आलोक श्रीवास्तव-1 की रचनाएँ

है कश्मीर धरती पे जन्नत का मंज़र

पहाड़ों के जिस्मों पे बर्फ़ों की चादर
चिनारों के पत्तों पे शबनम के बिस्तर
हसीं वादियों में महकती है केसर
कहीं झिलमिलाते हैं झीलों के जेवर
है कश्मीर धरती पे जन्नत का मंज़र

यहाँ के बशर हैं फ़रिश्तों की मूरत
यहाँ की जु़बाँ है बड़ी ख़ूबसूरत
यहां की फ़िजाँ में घुली है मुहब्बत
यहाँ की हवाएँ मुअत्तर-मुअत्तर
है कश्मीर धरती पे जन्नत का मंज़र

ये झीलों के सीनों से लिपटे शिकारे
ये वादी में हँसते हुए फूल सारे
यक़ीनों से आगे हसीं ये नज़ारे
फरिश्ते उतर आए जैसे ज़मीं पर
है कश्मीर धरती पे जन्नत का मंज़र

सुखन सूफ़ियाना, हुनर का खज़ाना
अजानों से भजनों का रिश्ता पुराना
ये पीरों, फ़कीरों का है आशियाना
यहाँ सर झुकाती है कुदरत भी आकर
है कश्मीर धरती पे जन्नत का मंज़र

मगर कुछ दिनों से परेशान है ये
सियासी-निगाहों से हैरान है ये
पहाड़ों में रहने लगी है उदासी
चिनारों के पत्तों में है बदहवासी
न केसर में केसर की ख़ुशबू रही है
न झीलों में रौनक बची है जरा-सी
मगर दिल अभी भी यही कह रहा है-
है कश्मीर धरती पे जन्नत का मंज़र ।

तुम सोच रहे हो बस

तुम सोच रहे हो बस, बादल की उड़ानों तक,
मेरी तो निगाहें हैं सूरज के ठिकानों तक।

टूटे हुए ख़्वाबों की एक लम्बी कहानी है,
शीशे की हवेली से पत्थर के मकानों तक।

दिल आम नहीं करता अहसास की ख़ुशबू को,
बेकार ही लाए हम चाहत को ज़ुबानों तक।

लोबान का सौंधापन, चंदन की महक में है,
मंदिर का तरन्नुम है, मस्जिद की अज़ानों तक।

इक ऎसी अदालत है, जो रुह परखती है,
महदूद नहीं रहती वो सिर्फ़ बयानों तक।

हर वक़्त फ़िज़ाओं में, महसूस करोगे तुम,
मैं प्यार की ख़ुशबू हूँ, महकूंगा ज़मानों तक।

मंज़िलें क्या हैं रास्ता क्या है

मंज़िलें क्या हैं रास्ता क्या है
हौसला हो तो फ़ासला क्या है

वो सज़ा देके दूर जा बैठा
किससे पूछूँ मेरी ख़ता क्या है

जब भी चाहेगा छीन लेगा वो
सब उसी का है आपका क्या है

तुम हमारे क़रीब बैठे हो
अब दवा कैसी अब दुआ क्या है

चाँदनी आज किस लिए नम है
चाँद की आँख में चुभा क्या है

ख़्वाब सारे उदास बैठे हैं
नींद रूठी है, माजरा क्या है

बेसदा काग़ज़ों में आग लगा
अपने रिश्ते को आज़्मा, क्या है

गुज़रे लम्हों की धूल उड़ती है
इस हवेली में अब रखा क्या है

ठीक हुआ जो बिक गए सैनिक

ठीक हुआ जो बिक गए सैनिक मुठ्ठी भर दीनारों में,
वैसे भी तो जंग लगा था, पुश्तैनी हथियारों में।

सर्द नसों में चलते-चलते गर्म लहू जब बर्फ़ हुआ,
चार पड़ौसी जिस्म उठाकर झौंक गए अंगारों में।

