इनामुल्लाह ख़ाँ यक़ीन की रचनाएँ

मिस्र में हुस्न की वो गर्मी-ए-बाज़ार कहाँ 

मिस्र में हुस्न की वो गर्मी-ए-बाज़ार कहाँ
जिंस तो है पे ज़ुलेखा सा ख़रीदार कहाँ

फ़ैज़ होता है मकीं पर न मकाँ पर नाज़िल
है वही तूर वले शोला-ए-दीवार कहाँ

ऐश ओ राहत के तलाशी हैं ये सारे बेदर्द
एक हम को है यही फ़िक्र कि आज़ार कहाँ

इश्क़ अगर कीजिए दिल कीजिए किसी से ख़ाली
दर्द ओ ग़म कम नहीं इस दौर में ग़म-ख़्वार कहाँ

क़ैदी उस सिलसिला-ए-ज़ुल्फ़ के अब कम हैं ‘यक़ीं’
हैं दिल-आज़ार बहुत जान-गिरफ़्तार कहाँ

वो कौन दिल है जहाँ जलवा-गर वो नूर नहीं 

वो कौन दिल है जहाँ जलवा-गर वो नूर नहीं
उस आफ़ताब का किस ज़र्रे में ज़ुहूर नहीं

कोई शिताब ख़बर लो कि बे नमक है बहार
चमन के बीच दीवानों का अब के शूर नहीं

तजल्लियों से पहुँचता है कब उसे आसेब
सनम-कदा है न आख़िर ये कोह-ए-तूर नहीं

तेरे सफ़र की ख़बर सुन के जान धड़कों से
जो पहुँचूँ मर्ग के नज़दीक मैं तो दूर नहीं

कोई भी देता है लड़कों के हाथ शीशा-ए-दिल
‘यक़ीं’ मैं ग़ौर से देखा तो कुछ शऊर नहीं

बहार आई है क्या क्या चाक जैब-ए-पैरहन करते

बहार आई है क्या क्या चाक जैब-ए-पैरहन करते
जो हम भी छूट जाते अब तो क्या दीवाना-पन करते

तसव्वुर उस दहान-ए-तंग का रूख़्सत नहीं देता
जो टुक दम मार सकते हम तो कुछ फ़िक्र-ए-सुख़न करते

नहीं जूँ पंजा-ए-गुल कुछ भी इन हाथों में गीराई
वगरना ये गरेबाँ नज़्र-ए-ख़ूबान-ए-चमन करते

मुसाफ़िर हो के आए हैं जहाँ में तिस पे वहशत है
क़यामत थी अगर हम इस ख़राबे में वतन करते

कोई फ़रहाद जैसे बे-ज़बाँ को क़त्ल करता है
‘यक़ीं’ हम वाँ अगर होते तो इक-दो बचन करते

इस क़दर ग़र्क़ लहू में ये दिल-ए-ज़र न था 

इस क़दर ग़र्क़ लहू में ये दिल-ए-ज़र न था
जब हिना से तेरे पाँव को सरोकार न था

हुस्न का जज़्ब ज़ुलेख़ा सेती कुछ चल न सका
वर्ना ये पाक गुहर क़ाबिल-ए-बाज़ार न था

दिल में ज़ाहिद के जो जन्नत की हवा की है हवस
कूच-ए-यार में क्या साया-ए-दीवार न था

दिल मेरा इश्क के धड़कों से मुवा जाता है
ये वो दिल है कि कोई ऐसा जिगर-दार न था

‘‘आप से क्यूँ न हुआ’’ कह के ‘यक़ीं’ को मारा
रास्त पूछो तो कोई मुझ से गुनह-गार न था

ये वो आँसू हैं जिन से ज़ोहरा आतिशनाक हो जावे 

ये वो आँसू हैं जिन से ज़ोहरा आतिशनाक हो जावे
अगर पीवे कोई उन को तो जल कर खाक हो जावे

न जा गुलशन में बुलबुल को खज़िल मत कर की डरता हूँ
ये दामन देख कर गुल का गरेबाँ चाक हो जावे

गुनहगारों को है उम्मीद इस अश्क़-ए-निदामत से
कि दामन शायद इस आब-ए-रवाँ से पाक हो जावे

अजब क्या है तिरी ख़ुश्की की शामत से जो तू ज़ाहिद
नहाल-ए-ताक बिठलावे तो वो मिसवाक हो जावे

दुआ मस्तों की कहते हैं ‘यक़ीं’ तासीर रखती है
इलाही सब्ज़ा जितना है जहाँ में ताक हो जावे

