली जोंकों की तरह प्रकाशन संस्थाएँ इस देश कीः
हुगली के किनारे आत्महत्या करने के पहले
क्यों चीख़ा था वह युवा कवि – ‘टाइम्स ऑफ़ इंडिया’
-उसकी लाश तक जाना भी मेरे लिए संभव नहीं हो सका
कि भाड़े पर लाया आदमी उसके लिए नहीं रो सका
क्योंकि इसे सबसे पहले
आज अपनी असली ताक़त के साथ हमलावर होना चाहिए।

हर बार कविता लिखते-लिखते
मैं एक विस्फोटक शोक के सामने खड़ा हो जाता हूँ
कि आखिर दुनिया के इस बेहूदे नक़्शे को
मुझे कब तक ढोना चाहिए,
कि टैंक के चेन में फँसे लाखों गाँवों के भीतर
एक समूचे आदमी को कितने घंटों तक सोना चाहिए?

कलकत्ते के ज़ू में एक गैंडे ने मुझसे कहा
कि अभी स्वतंत्रता कहीं नहीं हैं, सब कहीं सुरक्षा है;
राजधानी के सबसे सुर‍क्षित हिस्से में
पाला जाता है एक आदिम घाव
जो पैदा करता है जंगली बिल्लियों के सहारे पाशविक अलगाव
तब से मैंने तय कर लिया है
कि गैंडे की कठिन चमड़ी का उपयोग युद्ध के लिए नहीं
बल्कि एक अपार करूणा के लिए होना चाहिए।

मैं अभी मांस पर खुदे हुए अक्षरों को पढ़ रहा हूँ-
ज़हरीली गैसों और खूंखार गुप्तचरों से लैस
इस व्यवस्था का एक अदना सा आदमी
मेरे घर में किसी भी समय ज़बर्दस्ती घुस आता है
और बिजली के कोड़ों से
मेरी माँ की जाँघ
मेरी बहन की पीठ
और मेरी बेटी की छातियों को उधेड़ देता है,
मेरी खुली आँखों के सामने
मेरे वोट से लेकर मेरी प्रजनन शक्ति तक को नष्ट कर देता है,
मेरी कमर में रस्से बाँध कर
मुझे घसीटता हुआ चल देता है,
जबकि पूरा गाँव इस नृशंस दृश्य, को
तमाशबीन की तरह देखता रह जाता है।
क्योंकि अब तक सिर्फ़ जेल जाने की कविताएँ लिखी गयीं
किसी सही आदमी के लिए
जेल उड़ा देने की कविताएँ पैदा नहीं हुईं।
 
एक रात
जब मैं ताज़े और गर्म शब्दों की तलाश में था-
हज़ारों बिस्तरों में पिछले रविवार को पैदा हुए बच्चे निश्चिंत सो रहे थे,
उन बच्चों की लम्बाई
मेरी कविता लिखने वाली क़लम से थोड़ी-सी बड़ी थी।
तभी मुझे कोने में वे खड़े दिखाई दे गये, वे खड़े थे – कोने में
भरी हुई बंदूक़ो की तरह, सायरानो की तरह, सफ़ेद चीते की तरह,
पाठ्यक्रम की तरह, बदबू और संविधान की तरह।
वे अभिभावक थे,
मेरी पकड़ से बाहर- क्रूर परजीवी,
उनके लिए मैं बिलकुल निहत्था था
क्योंकि शब्दों से उनका कुछ नहीं बिगड़ता है
जब तक कि उनके पास सात सेंटीमीटर लम्बी गोलियाँ हैं
– रायफ़लों में तनी-पड़ी।
वे इन बच्चों को बिस्तरों से उठाकर
सीधे बारूदख़ाने तक ले जायेंगे।
वे हर तरह की कोशिश करेंगे
कि इन बच्चों से मेरी जान-पहचान न हो
क्योंकि मेरी मुलाक़ात उनके बारूदख़ाने में आग की तरह घुसेगी।
मैं गहरे जल की आवाज़-सा उतर गया।
बाहर हवा में, सड़क पर
जहाँ अचानक मुझे फ़ायर स्टेशन के ड्राइवरों ने पकड़ लिया और पूछा-
आखिर इस तरह अक्षरों का भविष्य क्या होगा ?
आखिर कब तक हम लोगों को दौड़ते हुए दमकलों के सहारे याद किया जाता रहेगा ?
उधर युवा डोमों ने इस बात पर हड़ताल की
कि अब हम श्मशान में अकाल-मृत्यु के मुर्दों को
सिर्फ़ जलायेंगे ही नहीं
बल्कि उन मुर्दों के घर तक जायेगें।
अक्सर कविता लिखते हुए मेरे घुटनों से
किसी अज्ञात समुद्र-यात्री की नाव टकरा जाती है
और फिर एक नये देश की खोज शुरू हो जाती है-
उस देश का नाम वियतनाम ही हो यह कोई ज़रूरी नहीं
उस देश का नाम बाढ़ मे बह गये मेरे पिता का नाम भी हो सकता है,
मेरे गाँव का नाम भी हो सकता है
मैं जिस खलिहान में अब तक
अपनी फ़सलों, अपनी पंक्तियों को नीलाम करता आया हूँ
उसके नाम पर भी यह नाम हो सकता है।
क्यों पूछा था एक सवाल मेरे पुराने पड़ोसी ने-
मैं एक भूमिहीन किसान हूँ,
क्या मैं कविता को छू सकता हूँ ?
अबरख़ की खान में लहू जलता है जिन युवा स्तनों और बलिष्ठ कंधों का
उन्हें अबरख़ ‘अबरख़’ की तरह
जीवन में एक बार भी याद नहीं आता है
क्यों हर बार आम ज़िंदगी के सवाल से
कविता का सवाल पीछे छूट जाता है ?

