आलोक श्रीवास्तव-२ की रचनाएँ

कनेर का एक पेड़ और एक रास्ता

एक शाम याद आती है
धूसर रंगों में डूबी
तुम्हारा चेहरा नहीं
एक रास्ता याद आता है
जिसे चलते हुए
मैंने तुम्हारा शहर छोड़ा था

तुम किन अँधेरों में जीती रहीं
मैं कभी नहीं जान पाया
तुम्हारी अन्तरात्मा का संगीत
कितना ज़िन्दा रहा, कितना मर गया
इसकी मुझे कोई ख़बर नहीं

तुम्हारे जिन कनेर फूलों की ओट से
रात के चाँद की ओर
अपनी बाहें फैलाई थीं
एक दृश्य की तरह मन में
वह अब भी अटका हुआ है

मैं तुम्हारे बरसों पुराने उस रूप को
देखता हूँ — अपने एकान्त में
और मेरी आँखें आँसुओं से भर उठती हैं
तुम्हारे सीने पर सर रखकर रोने का मन होता है

यह उजाड़–सा बीता मेरा जीवन
तुम्हें आवाज़ देता है
तुम हो इसी दुनिया में पस्त और हारी हुई
मुझसे बहुत दूर !

मेरी थकी स्मृतियों में
अब तुम्हारा चेहरा भी मुकम्मल नहीं हो पाता

दिखता है सिर्फ़
कनेर का एक पेड़
और एक रास्ता…

तुम्हारी भी एक दुनिया है 

तुम्हारे पास आकाश था
मेरे पास एक टेकरी
तुम्हारे पास उड़ान थी
मेरे पास
सुनसान में हिलती पत्तियां
तुम जनमी थीं हंसी के लिये
इस कठोर धरती पर
तुमने रोपीं
कोमल फूलों की बेलें
मैं देखता था
और सोचता था

बहुत पुराने दरख़्तों की
एज दुनिया थी मेरे चारों ओर
थके परिंदों वाली
शाम थी मेरे पास
कुछ धुनें थीं
मैं चाहता था कि एक पूरी शाम तुम
थके परिंदों का
पेंड़ पर लौटना देखो

मैं तुम्हें दिखाना चाहता था
अपने शहर की नदी में
धुंधलाती रात
दुखों से भरी एक दुनिया

मैं भूल गया था
तुम्हारी भी एक दुनिया है
जिसमें कई और नदियां हैं
कई और दरख़्त
कुछ दूसरे ही रंग
कुछ दूसरे ही स्वर
शायद कुछ दूसरे ही
दुख भी !

कहानी हमारे प्रेम की

तुमने रंग कहा
मैंने राग
बहुत अलग थी तुम्हारी भाषा
मैं सोचने लगा
उन तमाम सपनों के बारे में
चुपचाप जिनकी पदचाप
मेरी नींद में दाखिल होती थी
हर रात !

तुम्हारी आंखें बंद थीं

धूप की एक पतली लकीर
चुपचाप उतर रही थी
तुम्हारी पलकों से

शाम की दहलीज पर
एक सूखा पत्ता रखा था

बरसों पुरानी कोई धुन गल रही थी हवा में

तुम बहुत ख़ुश थीं
मैं बहुत उदास
बस,
इतनी सी कहानी थी
हमारे प्रेम की ।

तुमने कुछ नहीं सुना 

मैंने कामना की
तुम्हारी काया की

तुम्हारे मन और
तुम्हारे सपनों के बारे में सोचा
बहुत दूर से उतरती
एक छाया देखी मैंने
तुम्हारी आंखों में

तुम खंडहरों के बीच अकेली घूम रही थी
चिलचिलाती धूप में
पात झरे दरख़्त के नीचे
एक परछाईं पड़ी थी आधी झुलसी

बुतों के जंगल में
मैं तुम्हें आवाज़ दे रहा था
शायद तुमने कुछ नहीं सुना
शायद तुम बहुत परेशान थीं
शायद हवा में कोई जादू था
शायद वहीं कहीं छिपा था प्यार
जिसे तुम खो आयी थीं
और मैं ढूँढ़ रहा था ।

एक निर्जन नदी के किनारे

मैं जानता हूँ
तुम कुछ नहीं सोचती मेरे बारे में
तुम्हारी एक अलग दुनिया है
जादुई रंगों और
करिश्माई बांसुरियों की

एक सुनसान द्वीप पर अकेले तुम
आवाज़ देती हो
जल-पक्षियों को
एक निर्जन नदी के किनारे मैं
कभी अंजलि भरता हूँ
बहते पानी से
कभी बालू पर लिखता हूं वे अक्षर
जिनसे तुम्हारा नाम बनता है

जमा होती गयीं हैं मुझमें
तुम्हारी कई कई आकृतियां
भंगिमायें चेहरे की
रोशनी से छलछलाती तुम्हारी आंखें

मैं जुटाता हूँ तुम्हारे लिये
रंगों और फूलों की उपमा

ढेर सारे सपनों के बीच निर्द्वंद
बेफ़िक्र खड़ीं तुम
हंसती हो सब कुछ पर ।

मेरा प्रेम और तुम्हारी निष्ठुर आंखें 

यह कैसा प्रेम है !

कितने मजबूर हैं मेरे शब्द
और सच कितनी निष्ठुर तुम्हारी आँखें

यह कैसी ऋतु है
कितने चटक खिले हैं पलाश यहाँ
पर कितनी दूर हो तुम
अपने ही जंगल में कहीं खोयी

कितना सुनसान है यह रास्ता मेरे घर का
बहुत निर्जन हैं यहां हवायें
और सच कितनी विभोर अपनी ही दुनिया में तुम!
क्या कभी नहीं समझ सकोगी मेरा कोई भी शब्द

कैसा है यह प्रेम !
जितना ही सघन होता जाता है
उतनी ही दूर कहीं खोती जाती हो तुम…

…और यहां मेरी हथेली में रह जाते हैं
थोड़े से रीते शब्द
थोड़े से झरे पलाश
……..
……
….

यह नगर और हमारा प्रेम

इस नगर से गुजरते हुए डर लग रहा है
इन पहचाने रास्तों पर
आहत पड़ा है हमारा प्यार

शोषण के इस विशाल तंत्र में
अपनी उम्र खत्म होने से पहले मेरे रिश्ते
दिल में खौफ पैदा करते हैं
अचानक कोई साया
ख़याल छू कर गुजर जाता है

याद हैं तुम्हें शाम के रंग ?
गुजरे वक्त की किताबों के हर्फ ?

तुम जो इस धरती पर
सबसे सुंदर घटना थीं मेरे लिये
तुम जो बेइंतहां ख़ूबसूरत स्मृति हो अब
मेरे अतीत का अर्थ
मेरे वजूद का हिस्सा
जो कहीं इस नगर के वीरानों में छूट गया है
कैसे दोष दूं तुम्हें
इल्जाम खुद को देना भी कहीं से वाजिब नहीं

एक कशिश है भीतर
गुजरे मौसमों के रंग
गयी हवाओं का स्पर्श
बीते खयाल रास्ता चलते
अचानक टोंक जाते हैं

इस शहर के ज्यादातर मोड़,
ज्यादातर रास्ते
ये तमाम पेड़ और मकानात
अप्णी अमरता घोषित कर रहे हैं
कहीं नहीं हैं हमारी मुहब्बत के निशान

डर लग रहा है गुजरते हुए
इस अजीमुश्शान, भव्य और महान नगर से ।

एक दिल बच गया है साबुत

हमने भी विदा कर दिया प्रेम
रुख़सत कर दीं
ख़ुद को टटोलने की कोशिश करती बातें
खु़द पर से उतार दिया चांदनी का जादू
यह सफ़र यहां खत्म होता है

अब एक नाव तट से बंधी खड़ी है
एक आदमी कहीं पगडंडियों में खो गया है

पर, एक दिल बच गया है साबुत

कितना कुछ नष्ट होने के बाद भी
एक तपिश कहीं बची रह गयी है
शायद, कम जानते थे हम भी
ग़मे इश्क़ को !

दुख, प्रेम और समय 

बहुत से शब्द
बहुत बाद में खोलते हैं अपना अर्थ

बहुत बाद में समझ में आते हैं
दुख के रहस्य

ख़त्म हो जाने के बाद कोई सम्बन्ध
नए सिरे से बनने लगता है भीतर
…और प्यार नष्ट हो चुकने
टूट चुकने के बाद
पुनर्रचित करता है ख़ुद को

निरंतर पता चलती है अपनी सीमा
अपने दुख कम प्रतीत होते हैं तब
और अपना प्रेम कहीं बड़ा ।

एक स्वप्न के विरुद्ध 

तुम्हारी रातो मे यह किसका स्वप्न है?

