इब्बार रब्बी की रचनाएँ

बिजली का खम्भा 

वह चलता गया
और अंधेरा पाकर
चूम लिया बिजली का खम्भा
काले लोहे का ठंडापन।

क्यों चूमा उसने
बिजली के अंधे कंधाबरदार को
ढोएगा जो
उलझे तारों की
सती
निगेटिव-पाजेटिव धाराएँ।

इस सवाल का जवाब
दर्शनशास्त्रियों,
बुद्धिजीवियों
या केन्द्रीय मंत्रिमंडल के
किसी भी मंत्री
के पास नहीं है।

32 खंभे हैं सड़क पर
इसे ही पसंद किया उसने
और्रों के पास नहीं फ़ालतू वक़्त
रोशन हैं सब
इसने तुड़वाया बल्ब
बच्चों की गुलेल से
ताकि वह रात में आए
और चूमकर चला जाए।

इसके बस का नहीं चलना
उसके बस का नहीं रुकना।

उस औरत की गोद में

उस औरत की गोद में बच्चा
मैं बच्चे को देख रहा हूँ
और औरत को।
मैं मैं नहीं रहा
गोद में हो गया
फूल की तरह भारहीन
गीत की तरह कोमल
उस औरत की गोद में।

लाख-लाख औरतों की गोद में
धरती की गोद में
पुरानी, बहुत पुरानी कब्र की तरह।

रचनाकाल : 16.08.1979

इच्छा

मैं मरूँ दिल्ली की बस में
पायदान पर लटक कर नहीं
पहिये से कुचलकर नहीं
पीछे घसिटता हुआ नहीं
दुर्घटना में नहीं
मैं मरूँ बस में खड़ा-खड़ा
भीड़ में चिपक कर
चार पाँव ऊपर हों
दस हाथ नीचे
दिल्ली की चलती हुई बस में मरूँ मैं

अगर कभी मरूँ तो
बस के बहुवचन के बीच
बस के यौवन और सोन्दर्य के बीच
कुचलकर मरूँ मैं
अगर मैं मरूँ कभी तो वहीं
जहाँ जिया गुमनाम लाश की तरह
गिरूँ मैं भीड़ में
साधारण कर देना मुझे है जीवन!

रचनाकाल : 20.09.1983

मेरी बेटी 

मेरी बेटी बनती है
मैडम
बच्चों को डाँटती जो दीवार है
फूटे बरसाती मेज़ कुर्सी पलंग पर
नाक पर रख चश्मा सरकाती
(जो वहाँ नहीं है)
मोहन
कुमार
शैलेश
सुप्रिया
कनक
को डाँटती
ख़ामोश रहो
चीख़ती
डपटती
कमरे में चक्कर लगाती है
हाथ पीछे बांधे
अकड़ कर
फ़्राक के कोने को
साड़ी की तरह सम्हालती
कापियाँ जाँचती
वेरी पुअर
गुड
कभी वर्क हार्ड
के फूल बरसाती
टेढ़े-मेढ़े साइन बनाती

वह तरसती है
माँ पिता और मास्टरनी बनने को
और मैं बच्चा बनना चाहता हूँ
बेटी की गोद में गुड्डे-सा
जहाँ कोई मास्टर न हो!

रचनाकाल : 21.08.1983

सड़क पार करने वालों का गीत 

महामान्य महाराजाधिराजाओं के
निकल जाएँ वाहन
आयातित राजहंस
कैडलक, शाफ़र, टोयेटा
बसें और बसें
टैक्सियाँ और स्कूटर
महकते दुपट्टे
टाइयाँ और सूट

निकल जाएँ ये प्रतियोगी
तब हम पार करें सड़क
मन्त्रियों, तस्करों
डाकुओं और अफ़सरों
की निकल जाएँ सवारियाँ
इनके गरुड़
इनके नन्दी
इनके मयूर
इनके सिंह
गुज़र जाएँ तो सड़क पार करें

यह महानगर है विकास का
झकाझक नर्क
यह पूरा हो जाए तो हम
सड़क पार करें
ये बढ़ लें तो हम बढ़ें
ये रेला आदिम प्रवाह
ये दौड़ते शिकारी थमें
तो हम गुज़रें।

अरहर की दाल

कितनी स्वादिष्ट है
चावल के साथ खाओ
बासमती हो तो क्या कहना
भर कटोरी
थाली में उड़ेलो
थोड़ा गर्म घी छोड़ो
भुनी हुई प्याज़
लहसन का तड़का
इस दाल के सामने
क्या है पंचतारा व्यंजन
उँगली चाटो
चाकू चम्मच वाले
क्या समझें इसका स्वाद!

