उदय भान मिश्र की रचनाएँ

कर्फ्यू में लिखी एक चिट्ठी 

प्रिय रामदेव जी!
अच्छा ही हुआ
जो
आप
इन
दिनों
नहीं थे
शहर में
रहते भी
तो क्या
हमारा मिलना
संभव था इस समय?
जहां एक विकराल राक्षस
अपने घिनौने और लंबे नाखूनों वाले
सहस्र पंजों में
पूरे शहर को दबोचे हुये
खड़ा है
हर सड़क
हर गली
हर मोड़ पर
कर्फ्यू का दंश
झेल रहा है शहर
सभी अभिशप्त हैं
अपने ही घरों में
बंदी बन रहने को।
घरों में दुबके हुए लोग
हिसाब लगा रहे हैं
कितने भेजे गये जेल,
कितने भेजे जाने वाले है
कहां चली गोली,
कहां हुआ लाठी चार्ज
कितने हुए घायल,
कौन-कौन पड़े हैं,
किस-किस अस्पताल में?
अर्ध सैनिक बलों की
कितनी टुकडिय़ां
उतारी गयी हैं इस
नगर में
कितने दंगा निरोधी
दस्ते
या साइरन बजाती
पुलिस की गाडिय़ां
घूम रही हैं
गली दर गली
उड़ती आती है
एक खबर
गोली चली है
अभी-अभी
कहीं
मरा है
कहीं कोई
कोई कहता है कोई हिंदू था
कोई कहता है मुसलमान था
कोई नहीं कहता
वह महज
एक इंसान था।
क्यों रामदेव जी
मृत्यु
दोस्त की हो
या दुश्मन की
दु:खद घटना नहीं है?
कमरे में कैद
लिख रहा हूं खत
आपको
लेकिन दुकान,
बाजार, यातायात, संचार
सभी तो बंद हैं
डाक में कैसे जा पायेगा?
और अगर नहीं पहुंचा
आप तक
तो क्या गारंटी है
बैरंग होकर
वापस लौट आयेगा।
कमरे में यहां मेरे साथ
बैठे हैं
तुलसी, कबीर, बुद्ध और गोरखनाथ
पूछ रहे हैं
मुझसे
यह सब क्या हो रहा है वत्स?
मुक हूं
निरुत्तर हूं
क्या उन्हें जवाब दूं
कहिये रामदेव जी!
कितने दिनों के बाद
आये थे रामदरश मिश्र यहां
पूछ रहे थे आपको
चाहता था सुनना
उनसे धूप और वसंत पर
लिखी उनकी कवितायें
सुनाना चाहता था
अपनी व्यथा-कथा
लेकिन सब कुछ
लील गयी
शहर की
जहरीली हवा
दु:ख है उन्हें छोडऩे तक
नहीं जा पाया
स्टेशन तक
कर्फ्यू की आग में

विवश 

कविता का
कोई समय
नहीं होता
जैसे मन
या
नींद का!

धूप की
धुंधली दोस्ती
काम नहीं आती
अगर अंधेरा
अमावस का हो
और गुजरना
किसी जंगल से हो
दोस्तों की
पुरानी पहचान
जेब में पड़ी
सिकुड़ी रूमाल की तरह
पसीना पोंछने के
काम
तो आ सकती है।
मगर छतरी का
काम नहीं कर सकती
अजनबी शबर की
ठसा-ठस भरी
बस में
खड़े-खड़े सफर
करने की लाचारी
में
कोई बदलाव
नहीं कर सकती।

एक क्रिकेट मैच को देखते हुए

मैं जानता था कि
वे हार रहे थे!
मैं निश्चिंत होकर
अपने बाकी पड़े
कामों को
निपटा सकता था
मगर
उन्हें हारते हुये
देखने के सुख से
वंचित होना
नहीं चाहता था।
और टेलीविजन स्क्रीन पर
आंखें गड़ाये
हर गेंद की
करामात
देखता रहा
सब कुछ
ताक पर रखकर।

वे जानते थे कि
वे हार रहे हैं
फिर भी वे
हर गेंद पर
जूझते रहे
अपनी सारी
ताकत को
झोंकते हुए?

क्योंकि वे
मानते थे
कि
हार मानना ही
मृत्यु है

बदरी नाथ जाते हुए

उठती
गिरती
चल रही है
सड़क
मेरे देश की तरह!

कभी तरकुल ऊंची
कभी पहाड़ नीची!
स्वप्न सी दिख रही
नीचे की घाटी में
छरहरी कन्या सी
इठलाती, मदमाती
उछलती अलकनंदा!

पत्थरों को तोड़ती,
कभी ऊपर से बहती
कभी नीचे चट्टानों के
सेंध लगाती
रेंगती, बहती
अलकनंदा!

जिंदगी और मौत में
कितना कम अंतर है
सोचता, अंतर्मन
बढ़ता है आगे
अपने देश की तरह!

याद आती है
बचपन में कही
दादी की बात!
बेटे मत झांकना इनार में
गिरने का डर है!

पाने के सुख से
खोने का डर
बड़ा है
मेरी मां!’’

