Poetry

उत्कर्ष अग्निहोत्री की रचनाएँ

इस तरह जीने का सामान जुटाता क्यूँ है

इस तरह जीने का सामान जुटाता क्यूँ है।
ख़र्च करना ही नहीं है तो कमाता क्यूँ है।

ये घड़ी तो है प्रभाती को सुनाने की घड़ी,
इस घड़ी मीठी सी लोरी तू सुनाता क्यूँ है।

चाहता है वो कोई काम कराना मुझसे,
वरना मरने से मुझे रोज़ बचाता क्यूँ है।

कौन देखेगा इधर किसको यहाँ फ़ुरसत है,
एक कमरा है इसे इतना सजाता क्यूँ है।

वक्त के शाह की तारीफ़ की ख़ातिर ‘उत्कर्श’,
सर झुकाकर के तू ईमान गिराता क्यूँ है।

हैरान हूँ ये देखके कितना बदल गया 

हैरान हूँ ये देखके कितना बदल गया।
लोहा ज़रा सी आँच में आकर पिघल गया।

बस्ती की आग उसके प्रयासों से बुझ गई,
लेकिन वो शख़्स आग बुझाने में जल गया।

बेटे ने फिर विदेश से आऊँगा कह दिया,
झूँठी तसल्लियों से वो बूढ़ा बहल गया।

गुस्ताखि़याँ भी खूब प्रशंसित हैं इन दिनों,
जीने का आज तौर तरीका बदल गया।

दुनिया की रस्मो राह ने रोका बहुत मगर,
मैं बंदिशों को तोड़कर आगे निकल गया।

शब्दों को शोध-शोध के मैंने रचा जिसे,
वो गीत अन्ततः मेरे जीवन में ढल गया।

मैं चाहता था कानों में भगवत कथा पड़े,
जो भी मिला वो दूजे की निंदा उगल गया।

सुलगती आँच का मन्ज़र है ज़रा ग़ौर करो

सुलगती आँच का मन्ज़र है ज़रा ग़ौर करो,
ये हम सभी का मुकद्दर है ज़रा ग़ौर करो।

इधर जले है दिया खूब अपनी हिम्मत से,
उधर हवा का बवन्डर है ज़रा ग़ौर करो।

दो-चार शेर कहे और तड़प उट्ठे तुम,
यहाँ ग़मों का समन्दर है ज़रा ग़ौर करो।

कभी गलीचों पे चलती थी ग़ज़ल नाज़ुक जो,
मरुस्थलों के सफ़र पर है ज़रा ग़ौर करो।

लिए तो आए हो तुम आइना ‘उत्कर्ष’ मगर,
सभी के हाथ में पत्थर है ज़रा गौर करो।

उसी को आज यहाँ मिल रही सफलता है 

उसी को आज यहाँ मिल रही सफलता है,
जो शख़्स रोज़ ही चेहरे नये बदलता है।

तेरे विशय में कहूँ तो भला कहूँ कैसे,
मैं जब भी देखूँ तो पहलू नया निकलता है।

जगत की पीर जो गाता हो अपने गीतों में,
उसी के कण्ठ से अमृत सदा निकलता है।

कुछ इस तरह से जीता रहा वो मन्दिर में,
कि जैसे मृत्तिका का कोई दीप जलता है।

सभी के सामने ये कह भी मैं नहीं सकता,
वो आईना भले है किन्तु सबको छकता है।

न उससे पूछिए उपचार के विशय में कभी,
वो सर्प है वो सदा ही गरल उगलता है।

उनके हाथों को थाम भूल गए 

उनके हाथों को थाम भूल गए,
उलझने हम तमाम भूल गए।

बैठते थे कभी जो मिल-जुल के,
आज हम ऐसी शाम भूल गए।

राह जिसने दिखाई हम उसको,
चलके दो-चार गाम भूल गए।

हाय, हैलो हुए हैं अभिवादन,
आज हम राम-राम भूल गए।

जब वो आए तो बज़्म में शायर,
पढ़ते-पढ़ते कलाम भूल गए।

आप जब हमसफ़र हुए तब से,
हम भी अपना मक़ाम भूल गए।

देखकर मौत के फ़रिश्ते को,
शाह कुल इंतिज़ाम भूल गए।

ज़िन्दगी को हटा के देख लिया 

ज़िन्दगी को हटा के देख लिया।
घर बहुत कुछ सजा के देख लिया।

ख़ार हों, फूल हों, या रिश्तें हों,
सबको दिल से लगा के देख लिया।

अहमियत क्या यहाँ उजाले की,
हमने घर तक जला के देख लिया।

झूठ, तिकड़म, बनावटी चेहरा,
ख़ुद को क्या-क्या सिखा के देख लिया।

दर्द अब साथ-साथ रहता है,
सौ दफा मुसकुरा के देख लिया।

ख़ुद बन गया निवाला देखो

ख़ुद बन गया निवाला देखो,
ऐसा विषधर पाला देखो।

अन्दर की लौ तो निर्मल पर,
शीशा है ये काला देखो।

दुनिया क्या है प्रश्न उठे जब,