इतिहास के भीतर आदिम युग से ही
कविता के नाम पर जो जगहें ख़ाली कर ली जाती हैं-
वहाँ इन दिनों चर्बी से भरे हुए डिब्बे ही अधिक जमा हो रहे हैं,
एक गहरे नीले काँच के भीतर
सुकान्त की इक्कीस फ़ीट लंबी तड़पती हुई आँत
निकाल कर रख दी गयी है,
किसी चिर विद्रोह की रीढ़ पैदा करने के लिए नहीं;
बल्कि कविता के अज़ायबघर को
पहले से और अजूबा बनाने के लिए।
असफल, बूढ़ी प्रेमिकाओं की भीड़ इकट्ठी करने वाली
महीन तम्बाकू जैसी कविताओं के बीच
भेड़ों की गंध से भरा मेरा गड़रिये-जैसा चेहरा
आप लोगों को बेहद अप्रत्याशित लगा होगा,
उतना ही
जितना साहू जैन के ग्ला‍स-टैंक में
मछलियों की जगह तैरती हुई गजानन माधव मुक्तिबोध की लाश।

बम विस्फोट में घिरने के बाद का चेहरा मेरी ही कविताओं में क्यों है?
मैं क्यों नहीं लिख पाता हूँ वैसी कविता
जैसी बच्चों की नींद होती है,
खान होती है,
पके हुए जामुन का रंग होता है,
मैं वैसी कविता क्यों नहीं लिख पाता
जैसी माँ के शरीर में नये पुआल की महक होती है,
जैसी बाँस के जंगल में हिरन के पसीने की गंध होती है,
जैसे ख़रगोश के कान होते हैं,
जैसे ग्रीष्म के बीहड़ एकांत में
नीले जल-पक्षियों का मिथुन होता है,
जैसे समुद्री खोहों में लेटा हुआ खारा कत्थईपन होता है,
मैं वैसी कविता क्यों नहीं लिख पाता
जैसे हज़ारो फ़ीट की ऊँचाई से गिरनेवाले झरने की पीठ होती है ?
हाथी के पैरों के निशान जैसे गंभीर अक्षरों में
जो कविता दीवारों पर लिखी होती है
कई लाख हलों के ऊपर खुदी हुई है जो
कई लाख मज़दूरों के टिफ़िन कैरियर में
ठंढी, कमज़ोर रोटी की तरह लेटी हुई है जो कविता ?
 
एक मरे हुए भालू से लड़ती रहीं उनकी कविताएँ
कविता को घुड़दौड़ की जगह बनाने वाले उन सट्टेबाज़ों की
बाज़ी को तोड़ सकता है वही
जिसे आप मामूली आदमी कहते है;
क्योंकि वह किसी भी देश के झंडे से बड़ा है।
इस बात को वह महसूस करने लगा है,
महसूस करने लगा है वह
अपनी पीठ पर लिखे गये सैकड़ों उपन्यासों,
अपने हाथों से खोदी गयी नहरों और सड़कों को

कविता की एक महान सम्भावना है यह
कि वह मामूली आदमी अपनी कृतियों को महसूस करने लगा है-
अपनी टाँग पर टिके महानगरों और
अपनी कमर पर टिकी हुई राजधानियों को
महसूस करने लगा है वह।
धीरे-धीरे उसका चेहरा बदल रहा है,
हल के चमचमाते हुए फाल की तरह पंजों को
बीज, पानी और ज़मीन के सही रिश्तों को
वह महसूस करने लगा है।
कविता का अर्थ विस्तार करते हुए
वह जासूसी कुत्तों की तरह शब्दों को खुला छोड़ देता है,
एक छिटकते हुए क्षण के भीतर देख लेता है वह
ज़ंजीर का अकेलापन,
वह जान चुका है –
क्यों एक आदिवासी बच्चा घूरता है अक्षर,
लिपि से डरते हुए,
इतिहास की सबसे घिनौनी किताब का राज़ खोलते हुए।

(1972)

 

रेल 

हर भले आदमी की एक रेल होती है
जो माँ के घर की ओर जाती है
सीटी बजाती हुई
धुआँ उड़ाती हुई।

 

एक जमाने की कविता 

वहाँ डाल पर फल पकते थे
और उनसे रोशनी निकलती थी

हम बहुत तेज़ दौड़ते थे
मैदान से घर की ओर
कभी तो आगे-आगे हम
और पीछे-पीछे बारिश

ऊँची घास की जड़ों के बीच
छोटे-छोटे फूल खिलते थे
किसी और ही पौधे से
घास के अंदर झाँकने पर
ही दिखते थे

कभी जब अचानक मेघ घिर आते
और शाम से पहले शाम हो जाती
माँ हमें पुकारती हुई
गाँव के बाहर तक आ जाती

अगर हम देर तक जगे होते
तो अँधेरे में कई तरह की आवाज़ें सुनते
जिन्हें दिन में कभी नहीं सुन पाते
कुएँ में डोल डुबोने की आवाज़
जानवरों की भारी साँस
कोई अकेला पक्षी ऊपर तारों के बीच
बोलता जाता हुआ

फ़सल की कटाई के समय
पिता थके-माँदे लौटते
तो माँ
कितने मीठे कंठ से बात करती

काली रात बहुत काली होती थी
सफ़ेद रात बहुत सफ़ेद होती थी

बहन की सहेली थी सुजाता
पोखर के घाट पर गाती थी
एक लड़का था घुँघराले बाल वाला दिवाकर
छिपकर उसका गाना सुनता
एक दिन सुजाता चली गयी बंगाल
उसका परिवार भी
और दिवाकर रह गया बिहार में

