उदयन वाजपेयी की रचनाएँ

कटोरे में अंगार

होली की आग में माँ मुझे गेहूँ की बालें भूनने को कहती हैं। चौराहे पर जलती ढेरों लकड़ियों की सुनहली आभा पास के मकानों को बुहारते हुए आकाष तक जा पहुँचती है। माँ की बहन पिता के सफ़ेद कुर्ते पर बाल्टी भर गहरा नीला रंग डालकर माँ के पीछे जा छिपती है। गुस्से में तमतमाते पिता को देख माँ सबकी खिलखिलाहटें फूलों की तरह चुनकर अपने आँचल में डालती जाती। पौ फटते ही नानी की कड़कती आवाज़ और माँ के शान्त स्वर के इंगित पर मैं चौराहे तक भागता चला जाता।

कटोरे में अंगार लेकर लौटते हुए मुझे देख पिता धीरे से अपना मुँह फेर लेते।

पेट

माँ का पेट ढीला पड़ गया है मानो वहाँ समुद्र की कोई लहर आकर बैठ गयी हो। मैं दूर तक फैली इस लहर में गोते लगाता हूँ, भीगता हूँ और माँ को अपनी ओर मुस्कराते देखता हूँ। नानी को यह पसन्द नहीं है। वह बार-बार मुझे किनारे पर बुलाती है। इस सब से बेखबर नाना हर शाम मुझे पार्क ले जाते हैं। मैं घनी झाड़ियों में छिपकर नाना के चेहरे पर उम्र की गहराती छाया देखता हूँ।

पिता की विदाई के बाद समुद्र की लहर समुद्र लौट जाती है। माँ की गोद में फैली बालू में मेरे पैरों के निषान भरना शुरू हो जाते हैं।

यमदूत 

पिता को जितना बीत गया उसके सामने जितना बीतने वाला है, इतना छोटा लगता कि उन्हें मृत्यु के पहले का अपना जीवन दो हाथ लम्बी ज़मीन मालूम देता जिसे वे एक बार में कूद कर पार सकते थे। वे इस लम्बी कूद के लिए अपना शहर छोड़ना नहीं चाहते थे। नाना के ऐसा चाहने पर पिता माँ की ओर देख मुस्करा देते। माँ गाय के सामने भूसा भरा बछड़ा रख देती। गाय के थनों में दूध और आँखों में आँसू उतर आते। मरे हुए चमड़े पर उसे जीभ फेरते देख माँ किसी चमत्कार की कामना करती।

नानी ज़िन्दगी को पूरा जी चुकने के बाद अपनी ही प्रेतछाया की तरह घर के जिस बरामदे में सरकती रहती उसी के कोने में पगड़ी पर सिर धरे एक बूढ़ा यमदूत सोता रहता।

साँस

मरने के ठीक पहले माँ की साँस की डोर छाती के भीतर बुरी तरह उलझ गयी है। उसे सुलझाने की जगह मैं उसका हाथ पकड़ लेता हूँ। रसोईघर के फहराते प्रकाश में मैं आग के सामने बैठा हूँ। माँ चूल्हे में फूलती रोटी को ताक रही है। सुदूर गहराते आकाश-मार्ग पर पिता के छूटे हुए पद-चिन्हों की तरह नक्षत्र दिखाई देना शुरू हो जाते हैं। माथे की झुरियों में फँसे हाथों से नाना नींद की ओर सरक रहे हैं।

अँधेरी छत पर खड़ी नानी पूरी ताकत से चीखती है: लो-लो वह चल दी।

परदे

माँ धूप में बैठी है। (ओफ़ कितने दिनों बाद मैं माँ को इस तरह धूप में बैठा देख पाया हूँ, कितने दिनों बाद …)। माँ धूप में बैठी है। जाने किसी बात पर हँसते पिता गुसलखाने से लौटते हुए आँगन में ठहर गये हैं। उनकी सफ़ेद धोती उनकी तोंद पर अटकी है। आँगन में सूखते कपड़ों के असंख्य परदे हवा में डोल रहे हैं। इन्हीं में से किसी एक के पीछे न होने का मंच तैयार हो चुका है। माँ की बन्द आँखों के पीछे पिता घर से दूर होते जा रहे हैं।

बरसों अपने जीवन पर फिसलने के बाद नाना नानी की मौत के सामने जा खड़े हुए हैं।

थाली 

बरामदे की मेज़ पर खाना खा रहे पिता गुस्से में थाली उठाकर आँगन में फेंक देते हैं। आँगन के फर्ष पर गर्म दाल फैल जाती है। नानी किसी लुप्त प्रजाति के पक्षी की तरह अपनी टेढ़ी टाँगों से चलकर पूजा के कमरे से बाहर निकलती है। मैं नाना को उनके मुवक्किलों के लम्बे-लम्बे मुकदमें पढ़कर सुना रहा हूँ। वे बार-बार मेरे उच्चारणों पर मुझे टोक रहे हैं। घर के जाने किस कोने से निकलकर भाई आँगन में बिखरे बर्तनों को उठाकर पिता के सामने रख देता है। वे उसे पूरी ताकत से घूरते हैं। चौके के दरवाजे़ पर खड़ी माँ सहमने को होती है कि पिता की आँखों का झुकना शुरू हो जाता है।

