इब्राहीम ‘अश्क़’ की रचनाएँ

आशना मिलते नहीं अहल-ए-वफ़ा

आशना मिलते नहीं अहल-ए-वफ़ा मिलते नहीं
शहर है आबाद लेलिन दिल-रुबा मिलते नहीं

किससे हम यारी करें किससे निभाएँ दोस्ती
सैकड़ों में एक दो भी ख़ुश-नवा मिलते नहीं

हम परस्तार-ए-वफ़ा बन कर अकेले रह गए
ये मगर अच्छा हुआ अब बे-वफ़ा मिलते नहीं

हम-ख़याली है ज़रुरी गुफ़्तगू के वास्ते
हम-सफ़र मिलते हैं लाखों हम-नवा मिलता नहीं

सब बुजुर्गों से दुआ लेने की तहज़ीब नहीं मिटी
इसलिए राहों में अब अहल-ए-दुआ मिलते नहीं

‘अश्क’ अपने दौर का हमसे करिश्मा पूछिए
राह-ज़न मिलते हैं सारे रह-नुमा मिलते नहीं.

देखा तो कोई और था सोचा तो कोई और

देखा तो कोई और था सोचा तो कोई और
अब आ के मिला और था चाह तो कोई और

उस शख्श के चेहरे में कई रंग छुपा था
चुप था तो कोई और था बोला तो कोई और

दो-चार क़दम पर हीं बदलते हुए देखा
ठहरा तो कोई और था गुज़रा तो कोई और

तुम जान के भी उस को न पहचान सकोगे
अनजाने में वो और है जाना तो कोई और

उलझन में हूँ खो दूँ के उसे पा लूँ करूँ क्या
खोने पे कुछ और है पाया तो कोई और

दुश्मन भी है हम-राज़ भी अंजान भी है वो
क्या ‘अश्क’ ने समझा उसे वो था तो कोई और

दुनिया लुटी तो दूर सर तकता ही रह गया

दुनिया लुटी तो दूर सर तकता ही रह गया
आँखों में घर के ख्वाब का नक्शा ही रह गया

उसके बदन का लोच था दरिया की मौज में
साहिल से मैं बहाव को तकता हीं रह गया

दुनिया बहुत क़रीब से उठ कर चली गई
बैठा मैं अपने घर में अकेला ही रह गया

वो अपनी अक्स भूल के जाने लगा तो मैं
आवाज़ दे के उसको बुलाता हीं रह गया

हम-राह उसकी सारी बहारें चली गईं
मेरी जबां पे फूल का चर्चा ही रह गया

कुछ इस अदा से आ के मिला हँ से ‘अश्क’ वो
आँखों में जज़्ब हो के सरापा ही रह गया.

गुलशन में लेके चल किसी सहरा

गुलशन में लेके चल किसी सहरा में ले के चल
ऐ दिल मगर सुकून की दुनिया में ले चल

कोई तो होगा जिसको मेरा इंतज़ार है
कहना है दिल के शहर-ए-तमन्ना में ले के चल

ये प्यास बुझ न पाई तो मैं डूब जाउँगा
साहिल से दूर तो मुझे दरया में ले के घल

पहचानता नहीं है मेरा नाम ‘कैस’ है
ऐ खिज़्र-ए-राह कूचा-ए-लैला में ले के चल

करे सलाम उसे तो कोई जवाब न दे 

करे सलाम उसे तो कोई जवाब न दे
इलाही इतना भी उस शख्स को हिज़ाब न दे

तमाम शहर के चेहरों को पढ़ने निकला हूँ
ऐ मेरे दोस्त मेरे हाथ में क़िताब न दे

गज़ल के नाम को बदनाम कर दिया उसने
कुछ और दे मेरे साक़ी मुझे शराब न दे

मैं तुझ को देख के तेरे भरम को जान सकूँ
इक आदमी हूँ ज़रा सोच ऐसी ताब न दे

वो न मिल पाए अगर मुझको इस ज़माने में
तो ऐसी हूर का दुनिया में कोई ख़्वाब न दे

ये मेरे फन की तलब है कि दिल की बात कहूँ
वो ‘अश्क’ दे के ज़माने को को इंकिलाब न दे.

जब मेरी हक़ीक़त जा जा कर, उन को जो सुनाई लोगों ने 

जब मेरी हक़ीक़त जा जा कर, उन को जो सुनाई लोगों ने
कुछ सच भी कहा, कुछ झूठ कहा, कुछ बात बनाई लोगों ने

ढाये हैं हमेशा ज़ुल्म-ओ-सितम, दुनिया ने मुहब्बत वालों पर
दो दिल को कभी मिलने न दिया, दीवार उठाई लोगों ने

आँखों से न आँसू पोंछ सके, होंठों पे ख़ुशी देखी न गई
आबाद जो देखा घर मेरा, तो आग लगाई लोगों ने

तनहाई का साथी मिल न सका, रुस्वाई में शामिल शहर हुआ
पहले तो मेरा दिल तोड़ दिया, फिर ईद मनाई लोगों ने

इस दौर में जीना मुश्किल है, ऐ ‘अश्क़’ कोई आसान नहीं
हर इक क़दम पर मरने की, अब रस्म चलाई लोगों ने

कुछ दूर हमारे साथ चलो हम दिल की कहानी कह देंगे 

कुछ दूर हमारे साथ चलो हम दिल की कहानी कह देंगे
समझे न जिसे तुम आँखों से वो बात ज़ुबानी कह देंगे

जो प्यार करेंगे जानेंगे हर बात हमारी मानेंगे
जो ख़ुद न जले हों उल्फ़त में वो आग को पानी कह देंगे

जब प्यास जवाँ हो जायेगी एहसास की मंज़िल पायेगी
ख़ामोश रहेंगे और तुम्हें हम अपनी कहानी कह देंगे

इस दिल में ज़रा तुम बैठो तो कुछ हाल हमारा पूछो तो
हम सादा दिल हैं ‘अश्क’ मगर हर बात पुरानी कह देंगे

मेरी आँखों में देख के तारे सितारे सारे शर्मा गये

मेरी आँखों में देख के तारे सितारे सारे शर्मा गये
पर सजनी ने हाल न पूछा और समझाने सब आ गये

दिन सूने हैं रातें वीरान इक इक लम्हा आज परेशाँ
तेरी याद के काले साये शबों पर भी अब छा गये

आह भी अब कुछ काम न आये प्यास बढ़े और जाम न आये
ऐसी प्रीत की रीत निभा के सनम हम पछता गये

Share