कई लोग गाँव छोड़कर चले जाते
फिर कभी वापस नहीं आते

बरसात में चलती पुरवाई
बहन के साथ हम
बाग़ीचे में भटकते
बहन दिखाती कि एक पेड़ कैसे भीगता है
ऊपर पत्तों से चू रहा होता पानी
जबकि भीतर की शाख़ें
बिल्कुल कम गीली
और नीचे का मोटा तना तो
शायद ही कभी पूरा भीगता
वहाँ छाल पर हम गोंद छूते
बाग़ीचे में हर ओर एक महक होती
ख़ूब अच्छी लगती

माँ जब भी नयी साड़ी पहनती
गुनगुनाती रहती
हम माँ को तंग करते
उसे दुल्ह न कहते
माँ तंग नहीं होती
बल्कि नया गुड़ देती
गुड़ में मूँगफली के दाने भी होते

जब माँ फ़ुरसत में होती
तो हमें उन दिनों की बातें सुनाती
जब वह ख़ुद बच्ची थी
हमें मुश्किल से यक़ीन होता
कि माँ भी कभी बच्ची थी

दियाबाती के समय माँ गाती
शाम में रोशनी करते हुए गाना
उसे हर बार अच्छात लगता

माँ थी अनपढ़
लेकिन उसके पास गीतों की कमी नहीं थी
कई बार नये गीत भी सुनाती
रही होगी एक अनाम ग्राम-कवि

शाम की रोशनी के सामने वह गाती
हम सभी भाई-बहन उसके बदन से लगकर
चुप हो उसे सुनते
वह इतना बढ़िया गाती कि लगता
वह कोई और काम न करे
लेकिन तभी उसे जाना पड़ता रसोई में

आँचल की ओट में दीप की लौ को
हवा से बचाती
वह आँगन पार करती
गोधूलि में नीम के नीचे से
हम उसे देखते रसोई में जाते हुए
जैसे-जैसे रात होती जाती
हम माँ से तनिक दूर नहीं रह पाते

आज सालों बाद भी मैं नहीं भूला
माँ का शाम में गाना
चाँद की रोशनी में
नदी के किनारे जंगली बेर का झरना
इन सबको मैंने बचाया दर्द की आँधियों से।

1995

 

आस्माँ जैसी हवाएँ 

समुद्र
तुम्हारे किनारे शरद के हैं

और तुम स्वयं समुद्र सूर्य और नमक के हो

तुम्हारी आवाज़ आंदोलन और गहराई की है

और हवाएँ
जो कई देशों को पार करती हुई
तुम्हारे भीतर पहुँचती हैं
आसमान जैसी

तुम्हें पार करने की इच्छा
अक्सर नहीं होती
भटक जाने का डर बना रहता है !

था

 

प्यार

पुराने टूटे ट्रकों के पीछे मैंने किया प्यार
कई बार तो उनमें घुसकर
लतरों से भरे कबाड़ में जगह निकालते
शाम को अपना परदा बनाते हुए
अक्सर ही बिना झूठ
और बिना चाँद के

दूर था अवध का शहर लखनऊ
और रेख़ते से भीगी
उसकी दिलकश ज़बान फ़िलहाल कोई एक देश नहीं
गोधूलि में पहले तारे के सिवा
पीठ के पीछे जो शहर था
वह शहर था भी और नहीं भी था
बनते-बनते उसे
अभी बनना था

औरतों और बच्चों से ताज़ादम बस्तियों
की गलियाँ ही गलियाँ
इनसे बाहर निकलते
छिपते-छिपाते
ऊँचाई पर बने आधी दीवार वाले फुटपाथों
के आसमान को गले लगाते
हम पहुँचते सिनेमाघर के भीतर
अमर मैटिनी शो के अँधेरे में
मैंने प्यार किया

हमारी पढ़ाई थी थोड़ी
हमारे जीने के साधन थे बेहद कठोर
फ़ुरसत नहीं थी इतनी कि बहस करते
ख़ाक होने तक जाते भटकने
घनी आबादी में पले हमारे शरीर में
इतना कोलाहल था इतनी चाहत थी
कि वह जो एक सूना डर सताना शुरू करता है
प्रेम के साथ-साथ
हम उससे अनजान ही रहे लगभग

जैसे शादी ही थी हमारी मंज़िल
हमारा ज़रिया आगे के सफ़र का

आखिर शादी की बात पक्की हो गई
फिर तो जब भी काम से छुट्टी होती
साइकिल पर आगे बिठाकर
अपनी होने वाली बेग़म को
मैं निकल जाता था दूर
शहर के बाहर जाने वाली किसी
छायादार सड़क पर
साइकिल चलाते हुए
आँख चुराते हुए
कभी-कभी दोनों एक ही साथ
सीटी बजाते हुए किया प्यार

घर के लोग भी जल्दी ही
सहमत हो गए
मेहनत की रोटी खाने वाले हमारे परिवार
नहीं थे इतने जटिल इतने पत्थरदिल
कि हमें बार-बार मरते हुए देखते
हम नहीं थे उनके लिए ज़रा भी अजनबी
हमारा निर्दोष इंसान होना
उनके ख़ून में भी मौजूद था

तो एक दिन हमारी शादी हुई राज़ी-ख़ुशी
घर-गृहस्थी बसाते हुए
मुहल्ले भर के परिवारों में आते-जाते हुए
हम अभी भी कर रहे हैं प्यार

आसपास के रंगरूट आशिक़ों का
पता मालूम नहीं करना पड़ता
वे तो महीना नहीं बीतता
कि हो जाते हैं मशहूर
उनकी मदद के लिए मैं रहता हूँ तैयार
मोटर के चक्के बदलकर
इंजन में तेल भरकर ।

 

जिलाधीश 

तुम एक पिछड़े हुए वक्ता हो

तुम एक ऐसे विरोध की भाषा में बोलते हो
जैसे राजाओं का विरोध कर रहे हो
एक ऐसे समय की भाषा जब संसद का जन्म नहीं हुआ था

तुम क्या सोचते हो
संसद ने विरोध की भाषा और सामग्री को वैसा ही रहने दिया है
जैसी वह राजाओं के ज़माने में थी

यह जो आदमी
मेज़ की दूसरी ओर सुन रह है तुम्हें
कितने करीब और ध्यान से
यह राजा नहीं जिलाधीश है !