खूबसूरत लॉन पर बिछी घासों में
आहिस्ता क़दम आता यह युवराज
बहुत मासूम लगता है
बहुत कोमल है उसकी अदायें

उसकी निगाहों में तुम्हारे लिये
दूर देश के नीले फूल
और दुर्लभ मणियाँ हैं

तुम देख नही पातीं
कोमलता के इस सारे तामझाम के बीच
क्रूरता का समूचा एक
जीवन-दर्शन पोशीदा है
पूरी एक मुकम्मल समझ
खु़शियाँ खरीदने की

तुम्हारी रातों में यह जिसका भी स्वप्न है
अथाह दरिया बन कर
भंवर और जल-गुंजलके बन कर
लिपटता ही जाता है
मेरे पावों से….

बहुत संभव है 

चांद तो तुम भी नहीं पाओगी
शायद प्रेम भी खो बैठो
दुखभी छू नहीं पायेगा तुम्हें
दिल के टूटने की बात तो दूर है
बहुत संभव है जीवन कट जाये ठीक-ठीक
हंसी में गुजर जायें दिन
और जिसे तुम यथार्थ कहती हो
उस सपने में रातें
एक निरापद जीवन जी लेने के बाद
शायद तुम सोचो
कुछ दार्शनिक लहजे में
बीते दिनों और छूटे संबंधों के बारे में
शायद तुम थोड़ा दुखी भी होओ
थोड़ा उदास भी

पर तुम्हारे ख़याल से बहुत दूर होगा
उस आदमी का दुख
जो शब्द में, खंडहर में, नदी-तट,
किसी जंगल, किसी भीड़, किसी गांव,
किसी शहर
सिर्फ तुम्हारे होने को जीता रहा
गढ़ता रहा अपनी कल्पना में तुम्हें
तुम्हें उठाए-उठाए अपने वजूद में

वह इस जमाने का सिसिफस
नायक नहीं था किसी प्रेमकथा का
जिस तंत्र में बिना प्रेम के भी
सुखी ज़िंदा रही हो तुम
उसी तंत्र में निरर्थक खत्म हुआ
एक हताश जीवन था ।

तुम नहीं जानोगी कभी

तुम नहीं जानोगी कभी
एक मामूली आदमी कैसे करता है प्यार

चिंता, दुख और बेबसी की
अथाह यमुना को पार कर
किस तरह बचा लाता है
जीवन और धरती के लिये
बेइंतहा कशिश

चट्टानों पर कुदाली की चोट करते
बंजर को हमवार बनाते
जंगलों में लकड़ियां बीनते
इस आदमी के पसीने में
एक अमृत है
जीवन भर नहीं जान पाओगी
तुम उसका स्वाद

बाढ़ के पानी से
बहा है कितनी बार उसका घर
टूटी शहतीरों के बीच उदास खड़े
इस आदमी ने
हर बार नये सिरे से बनाया है बसेरा
उसके साथ हमेशा रही है
भादों की डरावनी अंधेरी रातों में
आले पर टिमटिमाती
दिये की लौ

समय के विशाल फाटकों की सांकल
सुनी है अक्सर उसने
नींद के तीसरे पहर में !

उसकी भी नींद में एक सपना है
और उस सपने की रेशम जैसी
एक कोमल भाषा भी है
जिसे कभी कभी ज़मीन सुनती है
और कभी कभी
फूल, पत्ती और टहनियां भी
तुम नहीं जानोगी कभी
अर्थ उस भाषा का !

जीवन इसी तरह तय करता जायेगा
समय की विशाल दूरियां
तुम भी जी चुकोगी एक ज़िंदगी
इच्छायें पूरी होने और न होने के
दुख-सुख से भरी

एक मामूली आदमी का प्यार नेमत होता है
धरती पर लहलहाती फसलों जैसा
शायद जानोगी तुम भी
मगर बहुत दिनों बाद !

तुम्हें प्रेम करने की चाह

मैं तुम्हें प्रेम करना चाहता था
जिस तरह से तुम्हें किसी ने नहीं चाहा
तुम्हारे भाई, पिता, मां और भी तुम्हारे चारों तरफ के वे तमाम लोग
जिस तरह से तुम्हें नहीं चाह सके
मैंने चाहा था तुम्हें उस तरह से चाहना
चांद सितारों की तिरछी पड़ती रोशनी में
दिप-दिप हुआ तुम्हारा चेहरा
बहुत करीब से देखना

तुम्हें छूने की इच्छा थी
तुम्हारे शरीर के हर हिस्से को
खुद में जज़्ब कर लेने की गहरी कामना भी
पर इन सब से ऊपर थी
तुम्हारे होठों की हंसी को
सदा फूलों में डूबा देखने की ख्वाहिश
सबसे परे था
बहे जा रहे समय के इस दरिया में
इत्तफाकन मिले तुम्हारे साथ को
बड़ी लौ से बचाये रखने का यत्न
देर तक तुम्हारे हांथों को
बहुत कोमलता से
अपने हांथों में सहेज रखने की भोली इच्छा

मैं चाहता था
तुम्हारा बचपन खुद जीना तुम्हारे साथ
तुम्हारे अतीत की गलियों, मोहल्लों, शहरों मे जाना
जिस नदी के जिस किनारे कभी तुम ठहरी हो कुछ पल को
अपनी हथेलियों में वहां उस नदी को उठा लेना
जो फूल तुम्हें सबसे प्रिय रहे कभी
उनकी एक-एक पंखुरी को हाथ में ले कर देर तक सहलाना
जो गीत कभी तुमने गाये थे
उनके सारे बोल
सदा को इस पृथ्वी पर गुंजा देना

बहुत भोली थीं मेरी इच्छायें
उन इच्छाओं में तुम सिर्फ नारी नहीं रहीं
न कोई सैर्फ बहुत प्रिय व्यक्ति
सिर्फ साथी नहीं
फिर भला सिफ प्रिया
सिर्फ कामिनी ही कैसे होतीं !

तुमको इस तरह धारण किया खुद में
जैसे दरख़्त शरद की हवाओं, वन के रहस्यों और
ऋतु के फूलों को करते हैं
तुम स्वप्न नहीं थीं मेरे लिये
न सुंदर वस्तुओं की उपमा
मैंने सोचा था कि
तुममें मेरे जीवन का कोई बहुत गहरा अर्थ है

पर तुम्हारा जीवन क्या था मुझमें ?

यहीं से वह प्रश्न शुरु हुआ
जिसके फंदों में हर शब्द उलझ गया है…

मेरी भोली इच्छाओं पर
तुम्हें चाहने
और खु़द को चाह पाने का योग्य बनाने की कोशिशों पर
दुख की तेज चोटें पड़ रही हैं ….

तुम कभी जानोगी क्या कि अपने दिल की आंच में
तुम्हारे लिये बहुत करीब से मैंने क्या महसूस किया था…?

तुम यक़ीन करोगी तुम्हारे लिये
कितनी अनमोल सौगातें थीं मेरे पास….
विंध्य के पर्वत थे
सतपुड़ा के जंगल
गंगा की वर्तुल लहरें
पलाश के इतने फूल जितनी पृथ्वी पर नदियां
तारों भरी विंध्य की रात, कास के फूल
कनेर की पत्तियां
पहाड़ी गांवों की शामें
और कुछ बहुत अकेले खंडहर
कुछ बहुत निर्जन पुल
सौंदर्य के कुछ ऐसे सघन बिंब
जिन तक काल की कोई पहुंच नहीं
और दिल के बहुत भीतर से उठी एक सच्ची तड़प…

सुनो, यह सब तुम्हारे लिये था
और यह सब आज बिलख उठा है
– ये जंगल, पर्वत, लहरें
ये फूल, नदी, शाम और खंडहर

तुम होतीं तो इन्हें एक अर्थ मिलता
इनका एकांत यों भी होता
जैसे आकाशगंगाओं में तारों की हंसी गूंजे
इन्हें सिर्फ प्यार नहीं एक संबंध चाहिये था
एक संबोधन चाहिये था …
एक स्पर्श और एक हंसी चाहिये थी
अफसोस ! ऐसा कुछ न हुआ
और इन सब में गहरे उतर गये हैं
दुख के मौसम और उदासी के बोल ….

तुम्हारे इसी नगर में मैं
इस सब के साथ थके कदमों से गुजरता हूँ
कभी तुम्हारे घर के सामने से भी
कभी बहुत दूर उन रास्तों से
उन लोगों से, उन इमारतों और उन दरख़्तों से
जो तुमसे आश्ना थे
पर यह दर्द है कि बढ़ता ही जाता है
गो कि कभी कभी लगता है कोई रंजो-ग़म नहीं
फ़क़त उदासियां हैं शाम की ….

प्रेम और सामूहिक दुःस्वप्न 

तुम भी उस गिरोह का हिस्सा थीं
जो हमारी बस्तियों में आग लगा रहा था
जला रहा था निर्ममता से
हमारी कच्ची नींद के सपने
उस सपने की नाजुक डोर पर ही पैर रखता
पता नहीं कैसे मैं आ निकला था एक दिन
तुम्हारी ओर….