ये ना-ख़ुशी से बुताँ का मुझे ख़याल नहीं 

ये ना-ख़ुशी से बुताँ का मुझे ख़याल नहीं
मिज़ाज दिल का मेरे इन दिनों बहाल नहीं

हमेशा मुझ से नई जान चाहता है सजन
ये कौन हट है तू इतना भी ख़ुर्द-साल नहीं

ख़ुदा करे न गिरूँ इश्क़ की मैं नज़रों में
किसू की चश्म-ए-हिक़ारत से कुछ मलाल नहीं

उसूल-ए-इश्क़ ये तोलें तो ज़मज़मा उस का
नहीं दुरूस्त जो बुलबुल शिकस्ता बाल नहीं

‘यक़ीं’ चमन में कुछ इस का सबब नहीं मालूम
कि बुलबुलों का वो हंगामा अब के साल नहीं

उम्र आखिर है जुनूँ कर लूँ बहाराँ फिर कहाँ 

उम्र आखिर है जुनूँ कर लूँ बहाराँ फिर कहाँ
हाथ मत पकड़ो मिरा यारों गरेबाँ फिर कहाँ

चश्म-ए-तर पर गर नहीं करता हवा पर रहम कर
दे ले साक़ी हम को मय ये अब्र-ए-बाराँ फिर कहाँ

यार जब पहने जवाहिर कर दे ऐ दिल जी निसार
जल चुक ऐ परवाने ये रंगीं चराग़ाँ फिर कहाँ

इस तरह सय्याद कब आज़ाद छोड़ेगा तुम्हें
बुलबुलों धूमें मचा लो ये गुलिस्ताँ फिर कहाँ

है बहिश्तों में ‘यक़ीं’ सब कुछ व-लेकिन दर्द नईं
भर के दिल रो लीजिए ये चश्म-ए-गिर्यां फिर कहा

क्या दिल है अगर जलवा-गह-ए-यार न होवे

क्या दिल है अगर जलवा-गह-ए-यार न होवे
है तूर से क्या काम जो दीदार न होवे

कुछ रंग नहीं नग़मा ओ आहंग में उस के
बुलबुल जो बहाराँ में गिरफ़्तार न होवे

दिल जल जो गया ख़ूब हुआ सोख़्ता बेहतर
वो जिन्स ही क्या जिस का ख़रीदार न होवे

शमशाद को देवे है क़ज़ा वार के तुझ पर
जो जामा तेरे क़द पे सज़ा-वार न होवे

नईं बाग़-ए-मुहब्बत में ‘यक़ीं’ उस को कहीं चैन
जिस दिल में कि दाग़ों सेती गुलज़ार न होवे

हक मुझे बातिल आशना न करे

हक मुझे बातिल आशना न करे
मैं बुतों से फिरूँ ख़ुदा न करे

दोस्ती बद-बला है उस में ख़ुदा
किसी दुश्मन को मुब्तला न करे

है वो मक़तूल काफ़िर-ए-नेमत
अपने क़ातिल को जो दुआ न करे

रू मेरे को ख़ुदा क़यामत तक
पुश्त-ए-पा से तेरी जुदा न करे

नासेहो ये भी कुछ नसीहत है
कि ‘यक़ीं’ यार से वफ़ा न करे

चला आँखों में जब कश्ती में वो महबूब आता है

चला आँखों में जब कश्ती में वो महबूब आता है
कभी आँखें भर आती हैं कभी जी डूब जाता है

कहो क्यूँकर न फिर होवेगा दिल रौशन ज़ुलेख़ा का
जहाँ यूसुफ़ सा नूर-ए-दीदा-ए-याक़ूब जाता है

जहाँ के ख़ूब-रू मुझ से चुराएँ क्यूँ न फिर आँखें
जो कोई ख़ुर्शीद को देखे सो वो महजूब जाता है

मिरा आँसू भी क़ासिद की तरह इक दम नहीं रूकता
किसी बेताब का गोया लिए मक्तूब जाता है

‘यक़ीं’ हरगिज़ किया मत कर इत्ती तारीफ़ लड़कों की
इसी बातों सती मज़मून सा महबूब जाता है

जो तू शराब पिए क्यूँकि दिल कबाब न हो

जो तू शराब पिए क्यूँकि दिल कबाब न हो
लगे जब आग कहाँ तक ये ज़हरा आब न हो

ख़ुनुक गुज़रते हैं अय्याम-ए-इश्क़ दाग़ बग़ैर
कि सर्द होवे हवा जिस दिन आफ़ताब न हो

दिवाने शहर से याँ आ के चैन पाते हैं
ख़ुदा करे ये ख़राबा कभी ख़राब न हो

पड़ गई दिल में तेरे तशरीफ़ फ़रमाने में धूम 

पड़ गई दिल में तेरे तशरीफ़ फ़रमाने में धूम
बाग़ में मचती है जैसे फ़स्ल-ए-गुल आने में धूम