यह जिलाधीश है
जो राजाओं से आम तौर पर
बहुत ज़्यादा शिक्षित है
राजाओं से ज़्यादा तत्पर और संलग्न !

यह दूर किसी किले में – ऐश्वर्य की निर्जनता में नहीं
हमारी गलियों में पैदा हुआ एक लड़का है
यह हमारी असफलताओं और गलतियों के बीच पला है
यह जानता है हमारे साहस और लालच को
राजाओं से बहुत ज़्यादा धैर्य और चिन्ता है इसके पास

यह ज़्यादा भ्रम पैदा कर सकता है
यह ज़्यादा अच्छी तरह हमे आजादी से दूर रख सकता है
कड़ी
कड़ी निगरानी चाहिए
सरकार के इस बेहतरीन दिमाग पर !

कभी-कभी तो इससे सीखना भी पड़ सकता है !

 

किसने बचाया मेरी आत्मा को 

किसने बचाया मेरी आत्मा को
दो कौड़ी की मोमबत्तियों की रोशनी ने

दो-चार उबले हुए आलुओं ने बचाया

सूखे पत्तों की आग
और मिट्टी के बर्तनों ने बचाया
पुआल के बिस्तर ने और
पुआल के रंग के चाँद ने
नुक्कड़ नाटक के आवारा जैसे छोकरे
चिथड़े पहने
सच के गौरव जैसा कंठ-स्वर
कड़ा मुक़ाबला करते
मोड़-मोड़ पर
दंगाइयों को खदेड़ते
वीर बाँकें हिन्दुस्तानियों से सीखा रंगमंच
भीगे वस्त्र-सा विकल अभिनय

दादी के लिए रोटी पकाने का चिमटा लेकर
ईदगाह के मेले से लौट रहे नन्हे हामिद ने
और छह दिसम्बर के बाद
फ़रवरी आते-आते
जंगली बेर ने
इन सबने बचाया मेरी आत्मा को।

 

मैटिनी शो

प्यार
पुराने टूटे ट्रकों के पीछे मैंने किया प्यार
कई बार तो उनमें घुसकर
लतरों से भरे कबाड़ में जगह निकालते
शाम को अपना परदा बनाते हुए
अक्सर ही बिना झूठ
और बिना चाँद के

दूर था अवध का शहर लखनऊ
और रेख़ते से भीगी
उसकी दिलकश ज़बान फ़िलहाल कोई एक देश नहीं
गोधूलि में पहले तारे के सिवा
पीठ के पीछे जो शहर था
वह शहर था भी और नहीं भी था
बनते-बनते उसे
अभी बनना था

औरतों और बच्चों से ताज़ादम बस्तियों
की गलियाँ ही गलियाँ
इनसे बाहर निकलते
छिपते-छिपाते
ऊँचाई पर बने आधी दीवार वाले फुटपाथों
के आसमान को गले लगाते
हम पहुँचते सिनेमाघर के भीतर
अमर मैटिनी शो के अँधेरे में
मैंने प्यार किया

हमारी पढ़ाई थी थोड़ी
हमारे जीने के साधन थे बेहद कठोर
फ़ुरसत नहीं थी इतनी कि बहस करते
ख़ाक होने तक जाते भटकने
घनी आबादी में पले हमारे शरीर में
इतना कोलाहल था इतनी चाहत थी
कि वह जो एक सूना डर सताना शुरू करता है
प्रेम के साथ-साथ
हम उससे अनजान ही रहे लगभग

जैसे शादी ही थी हमारी मंजिल
हमारा ज़रिया आगे के सफ़र का

आखिर शादी की बात पक्की हो गयी
फिर तो जब भी काम से छुट्टी होती
साइकिल पर आगे बिठाकर
अपनी होने वाली बेग़म को
मैं निकल जाता था दूर
शहर के बाहर जाने वाली किसी
छायादार सड़क पर
साइकिल चलाते हुए
आँख चुराते हुए
कभी-कभी दोनों एक ही साथ
सीटी बजाते हुए किया प्यार

घर के लोग भी जल्दी ही
सहमत हो गये
मेहनत की रोटी खाने वाले हमारे परिवार
नहीं थे इतने जटिल इतने पत्थरदिल
कि हमें बार-बार मरते हुए देखते
हम नहीं थे उनके लिए ज़रा भी अजनबी
हमारा निर्दोष इंसान होना
उनके खून में भी मौजूद था

तो एक दिन हमारी शादी हुई राज़ी-ख़ुशी
घर-गृहस्थी बसाते हुए
मुहल्ले भर के परिवारों में आते-जाते हुए
हम अभी भी कर रहे हैं प्यार

आसपास के रंगरूट आशिक़ों का
पता मालूम नहीं करना पड़ता
वे तो महीना नहीं बीतता
कि हो जाते हैं मशहूर
उनकी मदद के लिए मैं रहता हूँ तैयार
मोटर के चक्के बदलकर
इंजन में तेल भरकर।

(1996)

 

मीर

मीर पर बातें करो
तो वे बातें भी उतनी ही अच्छी लगती हैं
जितने मीर

और तुम्हारा वह कहना सब
दीवानगी की सादगी में
दिल-दिल करना
दुहराना दिल के बारे में
ज़ोर देकर कहना अपने दिल के बारे में कि
जनाब यह वही दिल है
जो मीर की गली से हो आया है।

(1996)

 

सवाल ज़्यादा हैं 

पुराने शहर उड़ना
चाहते हैं
लेकिन पंख उनके डूबते हैं
अक्सर ख़ून के कीचड़ में !