तुमसे मैंने प्रेम किया
विचित्र रहे उसके अनुभव
मैं कहाँ था खुद
सिर्फ एक ऊंची कगार थी
और एक कठिन तिलिस्म…

इस धरती की कविता की तरह मैंने तुमको देखा
एक ख़ूबसूरत स्मृति की तरह रखा तुम्हें सहेजकर
एकांत में अबोध प्रार्थना की तरह
याद किया कितनी बार
तुम्हें चाहा
जीवन में अर्थ की तरह
अर्थ में दीप्ति की तरह देखा
तुम्हारा होना

कहाँ पता था तब
प्रेम अक्सर भ्रम भी साबित होता है
ज़रूरत और अभाव के बीच का अस्थिर टापू
जहाँ बस्तियाँ नहीं बसतीं
कहाँ पता था तब
ख़रीद-फ़रोख़्त की इस दुनिया में
सुंदरता का ठीक-ठीक वही अर्थ नहीं होता
जो दुनिया की महान किताबें हमें बताती हैं
जो फूलों के रंग और नदी की गति के साथ
हमारी चेतना की गहराईयों में उतर चुका होता है
जिसमें भोर के शब्द और गोधूलि का रंग खनकता है …

कहाँ पता था तब
कि बहुत दूर छूट गये हमारे घरों के किवाड़
जर्जर हो चुके हैं
धूल हो चुके हैं बचपन के अबोध सपने
समय में कहीं दफ़न पड़ा है
पुरखों का भी प्रेम
उनकी प्रेमिकाओं की स्मृति मंडराती है
पुरानी कविताओं के लय-ताल में

कहाँ पता था तब
प्रेम न कर पाने और न पा सकने की पीड़ा का
कोई भयानक अर्थ भी होता है
जिसकी ओट में छुपे होते हैं
सामूहिक दुःस्वप्न

कहाँ पता था तब
तुम्हारे मन के भी परे तुम्हारा दिमाग है
जो मुक्त नहीं हो पाया गुलामी से अभी
फिर भला तुम कैसे अनुमान करतीं कि
दुखों की एक दुनिया बुन दी है तुमने किसी के चारों ओर
कभी पूरे न हो पाने वाले ख़्वाबों का एक अंतहीन सिलसिला …

तुम भला क्यों जानोगी
उम्र भर कोई क्यों देखता रहा स्वप्न
एक उजड़े नगर में लौटने का
निरर्थक प्रतीक्षा में ख़त्म कर डाला एक पूरा जीवन
एक जीवन –
जिसका बहुत कुछ हो सकता था

कहाँ पता था मुझे तब
मेरी भाषा तुम्हारे लिये गै़र है
व्यर्थ हैं मेरी लड़ाईयां मेरे सपने
नहीं जानता था तब तुम्हारे जानने की सीमा
तुम्हारे सुख की परिधि पर ख़त्म होती है
और मेरे दुख से शुरु होता है मेरा संसार
देखा है कभी
एक ग़रीब देश के मामूली आदमी के दुख का संसार ?
फिर भला तुम क्यों जानोगी
दुख कैसे प्रेम बनता है और
प्रेम दुख

क्या जानती हो मुझे ?
मैं, जो एक दिन तुम्हारे वैभव पर रीझा
तुम्हारी हंसी, तुम्हारी खनक का वैभव
मैं रीझा तुम्हारी वसंत से धुली आंखों के विस्तार पर
जीवन को तेज कदमों से पार करती
तुम्हारी सुंदरता पर
जैसेक कोई चांद पर मोहित होता है
कोई चाहता है नदी की लहरों को हाथों में उठा लेना
वैसे ही मोहित हुआ तुम पर
तुम्हें चाहा
तुम्हारे जानने के परे है यह चाहत
तुम्हारे जानने के परे है यह दुख
और बहुत परे है यह हमारा जीवन
जिस पर सदियों की लूट तारी है अब भी !

केतकी फ़िर फूलेगी 

केतकी फिर फूलेगी
जूही में भी फूटॆंगी कलियाँ
पूर्व से लौटेंगे पक्षी
नगर,ग्राम, अरण्य को छा लेंगे दक्खिनी मेघ
यह मौसम का आवर्तन,
ऋतुओं की यह आवाजाही,
पता नहीं तुम्हें कैसी लगेगी
पर मैं तो आज दर्द से भरे अपने इस पूरे वजूद के साथ
आने वाले सूने दिनों को देख रहा हूँ
जीवन-व्यापी इस दुख की शिनाख़्त
इसी क्षण से तोड़ रही है मुझे अनागत बरसों तक के लिये

यह मुंडेर पर की रुकी धूप क्ल नहीं होगी
या हो सकता है हो भी
पर तुम्हारी आँखों में इस धूप को घुलते हुए देखना
शायद ही फिर कभी हो पाये

बहुत भारी है यह शब्द शायद
शायद बुड्ढे होने तक हम जीवित रहें
शायद तुम पहले धरती को विदा कहो
शायद अचानक किसी दिन तुमसे मुलाकात हो
शायद कोई शब्द न हो तुम्हारे पास
शायद मैं भी हो चुका होऊँ अपनी भाषा
कितना ख़तरनाक है प्रेम करना और जु़दा हो जाना
इस मोड़ के बाद जो भविष्य शुरु होता है
कितना ख़तरनाक है इसके बारे में सोचना
और एक मनुष्य की पूरी संजीदगी के साथ उसे जीना
गिनना समुद्र की लहरों को उनके टूटने तक
साँस की हद तक जुटे रहना जीवन की जय में
उतनी ही संजीदगी से
कोमलता और शिद्दत से
हर शै को देखना, चाहना, रचना
जितनी संजीदगी, कोमलता और शिद्दत से
जीवन में टूट कर जैसे पहली बार किसी को चाहा था
हमेशा बड़े जतन से कुछ सिरजते रहना
जैसे वह गुजरे प्रेम का कोई स्मारक हो
जिसमें सचमुच कोई अमरत्व हो
काल में विलीन हुए किसी संबंध का

प्रेम का अंत नहीं
दुख में, उदासी में, थकन और अकेलेपन में
थोड़ा और दुख, थोड़ी और उदासी, थोड़ी और थकन
थोड़ा और अकेलापन बनकर
बचा रहता है प्रेम –
अरसे पहले के एक सादे से जज़्बे और
एक जरूरी-से सम्बंध की याद दिलाता

….और तब आती हैं ऋतुएं,
दखिनी मेघ,
जूही में कलियाँ, केतकी में फूल
नदियों में उछालें लेता पानी
और रंग ढेर सारे आकाश के
शब्द रात के नीरव, चुप
और भोर की गूंज
मद्धिम !

रहस्य वसंत की उदासी का

ऋतुओं की पुत्री
क्या याद रखेगा तुम्हें यह जाता वसंत ?

इसके झरे पत्तों में मेरा दुख है
पंखुरियों में कुछ गहरी टीसें

यह अंत है एक ऋतु का
नील फूलों पर हवा का का़तर स्पर्श
जैसे कोई सिसकी हो

क्या कभी नहीं आओगी आज के बाद ?
कभीं नहीं कर सकोगी मुझे प्यार ?
पलाश यों ही झरता रहेगा ?
कगारों पर यों ही टूटती रहेंगी लहरें ?

तुम्हारी तमाम स्मृतियाँ
जगह-जगह बिखरी पड़ी हैं –

इस रास्ते पर तुम्हारी पग-छापें हैं
तुम्हारे केशों की सुगंध
तुम्हारी अंगुलियों का स्पर्श
तुम्हारी आंखों का अबोल देखना
यहां मेरे मन में भी छूट गया है
एक छाया रह गयी है
एक दबी हंसी
एक उत्फुल्ल चेहरा

यह तुम्हारा चेहरा था
जिसे मैं कभी नहीं चूम पाया
उस पर नहीं हैं मेरे प्यार की छाप
मेरी कामना के कोमल स्पर्श
सिर्फ एक डरी छुअन है मेरे हांथों की
तुम्हारे कंधो पर
क्या भूल जाओगी उसे भी ?
कंधे पर घिर आये केशों को सँवारते
कभी याद नहीं करोगी उन हाथों को ?

उन हाथों की ज़द से बहुत दूर थे
गगन के तारे
जादू-महलों के फूल, मायावी अस्त्र-शस्त्र,
सम्मोहन विद्यायें
पर धरती के कुछ स्वप्न और
नदी का एक अंजलि जल
तुम्हारे लिये उन हाथों में सदा रहा !

तुम्हारे लौटते ही
देखो यह सारा जंगल अब उदास हो चला है
तुम जिस राजकुमार की प्रतीक्षा में थी
अंधकार में घिरते इस वन के अंधेरे में
कहीं वह भटक न जाये
मैंने उसे दूर दरख़्तों के पीछे से आते देखा
मैं बहुत डर गया हूँ उसके वैभव से
उसके श्वेत अश्वों की अयालें
अब भी मेरी आंखों में झलक रही हैं ।

देखो तो कितना विचित्र है जीवन
इस बीसवीं सदी में
रौशनियों के इस जगमग शहर में
फिर दोहरायी गयी चरवाहे की प्रेम कथा..
फिर तुम्हें ले गया
सफेद घोड़ों का बांका सवार

…….
अब खुला रहस्य वसंत की उदासी का
अपने फूल, हवा, गंध, कोंपलें समेट
जल्दी जल्दी लौटते वसंत का दर्द
अब हुआ ज़ाहिर…..