मैं गंगा में लहर पर लहर
खाता डूबता
झपक और लोरियाँ
हल्की-हल्की
एक के बाद एक थाप
नींद जैसे
नरम जल
वाह रे भोजन के आनन्द
अरहर की दाल
और बासमती
और उस पर तैरता थोड़ा सा घी!

रचनातिथि : 18 जनवरी 1982

पड़ताल 

सर्वहारा को ढूँढ़ने गया मैं
लक्ष्मीनगर और शकरपुर
नहीं मिला तो भीलों को ढूँढ़ा किया
कोटड़ा में
गुजरात और राजस्थान के सीमांत पर
पठार में भटका
साबरमती की तलहटी
पत्थरों में अटका
लौटकर दिल्ली आया

नक्सलवादियों की खोज में
भोजपुर गया
इटाढ़ी से धर्मपुरा खोजता फिरा
कहाँ-कहाँ गिरा हरिजन का ख़ून
धब्बे पोंछता रहा
झोपड़ी पे तनी बंदूक
महंत की सुरक्षा देखकर
लौट रहा मैं
दिल्ली को

बंधकों की तलाश ले गई पूर्णिया
धमदहा, रूपसपुर
सुधांशु के गाँव
संथालों-गोंडों के बीच
भूख देखता रहा
भूख सोचता रहा
भूख खाता रहा
दिल्ली आके रुका

रींवा के चंदनवन में
ज़हर खाते हरिजन आदिवासी देखे
पनासी, झोटिया, मनिका में
लंगड़े सूरज देखे
लंगड़ा हल
लंगड़े बैल
लंगड़ गोहू, लंगड़ चाउर उगाया
लाठियों की बौछार से बचकर
दिल्ली आया

थमी नहीं आग
बुझा नहीं उत्साह
उमड़ा प्यार फिर-फिर
बिलासपुर
रायगढ़
जशपुर
पहाड़ में सोने की नदी में
लुटते कोरबा देखे
छिनते खेत
खिंचती लंगोटी देखी
अंबिकापुर से जो लगाई छलाँग
तो गिरा दिल्ली में

फिर कुलबुलाया
प्यार का कीड़ा
ईंट के भट्ठों में दबे
हाथों को उठाया
आज़ाद किया
आधी रात पटका
बस-अड्डे पर ठंड में
चौपाल में सुना दर्द
और सिसकी
कोटला मैदान से वोट क्लब तक
नारे लगाता चला गया
`50 लाख बंधुआ के रहते
भारत माँ आज़ाद कैसे´
हारा-थका लौटकर
घर को आया

रवाँई गया पहाड़ पर चढ़ा
कच्ची पी बड़कोट पुरोला छाना
पांडवों से मिला
बहनों की खरीद देखी
हर बार दौड़कर
दिल्ली आया !

भागो 

दुनिया के बच्चो
बचो और भागो
वे पीछे पड़े हैं तुम्हारी
खाल खींचने को
हड्डियाँ नोचने को

बड़े तुम्हें घेर रहे हैं
हीरे की तरह जड़ रहे हैं
ठोक-पीट कर कविता में

बच्चो, पेड़, चिड़ियो
रोटी और पहाड़ो
भागो
क्रान्ति तुम छिपो
हिन्दी के कवि आ रहे हैं
काग़ज़ और क़लम की सेना लिए
भागो जहाँ हो सके छिपो।

रचनाकाल : 21.04.1981

खिड़की

उसकी खिड़की पर
लोहे की सलाख को
पहली बार
लपेटा
अँखुए ने।

ओह! बेल
यह क्या किया!
नवजात
गंधाते
मृणाल को
तूने लपेटा सलाख से।

किसके गले में डाल दँ
ये आदिवासी बाहें!

रचनाकाल : 1967

रेल की पटरी

रेल की पटरी हो सुनसान
चांद आज नहीं निकले
कुत्ते भूँकते हों दूर
भगवान ग्लास फ़ैक्टरी का भोंपू
बोलने में देर हो
दूर-दूर तक कुछ नहीं
सिर्फ़ अंधेरा
ऐसे में वह
बस्ती से दूर आए
सूनी पटरी पर बैठे
फिर खड़ा हो और
मुँह भर पुकारे
नहीं सुनेगी तू।

रचनाकाल : 1967

अँकुर

1.
अँकुर जब सिर उठाता है
ज़मीन की छत फोड़ गिराता है
वह जब अन्धेरे में अंगड़ाता है
मिट्टी का कलेजा फट जाता है
हरी छतरियों की तन जाती है कतार
छापामारों के दस्ते सज जाते हैं
पाँत के पाँत
नई हो या पुरानी
वह हर ज़मीन काटता है
हरा सिर हिलाता है
नन्हा धड़ तानता है
अँकुर आशा का रँग जमाता है ।

2.
क्या से क्या हो रहा हूँ
छाल तड़क रही है
किल्ले फूट रहे हैं
बच्चों की हंसी में
मुस्करा रहा हूँ
फूलों की पाँत में

