‘आसिम’ वास्ती की रचनाएँ

बनाई है तेरी तस्वीर मैं ने डरते हुए

बनाई है तेरी तस्वीर मैं ने डरते हुए
लरज़ रहा था मेरा हाथ रंग भरते हुए

मैं इंहिमाक में ये किस मक़ाम तक पहुँचा
तुझे ही भूल गया तुझ को याद करते हुए

निज़ाम-ए-कुन के सबब इंतिशार है मरबूत
ये काएनात सिमटती भी है बिखरते हुए

कहीं कहीं तो ज़मीं आसमाँ से ऊँची है
ये राज़ मुझ पे खुला सीढ़ियाँ उतरते हुए

हमें ये वक़्त डराता कुछ इस तरह भी है
ठहर न जाए कहीं हादसा गुज़रते हुए

कुछ ऐतबार नहीं अगली नस्ल पर इन को
वसीयतें नहीं करते ये लोग मरते हुए

हर एक ज़र्ब तो होती नहीं अयाँ आसिम
हज़ार नक़्श हुए मुंदमिल उभरते हुए

देर तक चंद मुख़्तसर बातें 

देर तक चंद मुख़्तसर बातें
उस से कीं मैं ने आँख भर बातें

तू मेरे पास जब नहीं होता
तुझ से करता हूँ किस क़दर बातें

कैसी बे-चारगी से करते हैं
बे-असर लोग बा-असर बातें

देख बच्चों से गुफ़्तुगू कर के
कैसी होतीं हैं बे-ज़रर बातें

सुन कभी बे-ख़ुदी में करते हैं
बे-ख़बर लोग बा-ख़बर बातें

उस की आदत है बात करने की
वो करेगा इधर उधर बातें

इंतिहाई हसीन लगती है
जब वो करती है रूठ कर बातें

आ मुझे सुन के हो तुझे मालूम
कैसी होती हैं ख़ूब-तर बातें

सहल कट जाए ये तवील सफ़र
और कर मेरे हम-सफ़र बातें

कोई सुनता न हो कहीं ‘आसिम’
यूँ न कर उस से फ़ोन पर बातें.