भला क्यों ठहरे वसंत इस धरती पर
क्यों खिलें वन में टेसू ?

चैत्र ही हमारी ऋतु है
वसंत हमारा सपना
इस जीवन में ऋतुओं की पुत्री
बार-बार भांति भांति से
बस तुम्हारा जाना ही सच है
और एक कथा है – नदी का एक अंजलि जल
कनेर का एक पीला फूल
अवसाद श्लथ चेहरा
दर्द से बिंधा एक दिल

किस्सा-कहानी है प्रेम
सच है —
वसंत का जल्दी जल्दी जाना,
रौशनियों का यह शहर
धीमे धीमे दुख से उबरता
एक आदमी….

सुदूर भविष्य के बारे में 

शायद किसी दिन
मैं फिर आऊंगा
शायद किसी दिन
तुम यों ही कहीं मिल जाओगी

बहुत बदल गये चेहरे भी एक दूसरे के
हम पहचान लेंगे

शायद शिनाख़्त न कर पायें
आपसी दुखों की
पर अब से थोड़ा समझदार होंगे
और दे सकेंगे दूसरे को
प्रेम और भरोसा ।

आखिरकार लौट आये तुम 

तुम्हारा लौटना किसी सिद्धार्थ का
निरापद वनों से
जनपदों की ओर आना नहीं है
तुम्हारे पास दुखों का कोई निवारण भी नहीं
खाली हाथ लौटे हो तुम
वैसी-की-वैसी आत्मा
वैसी-की-वैसी देह

सवाल अब भी क़ाबिज़ है
दुख अब भी मूर्त

फिर भी बधाइ लो
न हो तुम्हारा लौटना बुद्ध की तरह
न हो जगतव्यापी दुखों का हल
पर लौटे हो तुम
उन्नतमाथ
प्रश्नचिन्हों से घिरे
और मैं जानता हूं
सुख के बारे में किये तुम्हारे प्रश्न
बहुत वाजिब हैं

निवारण के साथ लौटा व्यक्ति
मिथक होता जाता है तो
सवालों के साथ लौटा मनुष्य
इतिहास !

विश्वास

मुझे भी है विश्वास
इन्हीं पथरीली चट्टानों के बीच फूटॆगा सोता
यहीं कहीं से उगेगा बीज
जन्मेगा नया युग –
हमारे ही दुखो की नदी तय करता

तुम्हारा यह चेहरा
जिसे हम कभीं चांद की उपमा देते हैं
कभी किसी फूल की
अपने आप में एक रोशनी होगा
तुम हमारी संगिनी
हमारी प्रिया
दूर देश में बाट नहीं जोहोगी
सिर्फ़ गीतों से बहला नहीम लोगी अपना मन
तुम खुद गीत होओगी
निरे कवियों का गीत नहीं
वह गीत जो धड़कता है ज़िन्दगी की आंच में
जो नदी की एक वर्तुल लहर से उठ कर
फैल जाता है सुदूर सागरों तक
गांवों-पर्वतों और वनानियों तक
जिसमें गूंजती है यह धरती
जिसके स्पर्श से हवा
सरसों के कोसों फ़ैले खेतों में
बसंत बन जाती है

बहुत दुख है, टूटन है
इतिहास की सबसे गहन निराशायें हैं
पर जीवन कभीं नहीं होता
हारी हुई समरभूमि
आज और भी अधिक दृढ़ता चाहिये
इन्हीं सब के बीच से जन्मेगा वह युग
जब झील में नहीं डूबेगे हमारे सपने
हमारे साथ सिर्फ स्मृतियां नहीं
तुम भी होओगी.

एक दिन आयेगा 

एक दिन आयेगा
जब तुम जिस रास्ते गुजरोगी
वहीं सबसे पहले खिलेंगे फूल

तुम जिन भी झरनों को छूओगी
सबसे मीठा होगा उनका पानी
जिन भी दरवाजों पर
तुम्हारे हांथों की थपथपाहट होगी
खुशियाँ वहीं आयेंगीं सबसे पहले

जिस भी शख्स से तुम करोगी बातें
वह नफ़रत नहीं कर पायेगा
फिर कभी किसी से
जिस भी किसी का कंधा तुम छुओगी
हर किसी का दुख उठा लेने की
कूवत आ जायेगी उस कंधे में
जिन भी आंखों में तुम झांकोगी
उन आंखों का देखा हर कुछ
वसंत का मौसम होगा

जिस भी व्यक्ति को तुम प्यार करोगी
चाहोगी जिस किसी को दिल की गहराइयों से
सारे देवदूत शर्मसार होंगे उसके आगे

चैत्र के ठीक पहले
पत्रहीन हो गये पलाश-वृक्षों पर
जैसे रंग उतरता है
ॠतु भींगती है भोर की ओस में
वैसे ही गुजरोगी तुम एक दिन
हमारी इच्छाओं, दुखों और स्वप्नों के बीच से

एक दिन आयेगा
जब हम दुखी नहीं होंगे तुम्हें लेकर
तुम्हें दोष नहीं देंगे
उम्मीदें नहीं पालेंगे
पर, सचमुच तुम्हें चाह सकेंगे
तुम भी महसूस कर सकोगी
हमारे प्यार का ताप ।

एक सभ्यता प्रेम के विरुद्ध 

दुनिया में सबसे कठिन चीज है
प्यार करना

एक मरुस्थल आ जाता है सबसे पहले
न जाने कहां से अगम्य पर्वत-श्रेणियां
एक खारा दरिया
एक नगर
एक समूची सभ्यता –
प्रेम के विरुद्ध

अपना ही साहस अपनी ही हंसी उड़ाने लगता है

वह तुम्हारी शत्रु हो जाती है
चली जाती है तुम्हारे ख्वाब से भी दूर
जीवन तुम्हें हांक देता है
किसी रेगिस्तान में .

उस लड़की का नाम

उस लड़की का कोई नाम नहीं है
वह अकसर
हम मध्यवर्ग के लोगों के सपने में आती है
और हम उसको ठीक-ठीक पहचान भी नहीं पाते
हम अपने सपनों को कुछ नाम देते हैं,
मसलन -प्रेम
और बुनते हैं स्मृतियों और दुख का
ताना-बाना अपने चारों ओर
फिर जीते हैं एक जीवन
ढेर सारी कुंठाओं से भरा
ढेर सारी सफलताओं से आतंकित

इस सारे दौर में
हमारे ही वर्ग की एक लड़की
किसी पुल की रेलिंग पर खड़ी होती है –
आत्महत्या के लिये
तो किसी घर की टूटी मुंडेर पर
कभी वह अपनी बढ़ती उम्र और
अपनी देह का मीज़ान बैठाती है
तो कभी दुलारती है
पड़ोस के बच्चे को
जैसे वही उसके जीवन का प्रेम हो
फिर टूट-टूट कर रोती है सपने में
जितना नजदीक जाती है वह जीवन के
उतनी ही तरह से
पीड़ायें प्रवेश करती हैं
उसके शरीर और मन में
उतनी ही विकृत होती जाती है
हमारे सपनों की शक्ल

फिर आता है प्रेम
डर बन कर हमारे जीवन में
फिर आता है याद एक चेहरा
जिसे जीवन के न जाने किस उजाड़ में
हम छोड़ आये हैं
एक लड़की का नाम
कनेर के कुछ बिखरे फूल
फिर आती है याद विदा की एक रात
और जीवन का यह विशाल रणक्षेत्र
जिसमें कितने अकेले हैं हम
गुलामों की तरह लड़ते –
अपनी ही इच्छाओं
अपने ही संस्कारों से
ग़ुलामी के तमाम रिश्ते बनाते और जीते हुए
पोसते हैं एक सदिच्छा –
शोषणमुक्त समाज की ।

चांद और औरत

चांद पकड़ने को बढ़ती है एक औरत
अपनी स्मृतियों बाहर आ कर
अपने घर, अपने आंगन
अपने बचपन और अपनी युवावस्था के
तमाम वर्षों के दरमियान
रात के अकेले चांद पर मोहित स्त्री
पता नहीं कहां चली गयी है
ख़ुद से दूर न जाने किस निर्जन में

जाओ उसे खोज लाओ
तभी तुम उसे प्यार कर पाओगे
जंगलों में, वीरान रास्तों, सूने पहाड़ों या
रात में जागते किसी विशाल महानगर में
कहीं-न-कहीं तो वह होगी ही

यह तुम्हारे बगल में खड़ी स्त्री
तुम्हारे पास नहीं है
यह तो चांद की तलाश में है
और रो रही है
और तुम उसका इतना सा भी
दुख नहीं समझ पा रहे
पुरुष-प्रभुत्व और
वर्ग-शोषण के इतिहास की चारदिवारी में
संयोग से तुम्हारे पास खड़ी
इस स्वप्नदर्शी स्त्री के पास
चांद की ऊबड़-खाबड़ ज़मीन तक
पहुंचानेवाला कोई निरापद रास्ता नहीं है
स्वप्न में भी नहीं

उसके पास एक लंबा सपना है
और दुख की एक विशाल रात

अभी तो वह
तुम्हारे इस प्यार को स्वीकार भर कर सकती है
जो ठीक-ठीक प्यार भी नहीं
तुम्हारी इच्छाओं और जरूरतों का
अजीब-सा समीकरण है

हां, जिस दिन वह
चांद की उलझी माया से मुक्त होगी
जिस दिन वह लौटेगी तमाम मायादेशों से
वह तुम्हें प्यार करेगी
यकीन करो चांद तब भी होगा
निर्जन पहाड़ों, जंगलों, नदियों, समुद्रों और
सोये नगरों पर फैली रात के उजास में
एक बिंब चुपचाप
उतर जायेगा ताल की गहरायी में
यकीन करो वह चांद ही होगा
और सुंदर भी !