खेतों को मुठ्ठी में भरना अब तक सीख नहीं पाया,
यों तो मेरा जीवन बीता सामंती अय्यारों में।

कैसे उसके चाल चलन में पश्चिम का अंदाज़ न हो,
आख़िर उसने सांसें ली हैं, अंग्रेज़ी दरबारों में।

नज़दीकी अक्सर दूरी का कारन भी बन जाती हैं,
सोच समझ कर घुलना मिलना अपने रिश्तेदारों में।

चाँद अगर पूरा चमके, तो उसके दाग खटकते हैं!
एक न एक बुराई तय है सारे इज़्ज़तदारों में।

इक हुनर है वो भी विरसे में मिला है

इक हुनर है वो भी विरसे में मिला है
देख लीजे हाँथ में सब कुछ लिखा है

हिचकियाँ साँसों को जख्मी कर रही हैं
यूं मुझे फिर याद कोई कर रहा है

नींद की मासूम परियां चौंकाती हैं
एक बूढा ख़्वाब ऐसे खांसता है

चाँद से नजदीकियां बढ़ने लगी है
आदमी में फासला था फासला है

सांस की पगडंडियाँ भी खत्म समझो
अब यहाँ से सीधा सच्चा रास्ता है

मैं बदलते वक्त से डरता नहीं हूँ
कौन है जो मेरे अंदर कांपता है

अगर सफ़र में मेरे साथ मेरा यार चले

अगर सफ़र में मेरे साथ मेरा यार चले,
तवाफ़ करता हुआ मौसमे-बहार चले।

लगा के वक़्त को ठोकर जो ख़ाकसार चले,
यक़ीं के क़ाफ़िले हमराह बेशुमार चले।

नवाज़ना है तो फिर इस तरह नवाज़ मुझे,
कि मेरे बाद मेरा ज़िक्र बार-बार चले।

ये जिस्म क्या है, कोई पैरहन उधार का है,
यहीं संभाल के पहना,यहीं उतार चले।

ये जुगनुओं से भरा आस्माँ जहाँ तक है,
वहाँ तलक तेरी नज़रों का इक़्तिदार चले।

यही तो इक तमन्ना है इस मुसाफ़िर की,
जो तुम नहीं तो सफ़र में तुम्हारा प्यार चले।

शब्दार्थ :
तवाफ़=परिक्रमा; इक़्तिदार= प्रभुत्व

बूढ़ा टपरा, टूटा छप्पर और उस पर बरसातें 

बूढ़ा टपरा, टूटा छप्पर और उस पर बरसातें सच,
उसने कैसे काटी होंगी, लंबी-लंबी रातें सच।

लफ़्जों की दुनियादारी में आँखों की सच्चाई क्या?
मेरे सच्चे मोती झूठे, उसकी झूठी बातें, सच।

कच्चे रिश्ते, बासी चाहत, और अधूरा अपनापन,
मेरे हिस्से में आई हैं ऐसी भी सौग़ातें, सच।

जाने क्यों मेरी नींदों के हाथ नहीं पीले होते,
पलकों से लौटी हैं कितने सपनों की बारातें, सच।

धोका खूब दिया है खुद को झूठे मूठे किस्सों से,
याद मगर जब करने बैठे याद आई हैं बातें सच।

