आलोक कुमार मिश्रा की रचनाएँ

डरा हुआ आदमी और कविता

राजनीति में मुझे पड़ना नहीं था
इसलिए समाज पर लिखी
मैंने एक कविता

कविता में अनायास उठे कुछ सवाल
सवालों पर बहुत से लोगों ने
किया बवाल
कहा — संस्कृति की महानता के गान की बजाय
क्यों समाज की मर्यादा रहे हो उछाल
यह कहकर कविता मिटा दी गई

डरा हुआ मैं सोचने लगा
परिवार पर लिखूँ
कोशिश कर ही रहा था कि
परिवार नाराज़ होकर कहने लगा —
कुछ काम कर लो
ये कविता काम नहीं आएगी

अन्त में
मैंने सोचा प्रेम पर लिखता हूँ
सबसे सुरक्षित है यह
इस पर कोई आवाज़ नहीं उठ पाएगी
पर लाख चाहने पर भी लिख न सका
प्रेम पर कविता
आखिर मैं जिससे प्रेम करूँ या
मुझसे जो करे
ऐसा कोई तो होता

एक डरा हुआ शून्य आदमी
आख़िर लिखे भी तो क्या ?

मैं और वो 

मैंने कहा — आओ साथ बैठो
उसने कहा — तुम अपनी सुनाते रहो
इस तरह वो करती रही
कई काम
एक साथ ही तमाम ।

मैंने कहा — तुम्हें याद है वो दिन…
बात काटकर बोली —
आजकल भूल जाती हूँ सब
और सूखने को डाल दिया डोर पर
वही मेरा दिया रुमाल ।

मैं उठा, कहा — चलता हूँ
वह कुछ नहीं बोली
बस देखती रही
इस तरह
इस बार भी मैं
और थोड़ा सा
रह गया वहीं ।

सुनो बेटी

सुनो, बेटी !
उसी दिन भाग जाना
छोड़कर मुझे और मेरा घर द्वार
जिस दिन
मुझमें यानी तुम्हारे पिता में घुसकर बैठ जाए
संस्कृति रक्षक पहरेदार
कोई परिवार रूपी जर्जर साम्राज्य का राजा
या दासियों का सामन्त

जिस दिन दिशा दिखाते दिखाते
मैं ख़ुद ही बन जाऊँ दिशा
रास्ता बदल लेना

जिस दिन वर्तमान होते होते
बन जाऊं भविष्य
विद्रोह कर देना

हालाँकि मुझे पता है
तुम्हारे बिना मैं रह नहीं पाऊँगा
पर छोड़ जाना
मुझे और मेरी अक़्ल को अकेला
ठिकाने लगने के लिए

यक़ीन मानो मैं आ जाऊँगा रास्ते पर
फिर ढूँढता हुआ तुम्हें
तुम्हारे माँ की वही सितारों जड़ी साड़ी
उपहार में
देने के लिए ।

नन्हीं चींटी 

नन्हीं चींटी ज़रा बताना
मुझको अपना हाल-ठिकाना
कहाँ से आती, कहाँ को जाती
दिन भर ढूँढो क्यों तुम खाना ।

छोटा सा तो पेट तुम्हारा
उस पर खाती हो ढेर सारा
मीठे से क्यों जी नहीं भरता
कैसे हो पाता है पचाना
नन्हीं चींटी जरा बताना ।

इतने घर में लोग तुम्हारे
मिलकर करते काम हो सारे
आलस तुममें तनिक नहीं है
करती क्यों नहीं कोई बहाना
नन्हीं चींटी जरा बताना ।

दादी कहती तुम हो ज्ञानी
अण्डे ढोओ उस दिन यानी
बारिश होगी ख़ूब सुहानी
ये सब तुमने कैसे जाना
नन्हीं चींटी जरा बताना ।

पेट दर्द 

दर्द पेट में बना हुआ है
लगता है जी खट्टा
सीने में भी जलन मची है
सोनू लगा रहा रट्टा

मम्मी बोली — ठीक है बेटा
रहो आज बिस्तर पर
वैसे आज पाठशाला में
खेल दिखाएगा जादूगर

सुनकर धीरे-धीरे सोनू
फिर होने लगा तैयार
बोला — पाठशाला मैं जाऊँगा
है तबियत में सुधार ।

अनोखी बन्दूक

एक बन्दूक बनाऊँ ऐसा
निकले जिससे प्रेम की गोली
जिसको लगे वही फिर बोले
एक-दूजे से मीठी बोली

फिर न होगी कहीं लड़ाई
सभी करेंगे सबकी भलाई
हम बच्चों संग खेलेंगे सब
गुल्ली-डण्डा, छुपन-छुपाई ।

चलो

चलो चान्द पर करें चढ़ाई
बैठ वहाँ पर करें पढ़ाई
सूरज पर भी धावा बोलें
गर्मी उसकी जरा टटोलें

फिर बादल पर झूला झूलें
कूद-कूद कर तारे छू लें
चलें हवा संग दूर देश में
घूमें जब तक रहें जोश में

जब थक जाएँ घर को आएँ
खा-पीकर बिस्तर पर जाएँ ।

तितली

पापा, मैं तितली बन जाऊँ
फूलों पर जाकर मण्डराऊँ
ख़ुशबू से जब जी भर जाए
आपके कान्धे आ सुस्ताऊँ
पापा, मैं तितली बन जाऊँ ।

पीले नीले हरे नारंगी
पँख मेरे होंगे सतरंगी
माँ मुझको पहचान न पाए
उड़-उड़ करके खूब छकाऊँ
पापा, मैं तितली बन जाऊँ ।

कोई पकड़े तो आप छुड़ाना
संग-संग मेरे बाग में आना
किसी जीव को तंग करो मत
तुम समझाओ, मैं समझाऊँ
पापा मैं तितली बन जाऊँ ।

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