ओ शायरा, हमारी ख्वाबपरी

चांद लहरों में घुला
और एक लहर समूची
मैंने भर ली अंजलि में

तुम्हारी आवाज
कोमल, दृढ़, उदास आवाज़
वादियों को पार करती
सरसों के खेत
और गंगा के पानी पर छा उठी

तुम बड़ी शिद्दत से जिसकी हथेली पकड़े थी
एक धुंध में वह शख़्स गुम होता दिखा
एक उदासी सी तिर आयी तुम्हारी आंखों में

संदल के पानी में भींगे तुम्हारे बाल
चंदन के मिस से दमकता जिस्म
और तुम्हारे तन के सुंदर-वन में
टूट कर छायी हरियाली
सब पर रात के काले केशों का जादू…

जंगल की वीरान हवा
पर्वत-पार की बांसुरी
विरह की चुप्पी तुम्हारे होंठ पर

ओ शायरा !
हमारी ख़्वाबपरी
गाओ हमारे लिये
चांद सितारों के थक कर सोने तक ….

परवीन शाकिर का असमय निधन १९९४ के दिसंबर के आखिरी हफ़्ते में कार-दुर्घटना में हो गया. यह कविता उनकी खूबसूरत नज्मों की याद में .

क्षमा करना 

क्षमा करना
सिर्फ़ तुम्हारा शरीर पाना चाहा
नयी परिभाषायें गढ़ीं
चौकन्ने शब्द दिये अपनी ख़्वाहिश को
क्षमा करना, एक बहुत काली लंबी रात थी हमारे चारों ओर
एक जंगल था मायावी दरख़्तों का……

बहुत भरोसा था हमें कोमल शब्दों पर
और सदियों के आंसुओं से तुम्हारी आंख़ें गीली थीं
यकीन था भावनाओं पर
पर तुम्हारे स्वत्व पर लोहे की जिन सलाखों के निशान थे
उसका कोई काट न था इन भावनाओं के पास
शब्द थे ढेर सारे
निरर्थक नहीं थे सब
पर तुमको संबोधित हो कर भी कितने गैर थे तुम्हारे लिये

क्षमा करना, इन्हीं शब्दों के बीहड़ वन में
बदहवाश भटकते बीत गया है कितना वक्त……
तुम हमारे सपनों में मौजूद रही
हमारी रचना, हमारे काम, हमारे संघर्ष, हमारे रक्त में तैरती रहीं
बजती रहीं हमारी निराशाओं, हमारे दुख के रक्तों में
स्मरण का राग बनकर

क्षमा करना, हम कुछ नहीं कर सके तुम्हारे लिये

तुम पीछे छूटे कस्बों में
धुंधली रातों और विशाल तपते दिनों में ढोती रहीं जिन्दगी
और हम शहर-दर-शहर
अपनी मामूली उपलब्धियों पर बच्चों की तरह खुश होते
मामूली दुखों पर गहरे अवसाद से भर जाते
भागते रहे, थकते रहे, टूटते रहे
कोसते रहे हन वक्त को
हज़ार ज़ंज़ीरें बन कर ज़िंदगी
दिन-ब-दिन तुमसे दूर करती रही हमें
क्षमा करना, हमें फुरसत ही नहीं मिल पायी
तुम तक लौट पाने की

वसंत, फूल, चांदनी और हिलोर से भरी
अपनी ज़िंदगी तुम्हें हैरान करती रही
हैरान करते रहे तुम्हें वे सपने
जिनमें एक खुला क्षितिज होता था
और एक अजस्रप्रवाही सलिला
कैशोर्य का एक दोस्त चेहरा होता था जिनमें
क्षमा करना, वह हमारा ही चेहरा था –
वक्त की गर्द से घिरा
न तुम्हें पहचान पाता
न ख़ुद की शिनाख़्त कर पाता

क्षमा करना,
हम तुम्हारे लिये लड़ नहीं सके कोई लड़ाई
हालांकि दावा करते रहे
गुज़र गईं बारिश से डूबी तमाम अंधेरी रातें
रंग और गंध की आवाज़ें देता कितनी बार गुज़रा वसंत
दहकते पलाश-फूलों वाली चैत्र हवाओं ने
न जाने कितने स्मरण बांचे
हर बार तुम्हारी नयी छवियां लिये उतरा आषाढ़
पर तमाम नेक इरादों और प्रतीक्षाओं के बावजूद कभीं नहीं आयी वह ॠतु
जो तुम्हें एक भयावह बियाबान में
न जाने क्या ढूंढती-खोजती छोड़ कर लौट गयी थी

क्षमा करना,
हम तुम्हारे लिये वह ॠतु तक न खोज सके

वक्त की भारी सलाखों से छिल गये हमारे कंधे देखो
देखो यह विकृत हो गया चेहरा, ये पत्थर हुई आंखें
इनमें तुम नहीं हो
एक बंजर समय है
मध्य-वर्ग का उत्तरपूंज़ीवादी हिंस्र समाज है
तुम नहीं हो इन आंख़ों में

पर कही तो हो तुम
अपनी लड़ाई अपनी तरह से लड़ती ।

प्रेम के निशान 

यहीं कहीं हमारे प्रेम के निशान छूटे हैं
यहीं कहीं दो डरी आंखें
यहॊं कहीं लड़खड़ाती जुबान
यहीं कहीं थकान पांवों की

देखो खड़ा है यह दरख़्त अब भी
अब भी साबुत है वह घर
जस-का-तस
सिर्फ पलस्तर झरा है दीवारों से

सामने गुज़रती सड़क पर वैसे ही उड़ती है धूल .

यहीं कहीं पड़ा है उस स्त्री का हारा थका जीवन
जो उन दिनों वसंत का गीत होती थी
उसके पांवों के स्पर्श से धरती पर कोंपल फूटती थी
उसकी आंखों में किसी विशाल स्वप्न-रात्रि का
अकेला चांद टहलता था

यही है वह लड़की दो बच्चों की अंगुलियां थामे
बहुत सुबह शुरु होता है उसका जीवन
और देर रात तक खटने के बाद
याद नहीं रहती उसे अपनी थकान भी
इस बीच चुपके से रात की झील में
गिर जाते हैं तमाम तारे

वह सूनी सड़क
बारिश की पहली झड़ी
और भीतर उगा एक बहुत कोमल अंकुर
आते वसंत की हवायें
कोयल की पहली पुकार
आज किस रूप में सुरक्षित हैं ?

इस दुखांत प्रेम-कथा के नाट्य-स्थल पर
प्रतीत होते हैं, पर हैं नहीं –
प्रेम के निशान,
गुजरे मौसम की छापें…

जब वसंत का पहला फूल खिलता है
तब याद आती है वह स्त्री ..
थकी, उदास, मलिन मन
जो वसंत का गीत होती थी
जिसके पांव के स्पर्श से धरती पर
फूट पड़ती थीं कोपलें
जिसकी आंखों में
किसी विशाल स्वप्न-रात्रि का
अकेला चांद टहलता था ….

वह छुअन

कनेर के उन फूलों पर
तुम्हारी अंगुलियों का
वह सकुचाया-सा स्पर्श
मिटा नहीं
अनंतजीवी हो उठा
हर कनेर पर
वह हल्की छुअन
मुझे लिखी मिली है …

क्या सच में वह वसंत था ! 

वसंत मैंने तुम्हारी आंखों में देखा था
बरसों से नहीं देखीं
तुम्हारी आंखें
देखा है –
बस एक उदास मौसम
जो सहमा-सा आता है
और
आहिस्ता से गुजर जाता है !

क्या सच में
वह वसंत था?
कहाँ से आया था वह
तुम्हारी आंखों में ?

