इरफ़ान सत्तार की रचनाएँ

ब-ज़ोम-ए-अक़्ल ये कैसा गुनाह मैं ने किया 

ब-ज़ोम-ए-अक़्ल ये कैसा गुनाह मैं ने किया
इक आईना था उसी को सियाह मैं ने किया

ये शहर-ए-कम-नज़राँ ये दयार-ए-बे-हुनराँ
किसे ये अपने हुनर का गवाह मैं ने किया

हरीम-ए-दिल को जलाने लगा था एक ख़याल
सो गुल उसे भी ब-इक सर्द आह मैं ने किया

वही यक़ीन रहा है जवाज़-ए-हम-सफ़ारी
जो गाह उस ने किया और गाह मैं ने किया

बस एक दिल ही तो है वाक़िफ़-ए-रुमूज़-ए-हयात
सो शहर-ए-जाँ का उसे सरबराह मैं ने किया

हर एक रंज उसी बाब में किया है रक़म
ज़रा सा ग़म था जिसे बे-पनाह मैं ने किया

ये राह-ए-इश्क़ बहुत सहल हो गई जब से
हिसार-ए-ज़ात को पैवंद-ए-राह मैं ने किया

ये उम्र की है बसर कुछ अजब तवाज़ुन से
तेरा हुआ न ही ख़ुद से निबाह मैं ने किया

ख़िरद ने दिल से कहा तू जुनूँ-सिफ़त ही सही
न पूछ उस की के जिस को तबाह मैं ने किया

छलक रही है जो मुझ में वो तिश्नगी ही न हो 

छलक रही है जो मुझ में वो तिश्नगी ही न हो
वो शय जो दिल में फ़रावाँ है बे-दिली ही न हो

गुज़र रहा है तू किस से गुरेज़ करता हुआ
ठहर के देख ले ऐ दिल कहीं ख़ुशी ही न हो

तेरे सुकूत से बढ़ कर नहीं है तेरा सुख़न
मेरा सुख़न भी कहीं मेरी ख़ामोशी ही न हो

मैं शहर-ए-हिज्र से तेरी तरफ ही लौटूँगा
ये और बात के अब मेरी वापसी ही न हो

वो आज मुझ से कोई बात कहने वाला है
मैं डर रहा हूँ के ये बात आख़िरी ही न हो

न हो वो शख़्स मिज़ाजन ही सर्द-महर कहीं
मैं बे-रुख़ी जिसे कहता हूँ बे-हिसी ही न हो

ये क्या सफ़र है के जिस की मसाफ़तें गुम हैं
अजब नहीं के मेरी इब्तिदा हुई ही न हो

हर ऐतबार से रहता है बा-मुराद वो दिल
उमीद जिस ने कभी इख़्तियार की ही न हो

अजीब है ये मेरी ला-तअल्लुक़ी जैसे
जो कर रहा हूँ बसर मेरी ज़िंदगी ही न हो

ये शोलागी तो सिफ़त है अलम-नसीबों की
जो ग़म न हो तो किसी दिल में रौशनी ही न हो

कहीं ग़ुरूर का पर्दा न हो ये कम सुख़नी
ये इज्ज़ अस्ल में एहसास-ए-बरतरी ही न हो

मेरे सुपुर्द किया उस ने फ़ैसला अपना
ये इख़्तियार कहीं मेरी बे-बसी न हो

देख मस्ती वजूद की मेरी

देख मस्ती वजूद की मेरी
ता अबद धूम मच गई मेरी

तू तवज्जोह इधर करे न करे
कम न होगी सुपुर्दगी मेरी

दिल मेरा कब का हो चुका पत्थर
मौत तो कब की हो चुकी मेरी

अब तो बर्बाद कर चुके ये कहो
क्या इसी में थी बेहतरी मेरी

मेरे ख़ुश-रंग ज़ख़्म देखते हो
यानी पढ़ते हो शाएरी मेरी

अब तेरी गुफ़्तुगू से मुझ पे खुला
क्यूँ तबीअत उदास थी मेरी

दिल में अब कोई आरज़ू ही नहीं
यानी तकमील हो गई मेरी

ज़िंदगी का मआल इतना है
ज़िंदगी से नहीं बनी मेरी

चाँद हसरत-ज़दा सा लगता है
क्या वहाँ तक है रौशनी मेरी

धूप उस की है मेरे आँगन में
उस की छत पर है चाँदनी मेरी

इक महक रोज़ आ के कहती है
मुंतज़िर है कोई गली मेरी

जाने कब दिल से आँख तक आ कर
बह गई चीज़ क़ीमती मेरी

अब मैं हर बात भूल जाता हूँ
ऐसी आदत न थी के थी मेरी

रात भर दिल में ग़ुल मचाती है
आरज़ू कोई सर-फिरी मेरी

मेरी आँखों में आ के बैठ गया
शाम-ए-फ़ुर्क़त उजाड़ दी मेरी

पहले सीने में दिल धड़कता था
अब धड़कती है बे-दिली मेरी

क्या अजब वक़्त है बिछड़ने का
देख रुकती नहीं हँसी मेरी

ख़ुद को मेरे सुपुर्द कर बैठा
बात तक भी नहीं सुनी मेरी

तेरे इंकार ने कमाल किया
जान में जान आ गई मेरी

ख़ूब बातें बना रहा था मगर
बात अब तक नहीं बनी मेरी

मैं तो पल भर जिया नहीं ‘इरफ़ान’
उम्र किस ने गुज़ार दी मेरी

ख़ुश-मिज़ाजी मुझ पे मेरी बे-दिली का जब्र है

ख़ुश-मिज़ाजी मुझ पे मेरी बे-दिली का जब्र है
शौक़-ए-बज़्म-आराई भी तेरी कमी का जब्र है

कौन बनता है किसी की ख़ुद-सताई का सबब
अक्स तो बस आईने पर रौशनी का जब्र है

ख़्वाब ख़्वाहिश का अदम इस बात का ग़म विसाल का
ज़िंदगी में जो भी कुछ है सब किसी का जब्र है

अपने रद होने का हर दम ख़ौफ़ रहता है मुझे
ये मेरी ख़ुद-एतमादी ख़ौफ़ ही का जब्र है

कार-ए-दुनिया के सिवा कुछ भी मेरे बस में नहीं
मेरी सारी काम-याबी बे-बसी का जब्र है

मैं कहाँ और बे-सबाती का ये हँगामा कहाँ
ये मेरा होना तो मुझ पर ज़िंदगी का जब्र है

ये सुख़न ये ख़ुश-कलामी दर-हक़ीक़त है फ़रेब
ये तमाशा रूह की बे-रौनक़ी का जब्र है

जिस का सारा हुस्न तेरे हिज्र ही के दम से था
वो तअल्लुक अब तेरी मौजूदगी का जब्र है

शहर-ए-दिल की राह में हाइल हैं ये आसाइशें
ये मेरी आसूदगी कम-हिम्मती का जब्र है

जब्र की ताबे है हर कैफ़ियत-ए-उम्र-ए-रवाँ
आज का ग़म जिस तरह कल की ख़ुशी का जब्र है

कुछ नहीं खुलता मेरे शौक़-ए-तसर्रुफ़ का सबब
शौक़-ए-सैराबी तो मेरी तिश्नगी का जब्र है

जो सुख़न इम्कान में है वो सुख़न है बे-सुख़न
ये ग़ज़ल तो कुछ दिनों की ख़ामोशी का जब्र है

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