इंशा अल्लाह खां की रचनाएँ

कमर बांधे हुए चलने पे यां सब यार बैठे हैं

कमर बांधे हुए चलने को याँ सब यार बैठे हैं ।
बहोत आगे गए, बाक़ी जो हैं तैयार बैठे हैं ।।

न छेड़ ए निक़हत-ए-बाद-ए-बहारी[1], राह लग अपनी ।
तुझे अटखेलियाँ सूझी हैं, हम बेज़ार बैठे हैं ।।

तसव्वुर[2] अर्श[3] पर है और सर है पा-ए-साक़ी पर ।
ग़र्ज़ कुछ और धुन में इस घड़ी मय-ख़्वार बैठे हैं ।।

बसाने नक़्शपाए रहरवाँ[4] कू-ए-तमन्ना[5] में ।
नहीं उठने की ताक़त, क्या करें? लाचार बैठे हैं ।।

यह अपनी चाल है उफ़तादगी[6] से इन दिनों पहरों तक ।
नज़र आया जहां पर साया-ए-दीवार बैठे हैं ।।

कहाँ सब्र-ओ-तहम्मुल[7]? आह! नंगोंनाम क्या शै है ।
मियाँ! रो-पीटकर इन सबको हम यकबार बैठे हैं ।।

नजीबों[8] का अजब कुछ हाल है इस दौर में यारो ।
जहाँ पूछो यही कहते हैं, “हम बेकार बैठे हैं” ।।

भला गर्दिश फ़लक की चैन देती है किसे इंशा !
ग़़नीमत है कि हम सूरत यहाँ दो-चार बैठे हैं ।।

शब्दार्थ
  1. ऊपर जायें वसन्तकाल की सुगन्धित वायु
  2. ऊपर जायें ध्यान
  3. ऊपर जायें आकाश
  4. ऊपर जायें मुसाफ़िर के चरणचिन्हों की तरह
  5. ऊपर जायें अभिलाषाओं के कूचे में
  6. ऊपर जायें निर्बलता
  7. ऊपर जायें संतोष
  8. ऊपर जायें कुलीन मनुष्यों