चैत की हवा

चैत की हवा
हिलाती है
टहनियां
वृक्षों के पत्ते
फिरती है
देर तक
उदासी बन कर
फिर
एक अनाम संदेशा
नदी-कूल लिख
चली जाती है
चुपचाप !

वसंत और तुम

दिशाओं पर
झुका हुआ एक मुख
निहार रहा है
पृथ्वी के एक फूल को
अति प्राचीन
रोमानी शैली में अधोमुख
फूल, एकटक देखे जा रहा है
अपने निहारने वाले को

दिशाओं पर
अभिभूत वह वसंत है
और
वह फूल ?

तुम अमर होंगी इस ऋतु में 

इस वसंत के किनारे रुको !
इसके फूलों में
इसके पानी में
इसकी हवा में
डूब जाओ थोड़ी देर को
सुनो इसके पेड़ों की आवाज़
छुओ इसकी पत्तियां
सौंप दो अपने को
एक नाद सुनायी देगा
दिखायी देंगे देवदूतों के चेहरे
तुम्हारे भीतर प्रेम
बस धीमे से एक बार
नाम लेगा किसी का
तुम अमर होगी इस ऋतु में
फूल, पानी, हवा, वृक्ष और पत्तियां
तुम्हें धन्यवाद देंगी
नदियों में तुम्हारे लिये
आशीष होगा !

प्रेम का ही स्वर 

प्रेम अब शिराओं में बह रहा है
टपक रहा है आंखों से
तारे चले गये हैं दूर आकाश में
मौन है धरती
सिर्फ एक फूल खिला है सूने में
सिर्फ उसी का रंग
सिर्फ उसी की पंखुरी
दिशाओं पर दिपती है
काल, काल ही के जलागारों से
पुनर्जन्म ले रहा है
एक नया ही व्यक्ति
मैं अपने ही भीतर से उग रहा हूं
तुम्हारी हंसी मुझमें घुल रही है
तुम्हारे सौंदर्य से अभिभूत
विनत तुम्हारे आंतरिक संसार के आगे
मैं अलंकारों की भाषा भूल गया हूं
प्रेम का ही स्वर है
मेरे सारे वजूद पर छाया हुआ ।

यह कैसा वसंत आया है 

एक

वसंत आया है और मैं उदास हूं

कैसे कहूं कि उदास हैं कोपलें
हवा, घास, धरती और वन उदास हैं
कैसे कहूं ?

दो

तुम्हारे बिना यह कैसा वसंत आया है?

नदी का जल
एक उदास लय की याद दिलाता
बहा जा रहा है
बांसुरी की एक टूटी टेक हिचकियां ले रही है
फूलों में यह कैसा रंग है ?
ये कैसे शब्द लिख रहा हूं मैं ?

तीन

इस वसंत भी तुम्हें प्यार नहीं कर पाउंगा

सूरज की आंच फूलों को गरमायेगी
उमग भरी डालों पर तैरेगा ऋतु का गान

वियोग की ऋतु का तार बजेगा मुझमें

न तुम्हारे केश छू पाउंगा
न आंखों में उतरती धूप देख सकूंगा
हवा में तुम्हारे वस्त्रों का
मंद उड़ना भी न होगा

यह वसंत भी
फूल, नदी, वन, धरती डालों पर से बीत जायेगा !

चार

इसे तो प्यार की ऋतु होना था
डूब जाना था हमें
इस मौसम के रस, रूप, गंध में
आवाज देनी थी एक-दूसरे को
हवा में गूंजनी थी हमारी सांसें
तट बंधी डोंगियों में
उमड़ आना था फूलों का ज्वार
तुम्हें उत्फुल्ल हंसना था
सरि-तट के निचाट एकांत में
सांझ तारे की साक्षी में
मुझे थाम लेनी थी
तुम्हारी हथेलियां

पर सरि तट पर आया यह सूना वसंत भी
लो हुआ ओझल

पांच

वसंत का चांद उगा है

पता नहीं फूलों पर अमृत झर रहा है या
सैकत-तट पर चांदनी

जाने किस अतीत में खोयीं
किस रास्ते किस गांव बस्ती की तुम हुई बाशिंदा

वक़्त के साथ लय होना था वियोग
किसी भविष्य में
किसी और शहर
नाम-रूप में तुमको फिर मिलना था
फिर शुरु होनी थी
धरती की सबसे सुंदर गाथा

वसंत के इस निर्जन चांद को उगना तो था आज भी
पर इस तरह स्तब्ध, शोकमय तो नहीं

पता नहीं फूलों पर अमृत झर रहा है या
सैकत-तट पर चांदनी ।

कल्पना में एक समुद्र है

कल्पना में एक समुद्र है
कल्पना में एक लड़की है
किनारे की लहरों से खेलती
पांवों से उछालती भीगी रेत

तट पर एक गाछ है
चांद है समूचा
दूर चप्पुओं की छ्प छ्प
मांझियों का गीत और
एक नाव है

लड़की की आंखों में
जिंदगी के दुख-सुख के
ढेरों सिलसिलों के बावजूद
इस समूचे चांद का अक्स है
और होठों पर
प्यार का एक बहुत पुराना
दूर वोल्गा-तट का गीत

कल्पना में
हवायें हैं-तेज खारी हवायें
और घिर आती अपनी लटें
उड़ उड़ पड़ता अपना दुपट्टा संभालती-सहेजती
यह लड़की है-
मेरी दोस्त ।

निर्वासित अकेलापन

तुम्हारी मां को चिंता है तुम्हारे भविष्य की
कभी उन्होंने प्रेम किया था
और एवज में मिली
कठोर और अकेली जिंदगी
दुख के दिन मिले, हताशा और कड़वाहट

वे नहीं जानतीं
कोई तुम्हें प्यार करने लगा है
कोई न जाने कब
तुम्हारे सिरहाने वसंत रख आता है
और अपने सारे वजूद में
तुम्हारे विछोह का दर्द लिये राह-गली
तुम्हारी उम्र की तमाम लड़कियों में
तुम्हें ढूंढता फिरता है
तुम भी नहीं जानतीं कि
कोई तुम्हें प्यार करने लगा है

तुम्हारी मां जब तुम्हारी आंखों में देखती होंगी
तो क्या बीस बरस की वह लड़की भी दिखती होगी
जो किसी से टूट कर प्यार करती थी

जानता हूं अगर कभी उस लड़की की छाया भी
वो देख लेती होंगी तो तुम्हें
अनजान बावड़ियों, निर्जन नदी और सूनी कब्रों के पास
न जाने की ताकीद करती होंगी

और तुम भी तो नहीं जानती होंगी कि
इन्हीं जगहों पर कोई
समूचा एक मौसम लिये बैठा होगा
सिर्फ इसलिये कि
बस तुम्हारी एक लट भर संवार दे
तुम्हारे दुपट्टे का एक कोर चुपके से बस एक बार छू भर ले

तुम्हारी मां नहीं जानतीं
कि कोई तुम्हें प्यार करने लगा है
और उसके हिस्से आये हैं
दुख के दिन, निर्वासित अकेलापन
और कठोर जिंदगी ।

चैत्र की हवायें और वह लड़की

और फिर एक बार लौट आया है प्यार
चैत्र की हवायें थीं बाहर
सड़कों पर झुलसे दरख़्तों की परछाइयां
जल चुकी थी पहाड़ी पर की घास
और एक लड़की तपती दोपहरियों
और उमस से भरी शामों में
बसों से चढ़ती-उतरती
नीले दुपट्टे को अपनी छाती पर संभालती
लौटती थी घर

बस में कभी-कभार होतीं उससे बातें
उसकी हंसी, आंखें, उसकी शालीन उड़ती लटों से
मोहित था मैं
निश्छल सादगी बन कर प्यार लौट आया था
बीते वसंत के पेड़ों पर नयी कोपलें थीं
और रात के आकाश पर समूचा चांद

बहुत-बहुत दिनों तक नहीं मिलती वह
मैं उदासी का वज़न उठाये-उठाये उन्हीं रास्तों से गुज़रता
एक झलक पा लेने की उम्मीद में
समुद्र की लहरों से पूछता उसके घर का पता
प्यार और विछोह के अतीत के हर अनुभव से
सघनतर होता दिनोदिन यह प्यार
अजीब-सी कसक बन उठा भीतर

जब सारा शहर रौशनी में डूब जाता
सो जाता सारा शहर
और सिर्फ सागर की लहरें चट्टानों पर गूंजतीं
एक खोयापन हवाओं पर अचानक तारी हो उठता
इन्हीं हवाओं में उलझी उसकी लटें मुझे मुग्ध कर गयीं थीं

दिनों बाद जब वह मिलती
खु़शी रगों में वसंत के फूल बन खिल उठती
हवाओं में उड़ते नीले दुपट्टे और उलझती लटों को
चूम लेने की कामना उमगती

चैत्र की साक्षी में लौटे इस प्यार की कथा अभी जारी है …
हालांकि अरसे से देखा नहीं है उसे
इसी शहर की भीड़ में कहीं खोया होगा वह चेहरा
किन्हीं हवाओं में चेहरे पर घिर आती उन लटों की गंध होगी
उमस भरी शामों में लौटते दो थके पैर होंगे
अपरिचित मेरी इस उदासी से ।