गा रहा हूँ ।

सुबह दे दो 

मुझे मेरी सुबह दे दो
सुबह से कम कुछ भी नहीं
सूरज से अलग कुछ भी नहीं
लाल गर्म सूरज
जोंक और मकोड़ों को जलाता हुआ
सुबह से कम कुछ भी नहीं ।

(1978)

बीज

मैं आदिम अंधेरे में
बीज की तरह
सुगबुगाना चाहता हूँ
आकाश और पृथ्वी से बाहर
माँ के गर्भ में
एक बूंद की तरह
आँख मलना चाहता हूँ
मैं एक महान नींद से
भयंकर आनन्द और
विस्मय में जगना चाहता हूँ।

रचनाकाल : 11.12.1976

कैरम बोर्ड

काली और सफ़ेद गोट
हमेशा लड़ती नहीं रहेंगी
अलग-अलग नहीं रहेंगी
’क्वीन’ का साम्राज्य डूबेगा
चार पाकेटॊं के समुद्र में
लाशें नहीं उतराएंगी
काली और सफ़ेद।

रचनाकाल : 1976

दराज़ 

बीच की दराज मेम बन्द हूं ।
ऊपर होता हूं तो
पैर टूटता है
नीचे सरकता हूं
सिर फूटरा है ।
मैं कहां जाऊं !
क्या करूं !
कैसे रहूं इस अन्धेरे में !
कब तक काग़ज़ों से पिचका हुआ !

दराज़ की हत्थी टूटी हुई है
कोई है
जो खींचकर निकाले
बेहत्थी दराज़ को
मैदान बना दे
मुझे हवा की दुनिया में
गुब्बारे-सा उड़ा दे ।

रचनाकाल : 25.09.1978

सलाह 

शेर को सलाह दी
खरगोश ने
शेर हिरन को खा गया
भेडियों को भगा दिया
खा गया नील गाय को

शेर को सलाह दी खरगोश ने
वह हाथी को मार आया
सुनसान हो गया सारा जंगल
कुछ नहीं बचा खाने को
भाँय-भाँय कर रहा था
शेर के पेट का कुआँ
उसने पुकारा खरगोश को
वह अपने सदाबहार बिल से
बाहर आया
शेर उसे चट कर गया ।

जब चली रेल 

जब चली रेल तो रुलाई आई!
छूट रही है दिल्ली,
खुसरो का पीहर।
निजामुद्दीन औलिया,
यमुना पुल, मिंटो ब्रिज और
प्रगति मैदान।
छूट रहा है घर, अपना जीवन,
जब चली रेल तो वर्षा आई,
गलने लगी स्मृति, झपने लगी आँख
दिल्ली! बहुत याद आई।

रचनाकाल : 03.07.1990

प्रस्ताव 

वह प्रस्ताव हूँ
जो पारित नहीं हुआ
रदी में फेंक दो उसे।

रचनाकाल : 16.04.1984

पीला पत्ता 

पीला पत्ता हूँ
हवा ने गिरा दिया
उम्र ने ढहा दी अवैध दीवार
खिले ओ फूल
हरा एक
दूसरा लाल
फूल हिले डाल पर
मुझे बीच से हटा इया
पीला पत्ता हूँ
काँपता गिरा
धूल ने
धूल में
मिला लिया।

रचनाकाल : 09.11.1984

आँख भर 

आँख भर देखा कहाँ!
जी भर पिया कहाँ!
घाटी को
धानी खेत
लहराती नदी
कि पुल से
गुज़र गई रेल

रचनाकाल : 22.11.1984

मातृभाषा

क्या है मातृभाषा ?
पूछा गया गूंगे लड़के से
क्या बताए वह !

लड़का जानता है मां को
भाषा को नहीं जानता
रोमन और नागरी
नहीं पहचानता ।

पूछता है लड़का —
“मां, क्या है मातृभाषा ?”
समझा नहीं पाती मां
सिर खुजाता है लड़का
फिर लिखता है अंग्रेज़ी में —

“मैडम
मुझे नहीं मालूम
माता-पिता की भाषा ।”

रचनाकाल : 28.03.1987

झरना

वह पहाड़ से छलाँग लगा रहा है
उत्साह घाटी से मिलने को दौड़ा
सफ़ेद रंग दहाड़ रहा है।

दूध पीता हुआ बच्चा 

ख़ून के खेत में
क्या कर रहा है?
करोड़ों वर्ष पुराने कारख़ाने में
मुँह छिपाए
क्या कर रहा है?
माँ की गोदी में पाँव पटकता
क्या कर रहा है वहाँ
वात्सल्य के भँवर में तैरता

भूख के विरुद्ध
गुप्त कार्रवाई कर रहा है
बच्चा।

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