इला प्रसाद की रचनाएँ

अस्वीकृति

मैं तलछट सी निकालकर
फेंक दी गई हूँ
किनारे पर
लहरों को मेरा
साथ बहना
रास नहीं आया

मैं न शंख थी
न सीपी
कि चुन ली गई होती
किन्ही उत्सुक निगाहों से
रेत थी
रेत सी रौंदी गई
काल के क्रूर हाथों से

शुरूआत 

जब भी सुबह शुरूआत हुई
अँधेरे में हुई
अँधेरे से उजाले तक पहुँची
फिर वापस अँधेरे में लौटकर
गुम हो गई
फिर थके-हारों पैरों को सहलाया
कतरा-कतरा साहस जुटाया
कदम बढ़ाए…..
कि एक और शुरूआत तो
करनी ही होगी
क्या पता इस बार
मेरे हिस्से का सूरज
मेरी पकड़ में आ जाय
अँधेरे का यह सफ़र
निर्णायक हो जाय

कपास 

आसमान की नीली चादर पर
बादलों की कपास धुनकर
किसने ढेरियाँ लगाई हैं ?

मैंने आँखों ही आँखों में
माप लिया पूरा आकाश
रूई के गोले उड़ते थे
यत्र-तत्र-सर्वत्र
नयनाभिराम था दृश्य

मैं सपनों के सिक्के लिए
बैठी रही देर तक
बटोरने को बेचैन
बादलों की कपास
झोली भर

लेकिन कोई रास्ता
जो आसमान को खुलता हो
नज़र नहीं आया……..

होली आ गई 

अंगड़ाई ले रही है प्रकृति नटी की देह
होली आ गई!
बौराई हवा दे गई सन्देश,
होली आ गई!

जल उठे जंगल में पलाश
जागी है मन में नई आस,
मुस्कराए अमलतास।
होली आ गई!

जल गया जो था अशुभ
असुन्दर, अतीत।
मन में रच गई नई प्रीत
होली आ गई!

रंगों की भरकर पिचकारी
साजन ने मुझपर मारी
बोले, तू क्यों खड़ी मुँह फेर?
होली आ गई!

द्वीप

आस्था की नदी में
विश्वास का द्वीप था
उसी द्वीप पर तो मैं
चुनौती देती निगाहों को
निरस्त करती
अकेली खड़ी थी

इंधन

यादों के उपलों में
अब एक भी कच्चा उपला नहीं
जो जले देर तक
और धुआँ देता रहे
कि आकांक्षाओं की नाक में पानी
और आँखों में जलन हो
गले में ख़राश
और थोड़ी देर के लिए ही सही
वे खामोश हो जाएं
वक़्त की आग ने
सब जलाकर राख कर दिया

अब नया इंधन जुटाना ही पड़ेगा
ज़िंदगी के लिए

तलाश

सुनो,
तुम कुछ तो बोलो
न बोलने से भी
बढ़ता है अँधेरा।
हम कब तक अपने-अपने अँधेरे में बैठे,
अजनबी आवाजों की
आहटें सुने!
इंतजार करें
कि कोई आए
और तुमसे मेरी
और मुझसे तुम्हारी
बात करे।
फ़िर धीरे-धीरे पौ फ़टे
हम उजाले में एक दूसरे के चेहरे पहचानें
जो अब तक नहीं हुआ
तब शायद जानें
कि हममें से कोई भी गलत नहीं था।

परिस्थितियों के मारे हम
गलतफ़हमियों के शिकार बने
अपनी ही परिधि में
चक्कर काटते रहे हैं।

कहीं कुछ फ़ंसता है
रह-रह कर लगता है
कौन जाने!
बिन्दु भर की ही हो दूरी,
कि हम अपनी अपनी जगह से
एक कन आगे बढ़े
और पा जायें वह बिन्दु
जहाँ दो असमान वूत्त
परस्पर
एक -दूसरे को काटते है!

सच कहना
तुम्हें भी उसी बिन्दु की तलाश है ना?

यात्रा

अंधेरे और उदासी की बात करना
मुझे अच्छा नहीं लगता।

निराशा और पराजय का साथ करना
मुझे अच्छा नहीं लगता,

इसीलिए यात्रा में हूँ।
अंधेरे में उजाला भरने
और पराजय को जय में बदलने के लिए
चल रही हूँ लगातार।

ठंड

दरवाज़ा खोला
तो ठंड दरवाज़े पर,
बाँहें खोले –
आगे बढ़,
भेंटने को तैयार।

हवा घबराई-सी
इधर उधर पत्ते बुहारती,
ख़बरदार करती
घूम रही थी।

निकलूँ न निकलूँ का असमंजस फलाँग
मैं जैसे ही आई
ठंड के आगोश में
एक थप्पड़ लगा
झुँझलाई हुई हवा का –
“मना किया था न!”

और सूरज –
बादलों को भेद,
मुसकुरा उठा!