हम जहाँ मिले

1.
इतिहास का यह कौन-सा मुक़ाम था
जहां हम मिले
यह कौन-सी धूसर,
टिमटिमाती काल की गोधूलि थी
जिसमें फीके पड़ रहे थे आसमान के रंग
यह कौन तुम थीं ?
जिसे मैं बार-बार पहचानता
बार-बार भूलता था
अजीब मंज़र था
देह और मन के बीच के योजनों अंधकार में
जाज्वलु नक्षत्रों-सी छवियां उभरती थीं
और डूब जाती थीं

सभ्यता के खंडहर थे वहां
आप्त ग्रंथों के सूत्रों में उलझता सत्य था
कल्पनाओं के रंगों में डूबता
आकाश का एक अकेला तारा था
देह से मन होतीं
मन से देह होतीं
तुम थीं

हम जहां मिले वहां सिर्फ़ एक जंगल था मायावी
चांदनी के उजास में
तुम जहां खड़ी थीं
चेतना के गहरे स्तरों पर मिलने से शापित हम
इच्छाओं में तलाशते थे एक-दूसरे को
और जीवन डूबता जाता था
अनंत में फिर न लौटने को…

2.
इतिहास का यह कैसा मुकाम है

स्मृतियों तक से मिटता जा रहा है
तुम्हारा चेहरा

तुम जो एक स्वप्न थीं
यह कैसा यथार्थ बन गई हो
जिससे टकरा कर टूट रहे हैं मेरे विचार

एक समुद्र के विलीन होने का दृश्य है यह
लहरों की उस भव्य कल्पना में
तेजोदीप्त तुम्हारा माथा
अब भी झलक उठता है
पर समय की ये कैसी गुंजलकें हैं
जिनमें उलझता गया है
तुम्हें चाहने का स्वप्न

यह किन खंडहरों के बीच खड़ा हूं मैं ?
ये कैसी हवाएं हैं ?
यह कैसी उदास आवाज है
किन सदियों की बाड़ें लांघती यहां तक आती हुई ?
क्या उठोगी प्रिया
इतिहास के इस मायावी रहस्यलोक से ?
क्या फिर से
कोई सपना दोगी ?

3.
एक युग ख़त्म हो रहा है

ध्वस्त दीवारें गिर रही हैं
धूल-ही-धूल है
दर्द, आंसू, व्यथा …

यह प्रकृति का नहीं
समय का नहीं
सभ्यता का तुमुल है

तुम यह किस मोड़ पर मिलीं ?
और यह किस रूप में?

मैं तुमसे क्या कहूं?

प्रेम के कौन से गीत
उम्मीद के कौन-से सपने ?
यह कैसी गोधूलि है ?

मिथकों की परिधियां लांघता
तुम्हारा वजूद
और यह इतिहास का
बंजर उजाड़
तुम्हें देने के लिए मेरे पास कोई नाम नहीं
तुम्हारी वेणी में सजाने के लिए
कोई फूल नहीं

ये अजीबोग़रीब रास्ते हैं

तुम्हारे घर तक जाने वाला कोई रास्ता नहीं

इतिहास की इस संधि-बेला में
नष्ट हो रहा जर्जर-पुरातन
ख़त्म हो रहा है एक युग

धूल-ही-धूल है रास्तों पर

दूर जनांतिक में गूंजती
ये किन सौदागरों की टापें हैं ?

यह कौन तुम हो
यह कैसी छवि है
गांव-देसों के अनाम रास्तों पर खोती हुई…

इतने बरसों बाद वनलता सेन

वनलता सेन !
मिलीं तुम
इस जगमग रौशनियों के शहर की
सूनसान एक सड़क पर
किसी और नाम-रूप में

श्रावण की मेघाच्छादित दोपहरी में
बैठी थीं तुम सीढ़ियों पर मेरे साथ
सामने के पेड़ से रह-रह टपकता था रुका पानी

कितने दिन, कितनी रात, कितने कल्पों से
इसी दिन का इंतजार था
जब पाऊंगा तुम्हें
अपने पार्श्व में —
उन्नत मुख
दीप्त नयन

हवा में उड़ रहे थे
कंधों तक ठहरे तुम्हारे बाल
तुमने सुनाई भरी आंखों कथा अपने विगत प्यार की

वेनिस की एक सड़क का
एक दृश्य उभर आया सामने

पर तभी तुम बोलीं
मुझे निरुत्तर करतीं कि
प्रतिदान नहीं कुछ तुम्हारे पास
मेरे प्यार का

बारिश से भीगी सड़क पर
कितनी तो गुज़र गईं बसें
दूर गोदी से आती आवाज़ें
शहर के गॉथिक स्थापत्य में ठहरा अतीत
जैसे सब स्तब्ध उस पल…

क्यों बोलीं तुम
वनलता सेन, क्यों
कि प्यार नहीं करतीं तुम मुझे ?

इतने काल बाद
दूर देशावर में क्यों मिले हम !

फिर कितने नगर, वन, वीथी, गए बीत
फिर कितने कल्प समूचे

मलय सागर तक — सिंहल के समुद्र से
भर अंधकार में मैं भटका हूँ
धूसर लगते संसारों में
दूर समय में….

वीरान रास्ते, सोनार चाँद और एक विदा…

कल तुम्हारे साथ चाँद देखा
रात का पूरा सोनार चाँद
चैत्र के आकाश पर टँगा

इसी चाँद को रास्ते भर देखते
थके कदमों से लौट कर
शब्दों में तुम्हारा तसव्वुर किया था
कितनी रातों …

बादलों के बीच बार-बार छिपता
यह चाँद था
दूर समुद्र की टूटती लहरें
और रोशनियों में झिलमिला उठा
समूचा का समूचा शहर
और भीड़ भरे बस-स्टॉप पर
तुम थीं बगल में

एक मैत्री थी हमारे बीच —
बहुत दुख और पीड़ा के बाद हासिल

रौशनियों के अजाब वाले इस शहर में
जगह बनाता एक पुख़्ता संबंध था
एक खूबसूरती थी
जीवन-कर्म से दीप्त
भावना के सच्चे विस्मय का ओज लिए
समूचे आकाश पर
उदित सोनार चाँद की एकांत आभा में
दिपदिपाता तुम्हारा चेहरा

फिर तुम्हारे घर तक का सफर तुम्हारे साथ
वीरान होते रास्तों पर
परसती रात का गुंजान सौंदर्य
और विदा को उठी
मोड़ पर
दो भरपूर आँखें …

अप्राप्य वसंत

तुम एक ऐसा अप्राप्य वसंत बन गईं
जिसकी पगछाप
वनथलियों में कहीं नहीं थी

जबकि बौर तुममें महके थे
नदी तुममें उमड़ी थी
कोई कूज़न था वहां
कोई टेर थी

पर सब कुछ जैसे मिथक हो सुदूर का
तुम्हारा रूप रूप नहीं
एक स्वप्न का कल्पित चित्र हो महज

ज़रूर कोई इंद्रजाल था
या सरोवर के पानी का माया-कुहुक
कि रंगों के, फूलों के, गंध के
ऐसे अटूट ज्वार के बावजूद
तुम एक ऐसा अप्राप्य वसंत बन गईं
जिसकी पगछाप
वनथलियों में कहीं नहीं थी ।

क्या अब भी देश में हो, वनलता सेन?

कोई वनलता सेन थी
किसी जीवनानंद दास की
देश की किसी वीथी में
उसका आना जाना था
किन्हीं हवाओं में उसके आँचल का
उड़ता कोई रंग था ।

कितना अमृत घुलता है
प्राणों में
कितने रंग
कितनी रेखाएं न जाने कहां से आकर
कोई और ही दुनिया रच देते हैं ।

भावुकता का संसार टूटता है
ज़िंदगी की सादगी होती है पराजित
शब्द गिरते हैं
हारती है भाषा
मिथक हो जाता है प्यार
सुनो !
सौदागरों की टापें

एक वीराना फैला है देश में
यहीं कहीं थी एक नदी
जिसकी महिमा गाते अब भी कविगण
कि लहरों पर सूर्यास्त के सारे दृश्य
गुंजान हवाओं का मंजर
कत़्ल किया गया
मुनाफ़े के बाज़ार में

एक पूरी सदी उदास
देखती है
नगर-नगर भटकते भूखे बदहाल
मिट्टी का टूट गया है चेहरा
दरारें ही दरारें हैं
क्या अब भी देश में हो वनलता सेन !