ये नफ़्रतों की सदाएँ, वतन का क्या होगा 

ये नफ़्रतों की सदाएँ, वतन का क्या होगा
हवा में आग बही तो चमन का क्या होगा

सफर नसीब मुसाफिर से ये सवाल न कर
कहाँ सुकूं मिलेगा थकन का क्या होगा

किसी के पास इबादत का आज वक्त नहीं
हमारे बाद यहाँ फिक्रो फेन का क्या होगा

मिटा तो देंगे ये उम्मीद की लकीर मगर
मेरी जमीन तुम्हारे गगन का क्या होगा

यही ख्याल तो दामन को थाम लेता है
हम उठा गए तो तेरी अंजुमन का क्या होगा

अब तो ख़ुशी के नाम पर कुछ भी नहीं रहा 

अब तो ख़ुशी के नाम पे कुछ भी नहीं रहा,
आसूदगी के नाम पर कुछ भी नहीं रहा।

सब लोग जी रहे हैं मशीनों के दौर में,
अब आदमी के नाम पे कुछ भी नहीं रहा।

आई थी बाढ़ गाँव में क्या-क्या न ले गई,
अब तो किसी के नाम पर कुछ भी नहीं रहा।

घर के बुजुर्ग लोगों की आँखें ही बुझ गईं,
अब रौशनी के नाम पे कुछ भी नहीं रहा।

आए थे मीर ख़्वाब में कल डाँटकर गए
’क्या शायरी के नाम पे कुछ भी नहीं रहा ?’

शब्दार्थ :
आसूदगी=प्राप्तियाँ

हम तो ये बात जान के हैरान हैं बहुत

हम तो ये बात जान के हैरान हैं बहुत
खामोशियों में शोर के तूफ़ान हैं बहुत

बाज़ार जा के खुद का कभी दाम पूछना
तुम जैसे हर दूकान में सामान हैं बहुत

अच्छा सा कामकाज खुली आँख से चुनो
ख़्वाबों के लेन देन में नुक्सान है बहुत

आवाज़ बर्तनों की घरों में दबी रहे
बाहर जो सुनने वाके हैं शैतान हैं बहुत

खुशहाल घर को जाने नज़र किसकी लग गई
हम लोग कुछ दिनों से परेशान हैं बहुत

आवाज़ साथ है न बदन का कहीं पता
अब के सफर में रास्ते सूनसान हैं बहुत

मंज़िल पे ध्यान हमने ज़रा भी अगर दिया

मंज़िल पे ध्यान हमने ज़रा भी अगर दिया,
आकाश ने डगर को उजालों से भर दिया।

रुकने की भूल हार का कारण न बन सकी,
चलने की धुन ने राह को आसान कर दिया।

पीपल की छाँव बुझ गई, तालाब सड़ गए,
किसने ये मेरे गाँव पे एहसान कर दिया।

घर, खेत, गाय, बैल, रक़म अब कहाँ रहे,
जो कुछ था सब निकाल के फसलों में भर दिया।

मंडी ने लूट लीं जवाँ फसलें किसान की,
क़र्ज़े ने ख़ुदकुशी की तरफ़ ध्यान कर दिया।

ले गया दिल में दबा कर राज कोई 

ले गया दिल में दबा कर राज कोई,
पानियों पर लिख गया आवाज़ कोई ।

बांध कर मेरे परों में मुश्किलें,
हौसलों को दे गया परवाज़ कोई ।

नाम से जिसके मेरी पहचान है,
मुझमें उस जैसा भी हो अंदाज़ कोई ।

जिसका तारा था वो आँखें सो गईं,
अब नहीं करता है मुझ्पे नाज़ कोई ।

रोज़ उसको ख़ुद के अंदर खोजना,
रोज़ आना दिल से एक आवाज़ कोई ।

धड़कते, साँस लेते, रुकते

पिता के नाम

धड़कते, साँस लेते, रुकते-चलते मैंने देखा है
कोई तो है जिसे अपने मैं पलते मैंने देखा है

तुम्हारे ख़ून से मेरी रगों में ख़्वाब हैं रौशन
तुम्हारी आदतों में ख़ुद को ढलते मैंने देखा है

मेरी ख़ामोशियों में तैरती हैं,तेरी आवाज़ें
तेरे सीने में अपना दिल मचलते मैंने देखा है

मुझे मालूम है तेरी दुआएँ साथ चलती हैं
सफ़र की मुश्किलों को हाथ मलते मैंने देखा है

तुम्हारी हसरतें ही ख़्वाब में रस्ता दिखाती हैं
ख़ुद अपने आप को नींदों में चलते मैंने देखा है