बदरीनाथ
का स्पर्श-सुख
पाने को
बेचैन मन
ऊंचे पहाड़ों
झाड़ों, झंखाड़ों
के बीच
गुजर रहा है
मेरे देश की तरह

गौरैया

कितने अधिकार से
फुदकती है गौरैया!
घर में
आंगन में
छज्जे-मुंडेर पर

मेरा घर
अपना घर समझती है
गौरैया!

चहचहाती है गौरैया!
खिड़की से
झांकती है गौरैया!

घोंसलें बनाती है
गौरैया!
दाना चूगती हैं
चुगाती है
गौरैया!

दानें बिखेरता हूं
चुन-चुन कर खाती है
और
उड़-उड़ जाती है
गौरैया!
पास नहीं आती है
गौरैया!

समय की बात

शायद मेरा खत
उन्हें नहीं मिला!
शायद मेरी याद
उन्हें नहीं आयी,
शायद वे व्यस्त है
जरूर लिखेंगे मुझे,
शायद वे नहीं
लिखेंगे
शायद वे भूल जाना
चाहते है
मुझे-
उत्तर नहीं आने पर
यही सब
मैं सोचता हूं।

तीरथराम कभी झूठ नहीं बोलते 

तीरथराम
कभी झूठ
नहीं बोलते!
सच के अलावा
वे कुछ भी नहीं बोलते!

अक्सर वे
मेरे यहां आते हैं,
हाल-चाल,
पूछते हैं
रोटी रोजगार की
टोह लेने के बाद
कचहरी,
मुकदमे पर
उतरते हैं!

बहुत दु:खी होते हैं
जब सुनते हैं
कि गवाह के अभाव में
मैं जीतता मुकदमा
हार सकता हूं!

तीरथराम
पिघल उठते हैं-
मैं मदद करने को
तैयार हूं।
गवाह
बनने को तैयार हूं
सिर्फ आप बताइए
मुझे क्या कहना है?
कहां-कहां कहना है’’

मैं चुपचाप सुनता हूं
तीरथराम को
एक टक देखता हूं!

तीरथराम कभी
झूठ नहीं बोलते
सच के अलावा
कुछ नहीं बोलते

आजकल

आजकल
मैं
एक ऐसे जंगल से
गुजर रहां हूँ
जिसमें
एक दरख्त की जड़ें
दूसरे दरख्त की
जड़ें हैं

एक की पत्तियां
दूसरे की पत्तियां हैं
एक की जत्तायें
दूसरे की जत्ताएं हैं

मैं
एक ऐसे जंगल से
गुजर रहा हूँ
जिसमें हर दरख्त
दूसरे दरख्त पर
झुका हुआ है
हर दरख्त
दुसरे दरख्त पर
ठिका हुआ है

गीत – 1

अंबर में चंदा का प्यार बहा जा रहा।
तारों के गहनों में, नाच रही चांदनी।
झींगुर की रुनझुन में, पायलें बजा रही।
बोल रही डालों पर ‘पी-पी’ पपीहरी,
बिरही उरों में आज पीड़ा जा रही।

डोल रहे धरती पर चलदल के पीते, पात,
भीनी सुगंध लिये मंद पवन आ रहा।
अंबर में…

अलसाई पुरवैया आज बही जा रही।
पिघली सी चांदी की धार बही जा रही।
धरती की छाती पर फूल झरे जा रहे-
पातों के आनन पर आंसु ढले जा रहे।

खोज रहा जुगनू है-मनमाना देवता-
भूला सा, मन का सितार बजा जा रहा।
अंबार में…

झूम रही उपवन में चंपा की डालियां।
खेतों में झूम रहीं-बाजरे की बालियां।
झांक रहे झुरमुट से-पंछी अलसाये से-
मार रहे डालों पर तीतर फुदकारियां।

खेल रहा मारुत भी-लतिका की गोद में-
लहरों में धुंधला सा चांद छिपा जा रहा।
अंबर में…

गीत – 2 

हंस लो कुछ क्षण और धरा पर, नभ के चांद सितारो!!
आग लिये हहराता पथ पर सूरज आता होगा।

कब तक ढांक सकेगी भू को, निशि तम की धारा में?
कब तक मौन रहेगा पंकज, कलियों की कारा में?
कब तक धरती की सुहाग पर, तम में छिपा रहेगा?
कब तक पत्तों के झुरमुट में-पंछी पड़ा रहेगा?
कब तक होगी मनचाही यह, कब तक धरा सहेगी?
कब तक भू पर अंधकार की-चादर तनी रहेगी?

कर लो अपने मन की कुछ क्षण और-गगन के तारो-
दीप लिये हहराता नभ में सूरज आता होगा।

अब तो जीवन और मरण का भीषण झगड़ा होगा।
और तुम्हारी मनचाही पर बल का पहरा होगा।
कुसुमों से खेलेगी हंस कर रोने वाली धरती।
हरी लताओं में झूमेगी, बन मतवाली धरती।
बंद रहेंगे गीत रात के-सरस प्रभाती होगी।
हारेगी जब रात, और जब जीत दिवस की होगी।

खोलो घर के द्वार, किरण आयेगी-भू के लोगों!!
थाल लिये कर में, कल सूरज तिलक लगाता होगा।

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