तो मकड़ी का जाला देखो।

देखे हाथों के गुलदस्ते,
पाँवों का भी छाला देखो।

क्या-क्या निकला है अन्दर से,
किसने सिन्धु ख़गाला देखो।

किसने गड़ा दिया देखो मत,
किसने ख़ार निकाला देखो।

जिससे ज़ख़्म सभी छुप जाँए,
ऐसा एक दुशाला देखो।

मुसलसल ज़ाफ़रानी हो रही है 

मुसलसल ज़ाफ़रानी हो रही है।
नज़र जितनी पुरानी हो रही है।

ख़ुदा है हर तरफ और हर तरह से,
उसी की तर्जमानी हो रही है।

ग़ज़ल मेरी नहीं है दास्ताँ ये,
ज़माने की कहानी हो रही है।

उन्हें कुछ काम हमसे आ पड़ा है,
तभी तो महरबानी हो रही है।

ज़ुबाँ की क़द्र क्या बच्चे करें जब,
घरों में बदज़ुबानी हो रही है।

नदी को छू रहा है एक सूरज,
तभी तो पानी-पानी हो रही है।

अब ज़िन्दगी से वो मेरी जा भी नहीं सकता

अब ज़िन्दगी से वो मेरी जा भी नहीं सकता,
पर उसपे अपना हक़ मैं जता भी नहीं सकता।

कश्ती को नाख़ुदा नहीं लाया है ख़ुदा ही,
वरना मैं इस मुकाम पे आ भी नहीं सकता।

यारो! ज़्ाबाँ की हद हुआ करती है उससे मैं,
ख़ुशबू की कोई शक्ल बना भी नहीं सकता।

तोड़ा है उसने आइना इस एहतियात से,
रो भी नहीं सकता हूँ गा भी नहीं सकता।

दीपक जो डूब जाए कोई अपनी अना में,
फिर कोई उस दिये को जला भी नहीं सकता।

रोज़ मेला सा लगा करता है 

रोज़ मेला सा लगा करता है।
कौन उस घर में रहा करता है।

जिसमें इक दौर नज़र आए वो,
ऐसे अशआर लिखा करता है।

दिल को जो ठीक लगे वो करिए,
ये ज़माना है कहा करता है।

क्या कहें उसकी ज़ुबाँ है कैसी,
बोलने वाला ख़ता करता है।

मसअले हल न ये होंगे ‘उत्कर्श’,
तज़िरा सिर्फ़ हुआ करता है।

मिलना जुलना आना जाना

मिलना जुलना आना जाना,
दुनिया एक मुसाफिरखाना।

मुझको मिलना ही था उससे,
ढूँढ रहा था कोई बहाना।

सच्चाई को ग़ौर से देखो,
ख़्वाबों से क्या जी बहलाना।

भटके एक मुसाफिर से सब,
पूछ रहे हैं ठौर ठिकाना।

आज बहुत जी भारी भारी,
आया है कुछ याद पुराना।

जीवन का इतना अफ़साना

जीवन का इतना अफ़साना।
कुछ रिश्तों का ताना बाना।

रोज़ मिला करता है हँसकर,
ग़म से है अपना याराना।

दुनिया में आने का मतलब,
कुछ लाना है कुछ ले जाना।

आँसू टपक पड़े आँखों से,
इतना ज़्यादा मत मुस्काना।

जीवन का अन्तिम पड़ाव है,
ख़ुद को खोना तुझको पाना।

कौन यहाँ पर ख़ास है, कौन यहाँ पर आम 

कौन यहाँ पर ख़ास है, कौन यहाँ पर आम,
जो जितना नीचे गिरे, उतना ऊँचा दाम।

देखो कब बुझ पाए है, अब होठों की प्यास,
जिसे उठाया हाथ में, टूट गया वो जाम।

स चमत समझों हर तरफ, मिले अगर सम्मान,
शोहरत के कारण सभी, करते दुआ सलाम।

डसने फिर हालात को, नहीं किया स्वीकार,
फिसमत के सर आज भी, आएगा इल्ज़ाम।

बता रहीं ख़ामोशियाँ, उसके दिल का हाल,
कितना ही उस शख़्स के, अन्दर है तूफान।

सिर्फ़ सूदो-जियाँ समझता है

सिर्फ़ सूदो-जियाँ समझता है।
बात कोई कहाँ समझता है।

मैं जहाँ हूँ वहाँ अकेला हँू,
वो मुझे कारवाँ समझता है।

डूबकर देख तो ज़रा उसमें,
तू जिसे बेज़ुबाँ समझता है।

वो सुखनवर है फूल के जैसा,
ख़ुशबूओं की ज़ुबाँ समझता है।

क्या बताएगा फ़लसफ़ा कोई,
तू ख़ुदी को कहाँ समझता है।

इबादत की तो ऐसा हुस्न सूरत में चला आया 

इबादत की तो ऐसा हुस्न सूरत में चला आया।
जिसे ख़ुद देखने आईना हैरत में चला आया।

अदीबों की सभा में क़त्ल होगा आज उसका ही,
उसे मालूम था फिर भी मुहब्बत में चला आया।

