इक़बाल सुहैल की रचनाएँ

अब दिल को हम ने बंदा-ए-जानाँ बना दिया 

अब दिल को हम ने बंदा-ए-जानाँ बना दिया
इक काफ़िर-ए-अज़ल को मुसलमाँ बना दिया

दुश्वारियों को इश्क़ ने आसाँ बना दिया
ग़म को सुरूर दर्द को दरमाँ बना दिया

इस जाँ-फ़ज़ा इताब के क़ुर्बान जाइए
अबरू की हर शिकन को रग-ए-जाँ बना दिया

बर्क़-ए-जमाल-ए-यार ये जलवा है या हिजाब
चश्म-ए-अदा-शनास को हैराँ बना दिया

ऐ ज़ौक़-ए-जुस्तुजू तेरी हिम्मत पे आफ़रीं
मंज़िल को हर क़दम पे गुरेज़ाँ बना दिया

उट्ठी थी बहर-ए-हुस्न से इक मौज-ए-बे-क़रार
फ़ितरत ने इस को पैकर-ए-इंसाँ बना दिया

ऐ सोज़-ए-ना-तमाम कहाँ जाए अब ख़लील
आतिश-कदे को भी तो गुलिस्ताँ बना दिया

वारफ़्तगान-ए-शौक़ को क्या दैर क्या हरम
जिस दर पे दी सदा दर-ए-जानाँ बना दिया

आँसू की क्या बिसात मगर जोश-ए-इश्क़ ने
क़तरे को मौज मौज को तूफ़ाँ बना दिया

क्या एक मैं ही मैं हूँ इस आईना-ख़ाने में
मुझ को तो कश्फ़-ए-राज़ ने हैराँ बना दिया

 

असीरों में भी हो जाएँ जो कुछ आशुफ़्ता-सर पैदा

असीरों में भी हो जाएँ जो कुछ आशुफ़्ता-सर पैदा
अभी दीवार-ए-ज़िंदाँ में हुआ जाता है दर पैदा

किए हैं चाक-ए-दिल से बू-ए-गुल ने बाल ओ पर पैदा
हवस है ज़िंदगानी की तो ज़ौक-ए-मर्ग कर पैदा

ये मुश्त-ए-ख़ाक अगर कर ले पर-ओ-बाल-ए-नज़र पैदा
तो औज-ए-ला-मकाँ तक हों हज़ारों रह-गुज़र पैदा

जमाल-ए-दोस्त पिंहाँ पर्दा-ए-शम्स-ओ-क़मर पैदा
यही पर्दे तो करते हैं तक़ाज़ा-ए-नज़र पैदा

मोहब्बत तेरे सदक़े तू ने कर दी वो नज़र पैदा
जिधर आँखें उठीं होता है हुस्न-ए-जलवा-गर पैदा

शब-ए-ग़म अब मनाए ख़ैर अपने जेब ओ दामन की
रहे दस्त-ए-जुनूँ बाक़ी तो कर लेंगे सहर पैदा

मज़ाक़-ए-सर-बुलंदी हो तो फिर दैर ओ हरम कैसे
जबीं-साई की फ़ितरत ने किए हैं संग-ए-दर पैदा

निसार इस लन-तरानी के ये क्या कम है शरफ़ उस का
दिल-ए-ख़ुद्दार ने कर ली निगाह-ए-ख़ुद-निगर पैदा

जवानो ये सदाएँ आ रही हैं आबशारों से
चटानें चूर हो जाएँ जो हो अज़्म-ए-सफ़र पैदा

वो शबनम का सुकूँ हो या के परवाने की बे-ताबी
अगर उड़ने की धुन होगी तो होंगे बाल ओ पर पैदा

‘सुहैल’ अब पूछना है इंक़िलाब-ए-आसमानी से
हमारी शाम-ए-ग़म की भी कभी होगी सहर पैदा.

 

हुस्न-ए-फ़ितरत की आबरू मुझ से 

हुस्न-ए-फ़ितरत की आबरू मुझ से
आब ओ गिल में है रंग ओ बू मुझ से

मेरे दम से बिना-ए-मै-ख़ाना
हस्ती-ए-शीशा-ओ-सुबू मुझ से

मुझ से आतिश-कदों में सोज़ ओ गुदाज़
ख़ानक़ाहों में हाए ओ हू मुझ से

शबनम-ए-ना-तावाँ सही लेकिन
इस गुलिस्ताँ में है नुमू मुझ से

इक तिगापूए दाइमी है हयात
कह रही है ये आब-जू मुझ से

ताक़त-ए-जुंबिश-ए-नज़र भी नहीं
अब हो क्या शरह-ए-आरज़ू मुझ से

 

जो तसव्वुर से मावरा न हुआ

जो तसव्वुर से मावरा न हुआ
वो तो बंदा हुआ ख़ुदा न हुआ

दिल अगर दर्द-आश्ना न हुआ
नंग-ए-हस्ती हुआ हुआ न हुआ

रूतबा-दाँ था जबीन-ए-इश्क़ का मैं
हुस्न के दर पे जब्हा सा न हुआ

दिल ख़ता-वार-ए-इश्तियाक़ सही
लब गुनह-गार-ए-इल्तिजा न हुआ

नंग है बे-अमल क़ुबूल-ए-बहिश्त
ये तो सदक़ा हुआ सिला न हुआ.