तेरी आँखों में नशे में इस तरह मारा है जोश
डालते हैं जिस तरह बद-मस्त मय-ख़ाने में धूम

चाँद के परतौ से जूँ पानी में हो जलवे का हश्र
मुँह तेरे के अक्स ने डाली है पैमाने में धूम

अब्र जैसे मस्त को शोरिश में लावे दिल के बीच
मच गई इक बार उन बालों के खुल जाने में धूम

बू-ए-मय आती है मुँह से जूँ कली से बू-ए-गुल
क्यूँ ‘यक़ीं’ से जान करते हो मुकर जाने में धूम

यार कब दिल की जराहत पे नज़र करता है 

यार कब दिल की जराहत पे नज़र करता है
कौन इस कूचे में जुज़ तेरे गुज़र करता है

अब तो कर ले निगह-ए-लुत्फ़ कि हो तोशा-ए-राह
कि कोई दम में ये बीमार सफ़र करता है

अपनी हैरानी को हम अर्ज़ करें किस मुँह से
कब वो आईने पे मग़रूर नज़र करता है

उम्र फ़रियाद में बर्बाद गई कुछ न हुआ
नाला मशहूर ग़लत है कि असर करता है

यार की बात हमें कौन सुनाता है ‘यक़ीं’
कौन कब गुल की दिवानों को ख़बर करता है

शहर में था न तिरे हुस्न का ये शूर कभू

शहर में था न तिरे हुस्न का ये शूर कभू
मिस्र इस जिंस से इतना न था मामूर कभू

इश्क़ में दाद न चाहो कि सुना हम ने नहीं
अदल ओ इंसाफ का इस मुल्क में दस्तू कभू

फ़िक्र मरहम का मिरे वास्ते मत कर नासेह
ख़ूब होता नहीं इस इश्क़ का नासूर कभू

गो न कर वादा वफ़ा दे न मुझे उस का जवाब
मुझ से मिलना भी सजन है तुझे मंज़ूर कभू

अपनी बेदर्दी की सौगंद है तुझ को ऐ मर्ग
तू ने देखा है ‘यक़ीं’ सा कोई रंजूर कभू

दर्द बिन हम को कुछ इस आग से मक़सूद नहीं 

दर्द बिन हम को कुछ इस आग से मक़सूद नहीं
इश्क़ फीका है अगर ज़ख़्म नमक-सूद नहीं

हम से गर सर न हुआ अहल-ए-तकब्बुर का तो क्या
फ़ख़्र-ए-आदम है जो इबलीस का मसजूद नहीं

है उसी तेग़ के ज़ंगार का मरहम दरकार
और किसी तरह मेरे ज़ख़्म का बहबूद नहीं

बुत-परस्ती में मोवह्हिद न सुना होगा कभू
कोई तुझ बिन मेरा वल्लाह कि माबूद नहीं

देख कर मुझ को किसी आँख से आँसू न गिरा
ज़ाहिरा आतिश-ए-सौदा में ‘यक़ीं’ दूद नहीं

कार-ए-दीं उस बुत के हाथों हाए अबतर हो गया

कार-ए-दीं उस बुत के हाथों हाए अबतर हो गया
जिस मुसलमाँ ने उसे देखा वो काफ़र हो गया

दिल-बरों के नक़्श-ए-पा में है सदफ़ का सा असर
जो मेरा आँसू गिरा उस में सो गौहर हो गया

क्या बदन होगा कि जिस के खोलते जामे का बंद
बर्ग-ए-गुल की तरह हर नाख़ुन मुअत्तर हो गया

आँख से निकले पे आँसू का ख़ुदा हाफ़िज़ ‘यक़ीं’
घर से जो बाहर गया लड़का सो अबतर हो गया

सरीर-ए-सल्तनत से आस्तान-ए-यार बेहतर था

सरीर-ए-सल्तनत से आस्तान-ए-यार बेहतर था
हमें ज़िल्ल-ए-हुमा से साया-ए-दीवार बेहतर था

मुझे दुख फिर दिया तू ने मुंडा कर सब्ज़ा-ए-ख़त को
जराहत को मिरे वो मरहम-ए-ज़ंगार बेहतर था

मुझे ज़ंजीर करना क्या मुनासिब था बहाराँ में
कि गुल हाथों में और पाँव में मेरे ख़ार बेहतर था

हमों ने हिज्र से कुछ वस्ल में धड़के बहुत देखे
हमारे हक़ में इस राहत से वो आज़ार बेहतर था

मिरा दिल मर गया जिस दिन कि नज़्ज़ारे से बाज़ आया
‘यक़ीं’ परहेज़ अगर करता तो ये बीमार बेहतर था

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