जहाँ हर फैसला हो ताकतों के हाथ का मोहरा,
वहाँ इंसाफ़ लेने वो अदालत में चला आया।

निगाहों में सभी की कल तलक जो बेशक़ीमत था,
वही बाज़ार में छोटी सी कीमत में चला आया।

हमारे देश के हालात बदतर इसलिए हैं अब,
यहाँ जो जादूगर था वो सियासत में चला आया।

तुम्हें रास आए मेरी शख़्सियत तो ये समझ लेना,
बुज़ुर्गों से बहुत कुछ मेरी आदत में चला आया।

सारी उम्र गवानी है

सारी उम्र गवानी है।
इक तसवीर बनानी है।

खूब सँभलकर चलना भी,
बचपन है नादानी है।

मूँह मोड़े थी किसमत पर,
हार न उसने मानी है।

दृश्टि नयी होती है बस,
बाक़ी बात पुरानी है।

बाहर से गुलज़ार है वो,
भीतर इक वीरानी है।

जितना गहरा दरिया है,
उतना मीठा पानी है।

दीप दिल में जला दिया तूने 

दीप दिल में जला दिया तूने,
इक कलन्दर बना दिया तूने।

जी सकूँ इसको इतनी ताकत दे,
मुझसे क्या क्या लिखा दिया तूने।

फूल महकें यही तो ख़्वाहिश थी,
एक पौधा लगा दिया तूने।

ठक दफ़ा कह दिया जिसे अपना,
उसका रुतबा बढ़ा दिया तूने।

देखकर बेज़ुबाँ हुआ जिसको,
ऐसा मंज़र दिखा दिया तूने।

खींच लेगा वो अपनी जानिब ख़ुद,
इक क़दम जब बढ़ा दिया तूने।

इंसानों में अब नहीं, दिखता है ईमान

इंसानों में अब नहीं, दिखता है ईमान,
बिकता है बाज़ार में, बनकर इक सामान।

मत इतरा ख़ुद पर यहाँ, बेहतर तुझसे लोग,
नहीं किसी को भीड़ में, मिल पायी पहचान।

सभी यहाँ कहने लगे, सही हुआ इंसाफ,
सच की गरदन कट गई, झूठ बना सुल्तान।

ना होने पर भी यहाँ, हो ऐसे मौजूद,
जैसे ख़ुशबू दे रहा, हो खाली गुलदान।

हर बन्धन से कर दिया, इक क्षण में आज़ाद,
जीवन पर है मृत्यु का, बहुत बड़ा एहसान।

जब हुआ सच्चाई का इज़हार वो 

जब हुआ सच्चाई का इज़हार वो,
हादसों का बन गया अख़बार वो।

कोई हंगामा खड़ा होगा जहाँ,
कह रहा दुश्यन्त के अशआर वो।

छत का जिसपे सबसे ज़्यादा वज़्न था,
गिर गई है आज इक दीवार वो।

फिर लगेगी द्रौपदी ही दाँव पे,
लग गया है आज फिर दरबार वो।

दूर से दीखा था जो प्रवचन भजन,
पास आकर के दिखा बाज़ार वो।

भागवत अनुराग की कैसे पढ़े,
सुन रहा है वक्त का चीत्कार वो।

रख निशानी महकने लगी 

रख निशानी महकने लगी।
इक दिवानी महकने लगी।

अगमन आपका जब हुआ,
ज़िन्दगानी महकने लगी।

दीप तुलसी पे जलने लगा,
रातरानी महकने लगी।

गद्य जब काव्यधर्मी हुआ,
इक कहानी महकने लगी।

वृक्ष चन्दन का उसने छुआ,
नागरानी महकने लगी।

संस्तवन फिर हुआ राम का,
बोली बानी महकने लगी।

वेद का ज्ञान होने लगा 

वेद का ज्ञान होने लगा,
दर्द मुस्कान होने लगा।

अवतरित जब भी कविता हुई,
इक अनुश्ठान होने लगा।

दुःख जब भी किसी का जिया,
गीत वरदान होने लगा।

दृश्टि थी वो कि संस्पर्शमणि,
रंक धनवान होने लगा।

जिसने पूँजी लुटाई नहीं,
उसका नुकसान होने लगा।

गाँव में मेरा गैरिकवसन,
मेरी पहचान होने लगा।

Share