क़िताब

कम्प्यूटर के सामने बैठकर
पत्र, पत्रिकाएँ पढ़ते
सीधे- कुबड़े, बैठे- बैठे
जब अकड़ जाती है देह
दुखने लगती है गर्दन
धुँधलाने लगते हैं शब्द
और गड्ड्मड्ड होने लगती हैं तस्वीरें
तो बहुत जरूरी लगता है
किताब का होना ।

किताब,
जिसे औंधे – लेटे
दीवारों से पीठ टिकाए
कभी भी, कहीं भी
गोदी में लेकर
पढ़ा जा सकता था
सीएडी (कम्प्यूटर एडेड डिसीज़) के तमाम खतरो को
नकारते हुए ।

किताब जो जाने कब
चुपके से
गायब हो गई
मेरी दुनिया से
बहुत याद आई आज !

प्रवासी का प्रश्न

हम ,
जो चले गए थे
अपनी जड़ों से दूर,
लौट रहे हैं वापस
अपनी जड़ों की ओर

और हैरान हैं यह देखकर
कि तुमने तो
हमारी शक्ल अख्तियार कर ली है

अब हम अपने को
कहाँ ढ़ूँढ़ें ?

संदेश 

दो देशों की दूरियाँ लाँघकर
आज जब अचानक
तुम्हारा संदेशा आया
मैंने जाना
कि समय की सीपी से
याद का मोती निकाल
वह जो मैंने गूँथी थी
नेह के धागे से,
वह सच्चे मोतियों की माला थी।

अंतर 

मैंने पलाश की एक डाली हिलाई
और झर गया मेरी गोदी में
अथाह सौंदर्य!
तुम मर मिटे
पुरुष हो!
मैं चुपचाप निखरती रही
सुगंध तलाशती रही
स्त्री हूँ न!

दीमक

वक्त का दीमक
मेरे अक्षरों को चाट जाए
इससे पहले ही
दिखला देनी होगी इन्हें
दोपहर की धूप।

सीख लें ये भी,
आँच में तपना।
वक्त की कसौटी पर चढ़कर,
खरा उतरना।
धूप में चमकना।
किसी के हिस्से का सूरज बन कर,
राह में,
रोशनी-सा बरसना।

वक्त का दीमक
मेरे अक्षरों को लगे
इससे पहले ही
मैं दिखला लाऊँगी इन्हें
सुबह की धूप।

बाकी कुछ

एक बार फिर मैं
दूर हूँ सबसे
नंगे पाँव चलती हूँ
अहसासों की कच्ची सड़क पे
अपनी ही सोच की दीवार तले
पली बढ़ी मैं
हर बार अलग हो जाती हूँ सबसे
अकेलेपन का दर्द
छोटा पड़ जाए
अगर मैं अपनी सोच को सार्थक कर सकूँ
लेकिन मेरी सोच का सार्थक होना अभी बाकी है
बाकी है अकेलापन
कुछ चोटें, कुछ रिस रहे घाव
तब भी
सबसे जुड़ने, सबके देने,
सबसे पाने का सपना
अभी बाकी है
पूरा होगा कभी सपना मेरा
या सबसे जुड़कर भी
अलग थलग पड़ जाऊँगी मैं
ज़िंदगी के इस मोड़ का
हिसाब अभी बाकी है

मूल्य 

आवाज़ें आपस ही में टकराने लगी थीं।
मुझी तक लौट आने लगी थीं।
मेरा विश्वास खोने लगा था,
मुझे बार-बार शक होने लगा था।

ऐसा क्यों होता है?
आवाज़ें गूँज कर रह जाती हैं!
कहीं जाने से पहले ही
लौट आती हैं।

प्रतिध्वनियाँ परेशान करती रहीं…
मैं एक विश्वास को ढोती रही

एक आकाश था मेरा विश्वास
निर्दोष, खूबसूरत।
अछोर, आधारहीन
मुझ ही को छलता रहा।

मैं समझ पाई नहीं
अपने शक को बेमानी मान
बार-बार
जुड़ने की कोशिश में
जुड़ाव भी भ्रम पालती रही।

मोह नहीं नेह
जो बाँधती नहीं
बाँधकर मुक्त करता है
सीमाएँ जोड़ी नहीं जाती
तोड़कर मुक्त हुआ जाता है
वो कैसा प्यार है
जो मुक्त नहीं करता?

यों बार-बार खुद ही को समझाती
अपने प्यार पर फूली न समाती
मैं कहाँ-कहाँ आती जाती
इस अहसास को समेटे रही

कि तुम्हारा होना तो ऐसा ही है न
जैसा साँसें लेना?
होकर भी न होना
न होकर भी होना।

कितने कोरे सपने थे
कितने झूठे विश्वास
जिनके सहारे
आज तक चलती रही थी

खुद पर चकित हूँ
कि कैसे शांत हूँ
या उदभ्रांत हूँ!
कि वहाँ पहुँचकर भी
जहाँ सारे रास्ते डेड एंड बन जाते हैं
मौन हूँ
कौन हूँ?