झूठा निकला करार तेरा 

झूठा निकला क़रार तेरा
अब किसको है ऐतबार तेरा

दिल में सौ लाख चुटकियाँ लीं
देखा बस हम ने प्यार तेरा

दम नाक में आ रहा था अपने
था रात ये इंतिज़ार तेरा

कर ज़बर जहाँ तलक़ तू चाहे
मेरा क्या, इख्तियार तेरा

लिपटूँ हूँ गले से आप अपने
समझूँ कि है किनार तेरा

“इंशा” से मत रूठ, खफा हो
है बंदा जानिसार तेरा

ज़ोफ आता है दिल को थाम तो लो

ज़ो’फ आता है दिल को थाम तो लो
बोलियो मत मगर सलाम तो लो

कौन कहता है बोलो, मत बोलो
हाथ से मेरे एक जाम तो लो

इन्हीं बातों पे लौटता हूँ मैं
गाली फिर दे के मेरा नाम तो लो

इक निगाह पर बिके हैं इंशा आज
मुफ़्त में मोल एक गुलाम तो लो

अच्छा जो ख़फा हमसे हो तुम ए सनम अच्छा

अच्छा जो खफा हम से हो तुम ऐ सनम अच्छा
लो हम भी न बोलेंगे खुदा की क़सम अच्छा

मशगूल क्या चाहिए इस दिल को किसी तौर
ले लेंगे ढूँढ और कोई यार हम अच्छा

गर्मी ने कुछ आग और ही सीने में लगा दी
हर तौर ग़र्ज़ आप से मिलना है कम अच्छा

ऐ गैर से करते हो मेरे सामने बातें
मुझपर ये लगे करने नया तुम सितम अच्छा

कह कर गए आता हूँ कोई दम में, मैं तुम पास
फिर दे चले कल की सी तरह मुझको दम अच्छा

छेड़ने का तो मज़ा तब है कहो और सुनो 

छेड़ने का तो मज़ा तब है कहो और सुनो
बात में तुम तो ख़फ़ा हो गये, लो और सुनो

तुम कहोगे जिसे कुछ, क्यूँ न कहेगा तुम को
छोड़ देवेगा भला, देख तो लो, और सुनो

यही इंसाफ़ है कुछ सोचो तो अपने दिल में
तुम तो सौ कह लो, मेरी एक न सुनो और सुनो

आफ़रीं तुम पे, यही चाहिए शाबाश तुम्हें
देख रोता मुझे यूँ हँसने लगो और सुनो

बात मेरी नहीं सुनते जो अकेले मिल कर
ऐसे ही ढँग से सुनाऊँ के सुनो और सुनो

यह जो महंत बैठे हैं

यह जो महंत बैठे हैं राधा के कुण्ड पर
अवतार बन कर गिरते हैं परियों के झुण्ड पर

शिव के गले से पार्वती जी लिपट गयीं
क्या ही बहार आज है ब्रह्मा के रुण्ड पर

राजीजी एक जोगी के चेले पे ग़श हैं आप
आशिक़ हुए हैं वाह अजब लुण्ड मुण्ड पर

‘इंशा’ ने सुन के क़िस्सा-ए-फरहाद यूँ कहा
करता है इश्क़ चोट तो ऐसे ही मुण्ड पर

फुटकर शेर

1.
सज गर्म, जबीं गर्म, निगह गर्म, अदा गर्म ।
वोह सरसे है ता नाख़ुने पा, नामे ख़ुदा गर्म ।।
2.
परतौसे चाँदनी के है सहने बाग ठंडा ।
फूलों की सेज पर आ, करदे चिराग़ ठंडा ।।
3.
लेके मैं ओढ़ूँ, बिछाऊँ, लपेटूँ क्या करूँ ?
रूखी, फीकी, सूखी, साखी महरबानी आपकी ।।
4.
ख़याल कीजिए क्या आज काम मैंने किया ।
जब उनने दी मुझे गाली, सलाम मैंने किया ।।
5.
कोई दुनिया से क्या भला माँगे ।
वह तो बेचारी आप न्ण्गी है ।।
6.
गर यार मय पिलाए तो फिर क्यों न पीजिए ।
ज़ाहिद नहीं, मैं शेख नहीं, कुछ वली नहीं ।।
7.
अजीब लुत्फ़ कुछ आपस की छेड़ छाड़ में है ।
कहाँ मिलाप में वह बात जो बिगाड़ में है ।।
8.
झिड़की सही, अदा सही, चीनेजबीं[1] सही ।
यह सब सही, पर एक ‘नहीं’ की नहीं नहीं ।।
9.
गर ‘नाज़नीं’ कहने से बुरा मानते हो आप ।
मेरी तरफ़ तो देखिए, मैं नाज़नीं सही ।।
10.
जिगर की आग बुझे जिससे जल्द वो शय[2] ला ।
लगा के बर्फ़ में साक़ी ! सुराहिए मय ला ।।
11.
नज़ाकत उस गुलेराना की देखिए ‘इंशा’ !
नसीमे सुबह जो छू जाए रंग हो जाए मैला ।।
12.
है ज़ोरे हुस्न से वोह निहायत घमंड पर ।
नामे ख़ुदा निगाह पड़े क्यों न डंड पर ।।
13.
यह जो महन्त बैठे हैं राधा के कुंड पर ।
औतार बन के गिरते हैं परियों के झुंड पर ।।
14.
ग़ुस्से में हमने तेरा बड़ा लुत्फ़ उठाया ।
अब तो अमूमन[3] और भी तक़सीर[4] करेंगे ।।

शब्दार्थ
  1. ऊपर जायें माथे की त्यौरी
  2. ऊपर जायें चीज़
  3. ऊपर जायें प्रायः
  4. ऊपर जायें बेअदबी, अपराध

मैंने जो कहा- हूँ मैं तेरा आशिक़े शैदा-ऐ- कानेमलाहत

मैंने जो कहा- हूँ मैं तेरा आशिक़े शैदा-ऐ- कानेमलाहत[1] ।
फ़रमाने लगे हँसके “सुनो और तमाशा- यह शक्ल, यह सूरत” ?

आए जो मेरे घर में वह सब राहे करम से- मैं मूँद दी कुण्डी ।
मुँह फेर लगे कहने त‍आज्जुब से कि “यह क्या- ऐ तेरी यह ताक़त” ?

लूटा करें इस तरह मज़े ग़ैर हमेशा- टुक सोचो तो दिल में ।
तरसा करे हर वक़्त यह बन्दा ही तुम्हारा- अल्लाह की कुदरत ।।

दीवार-ए-चमन फाँद के पहुँचे जो हम उन तक- इक ताक की ओझल ।
तरसाँ[2] हो कर फ़रमाने लगे कूटके माथा- ऐ वाए फ़ज़ीहत !

शब महफ़िले होली में जो वारिद हुआ ज़ाहिद- रिन्दों ने लिपटकर ।
दाढ़ी को दिया उसकी लगा बज़रे फतूना- और बजने लगी गत ।।

शब्दार्थ
  1. ऊपर जायें मनमोहक
  2. ऊपर जायें डरकर
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