एक आँसू में तेरे ग़म का एहाता करते 

एक आँसू में तेरे ग़म का एहाता करते
उम्र लग जाएगी इस बूँद को दरिया करते

इश्क़ में जाँ से गुज़रना भी कहाँ है मुश्किल
जान देनी हो तो आशिक़ नहीं सोचा करते

एक तू ही नज़र आता है जिधर देखता हूँ
और आँखें नहीं थकती हैं तमाशा करते

ज़िंदगी ने हमें फ़ुर्सत ही नहीं दी वरना
सामने तुझ को बिठा बैठ के देखा करते

हम सज़ा-वार-ए-तमामशा थे हमें देखना था
अपने ही क़त्ल का मंज़र था मगर क्या करते

अब यही सोचते रहते हैं बिछड़ कर तुझ से
शायद ऐसे नहीं होता अगर ऐसा करते

जो भी हम देखते हैं साफ़ नज़र आ जाता
चश्म-ए-हैरत को अगर दीदा-ए-बीना करते

शहर के लोग अब इल्ज़ाम तुम्हें देते हैं
ख़ुद बुरे बन गए ‘आसिम’ उसे अच्छा करते

गुज़र चुका है जो लम्हा वो इर्तिक़ा में है 

गुज़र चुका है जो लम्हा वो इर्तिक़ा में है
मेरी बक़ा का सबब तो मेरी फ़ना में है

नहीं है शहर में चेहरा कोई तर ओ ताज़ा
अजीब तरह की आलूदगी हवा में है

हर एक जिस्म किसी ज़ाविए से उरियाँ है
है एक चाक जो मौजूद हर क़बा में है

ग़लत-रवी को तेरी मैं ग़लत समझता हूँ
ये बे-वफ़ाई भी शामिल मेरी वफ़ा में है

मेरे गुनाह में पहलू है एक नेकी का
जज़ा का एक हवाला मेरी सज़ा में है

अजीब शोर मचाने लगे हैं सन्नाटे
ये किस तरह की ख़ामोशी हर इक सदा में है

सबब है एक ही मेरी हर इक तमन्ना का
बस एक नाम है ‘आसिम’ के हर दुआ में है

है मुस्तकि़ल यही अहसास कुछ कमी सी है

है मुस्तकि़ल यही अहसास कुछ कमी सी है
तलाश में है नज़र दिल में बे-कली सी है

किसी भी काम में लगता नहीं है दिल मेरा
बड़े दिनों से तबीयत बुझी बुझी सी है

बड़ी अजबी उदासी है मुसकुराता हूं
जो आज कल मेरी हालात है शायरी सी है

गुज़र रहे हैं शब ओ रोज़ बे-सबब मेरे
ये ज़िंदगी तो नहीं सिर्फ़ ज़िंदगी सी है

थकी तो एक मोहब्बत ने मूंद ली आंखें
हर एक नींद से अब मेरी दुश्मनी सी है

तेरे बग़ैर कहां है सुकून क्या आराम
कहीं रहूँ मेरी तकलीफ़ बे-घरी सी है

नहीं वो शमा-ए-मुहब्बत रही तो फिर ‘आसिम’
ये किस दुआ से मेरे घर में रौशनी सी है

हैं नींद अभी आँख में पल भर में नहीं है

हैं नींद अभी आँख में पल भर में नहीं है
करवट कोई आराम की बिस्तर में नहीं है

साहिल पे जला दे जो पलटने का वसीला
अब ऐसा जियाला मेरे लश्कर में नहीं है

फैलाव हुआ है मेरे इदराक से पैदा
वुसअत मेरे अंदर है समंदर में नहीं है

सीखा न दुआओं में क़नाअत का सलीक़ा
वो माँग रहा हूँ जो मुक़द्दर में नहीं है

रख उस पे नज़र जो कहीं ज़ाहिर में है पिंहाँ
वो भी तो कभी देख जो मंज़र में नहीं है

यूँ धूप ने अब ज़ाविया बदला है के ‘आसिम’
साया भी मेरा मेरे बराबर में नहीं है

हर तरफ़ हद्द-ए-नज़र तक सिलसिला पानी का है

हर तरफ़ हद्द-ए-नज़र तक सिलसिला पानी का है
क्या कहें साहिल से कोई राबता पानी का है

ख़ुश्क रुत में इस जगह हम ने बनाया था मकान
ये नहीं मालूम था ये रास्ता पानी का है

आग सी गर्मी अगर तेरे बदन में है तो हो
देख मेरे ख़ून में भी वलवला पानी का है

एक सोहनी ही नहीं डूबी मेरी बस्ती में तू
हर मोहब्बत का मुक़द्दर सानेहा पानी का है

बे-गुनह भी डूब जाते हैं गुनह-गारों के साथ
शहर के क़ानून में ये ज़ाबता पानी का है

जानता हूँ क्यूँ तुम्हारे बाग़ में खिलते हैं फूल
बात मेहनत की नहीं ये मोजज़ा पानी का है

