इंदिरा शर्मा की रचनाएँ

शिव स्तुति

हे , ब्रह्माण्ड के भाल तिलक
त्रिनेत्र उज्ज्वल ,
पट बाघाम्बर , व्योम विषद ,
डमरू करे निनाद , ओम भास्वर ,
हे त्रिलोक के द्वारपाल त्रिशूल
तीखे फाल विषम |
है गूढ़ समाधि ध्यान , न चित चंचल ,
जटा – जूट से बहे गंग अपार ,
पवित्र , निर्मल , सलिला की धार |
प्रखर ताण्डव में भरकर आग ,
दुष्टों का करने को संहार |
हे त्रिलोक के स्वामी ,
मैं अभिनन्दन करती हूँ आज |

मोक्ष

दुनिया पकड़ना चाहती है
आँचल तुम्हारा ,
चाहती है बुद्ध बनना |
काषाय वस्त्र , भिक्षा पात्र , भिक्षुक संघ
महाप्रस्थान और निर्वाण :
यह महावृत जीवन तुम्हारा |
छोड़ने होंगे यहीं राजसी वेश ,
कर्तन किए केश ,
ये राज मुकुट – मणियाँ नहीं शेष |
यह प्रकृति परिवेश –
तुममें हिम्मत नहीं थी शेष ,
अंतिम बार , बस अंतिम बार
देख आऊँ ,
निद्रा मग्न प्रकोष्ठ |
शांत निर्विकार ,
शयन कक्ष , गोपा निद्रा – मग्न
हृदय का द्वार ,
अंत में मोह का त्याग ,
अब न बचा कुछ शेष |


छोड़ सकोगे घर
रात्रि की निस्तब्ध वेला में
शून्य बन जाने को – शून्य हो जाने को |
प्रबल मोह क्या रोक न लेगा तुम्हे ?
बाहर तैयार खड़ा है रथ ,
प्रतीक्षा रत ,
तुम्हे ले जाने को
मोक्ष पाने को |

माँ मैं तेरे मंदिर का दिया

माँ मैं तेरे मंदिर का दिया
तेरे ही चरणों में जिया |
जलता रहता झिलमिल – झिलमिल
मन मंदिर में अर्जित – पूजित
नित सांध्य तुझे अर्पित किया
तेरे ही चरणों में जिया |
नव दिन तेरे हैं रूप नवल
तू दिव्य रूप शिव , कल्याणी
अमृत घट भरे वरदान सदा
माँ मैं तेरे मंदिर का दिया
तेरे ही चरणों में जिया |
जग में तेरी महिमा अनंत
सबका जीवन जग में सुखमय
दुष्टों का तूने उद्धार किया
माँ मैं तेरे मंदिर का दिया
तेरे ही चरणों में जिया |
तेरे चरणों में शीश रहे
मन भक्ति में तल्लीन रहे
मन में सेवा का भाव सदा
माँ मैं तेरे चरणों का दिया
तेरे ही चरणों में जिया |

यायावर मेरा मन 

अरे !
ये यायावर मेरा मन |
खोजता निशिदिन , हिम श्रृंगों से
प्रवाहमान गंगा – अवतरण |
कल – कल , छल – छल बहती
करती गिरि कंदराओं का मन प्रसन्न
इस सौन्दर्य का न आदि – अंत |
फैला दूर – सुदूर , हरित आँचल
वेदी – धरा , धूम उठता गगन मंडल
करता हव्य ग्रहण , प्रातः पूजन |
आचमन जल शुद्ध , पवित्र गंगा जल
शुद्ध मलय समीर , सुगंद्धित अगुरु औ’ चन्दन
मौन , शांत , नित करता गुरु दर्शन
मेरा प्रातः वंदन |
अरे !
ये यायावर मेरा मन |
दिवा – अवसान का क्षण
क्षितिज – कोर पर बैठ , मूंद आँख
पूर्व दिग दिगंत
करता सांध्य तारा दर्शन
है अबोध मन ,
फिर रात्रि गहन चिंतन
करता सृष्टि में व्याप्त संगीत चिरंतन
ये मेरा रात्रि मंथन
अरे !
ये यायावर मेरा मन |

मन वीणा

मेरी मन वीणा के टूटे थे तार
उन्हें लिया सँवार
मधुर स्वर हवा में लहराया
कहाँ हो तुम , हे सृष्टि के नूर
कहाँ तुम्हारी छाया ?
नदिया के पार , या फिर नील गगन विस्तार |
सूरज प्राण प्राची में मुस्कुराया
नीड़ों में कलरव –
करतल ध्वनि का स्वर बन
शिशु विहगों ने गाया |
आहत था जो मानव
निरखता प्रकृति छवि , अवछिन्न
हुआ शांत मन , तन सिहराया |
मैंने कर में साधी वीणा
फिर हौले से , जो टूटे थे तार , उन्हें लिया सँवार
पलक बंद कर मंद मधुर स्वर में , हृदय गीत गाया |
मन सरिता पर मानो रजत चाँद उतर आया
मन वीणा पर मैंने गाया ,
मैंने गाया , मैंने गाया , मैंने गाया |

