इक़बाल अज़ीम की रचनाएँ

हम बहुत दूर निकल आए हैं चलते चलते

हम बहुत दूर निकल आए हैं चलते चलते
अब ठहर जाएँ कहीं शाम के ढलते ढलते

अब ग़म-ए-ज़ीस्त से घबरा के कहाँ जाएँगे
उम्र गुज़री है इसी आग में जलते जलते

रात के बाद सहर होगी मगर किस के लिए
हम ही शायद न रहें रात के ढलते ढलते

रौशनी कम थी मगर इतना अँधेरा तो न था
शम्मा-ए-उम्मीद भी गुल हो गई जलते जलते

आप वादे से मुकर जाएँगे रफ़्ता रफ़्ता
ज़ेहन से बात उतर जाती है टलते टलते

टूटी दीवार का साया भी बहुत होता है
पाँव जल जाएँ अगर धूप में चलते चलते

दिन अभी बाक़ी है ‘इक़बाल’ ज़रा तेज़ चलो
कुछ न सूझेगा तुम्हें शाम के ढलते ढलते

बिल-एहतिमाम ज़ुल्म की तजदीद की गई

बिल-एहतिमाम ज़ुल्म की तजदीद की गई
और हम को सब्र ओ ज़ब्त की ताकीद की गई

अव्वल तो बोलने की इजाज़त न थी हमें
और हम ने कुछ कहा भी तो तरदीद की गई

अंजाम-कार बात शिकायात पर रुकी
पुर्सिश अगरचे अज़-रह-ए-तम्हीद की गई

तज्दीद-ए-इल्तिफ़ात की तज्वीज़ रद हुई
तर्क-ए-तअल्लुक़ात की ताईद की गई

जीने का कोई एक सहारा तो चाहिए
डर डर के की गई मगर उम्मीद की गई

घर के चराग़ और भी बे-नूर हो गए
इस दर्जा ख़ातिर-ए-माह-ओ-ख़ुर्शीद की गई

अपना घर छोड़ के हम लोग वहाँ तक पहुँचे 

अपना घर छोड़ के हम लोग वहाँ तक पहुँचे
सुब्ह-ए-फ़र्दा की किरन भी न जहाँ तक पहुँचे

मैं ने आँखों में छुपा रक्खे हैं कुछ और चराग़
रौशनी सुब्ह की शायद न यहाँ तक पहुँचे

बे-कहे बात समझ लो तो मुनासिब होगा
इस से पहले के यही बात ज़बाँ तक पहुँचे

तुम ने हम जैसे मुसाफ़िर भी न देखे होंगे
जो बहारों से चले और ख़िज़ाँ तक पहुँचे

आज पिंदार-ए-तमन्ना का फ़ुसूँ टूट गया
चंद कम-ज़र्फ़ गिले नोक-ए-ज़बाँ तक पहुँचे

ऐ अहल-ए-वफ़ा दाद-ए-जफ़ा क्यूँ नहीं देते

ऐ अहल-ए-वफ़ा दाद-ए-जफ़ा क्यूँ नहीं देते
सोए हुए ज़ख़्मों को जगा क्यूँ नहीं देते

इस जश्न-ए-चराग़ाँ से तो बेहतर थे अँधेरे
इन झूटे चराग़ों को बुझा क्यूँ नहीं देते

जिस में न कोई रंग न आहंग न ख़ुश-बू
तुम ऐसे गुलिस्ताँ को जला क्यूँ नहीं देते

दीवार का ये उज़्र सुना जाएगा कब तक
दीवार अगर है तो गिरा क्यूँ नहीं देते

चेहरों पे जो डाले हुए बैठे हैं नक़ाबें
उन लोगों को महफ़िल से उठा क्यूँ नहीं देते

तौबा का यही वक़्त है क्या सोच रहे हो
सजदे में जबीनों को झुका क्यूँ नहीं देते

ये झूटे ख़ुदा मिल के डुबो देंगे सफ़ीना
तुम हादी-ए-बर-हक़ को सदा क्यूँ नहीं देते

ज़हर के घूँट भी हँस हँस के पिए जाते हैं 

ज़हर के घूँट भी हँस हँस के पिए जाते हैं
हम बहर-हाल सलीक़े से जिए जाते हैं

एक दिन हम भी बहुत याद किए जाएँगे
चंद अफ़साने ज़माने को दिए जाते हैं

हम को दुनिया से मोहब्बत भी बहुत है लेकिन
लाख इल्ज़ाम भी दुनिया को दिए जाते हैं

बज़्म-ए-अग़्यार सही अज़-रह-ए-तनक़ीद सही
शुक्र है हम भी कहीं याद किये जाते हैं

हम किये जाते हैं तक़लीद-ए-रिवायात-ए-जुनूँ
और ख़ुद चाक-ए-गिरेबाँ भी सिये जाते हैं

ग़म ने बख़्शी है ये मोहतात-मिज़ाजी हम को
ज़ख़्म भी खाते हैं आँसू भी पिए जाते हैं

हाल का ठीक है ‘इक़बाल’ न फ़र्दा का यक़ीं
जाने क्या बात है हम फिर भी जिए जाते हैं

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