उपासना झा की रचनाएँ

बनारस क्या शहर है बस 

1.

उगते सूर्य को अर्घ्य देकर ही
विदा होती है अरुंधति
कालभैरव की आरती करती है
अनवरत जलती चिताएं
उसी शहर में
गंगा पार ठंडी रेत में
बैशाख के किसी अनमने दिन में
सूर्य के साथ उदित हुआ था प्रेम
तुम्हारे लिए हो सकता है
वह संकीर्ण गलियों वाला
गन्दी सड़कों वाला शहर
भीड़भाड़ और ट्रैफिक जाम में फंसा हुआ
शहर जिसकी ठगी मशहूर है
उस शहर ने मुझे ऐसे ठग लिया था
कि सब तरफ़ हरा ही नज़र आता था

2.

जाने कितने व्याकुल दिन
हमने बिताए एक शहर में रहकर
एक-दूसरे को बिना देखे
जाने कितने असंख्य क्षण काटे गए
संग में बिना हँसे
तुम्हारा कंधा चूम लेने की हसरत
बनी रही एक प्यास
लेकिन ‘चाहना भी चूमना ही है’
कहकर जिस तरह तुमने देखा था
आत्मा पर उसका स्पर्श अब भी है
बनारस वह आदिम इच्छा भी है
जिसने जला रखा है प्रेमियों को सृष्टि के आरंभ से

3.

तुम कह सकते हो उसे
उम्र के उन बरसों की नादानी
या ये भी कि नदियों में भी होती है
समय की उठान
उनदिनों हर चीज़ नशा होती थी
हँसी में घुली रहती थी
गोदौलिया की भाँग और रथयात्रा की ठंडई
सिगरा चौराहे की चाय
लहुराबीर का समोसा
और कैंट पर खाये गये अमरुद
उचटी हुई नींद से उठने पर
गला सूख जाने से जो याद आये
बनारस वही कलेजे की फाँस है…

4.

घाट-घाट का पानी पीकर
लहरतारा से जो लहर उठकर
चली गयी है मंडुआडीह की तरफ़
उसमें गुम हैं हज़ार मुस्काने
क़ैद हैं जाने कितनी जवानियाँ, जिन्दगानियां
बजरडीहा में धुन है धागों के रंगों की
उसी शहर में उठती है विदा की धूम
मणिकर्णिका के मरघट पर, अनवरत
उसी शहर से कुछ अलग हटकर
दिनरात जपते हैं बौद्ध-भिक्षु
करुणा के मंत्र
उस शहर ने बना लिया है
मुझमें एक ऐसा प्राचीन शहर
जो युगों तक जीवित रहेगा

5.

प्रेम की सब कविताओं में
उदासियाँ उसी तरह गुंथी हुई है
जैसे जब मैं सपनों की बात लिखना चाहूँ
तो लिख जाती हूँ भरी हुई आँखे
जैसे बरसात के मौसम में किसी भी क्षण
छलकने को तैयार रहती है गंगा
जब मैं लिखना चाहूँ तुम्हारे चेहरे पर
ख़ुशी की खिलखिलाहट
कागज पर उतर जाता है तुम्हारे होंठो का चुप
बनारस वह धागा भी है
जिसने जोड़े रखा है तुम्हें मुझसे अबतक

6.

उनदिनों जब तुम पूछते थे कि
प्यार की मात्रा और गहराई
और कभी-कभी उम्र भी
अस्सी घाट की सीढ़ियां, गंगा का तल
और बनारस
कितने माक़ूल जवाब लगते थे
और अब सोचती हूँ तो लगता है
अस्सी की कितनी सीढियां डूब गई
गंगा के कितने पाट सूख गए
बनारस कितना पुराना हो गया…

ग्यारह बरस की माँ 

उसे नहीं भाती देर रात
शिशु की रुलाई
उठते डर लगता है उसे कम रौशनी में
अचानक उसकी टूटती है नींद
माघ की ठंड में उसकी गात है
पसीने से धुली हुई

एक क्षण को कभी
मन में उठता है दुलार
उमगती है नसों में एक पवित्र अनुभूति
अवयस्क उसकी छातियों में
उतरता है दूध
लेकिन ये क्षण भीषण अंधकार को
पाट नहीं पाते

उसके सपनों में परियाँ नहीं आती
उसकी किताबें हैं
बोरी में बन्द, दुछत्ती पर धरी हुई
छोटे भाई की किताबों को
देखती है छूकर
सोचती है कि स्कूल जाना
उसे इतना तो नापसन्द न था

नहीं आती उसकी सहेलियाँ अब घर
गुड्डे-गुड़ियों की बारात में
उसकी अब कोई ज़रूरत नहीं
न छुप्पमछुपाई में अब उसकी डाक होती है
उसे कर दिया गया है निर्वासित
जीवन के सभी सुखों से

दादी अब नहीं देती उसे मीठी गालियाँ
पिता कि आँखों में सूनेपन के सिवा कुछ नहीं
चाचा के गुस्से की जगह
आ बैठा है डबडबाया हुआ पछतावा
क्यों नहीं रखा उन्होंने उसका ध्यान
माँ को बोलते अब कोई सुनता