नए सपने बुनें 

चलो , आज शाम फिर दूर कहीं
नदी किनारे बैठें , गुमसुम न रहें
चलो , कुछ नए सपने बुनें |
वो नदिया का छल – छल पानी
लहरों की चुन्नट में सिमटा
एक नया रजत ख़ामोश चाँद चुनें ,
चलो , कुछ नए सपने बुनें |
भटके हुए हैं तारे गगन में
लहरों में तिरते हैं बेचैन हो कर
कुछ मधुर गीत उनके नाम लिखें ,
चलो , कुछ नए सपने बुनें |
लौटने लगे थके परिंदे नीड़ों में
उतर आया शाखों पे अँधेरा धीरे
उनके कुछ रेशमी जज़्बात सुनें ,
चलो , कुछ नए सपने बुनें |
कुछ कहता है रात का आलम मुझसे
पकड़े चांदनी का हाथ , फ़लक तक टहलें
दिल की धड़कनों को चुपचाप गुने ,
चलो , कुछ नए सपने बुनें |

हवा

हवा ने कहा –
अभी यहाँ , अभी वहाँ
मुझे कहाँ विराम |
फूलों की गंध ले उड़ती हूँ
कभी धरा तो कभी आसमां
हिम श्रृंगों पर डोलती फिरती हूँ , कंपकपाती हूँ |
श्वेत चादर सी बर्फ़ में ऊष्मा बन समाती हूँ
गाती हुई अंत:राग , हिम पिघलाती हूँ
कभी ढूँढती हूँ , शीतल छाँह कठोर
कभी बर्फ़ पर तूफ़ान उठती हूँ |
मुझे नहीं कोई गतिरोध
शून्य से धरती तक बेरोक टोक फेरा लगाती हूँ
नि:कलंक , नि:पाप धरती के चरण छूकर
धन्य हो जाती हूँ , उसकी रज से आकाश के भाल पर
जय तिलक लगाती हूँ |
मेरी गति पर नहीं कोई अंकुश
कभी चक्रवात बन धूम मचाती हूँ
कभी शीतल मंद पवन बन
सरिता पर तरंगें उमगाती हूँ
मैं हवा हूँ , प्राण वायु हूँ , तुम्हे जिलाती हूँ |

सूरज 

हर सुबह एक सूर्य प्राची आँगन में
और एक – मेरे मन मंदिर भीतर |
प्रकाशित कर अग – जग को
डूब जाता है पश्चिम छोर पर
यह सांध्य सूरज |
कहीं दूर फैला विस्तृत अपार जल
जैसे पिघल गया लावा हो ,
बिखर गई हो ऊर्जा |
उमड़ उठते हों अमृत घन
आप्लावित जल –थल
जीती है सृष्टि
पीती हुई रस
इस जीवन का ,
सृष्टि इसी से तू आत्मसात करती है
होता है सृजन सृष्टि का |
मन मंदिर का सूर्य
देव सम्मुख – बन जाता है दीपक
आलोकित जिससे
अंतर – तन – मन
करता रहता सृजन
चेतन आत्म तत्व
गढ़ता रूप नित्य नूतन |
मेरा मन मंदिर –
ईश पूजन स्थल
जलता ऊर्ध्व दिशा
बन आत्म दीपक |

नीरवता में

मायावी रात का वह क्षण
वह अनुभूति
वह तारों का खिलखिलाना
फिर अनंत ब्रह्माण्ड की कालिमा में दूब जाना |
वह नित – नित नूतन चिर सत्य
जो केवल मैंने जाना
उस अद्भुत नीरवता में
तुम्हें पाना
फिर सहसा
टूटते तारे सा तुम्हारा खो जाना
दूर –
आकाश के पार अनचीन्हा , अनपहचाना |
पुन: मुझे
इंगित कर बुलाना
हौले से मुस्कुराना
मन के किसी कोने में चुपके से झाँक जाना
यही तो मैंने जीवन भर जाना |
मायावी रात का वह क्षण
वह अनुभूति
वह तारों का खिलखिलाना
रात्रि की निस्तब्धता
और मेरा गुनगुनाना
क्या तुमने पहचाना |
मायावी रात का वह क्षण

समय – चक्र

मैं महाकाल हूँ
मैं महाकाल हूँ
बीत रहा कतरा – कतरा
यह वर्तमान हिमसेतु सा है जोड़ रहा
आदि भूत को महा भविष्यत् से
ये वर्तमान कुछ जल चंचल |
भूतकाल कुछ हिम जैसा स्थिर कठोर
जिसमें जीवन के शिला लेख
जाने कितने हो गए दफ़न |
मैं वर्तमान हूँ खड़ा भूत के शैल शिखर
बहता घाटी में बन चंचल जल
गतिशील –
समोता मुझमें जीवन का उर्वर हर क्षण –
कर्मठ जीवन
ये भी तो नहीं रहा ठहर |
द्रुत गति बढ़ता उस ओर जहाँ अदृश्य पटल
यह आगत –विषम – सम निर्मम
या –
फिर कोमल कान्त पुष्प वल्लरी सा
सुन्दर सुखमय क्षण
निरंतर बहता
सरिता सा बहता जल आगम |
यह महाकाल इसके न काल खंड
बहता नित्य चिरंतन
यह भूतकाल , वर्तमान , भविष्यत् चक्र
गति से घूम रहे हैं , नित्य , प्रतिक्षण ,
प्रतिपल |

पथिक – घन

ये अजाने पथिक – घन
नभ में घूमते घनश्याम से
चल रहे हैं साथ मेरे
सुभग घन , मन – वलय घेरे
तू बनी रे चातकी
मन प्राण मेरे |
तृप्ति की संपुष्टि में ये
चंचुपुट उन्मुक्त तेरे ,
घन बरस तू , स्वाति के नक्षत्र में शुभ
जलधि बन तृप्त कर दे , कंठ सूखे |
नभ में घूमते ये तृप्ति के जल घूँट
पी ले |
तू बनी रे चातकी
मन प्राण मेरे |
ये अजाने पथिक घन
चल रहे हैं साथ मेरे |

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