माँ का कद बढ़ते-बढ़ते आसमान तक जा पहुँचता है।

साड़ी

पिता लम्बी मेज़ के सिरे पर बैठे काँट-छुरे से रोटी तोड़ रहे हैं।
मैं उनके बगल में बैठा उनके इस कारनामे पर अचम्भित होता हूँ।
माँ झीने अँधेरे में डूबती, खाली कमरे में बैठी है।
उसकी साड़ी पर पिता की मौत धीरे-धीरे फैल रही है।
नाना वीरान हाथों से दीवार टटोलने के बाद खूँटी पर अपनी टोपी टाँग देते हैं।
नानी दबी आवाज़ से बुड़बुड़ाती है: ‘क्या बुड़ला फिर सो गया ?‘

माँ मेरी हठ के कारण सफ़ेद साड़ी बदलती है।
पिता सड़क के मुड़ते ही आकाष की ओर मुड़ जाते हैं।

अदृश्य होने से पहले 

अदृश्य होने से पहले
शाम हर ओर फैला रही है
अपना महीन जाल

हर अवसाद में
स्पन्दित होने लगा है
हरेक अवसाद

सड़क पर धूल की तरह 

सड़क पर धूल की तरह
फैला है झीना एकान्त

वह आती है
न कोई सन्देश

हवा तितली से
तितली हवा से
खेलते हैं

सड़क पर खुली है एक खिड़की

सड़क पर खुली है एक खिड़की

गुलमुहर की छाँव पर सिर रखे
एक बूढ़ा रात आए स्वप्न से
धागे निकालकर चुपचाप बुन रहा है
सालों पहले मरी अपनी औरत का रुग्ण चेहरा

शायद बीत चुकी हो अब तक
उसके संशय की घड़ी
या शायद ख़ुद वह

वह घर से निकली है 

वह घर से निकली है
वह खिड़की से सड़क देखता है

उसके साथ चुपचाप चल रहा है अनिश्चय
उसके साथ बैठी है अपने से निरन्तर उत्पन्न होती हुई प्रतीक्षा

पल भर को ही सही
वे इन्हें आपस में बदल सकते
उन क़िताबों की तरह
जिन्हें कुछ कहे बिना
वे बदलने वाले हैं आज शाम

वह लगातार घर से निकल रही है
वह खिड़की से देख रहा है सड़क की निस्पन्द अन्तहीनता

वह नहीं आई 

वह नहीं आई
शाम निःशब्द वापस लौट गई

खिड़की से कमरे में आने लगा
काँपता हुआ चौकोर अंधेरा
वह कुछ देर बरामदे में टहलता रहा
फिर रुके पंखे के नीचे जाकर लेट गया

एक बूढ़ी औरत की तरह
बिस्तर की किनार पर बैठी कविता
उसका माथा सहलाती इन्तज़ार करती है
पिछले दरवाज़े से मृत्यु के आने का

क़िताब के अँधेरे में लगातार 

क़िताब के अँधेरे में लगातार
बीत रही हैं कुछ ज़िन्दगियाँ

हरी घास में अपनी तेज़ दौड़ में
घुल रहा है एक सुनहला कुत्ता

वह बिस्तर पर लेटी है
उसका एक पाँव दूसरे पाँव पर रखा है
हाथों में खुली क़िताब के हर दो शब्दों के बीच
वह सबसे आँख बचाकर
लगातार खोज रही है एक पारदर्शी

प्रेम वाक्य !

वह उसे भूल सकती है जान कर

वह उसे भूल सकती है जान कर
उसने ख़ुद अपने को धीरे-धीरे
भूलना शुरू कर दिया

कृशकाय वर्ष पूर्वजों की तरह बीत गए…

और एक दिन वह निकला अपने मकान के सामने से,
अपने दरवाज़े पर देर तक खड़ा
वह पहिचान नहीं पाया कि यह
कौन जा रहा है, सिर झुकाए, धीरे-धीरे…

वह अपने मिलने के

वह अपने मिलने के
ढेर सारे निशान छोड़कर
गुम हो जाती है

वह उसे हर निशान में
पा लेता है और उसे
खोज नहीं पाता
अन्त तक

वह अपने हाथों से

वह अपने हाथों से
अँधेरे में खोई अपनी देह को
खोजती-खोजती सो जाती है थककर

अपने आलोक के झीने जाल में
धीरे-धीरे झूलता है ताम्बई चन्द्रमा

वह आईने के सामने खड़ी
सोचती है : आईना एक दीवार है
जहाँ से टकराकर हर बार गेंद की तरह
लौट आता है
मेरा ही चेहरा !