मैं अभी भी
उनके चौराहों पर कभी
भाषण देता हूँ
जैसा कि मेरा काम रहा
वर्षों से
लेकिन मेरी अपनी ही आवाज़
अब
अजनबी लगती है

मैं अपने भीतर घिरता जा रहा हूँ

सवाल ज़्यादा हैं
और बात करने वाला
कोई-कोई ही मिलता है
हार बड़ी है मनुष्य होने की
फिर भी इतना सामान्य क्यों है जीवन ?

 

बारिश

बारिश एक राह है
स्त्री तक जाने की

बरसता हुआ पानी
बहता है
जीवित और मृत मनुष्यों के बीच

बारिश
एक तरह की रात है

एक सुदूर और बाहरी चीज़
इतने लम्बे समय के बाद
भी
शरीर से ज़्यादा
दिमाग भीगता है

कई बार
घर-बाहर एक होने लगता है !

बड़े जानवर
खड़े-खड़े भीगते हैं देर तक
आषाढ़ में
आसमान के नीचे
आदिम दिनों का कंपन
जगाते हैं

बारिश की आवाज़ में
शामिल है मेरी भी आवाज़ !

 

अपनी बात 

कितने दिनों से रात आ रही है
जा रही है पृथ्‍वी पर
फिर भी इसे देखना
इसमें होना एक अनोखा काम लगता है

मतलब कि मैं
अपनी बात कर रहा हूँ।

(1996)

 

हसरत 

जहाँ नदियाँ समुद्र से मिलती हैं
वहाँ मेरा क्या है
मैं नहीं जानता
लेकिन एक दिन जाना है उधर

उस ओर किसी को जाते हुए देखते
कैसी हसरत भड़कती है !

(1996)

 

शरीर

स्त्रियों ने रचा जिसे युगों में
युगों की रातों में उतने नि‍जी हुए शरीर
आज मैं चला ढूँढने अपने शरीर में।

1995

 

कपड़े के जूते

रेल की चमकती हुई पटकरियों के किनारे
वे कपड़े के पुराने जूते हैं
एक आदमी उन्हें छोड़कर चला गया
और एक ही क़दम बाद अदृश्य‍ हो गया
क्यों कि जूतों की दुनिया है सिर्फ़ एक कदम की

उस ओर से गुज़र रहे राहगीर का
एक कदम पीछा करते हुए
वे कपड़े के पुराने जूते हैं
उनके भीतर बारिश का पानी ठहर गया है
हवा तेज चलने से बारिश का पानी पैर की तरह हिलता है

लगातार भीगते हुए वे जूते फफूँद से ढँक गये हैं
और ज़मीन की सबसे बारीक सतह पर तो
वे जूते अँकुर भी रहे हैं
मैं सोच सकता ही हूँ कि
कितनी बार खेल के निर्णायक क्षणों में
ये जूते सूर्य की तरह गर्म हुए होंगे!
इन जूतों के भीतर धूल और पहाड़ों से भरे
रास्ते बिखरे हुए हैं-
आवाजों और मैदानों के भटक गये छोर इन्हें टिकने दे रहे हैं
आवाज़ों और मैदानों के भटक गये छोर-
जो आदमी की ज़रूरतों से बाहर रह गये !

इन जूतों के भीतर कितनी बार
आवारा सैलानियों की आत्मा एँ पैरों के सहारे
नीचे उतरी होंगी-
महीनों लगातार रही होंगी इन जूतों के भीतर
आत्माएँ-
छतों और राज्यों से बाहर-
समुद्र तल से कितना ऊपर!

कपड़े के ये जूते
सिगरेट और रूमाल की तरह मुलायम
सिगरेट और रूमाल की ही तरह हवाओं से भरे
घोंसलों की तरह बुने हुए-
ये जूते दुनिया में हत्या और बलात्काहर जैसी
ठोस चीज़ों के विरूद्ध
बहुत तरल हैं
घास और भाषा में मुड़ते हुए
नमक के क़रीब बढ़ते हुए-
और चूहों के लिए तो
कपड़े के ये जूते वर्णमाला की तरह हैं
जहाँ से वे कुतरने की शुरूआत करते हैं

जूतों की दुनिया जहाँ से शुरू हुई होगी-
गड़रिये वहाँ तक ज़रूर आये होंगे !
क्योंकि जूतों के भीतर एक निविड़ता है-
जो नष्ट नहीं की जा सकती
क्योंकि भेड़ों के भीतर एक निविड़ता है आज भी
जहाँ से समुद्र सुनाई पड़ता है
और निवि‍ड़ता एक ऐसी चीज़ है-
जहाँ नींद के बीज सुरक्षित हैं
जूतों की दुनिया जहाँ से शुरू हुई होगी
जानवर वहाँ तक जरूर आये होंगे।

जूते-जो प्राचीन हैं
जिस तरह नावें प्राचीन हैं
चाहे उन्हेंप कल ही क्योंग न बनाया गया हो
जैसे फल-
जो जूतों और नावों से भी अधिक प्राचीन हैं
चाहे वे आज की रात ही क्यों न फले हों
जैसे पाल-
जो हमारे कपड़ों से बहुत अधिक प्राचीन दिखते हैं
लेकिन हमारे कपड़े-
जो पालों से बहुत अधिक प्राचीन हैं।
और प्राचीनता एक ऐसी चीज़ है-
जिसे अपने घुटनों में जगह दो
ताकि ये घुटने किसी तानाशाह के आगे न झुक सकें
क्योंकि भय भी एक प्राचीन चीज़ है-
लेकिन हथियार भी उतने ही प्राचीन हैं