अश्क बहते भी नहीं आसिम ठहरते भी नहीं
क्या मसाफ़त है ये कैसा क़ाफ़िला पानी का है

मकाँ से दूर कहीं ला-मकाँ से होता है

मकाँ से दूर कहीं ला-मकाँ से होता है
सफ़र शुरू यक़ीं का गुमाँ से होता है

वहीं कहीं नज़र आता है आप का चेहरा
तुलू चाँद फ़लक पर जहाँ से होता है

हम अपने बाग़ के फूलों को नोच डालते हैं
जब इख़्तिलाफ़ कोई बाग़-बाँ से होता है

मुझे ख़बर ही नहीं थी के इश्क़ का आग़ाज़
अब इब्तिदा से नहीं दरमियाँ से होता है

उरूज पर है चमन में बहार का मौसम
सफ़र शुरू ख़िज़ाँ का यहाँ से होता है

ज़वाल-ए-मौसम-ए-ख़ुश-रंग का गिला ‘आसिम’
ज़मीन से तो नहीं आसमाँ से होता है

मौजूद जो नहीं वही देखा बना हुआ

मौजूद जो नहीं वही देखा बना हुआ
आँखों में इक सराब है दरिया बना हुआ

इक और शख़्स भी है मेरे नाम का यहाँ
इक और शख़्स है मेरे जैसा बना हुआ

समझा रहे हो मुझ को मेरा इर्तिक़ा मगर
देखा नहीं है आदमी पहला बना हुआ

ऐ इंहिमाक-ए-चश्म ज़रा ये मुझे बता
चारों तरफ़ ज़मीन पे है क्या बना हुआ

करने लगा है तंज़ मेरे निस्फ़ अक्स पर
मुझ में जो एक शख़्स है पूरा बना हुआ

पहले किसी की आँख ने पागल किया मुझे
अब हूँ किसी नज़र का तमाशा बना हुआ

खुलती नहीं हैं तुझ पे ही उरयानियाँ तेरी
‘आसिम’ तेरा लिबास है अच्छा बना हुआ

मेरी नज़र मेरा अपना मुशाहिदा है कहाँ 

मेरी नज़र मेरा अपना मुशाहिदा है कहाँ
जो मुस्तआर नहीं है वो ज़ाविया है कहाँ

अगर नहीं तेरे जैसा तो फ़र्क़ कैसा है
अगर मैं अक्स हूँ तेरा तो आइना है कहाँ

हुई है जिस में वज़ाहत हमारे होने की
तेरी किताब में आख़िर वो हाशिया है कहाँ

ये हम-सफ़र तो सभी अजनबी से लगते हैं
मैं जिस के साथ चला था वो क़ाफ़िला है कहाँ

मदार में हूँ अगर मैं तो है कशिश किस की
अगर मैं ख़ुद ही कशिश हूँ तो दाएरा है कहाँ

तेरी ज़मीन पे करता रहा हूँ मज़दूरी
है सूखने को पसीना मुआवज़ा है कहाँ

हुआ बहिश्त से बे-दख़्ल जिस के बाइस मैं
मेरी ज़बान पर उस फल का ज़ाएक़ा हैं कहाँ

अज़ल से है मुझे दर-पेश दाएरों का सफ़र
जो मुस्तक़ीम है या रब वो रास्ता है कहाँ

अगरचे उस से गुज़र तो रहा हूँ मैं आसिम
ये तजरबा भी मेरा अपना तजरबा है कहाँ

सामने रह कर न होना मसअला मेरा भी है 

सामने रह कर न होना मसअला मेरा भी है
इस कहानी में इज़ाफ़ी तज़्किरा मेरा भी है

बे-सबब आवारगी मसरूफ़ रखती है मुझे
रात दिन बेकार फिरना मश्ग़ला मेरा भी है

बात कर फ़रहाद से भी इंतिहा-ए-इश्क़ पर
मश्विरा मुझ से भी कर कुछ तजरबा मेरा भी है

क्या ज़रूरी है अँधेरे में तेरा तंहा सफ़र
जिस पे चलना है तुझे वो रास्ता मेरा भी है

है कोई जिस की लगन गर्दिश में रखती है मुझे
एक नुक्ते की कशिश से दाएरा मेरा भी है

बे-सबब ये रक़्स है मेरा भी अपने सामने
अक्स वहशत है मुझे भी आईना मेरा भी है

एक गुमकर्दा गली में एक ना-मौजूद घर
कूचा-ए-उश्शाक़ में ‘आसिम’ पता मेरा भी है

तुम भटक जाओ तो कुछ ज़ौक़-ए-सफ़र आ जाएगा 

तुम भटक जाओ तो कुछ ज़ौक़-ए-सफ़र आ जाएगा
मु्ख़्तलिफ़ रास्तों पे चलने का हुनर आ जाएगा

मैं ख़ला में देखता रहता हूँ इस उम्मीद पर
एक दिन मुझ को अचानक तू नज़र आ जाएगा

तेज़ इतना ही अगर चलना है तन्हा जाओ तुम
बात पूरी भी न होगी और घर आ जाएगा

ये मकाँ गिरता हुआ जब छोड़ जाएँगे मकीं
इक परिंदा बैठने दीवार पर आ जाएगा

कोई मेरी मुख़बिरी करता रहेगा और फिर
जुर्म की तफ़तीश करने बे-ख़बर आ जाएगा

हो गया मिट्टी अगर मेरा पसीना सूख कर
देखना मेरे दरख़्तों पर समर आ जाएगा

बंदगी में इश्क़ सी दीवानगी पैदा करो
एक दम ‘आसिम’ दुआओं में असर आ जाएगा

वक़्त बे-वक़्त ये पोशाक मेरी ताक में है

वक़्त बे-वक़्त ये पोशाक मेरी ताक में है
जानता हूँ के मेरी ख़ाक मेरी ताक में है

मुझ को दुनिया के अज़ाबों से डराने वालो
एक आलम पस-ए-अफ़लाक मेरी ताक में है

साँप हर दस्त में करता है तआक़ुब मेरा
बहर-ए-बे-आब का तैराक मेरी ताक में है

जम्मा करता है शवाहिद मेरे होने के ख़िलाफ़
दर-हक़ीक़त मेरा इदराक मेरी ताक में है

है मेरे गिर्द हिफ़ाज़त के लिए एक हिसार
हो अगर कोई ग़ज़ब-नाक मेरी ताक में है

उस से कहना मुझे हासिल है तहफ़्फ़ुज़ ग़ैबी
जो पस-ए-पर्दा-ए-बे-चाक मेरी ताक में है

वो तो यूँ है के बचाता है बचाने वाला
वरना इक लश्कर-ए-सफ़्फ़ाक मेरी ताक में है

इक तरफ़ रूह वज़ू में नहीं होती शामिल
इक तरफ़ सजदा-ए-ना-पाक मेरी ताक में है

आश्ना एक है इस शहर में ‘आसिम’ मेरा
और वो दुश्मन-ए-बे-बाक मेरी ताक में है

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