तुम्हें उदासी क्यों घेरती है 

“तुम्हें उदासी क्यों घेरती है,
पिछले जन्मों में मेरे जो दुख यहाँ छूट गए थे,
मैं तो उन्हें उठाने आई थी।
हमारे प्रेम की बुनावट में छिपा था वह नक्शा
जिससे मैं अपने दुखों तक पहुँच सकती थी।
देखो, मैंने उसके सहारे अपने दुख दोबारा पा लिए हैं।
तुम मुझे कोस सकते हो
लेकिन अपने दुखों को पाने यहाँ आना ही मेरा होना है
और मुझे वहाँ तक पहुँचाना तुम्हारा ।
तुम्हारे हिस्से आना था दुख सहना
और मेरे हिस्से पूर्व जन्म के दुखों को खोई जागीर की तरह पाना ।”

वह उसे अपनी खिड़की से धीरे-धीरे ओझिल होते देखता है ।”

वह बोल रही थी

वह बोल रही थी

वह उसके वाक्यों से व्याकरण की
ग़लतियों को चुन-चुन कर
आकाश में एक ख़ास तरतीब से जमाता जा रहा था
चुपचाप

अब न जाने कब सूर्योदय होगा
अब न जाने कब नींद के अदृश्य रेशों से
वह बाहर झाँकेगी और पढ़ेगी
आकाश के विजन में उच्चारित

एक प्रेम-वाक्य !

वापस जाने लगा है

वापस जाने लगा है
प्रकाश
शान्त आकाश
हाँ, शान्त आकाश में
भर रहा है चुपचाप
अवसाद !

सम्भव है वह भूल जाए अपना प्रेम

सम्भव है वह भूल जाए अपना प्रेम
सम्भव है वह भूल जाए वह स्पर्शगंगा
जिसमें वह तिरी थी
लेकिन एक शाम सड़क पर चलते-चलते
हल्के लाल आकाश को देखकर क्या वह
एक क्षण को भी यह नहीं सोचेगी :
यह कौन है,
यह कौन है
मैंने इसे ज़रूर कहीं देखा है !

ज़रूर कहीं देखा है ! !

उसने उल्टी सैण्डिल को सीधा किया

उसने उल्टी सेण्डिल को सीधा किया
कि इससे झगड़ा होता है
किनमें? पूछने पर वह चुप रही थी

आकाश में काँच के शिल्प की तरह टँगा
मूक चन्द्रमा इन्तज़ार करता है
फ़र्श पर अपने टूट कर गिरने की आवाज़ का

वह कमरे में उल्टे पड़े
एक जोड़ा एकान्त को
सीधा कर फ़र्श पर जमा देता है
कि वह आए और इन्हें पहिनकर चली जाए
उस ओर जहाँ से आते हुए
वह लगातार दिखती रही थी।

वह उसकी सिहरती देह में 

वह उसकी सिहरती देह में
बोता जाता है अनेक स्पर्श

अपनी ही आभा की झील में
डूब रहा है
चाकू-सा पैना चन्द्रमा

वह अँधेरे कमरे में
चुपचाप उठकर खोजती है
कहाँ गिर गया वह कनफूल !

आकाश में घुलते-घुलते 

आकाश में घुलते-घुलते
पूरी तरह ग़ायब हो गया
चन्द्रमा
अँधेरे में

खाली मकान में न जाने कब से
मेज़ के पीछे छिपा है एक बच्चा कि
कोई उसे खेल-खेल में ढूँढे

छत पर खड़ी हो वह देखती है
दूर मकान में चमकती एक खिड़की
और सोचती है :

विरह प्रेम का अनन्त है ।

वह मैदान के किनारे

वह मैदान के किनारे
सखियों के साथ बैठी है

उसका एक हाथ उसके बालों को
चुपचाप सँवार रहा है, दूसरे से
घास पर ओस की तरह
निरन्तर टपक रहा है एक विस्मृत स्पर्श

वह रास में डूबती है
उभरती है आँसुओं में

वे अपनी ही गोद में 

… और उसके बच्चे

वे अपनी ही
गोद में सो
रहे हैं

वह उन्हें देखती है
और भूल जाती है
कि वह अब
नहीं
है !

द्वार तक आकर 

… और उसके बच्चे

द्वार तक आकर कँपकँपाती है
पवन, ठिठक जाता है प्रभात

वे प्रार्थना की तरह
सो रहे हैं, वह प्रार्थना
की तरह हो रही है

वे रात भर अन्त की 

वे रात भर अन्त की
प्रतीक्षा करते रहे जो
घुप्प आकाश के एक अदृश्य
कोने में पड़ा
सोता रहा रात भर

उसने मुझे कन्धे हिलाकर
जगाया, बोली धीरे से
मेरे पंख ! मेरे पंख !!
नींद में चलते मैंने वे
चुपचाप उसके हाथों में रख दिए
जैसे वह उन हाथों से
गुसलख़ाने से भूले हुए
कपड़े माँग रही हो, धीरे से

ठहर जाता है हवा में 

ठहर जाता है हवा में बारिश का
कलरव, विहँसती है आकाश की नीलिमा में
एक पारदर्शी शून्यता, क़िताब के पन्नों में
फड़फड़ाती है गुपचुप यह कहाँ के पक्षी की श्वेत आकृति

अँधेरी रात में वह खटखटाती है
एक खाली देह के
वे सारे द्वार जो भीतर से बन्द हैं

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