 

पैग़ाम-ए-रिहाई दिया हर चंद क़ज़ा ने

पैग़ाम-ए-रिहाई दिया हर चंद क़ज़ा ने
देखा भी न उस सम्त असीरान-ए-वफ़ा ने

कह दूँगा जो के पुर्सिश-ए-आमाल ख़ुदा ने
फ़ुर्सत ही न दी कशमकश-ए-बीम-ओ-रजा ने

है रश्क-ए-इरम वादी-ए-पुर-ख़ार-ए-मोहब्बत
शायद उसे सींचा है किसी आबला-पा ने

ये ख़ुफ़िया-नसीबी के हुए और भी ग़ाफ़िल
नग़मे का असर हम पे किया शोर-ए-दरा ने

ख़ाकिस्तर-ए-दिल में तो न था एक शरार भी
बेकार उसे बर्बाद किया मौज-ए-सबा ने

 

उफ़ क्या मज़ा मिला सितम-ए-रोज़-गार में 

उफ़ क्या मज़ा मिला सितम-ए-रोज़-गार में
क्या तुम छुपे थे पर्दा-ए-लैल-ओ-नहार में

सौ सजदे एक लग़्ज़िश-ए-मस्ताना-वार में
अल्लाह क्या अदा है तेरे बादा-ख़्वार में

रोकूँ तो मौज-ए-ग़म को दिल-ए-बे-क़रार में
साग़र छलक न जाए कफ़-ए-राशा-दार में

किस से हो फिर उम्मीद के तार-ए-नज़र मेरा
ख़ुद जा के मिल गया सफ़-ए-मिज़गान-ए-यार में

ख़ुद हुस्न बे-नियाज़ नहीं फ़ैज़-ए-इश्क़ से
ख़ू मेरे दिल की है निगह-ए-बे-क़रार में

वो मस्त-ए-नाज़ हुस्न मैं सरशार-ए-आरज़ू
वो इख़्तियार में हैं न मैं इख़्तियार में

आशोब-ए-इज़्तिराब में खटका जो है तो ये
ग़म तेरा मिल न जाए ग़म-ए-रोज़-गार में

बाक़ी रहा न कोई गिला वक़्त-ए-वापसीं
क्या कह गए वो इक निगह-ए-शर्म-सार में

इक मश्क़-ए-इज़्तिराब का रक्खा है नाम इश्क़
उफ़ बे-कसी के वो भी नहीं इख़्तियार में

बज़्म-ए-सुख़न में आग लगा दी ‘सुहैल’ ने
क्या बिजलियाँ थीं ख़ामा-ए-जादू-निगार में

 

ज़बानों पर नहीं अब तूर का फ़साना बरसों से 

ज़बानों पर नहीं अब तूर का फ़साना बरसों से
तजल्ली-गाह-ए-ऐमन है दिल-ए-दीवाना बरसों से

कुछ ऐसा है फ़रेब-ए-नर्गिस-ए-मस्ताना बरसों से
के सब भूले हुए हैं काबा ओ बुत-ख़ाना बरसों से

वो चश्म-ए-फ़ितना-गर है साक़ी-ए-मै-ख़ाना बरसों से
के बाहम लड़ रहे हैं शीशा ओ पैमाना बरसों से

न अब मंसूर बाक़ी है न वो दार ओ रसन लेकिन
फ़ज़ा में गूँजता है नारा-ए-मस्ताना बरसों से

चमन के नौनिहाल इस ख़ाक में फूलें फलें क्यूँकर
यहाँ छाया हुआ है सब्ज़ा-ए-बेगाना बरसों से

ये आँखें मुद्दतों से ख़ू-गर-ए-बर्क़-ए-तजल्ली हैं
नशेमन बिजलियों का है मेरा काशाना बरसों से

तेरे क़ुर्बां इधर भी एक झोंका अब्र-ए-रहमत का
जबीनों में गिरह है सजदा-ए-शुकराना बरसों से

‘सुहैल’ अब किस को सजदा कीजिए हैरत का आलम है
जबीं ख़ुद बन गई संग-ए-दर-ए-जानाना बरसों से

 

ये इत्र बे-ज़ियाँ नहीं नसीम-ए-नौ-बहार की

ये इत्र बे-ज़ियाँ नहीं नसीम-ए-नौ-बहार की
उड़ा के लाई है सबा शमीम ज़ुल्फ़-ए-यार की

बस इतनी काइनात है हयात-ए-मुस्तआर की
शबाब है हुबाब का बहार है शरार की

फ़रेब-कारियाँ न पूछ जोश-ए-इंतिज़ार की
तमाम शब सुना किए सदा ख़िराम-ए-यार की

ये मुख़्तसर सी दास्ताँ है जब्र ओ इख़्तियार की
करिश्मा-साज़ कोई हो ख़ता गुनाह-गार की

हक़ीक़त-ए-फ़रेब-ए-हुस्न आलम आशकार की
ये इब्तिदा-ए-फ़तह है जुनून-ए-पुख़्ता-कार की

मुझे तो आँख खुलते ही क़फ़स की तीलियाँ मिलीं
मेरी बला से गर चमन में फ़स्ल है बहार की

तेरे निसार ज़ख़्म-ए-इश्क़ कुछ वो लज़्ज़तें मिलीं
बलाएँ ले रहा है दिल ख़दंग-ए-जाँ-शिकार की

रह-ए-तलब की लज़्ज़तें हैं और हिम्मत आफ़रीं
ये तल्ख़ियाँ हैं तल्ख़ियाँ शराब-ए-ख़ुश-गवार की

‘सुहैल’ तेरी शाएरी है या फ़ुसून-ए-सामरी
रवानियाँ हैं नज़्म में ख़िराम-ए-जू-ए-यार की

 

 

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