और ज़मीन-
जो फल से अधिक प्राचीन है
बीज की तरह प्राचीन-
और ज़मीन पर चलना-
जो इतना आसान काम है
फिर भी ज़मीन पर चल रहे आदमी को देखना
एक प्राचीन दृश्य को देखना है-
ज़मीन पर चलना एक इतना आसान काम है
फिर भी
ज़मीन पर चलने की स्मृति गहन है

रेल की चमकती हुई पटरियों के किनारे
वे अब सिर्फ़ कपड़े के पुराने जूते ही नहीं हैं
बल्कि वे अब
ऐसे धुँधले और ख़तरनाक रास्ते भी हो चुके हैं-
जिन पर जासूस भी चलने में असमर्थ हैं
लेकिन जब तारे छिटकने लगते हैं
और शाम की टहनियाँ उन पुराने जूतों में भर जाती हैं
तो उन्हीं धुँधले और ख़तरनाक रास्तों पर स्वप्न के
सुदूर चक्के तेज़ घूमते हुए आते हैं और
आदमी की नींद में रोशनी और जड़ें फेंकते हुए
कहाँ-कहाँ फेंक दी गयीं ओर छोड़ दी गयीं और
बेकार पड़ी चीज़ों को एक
हरियाली की तरह बटोर लाते हैं !

जानवर प्रकृति से आये। और दिन भी।
लेकिन जूते प्रकृति से नहीं आये
जूतों को आदमियों ने बनाया-
जिस तरह बाग़ीचों को आदमियों ने बनाया
इस तरह साथ-साथ चलने के लिए
आदमी ने महान चीज़ें बनायीं
और उन महान चीज़ों में जूते आदमी
के सबसे निकट हैं-
जहाज़ से भी अधिक
सड़कों, रेलों और सीढ़ियों से भी अधिक
कोशिशों और धुनों की तरह
निरंतर प्रवेश चाहते हुए
कपड़े के वे जूते इतने पुराने हो चुके हैं
कोई कह सकता है कि
जहाँ वे जूते हैं वहाँ कोई समय नहीं है-
मृत्यु भी अब उन जूतों को पहनना नहीं चाहेगी
लेकिन कवि उसे पहनते हैं
और शताब्दियाँ पार करते हैं!

1979

 

विस्मय तरबूज की तरह

तब वह ज़्यादा बड़ा दिखाई देने लगा
जब मैं उसके किनारों से वापस आया

वे स्त्रियाँ अब अधिक दिखाई देती हैं
जिन्होंने बचपन में मुझे चूमा

वे जानवर
जो सुदूर धूप में मेरे साथ खेलते थे
और उन्हें इन्तज़ार करना नहीं आता था

और वे पहले छाते
बादल जिनसे बहुत क़रीब थे

समुद्र मुझे ले चला उस दोपहर में
जब पुकारना भी नहीं आता था
जब रोना ही पुकारना था

जहाँ विस्मय
तरबूज़ की तरह
जितना हरा उतना ही लाल।

(1990)

 

कीमत

अब तो भूलने की भी बड़ी क़ीमत मिलती है

अब तो यही करते हैं
लालची ज़लील लोग।

(1997)

 

भागी हुई लड़कियां 

एक

घर की जंजीरें
कितना ज्यादा दिखाई पड़ती हैं
जब घर से कोई लड़की भागती है

क्या उस रात की याद आ रही है
जो पुरानी फिल्मों में बार-बार आती थी
जब भी कोई लड़की घर से भगती थी?
बारिश से घिरे वे पत्थर के लैम्पपोस्ट
महज आंखों की बेचैनी दिखाने भर उनकी रोशनी?

और वे तमाम गाने रजतपरदों पर दीवानगी के
आज अपने ही घर में सच निकले!

क्या तुम यह सोचते थे
कि वे गाने महज अभिनेता-अभिनेत्रियों के लिए
रचे गए?
और वह खतरनाक अभिनय
लैला के ध्वंस का
जो मंच से अटूट उठता हुआ
दर्शकों की निजी जिन्दगियों में फैल जाता था?

दो

तुम तो पढ कर सुनाओगे नहीं
कभी वह खत
जिसे भागने से पहले
वह अपनी मेज पर रख गई
तुम तो छुपाओगे पूरे जमाने से
उसका संवाद
चुराओगे उसका शीशा उसका पारा
उसका आबनूस
उसकी सात पालों वाली नाव
लेकिन कैसे चुराओगे
एक भागी हुई लड़की की उम्र
जो अभी काफी बची हो सकती है
उसके दुपट्टे के झुटपुटे में?

उसकी बची-खुची चीजों को
जला डालोगे?
उसकी अनुपस्थिति को भी जला डालोगे?
जो गूंज रही है उसकी उपस्थिति से
बहुत अधिक
सन्तूर की तरह
केश में

तीन

उसे मिटाओगे
एक भागी हुई लड़की को मिटाओगे
उसके ही घर की हवा से
उसे वहां से भी मिटाओगे
उसका जो बचपन है तुम्हारे भीतर
वहां से भी
मैं जानता हूं
कुलीनता की हिंसा !