पाना चाहा नहीं, पाया था।
मन छूटना चाहकर भी
कब छूट पाया था!
अनजाने ही खड़ी थी
प्रतीक्षारत
कि कोई सच हो ऐसा
जो मुझे तोड़ दे
झकझोरे, जगाए
और एक ओर मोड़ दे।

पर न झकझोरी गई हूँ
न जगाई गई हूँ
हालाँकि कितने मोड़ों से
आई गई हूँ।

और आज भी मौन हूँ
प्यार के उस एक तूफ़ान के बाद,
बाद के इन सारे तूफ़ानों को
अर्थहीन करता मेरा मन
अब और कोई भी मूल्य
नहीं चुकाएगा

रास्ते 

अपने पाँवों से चली
तो जाना
रास्ते कितने लंबे हैं
वरना कब, इस तरह, अकेले,
घर से निकलना हुआ था!

विश्वास 

सूई की नोक भर विश्वास था मन में।
सूई की नोक पर बैठी रही रात भर।
चुभता रहा मन में अपना ही विश्वास
सहती गई रात भर।

सूरज 

मैं सूरज की ओर हाथ बढ़ाती हूँ
मेरी हथेलियाँ
नाप नहीं पातीं
उसकी गोलाई को
मेरी उँगलियाँ
छोटी पड़ती हैं
उसे छूने के लिए
तब मेरे पेशानी पर
सूरज का स्पर्श था!
भोर की उजली धूप में नहाई
मैं खिलखिलाती
और सूरज
मेरी मुट्ठियों में
होता था
किसी गेंद की तरह।
फिर एक दिन अनजाने ही
मैंने वह गेंद एक ओर
उछाल दी
और वह घूमकर
वक्त की झाड़ियों में खो गई
मुझे नहीं मालूम।
या कि सूरज खुद ही
निकल गया
पारे की तरह
मेरी हथेलियों को भेद कर
मैंने नहीं जाना।
शायद, सारा कुछ
इतनी आसानी से नहीं हुआ।
किस्तों में मिले दर्द को
मैंने किस्तों में ही जिया।
मेरी हथेलियाँ काँपीं
और सूरज मेरी मुट्ठियों से
फिसलता चला गया…
अगली सुबह
मेरी मुट्ठियाँ खाली थीं
और सूरज क्षितिज पर।
फिर सहसा बहुत बड़ा हो आया सूरज
मेरी हथेलियों के लिए…
तब से लगातार
मैं सूरज का बड़ा होते जाना देख रही हूँ
जड़, अपलक!

कल रात

कल रात फिर रोया आसमान
कि क्यों बादलों ने चेहरे पर सियाही पोत दी!
सितारे काजल की कोठरी में बैठे बिलखते रहे
नसीब में इतना अन्धेरा बदा था!

हवा शोर मचाती रही
पेड़ सिर धुनते रहे
धरती का दामन भीगता रहा
किसको फ़र्क पड़ा

बादल गरजते रहे
अट्टाहास करते रहे
उन्हें मालूम था
मौसम उनका है।

रोज़ बदलता मौसम

यहां मौसम हर रोज़ बदलता है
और लोगों के मिज़ाज भी ।
एक मौसम इस घर का है
एक मौसम शहर का।

एक मौसम मेरे मन का है
वीतराग …

सोंचती हूँ
कहीं जो बिठा पाती संगति
इन सबके बीच
तो मेरे मन का मौसम
क्या होता?

वहाँ हरदम शायद
वसंत होता!

अँधेरे के कुएँ से 

अँधेरे के कुएँ से
ळगातार बाहर आते हुए
कई बार मुझे लगा है
कि सूरज और मेरे बीच की दूरी
स्थाई है।
वो जो रह रहकर
मेरी आँखें चौंधियाई थीं
वे महज धूप के टुकड़े थे
या रोशनी की छायाएँ मात्र ।

सूरज मेरी आँखों के आगे नहीं आया कभी
भरोसा दिलाने के लिए
जिसे महसूसकर
अक्सर ऊग आता रहा है
मेरी आँखों में
एक पूरा आकाश।

न ही मैंने महसूसा कभी
कि कोई सूरज प्रवाहित है मेरी धमनियों में
मेरे रक्त की तरह
जैसा मैंने कभी कहीं पढ़ा था।

फिलहाल तो
एक अँधेरे से दूसरे अँधेरे तक की दूरी ही
मैंने बार-बार पार की है
और सूरज से अपने रिश्ते को
पहचानने पचाने में ही
सारा वक्त निकल गया है
और मैं खड़ी हूँ
वक्त के उस मोड़ पर अकेली
एक शुरूआत की सम्भावना पर विचार करती
जहाँ से रोशनी की सम्भावनाएँ
समाप्त होती हैं।

सम्बन्ध 

सम्बन्धों को उन्होंने ओढ़ा था
शॉल की तरह
ताकि वक़्त ज़रूरत उन्हें
उतार दें गर्मियों में
और उम्मीद की मुझसे
कि मैं उससे चिपकी रहूं
जाड़ों में स्वेटर की तरह

मासूम हैं लोग
नहीं समझते
कि न शॉल, न स्वेटर
रास आता है मुझे
मुझे तो ठिठुरती ठंड में
अपनी हड्डियों का
कड़ा होते जाना अच्छा लगता है!

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