तुम्हारा आंचल उड़ रहा है

मेरी स्मृतियों में तुम्हारा आंचल उड़ रहा है
मन लौट रहा है पीछे
छूटती रही हैं सड़कें
पगवाट
ट्रेन की पटरियां
कुऒं के जगत
सघन अमराईयां
पीछे छूटता जा रहा है
आकाश में चांद
इस खामोशी में सुनायी दे रहा
पत्ते का हिलना तक
तुम्हारे पांवों की हल्की थाप बोल रही है
हंसी से चंचल आंखें
बरसों बाद जाग उठी है
मेरी याद में
पर क्या समय ने अब भी उन आंखों में
वही चंचलता रहने दी होगी ?
तुम जो कभी नहीं कर सकीं प्यार
अपने ही भीतर छिपे झरनों का निनाद
सुन नही सकीं

कल रात क्या स्वप्न देखा होगा तुमने
अभी किस सोच में डूबी होगी ?
जबकि इस वक़्त
मेरी स्मृतियों में
तुम्हारा आंचल उड़ रहा है
तुम्हारी आंखों की हंसी
तुम्हारे बोल
तुम्हारे पैरों की थाप गूंज रही है …

नहीं, प्यार नहीं 

वह तो सिर्फ़ मौसम था
हवाएं थीं
बयार के साथ झूमते दरख़्तों की
शोख टहनियां थीं
रंग थे फूलों के
और एक आसमान का भी
नस-नस में उतरता वह तो
राग था एक ऋतु का
नहीं प्यार नहीं
वह तो
इन्हीं बयारों के साथ
लौट आई एक भावना थी
तुम्हारे रूप का गान करती
तुम्हारे वैभव से विस्मित
तुम्हारे वसंत में विभोर
प्यार नहीं
वह तो
सिर्फ़ एक मौसम था।

धरती आज फिर अलाव पर है 

जो आज बैठे हैं
घरों की सांकल लगाकर
नहीं जानते
सातों समुद्रों में
कहीं नहीं है आज
ख़ामोश तरंगें

जिन्होंने सुनी नहीं
वे आवाज़ें
जो उत्तर से, पूरब से
दक्षिण और पश्चिम से
चली आईं
उन्हें बुलाते

वे बेशक जितना भी सिमटें
जितना भी भागें
बच नहीं पाएंगे
समय के पंजों से

धरती आज फिर
अलाव पर है!

राम का आँसू

सरयू-तट के जनपदों से लेकर
मुंबई की उजाड़ मिलों तक
भूख और ज़ुल्म का मंज़र था
क़त्लेआम थे

एक आँसू अटका हुआ
चीर नहीं पा रहा था
पाताल

निराला के राम का आँसू
कितना बेबस था!
रामभक्तों की सत्ता
कितनी सर्वजयी!!

7.11.2002

उपरोक्त कवित में हिन्दी के अनेक प्रमुख कवियों की काव्य-पंक्तियाँ इस्तेमाल हुई हैं। उनके प्रति कृतज्ञ है कवि।

तुम्हारे वसंत का प्रेमी

मैं तुम्हारे वसंत का प्रेमी
तुम्हारी ऋतु का गायक हूँ

तुम कहीं भी जाओ
तुम्हारे होने की ख़ुशबू
मुझ तक आती रहेगी
हवाएँ तुम्हारे गीत बाँधकर
दिशाओं के हर कोने से मुझ तक लाएँगी

मैं तुम्हारे खिलाए फूलों में
तुम्हारी उँगलियों का स्पर्श चूमूँगा
तुम्हारी पलक छुऊँगा
तुम्हारे स्वप्न से भरी कोंपलों में

झरनों के निनाद में
तुम्हारी हँसी गूँजेगी
पलाश-वन को निहारेंगी मेरी आँखें
जो रंगी हैं तुम्हारी काया की रंगत में
मैं तुम्हें खोजने
देशावर भटकूँगा

तुम मुझे भूलना मत
लौटना हर बार
मैं तुम्हारी राह तकूँगा…

मैं तुम्हारे वसंत का प्रेमी
तुम्हारी ऋतु का गायक हूँ

चैत्र की यह शाम

यह जाते हुए चैत्र की शाम है

झरे पत्तों की उदास
रागदारी बजती है
मन के उदास कोनों में
जाते चैत्र का यह दृश्य
ठहरा रहेगा ताउम्र
ऐसे ही याद दिलाता
किसी सूने रास्ते
और पर्वतश्रेणी के पीछे
खोती शाम का !

कनेर का एक पेड़ और एक रास्ता…

एक शाम याद आती है
धूसर रंगों में डूबी
तुम्हारा चेहरा नहीं
एक रास्ता याद आता है
जिसे चलते हुए
मैंने तुम्हारा शहर छोड़ा था

तुम किन अँधेरों में जीती रहीं
मैं कभी नहीं जान पाया
तुम्हारी अंतरात्मा का संगीत
कितना ज़िंदा रहा, कितना मर गया
इसकी मुझे कोई ख़बर नहीं

तुम्हारे जिन कनेर फूलों की ओट से
रात के चाँद की ओर
अपनी बाहें फैलाई थीं
एक दृश्य की तरह मन में
वह अब भी अटका हुआ है

मैं तुम्हारे बरसों पुराने उस रूप को
देखता हूँ- अपने एकांत में
और मेरी आँखें आँसुओं से भर उठती हैं
तुम्हारे सीने पर सर रखकर रोने का मन होता है

यह उजाड़–सा बीता मेरा जीवन
तुम्हें आवाज़ देता है
तुम हो इसी दुनिया में पस्त और हारी हुई
मुझसे बहुत दूर!

मेरी थकी स्मृतियों में
अब तुम्हारा चेहरा भी मुकम्मल नहीं हो पाता

दिखता है सिर्फ़
कनेर का एक पेड़
और एक रास्ता…

यह कौन राह 

यह कौन राह मुझे तुम तक लाई
सूर्यास्त का यह मेघ घिरा आसमान विलीन हो रहा है
एक नौका के पाल दिखते हैं सहस्राब्दियों के पार
और तुम्हारा उठा हाथ…

मैंने कहाँ तलाशा था तुम्हें
किस युग के किस वान-प्रांतर में?

कहाँ खोई थीं, तुम ऋतुओं का लिबास ओढ़े
हिमान्धियों के पार…

स्वप्न और सत्य की परिधि पर टूट जाता है जीवन
राहें बन जाती हैं गुंजलक
एक विशाल गह्वर अन्धकार का घेर लेता पूरी पृथ्वी!

मैं तुम्हें नहीं
तुम्हारे भीतर किसी को तलाशता
शताब्दियों भटका हूँ…!

एक गीत, जो फूल बन खिलता 

मैंने इतने झरे पत्ते देखे हैं
खिले फूल देखे हैं
बहती नदियाँ देखी हैं
वीरान पहाड़ियाँ
निर्जन मैदान
बहारों का स्वागत करते दरख़्त
समंदर की ऊँची लहरें
गुँजान हवाएँ
रंगों में डूबी धरती की अम्लान छवि
उमड़ते बादल
सूनी राहें

काश गूँथ पाता
किसी एक गीत में
जो फूल बन खिलता
तुम्हारी हँसी में!

प्रेम

दुख ही लाया प्रेम
पर यह भी तो था जीवन का एक रंग
और हर रंग का अपना ही तिलिस्म होता है
रंगों के भीतर होते हैं कई रंग…

क्या होता है एक स्त्री का मन?

कितने फूल गुँथे होते हैं उसमें
कितने रंग, कितने राग
कितने स्वप्न अस्फुट

या कितने भय
कितने विकल स्वर
असुरक्षित वन

कितना छूटा बालपन
बीती किशोर वय
सुदूर देखती
अधेड़ दिनों की ठहरी कतार

पूरब के एक उदास देश में
दुख का एक गीत रोता है
पथ पर

तुम पूछते हो
क्या होता है प्रेम!

मिटा नहीं तुम्हारे होने का जादू

तुम्हारी छवि दीप्त हो उठती है
दुख के इन दिनों में

कहीं नहीं हो तुम
पर तुम्हारे होने का जादू अब भी है

भावना के वे दिन बीत गए
रंग से सराबोर दिशाएँ घुल गई
रात के वीरान रहस्यों में

कोई एक पुकार
खो गई
मिट गया कोमलता का पूरा एक संसार
जीवन दुख की कथाएँ लिखता रहा
जिन हवाओं में तुम्हारे होने का गीत था
उनमें सिर्फ़ वीरानी बची
चैत के पत्तों का गिरना
और धूसर पलाश बचे वसंत के वन में

गहरे दुखों की लकीरें छूट गईं
बदल गया कितना कुछ
पर क्यों नहीं मिटा
तुम्हारे होने का जादू?

एक लहर विशाल…

तुम मुझे ले जाती हो इस पृथ्वी की निर्जन प्रातों तक
अक्लांत धूसर गहन रातों तक

तुम्हारे होने से ही खिलता है नील-चंपा

मैंने तुम्हें देखा, पाया वह उन्नत भाव समन्वित
जो मानवता का अब तक का संचय

तुम नहीं रूप, नहीं आसक्ति, नहीं मोह, नहीं प्यार
जीवन का एक उदास पर भव्य गान
अम्बुधि से उठी एक लहर विशाल
जिसमें भीगा मेरा भाल…

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