लेकिन उसके भागने की बात
याद से नहीं जाएगी
पुरानी पवनचिक्कयों की तरह

वह कोई पहली लड़की नहीं है
जो भागी है
और न वह अन्तिम लड़की होगी
अभी और भी लड़के होंगे
और भी लड़कियां होंगी
जो भागेंगे मार्च के महीने में

लड़की भागती है
जैसे फूलों गुम होती हुई
तारों में गुम होती हुई
तैराकी की पोशाक में दौड़ती हुई
खचाखच भरे जगरमगर स्टेडियम में

चार

अगर एक लड़की भागती है
तो यह हमेशा जरूरी नहीं है
कि कोई लड़का भी भागा होगा

कई दूसरे जीवन प्रसंग हैं
जिनके साथ वह जा सकती है
कुछ भी कर सकती है
महज जन्म देना ही स्त्री होना नहीं है

तुम्हारे उस टैंक जैसे बंद और मजबूत
घर से बाहर
लड़कियां काफी बदल चुकी हैं
मैं तुम्हें यह इजाजत नहीं दूंगा
कि तुम उसकी सम्भावना की भी तस्करी करो

वह कहीं भी हो सकती है
गिर सकती है
बिखर सकती है
लेकिन वह खुद शामिल होगी सब में
गलतियां भी खुद ही करेगी
सब कुछ देखेगी शुरू से अंत तक
अपना अंत भी देखती हुई जाएगी
किसी दूसरे की मृत्यु नहीं मरेगी

पांच

लड़की भागती है
जैसे सफेद घोड़े पर सवार
लालच और जुए के आरपार
जर्जर दूल्हों से
कितनी धूल उठती है

तुम
जो
पत्नियों को अलग रखते हो
वेश्याओं से
और प्रेमिकाओं को अलग रखते हो
पत्नियों से
कितना आतंकित होते हो
जब स्त्री बेखौफ भटकती है
ढूंढती हुई अपना व्यक्तित्व
एक ही साथ वेश्याओं और पत्नियों
और प्रमिकाओं में !

अब तो वह कहीं भी हो सकती है
उन आगामी देशों में
जहां प्रणय एक काम होगा पूरा का पूरा

छह

कितनी-कितनी लड़कियां
भागती हैं मन ही मन
अपने रतजगे अपनी डायरी में
सचमुच की भागी लड़कियों से
उनकी आबादी बहुत बड़ी है

क्या तुम्हारे लिए कोई लड़की भागी?

क्या तुम्हारी रातों में
एक भी लाल मोरम वाली सड़क नहीं?

क्या तुम्हें दाम्पत्य दे दिया गया?
क्या तुम उसे उठा लाए
अपनी हैसियत अपनी ताकत से?
तुम उठा लाए एक ही बार में
एक स्त्री की तमाम रातें
उसके निधन के बाद की भी रातें !

तुम नहीं रोए पृथ्वी पर एक बार भी
किसी स्त्री के सीने से लगकर

सिर्फ आज की रात रुक जाओ
तुमसे नहीं कहा किसी स्त्री ने
सिर्फ आज की रात रुक जाओ
कितनी-कितनी बार कहा कितनी स्त्रियों ने दुनिया भर में
समुद्र के तमाम दरवाजों तक दौड़ती हुई आयीं वे

सिर्फ आज की रात रुक जाओ
और दुनिया जब तक रहेगी
सिर्फ आज की रात भी रहेगी

 

पहली फ़िल्म की रोशनी

जिस रात बांध टूटा
और शहर में पानी घुसा

तुमने ख़बर तक नहीं ली

जैसे तुम इतनी बड़ी हुई बग़ैर इस शहर के
जहाँ तुम्हारी पहली रेल थी
पहली फिल्म की रोशनी

 

कारवां 

समुद्र और शहर
एक दूसरे की याद से भरे हुए हैं

बंदरगाह हैं इनके रास्ते
और मज़दूर हैं इनके कारवाँ

शाम के समय गहरे पानी में
जब जहाज़ी लंगर डालते हैं
शहर अपनी बत्तियाँ जलाता है
दरवाज़ों में खड़ी स्त्रियाँ दिखाई देती हैं
क्या है उनके मन में
कैसी ज़मीन
बालू के ऊपर भी पानी
और बालू के नीचे भी पानी

समुद्र में काम करने वाले लोग
जब शहर में आते हैं
रात शुरू होती है
छुट्टी का सप्ताह है यह
एक सप्ताह की रात शुरू होती है
सात दिनों तक रात ही रात होगी
दुख होंगे लेकिन रेस्तराँ खुले रहेंगे
आधी रात के बाद भी सिनेमा दिखाया जायेगा
गाना जत्थों में गाया जायेगा
स्त्रितयों के साथ-साथ मर्द गायेंगे
इनमें बच्चे भी शामिल होंगे
और पालतू जानवर भी

जहाज़ के लंगर पानी में सोते रहेंगे

फिर अगले सप्ताह समुद्र ही समुद्र होगा
लेकिन इस सप्ताह शहर ही शहर।

(1997)

 

रास्‍ते 

घरों के भीतर से जाते थे हमारे रास्‍ते
इतने बड़े आँगन
हर ओर बरामदे ही बरामदे
जिनके दरवाज़े खुलते थे गली में
उधर से धूप आती थी दिन के अंत तक

और वे पेड़
जो छतों से घिरे हुए थे इस तरह कि
उन पेड़ों पर चढ़कर
किसी भी छत पर उतर जाते

थे जब हम बंदर से भी ज़्यादा बंदर
बिल्ली से भी ज़्यादा बिल्ली
 
हम थे कल गलियों में
बिजली के पोल को
पत्थर से बजाते हुए।

(1996)

 

जंक्शन

आह जंक्श‍न !
रेलें जहाँ देर तक रुकती हैं
बाक़ी सफ़र के लिए पानी लेती हैं

मैं ढूँढता हूँ वहाँ
अपने पुराने हमसफ़र।

(1994)

 

आम का पेड़

बीसों साल पुराना
यह पेड़ आम का
शाम के रंग का
 
ज़मीन तक झुक कर
ऊपर उठी हैं इसकी कई डालियाँ
कुछ तने को ऊपर उठाती
साथ-साथ गई हैं खुले में
 
रात में इसके नीचे
सूखी घास जैसी गरमाहट
नीड़, पक्षियों की साँस
उनके डैनों और बीट की गंध
काली मिट्टी जैसी छाया।
(1996)

 

गोली दागो पोस्टर

यह उन्नीस सौ बहत्तर की बीस अप्रैल है या
किसी पेशेवर हत्यारे का दायाँ हाथ या किसी जासूस
का चमडे का दस्ताना या किसी हमलावर की दूरबीन पर
टिका हुआ धब्बा है
जो भी हो-इसे मैं केवल एक दिन नहीं कह सकता !

