‘इस्माइल’ मेरठी की रचनाएँ

आगाज़-ए-इश्क़ उम्र का अंजाम हो गया

आगाज़-ए-इश्क़ उम्र का अंजाम हो गया
नाकामियों के ग़म में मिरा काम हो गया।

मेरा निशाँ मिटा तो मिटा पर ये रश्क है
विर्द-ए-ज़बान-ख़ल्क़ तिरा नाम हो गया।

दिल चाक चाक नग़्मा-ए-नाक़ूस ने किया
सब पारा पारा जामा-ए-एहराम हो गया।

अब और ढूँडिए कोई जौलाँ-गह-ए-जुनूँ
सहरा ब-क़द्र-वुसअत-यक-गाम हो गया।

अब हर्फ़-ए-ना-सज़ा में भी उन को दरेग़ है
क्यों मुझको जौक़-ए-लज्ज़त-दुश्राम हो गया।

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