हाँ ये सच है, गुज़रे दिन की बातें अक्सर करता है 

हाँ ये सच है, गुज़रे दिन की बातें अक्सर करता है,
लेकिन माज़ी की गलियों में दिल जाने से डरता है ।

रफ़्ता-रफ़्ता मेरी जानिब मंज़िल बढ़ती आती है,
चुपके-चुपके मेरे हक़ में कौन दुआएँ करता है ।

सारा बदन हयात की ख़ुशबू से भर गया

सारा बदन अजीब-सी ख़ुशबू से भर गया,
शायद तेरा ख़याल हदों से गुज़र गया।

किसका ये रंग-रूप झलकता है जिस्म से,
ये कौन है जो मेरी रगों में बिखर गया।

हम लोग मिल रहे हैं अना अपनी छोड़ कर,
अब सोचना ही क्या के मेरा मैं किधर गया।

लहजे के इस ख़ुलुस को हम छोड़ते कहाँ,
अच्छा हुआ ये ख़ुद ही लहू में उतर गया।

मंज़िल मुझे मिली तो सबब साफ़-साफ़ है,
आईना सामने था मेरे मैं जिधर गया।

ये सोचना ग़लत है कि तुम पर नज़र नहीं 

ये सोचना ग़लत है के’ तुम पर नज़र नहीं,
मसरूफ़ हम बहुत हैं मगर, बेख़बर नहीं।

अब तो ख़ुद अपने ख़ून ने भी साफ़ कह दिया,
मैं आपका रहूंगा मगर उम्र भर नहीं।

आ ही गए हैं ख़्वाब तो फिर जाएंगे कहां,
आंखों से आगे इनकी कोई रहगुज़र नहीं।

कितना जिएं, कहां से जिएं और किस लिए,
ये इख़्तियार हम पे’ है, तक़्दीर पर नहीं।

माज़ी की राख उलटें तो चिंगारिया मिलें,
बेशक किसी को चाहो मगर इस क़दर नहीं।

झिलमिलाते हुए दिन रात हमारे लेकर 

झिलमिलाते हुए दिन-रात हमारे लेकर,
कौन आया है हथेली पे सितारे लेकर।

हम उसे आँखों की देहरी नहीं चढ़ने देते,
नींद आती न अगर ख़्वाब तुम्हारे लेकर।

रात लाई है सितारों से सजी कंदीलें,
सरनिगूँ दिन है धनक वाले नज़ारे लेकर।

एक उम्मीद बड़ी दूर तलक जाती है,
तेरी आवाज़ के ख़ामोश इशारे लेकर।

रात, शबनम से भिगो देती है चहरा-चहरा,
दिन चला आता है आँखों में शरारे लेकर।

एक दिन उसने मुझे पाक नज़र से चूमा,
उम्र भर चलना पड़ा मुझ को सहारे लेकर।

शब्दार्थ :
सरनिगूँ=नतमस्तक

चिंतन, दर्शन, जीवन, सर्जन 

चिंतन, दर्शन, जीवन, सर्जन, रूह, नज़र पर छाई अम्मा
सारे घर का शोर-शराबा,सूनापन,तनहाई अम्मा

सारे रिश्ते- जेठ-दुपहरी, गर्म-हवा, आतिश, अंगारे
झरना, दरिया, झील, समंदर, भीनी-सी पुरवाई अम्मा

उसने ख़ुद को खोकर; मुझ में एक नया आकार लिया है
धरती, अंबर, आग, हवा, जल जैसी ही सच्चाई अम्मा

बाबूजी गुज़रे, आपस में सब चीज़ें तक़्सीम हुईं,तब-
मैं घर में सबसे छोटा था,मेरे हिस्से आई अम्मा

घर में झीने रिश्ते मैंने लाखों बार उधड़ते देखे
चुपके-चुपके कर देती है, जाने कब तुरपाई अम्मा

Share