जहाँ मैं लिख रहा हूँ
यह बहुत पुरानी जगह है
जहाँ आज भी शब्दों से अधिक तम्बाकू का
इस्तेमाल होता है

आकाश यहाँ एक सूअर की ऊँचाई भर है
यहाँ जीभ का इस्तेमाल सबसे कम हो रहा है
यहाँ आँख का इस्तेमाल सबसे कम हो रहा है
यहाँ कान का इस्तेमाल सबसे कम हो रहा है
यहाँ नाक का इस्तेमाल सबसे कम हो रहा है

यहाँ सिर्फ दाँत और पेट हैं
मिट्टी में धँसे हुए हाथ हैं
आदमी कहीं नहीं है
केवल एक नीला खोखल है
जो केवल अनाज माँगता रहता है-

एक मूसलधार बारिश से
दूसरी मूसलाधार बारिश तक

यह औरत मेरी माँ है या
पाँच फ़ीट लोहे की एक छड़
जिस पर दो सूखी रोटियाँ लटक रही हैं-
मरी हुई चिड़ियों की तरह
अब मेरी बेटी और मेरी हड़ताल में
बाल भर भी फ़र्क़ नहीं रह गया है
जबकि संविधान अपनी शर्तों पर
मेरी हड़ताल और मेरी बेटी को
तोड़ता जा रहा है

क्या इस आकस्मिक चुनाव के बाद
मुझे बारूद के बारे में
सोचना बंद कर देना चाहिए?
क्या उन्नीस सौ बहत्तर की इस बीस अप्रैल को
मैं अपने बच्चे के साथ
एक पिता की तरह रह सकता हूँ?
स्याही से भरी दवात की तरह-
एक गेंद की तरह
क्या मैं अपने बच्चों के साथ
एक घास भरे मैदान की तरह रह सकता हूँ?

वे लोग अगर अपनी कविता में मुझे
कभी ले भी जाते हैं तो
मेरी आँखों पर पट्टियाँ बाँधकर
मेरा इस्तेमाल करते हैं और फिर मुझे
सीमा से बाहर लाकर छोड़ देते हैं
वे मुझे राजधानी तक कभी नहीं पहुँचने देते हैं
मैं तो ज़िला-शहर तक आते-आते जकड़ लिया जाता हूँ !

सरकार ने नहीं-इस देश की सबसे
सस्ती सिगरेट ने मेरा साथ दिया

बहन के पैरों के आस-पास
पीले रेंड़ के पौधों की तरह
उगा था जो मेरा बचपन-
उसे दरोग़ा का भैंसा चर गया
आदमीयत को जीवित रखने के लिए अगर
एक दरोग़ा को गोली दागने का अधिकार है
तो मुझे क्यों नहीं ?

जिस ज़मीन पर
मैं अभी बैठकर लिख रहा हूँ
जिस ज़मीन पर मैं चलता हूँ
जिस ज़मीन को मैं जोतता हूँ
जिस ज़मीन में बीज बोता हूँ और
जिस ज़मीन से अन्न निकालकर मैं
गोदामों तक ढोता हूँ
उस ज़मीन के लिए गोली दागने का अधिकार
मुझे है या उन दोग़ले ज़मींदारों को जो पूरे देश को
सूदख़ोर का कुत्ता बना देना चाहते हैं

यह कविता नहीं है
यह गोली दागने की समझ है
जो तमाम क़लम चलानेवालों को
तमाम हल चलानेवालों से मिल रही है।

 

बकरियाँ 

अगर अनंत में झाडियाँ होतीं तो बकरियाँ
अनंत में भी हो आतीं
भर पेट पत्तियाँ तूंग कर वहाँ से
फिर धरती के किसी परिचित बरामदे में
लौट आतीं

जब मैं पहली बार पहाड़ों में गया
पहाड़ की तीखी चढाई पर भी बकरियों से मुलाक़ात हुई
वे काफ़ी नीचे के गाँवों से चढ़ती हुई ऊपर आ जाती थीं
जैसे जैसे हरियाली नीचे से उजड़ती जाती
गर्मियों में

लेकिन चरवाहे कहीँ नहीं दिखे
सो रहे होंगे
किसी पीपल की छाया में
यह सुख उन्हें ही नसीब है।

 

नदियाँ 

इछामती और मेघना
महानंदा
रावी और झेलम
गंगा गोदावरी
नर्मदा और घाघरा
नाम लेते हुए भी तकलीफ़ होती है

उनसे उतनी ही मुलाक़ात होती है
जितनी वे रास्ते में आ जाती हैं

और उस समय भी दिमाग कितना कम
पास जा पाता है
दिमाग तो भरा रहता है
लुटेरों के बाज़ार के शोर से।

 

सात सौ साल पुराना छन्द

पृथ्वी घूमती हुई गयी किस ओर
कि सेब में फूल आने लगे

छोटे-छोटे शहरों के चाँद
अलग-अलग याद आये
बारिश से ऊपर उठते हुए उनका क़रार

घास की पत्तियों में ठहर गयी बूँदें
बिखरने लगीं तमाम नींद में
 
धूप उतरी नींबू में

पहला प्यार जब राख हो गया
ख़ुद को बचाया उस साँवली नृत्य शिक्षिका ने
दंगे के ख़िलाफ़ दिखी वह प्रभातफेरी में फिर
शरीर और समुदाय एक हुआ

लंबी छुट्टी बीच में हीं ख़त्म कर
लौटी वह फिर काम पर
आयी अपनी छात्राओं के बीच
अभ्यास कराने सात सौ साल पुराने छंद का ।

(1994)

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