उसे नहीं धोने इस शिशु के पोतड़े
उसे खेतों में फूली मटर
और सरसों के पीले फूल बुलाते हैं
लेकिन यह अब किसी और ही
युग की बात लगती हो जैसे
उसे डर लगता है शंकित आँखो
और हर तरफ़ फुसफुसाहटों से

इस घर में शिशु-जन्म
ऐसा शोक है, जिसमें यह घर है संतप्त
यह शिशु है अवांछनीय, अस्वीकृत
हर दिन यह परिवार कुछ और ढहता है
देश का अंधा कानून आत्ममुग्ध है
अपने अँधेरे कमरे की फ़र्श पर बैठी
यह ग्यारह बरस की माँ
किसी से कुछ पूछ भी नहीं पाती…

मुक्ति

जीवन को गलाता था कई हिमयुगों का शीत
मैं रोज़ देखता था अपनी छाती पर जमते पहाड़
रोज भोगता था ज्वालामुखियों का ताप
वर्षों आकाश के नीचे गूँजता रहा एक ही शब्द
आकाश-गंगाओं से झरती रही उदासी

तुमसे मिलने की इच्छा ने मुझे दिए
कई सागरों का खारापन
कई पहाड़ो की खाइयाँ
कई मीलों लंबी संकरी गुफाएँ
दुनिया भर का अँधेरा भर आया था मेरी नसों में
देह में खून की जगह दौड़ता था दुःख

दुनिया का चेहरा टटोलती थी तुम अपनी हैरत भरी आँखो से
होंठो पर पहने रखती थी पिछली कई रातों के इंतज़ार की चुप्पी
कई-कई जन्मों का प्रेम लिए माथे पर
कई-कई जन्म लेता रहा धरती पर
जन्म-मृत्यु के सत्य के बीच
कंठ में विष की तरह धरा मैंने
तुम्हें न खोज पाने का विषाद
तुम्हारे गर्भ से आती गंध ही केवल चीन्हता था मैं
तुम्हारी गोद में अपना मुँह छिपाकर
फूटकर बहना ही मेरी मुक्ति थी

धुंधली इबारत

कई स्थगित आत्महत्याओं की
धुंधली इबारत
होते हैं हम सभी
कभी न कभी
दर्ज़ है जिसमें पहली दफ़ा
और उसके बाद कई बार
दिल का टूट जाना
उतनी ही बार दर्ज़ है ये शिक़ायत
कि दुनिया ज़ालिम है।
उस खंडहर पर एक आइना है
जिसमें चमकता है वो गहरा घाव
बड़ा गहरा
उस दिन का निशान लिए
जब अपने चारों उगाये थे कई बाड़
कई टूटी हुई, छूटी हुई शामें
और कई बिखरे हुए यकीन
उन नामों के साथ समय ने उकेर
दिए हैं
जो नाम खुद के नाम से ज़्यादा
अपने लगते थे
उन धुँधली-ढहती इबारतों में दर्ज हैं
कई चाँद-राते
कई सूने दिन
कई सर्द क़िस्से
कई रिसते रिश्ते
कई सख़्त रस्ते
जिनसे गुज़रे हैं
हम सभी… कभी न कभी

पारस 

तुम्हारे छूने भर से
सदियों से सोया हुआ एक गीत
जग आया है मेरी आवाज़ में
अब डोलती है निरापद
बूंदों की बोलियाँ
प्रतीक्षा जो बनाये रखती थी मुझे
अपनी गंध में उन्मत्त हिरण
उसने पा लिया है
कस्तूरी का स्रोत
बहती है एक धार ओजस्विनी
बहा ले जाती हैं
लाज के ऊंचे किले
मुक्त हृदय कब चिंता करता है
दाग लगने की
गाँठ पड़ने की
दिवा-रात्रि अनवरत जलते मन को
मिल गया है मानसरोवर

मेरे गाँव की लड़कियाँ 

गाँव की छाती पर पैर रखकर सरपट दौड़ती जा रही हैं
मेरे गाँव की लड़कियाँ
हाँफती-काँपती, सिर पर पैर रखकर भागती जा रही हैं ये नन्हीं किशोरियाँ
घर लीपतीं, चूल्हा-जोड़तीं, बासन माँजती, घर का सौदा-सुलुफ लातीं, गाली खातीं
कब बन गईं ये अदद जीवित मनुष्य!

बभनटोले से लेकर जुलहाटोल तक टुनटुना रहा है नए समय का औजार!
गालियों के स्वस्तिवाचन से आकाश कट कर गिर रहा
सूर्य की तरफ़ मुँह करके दैव को अरोगती ये मातायें
उनके पैदा होते ही मर जाने का अरण्य श्राप जाप रहीं
दबी फुसफुसाहटों में इन अभागिनों के उरहर जाने की कथाएँ
प्रागैतिहासिक काल से सुन रहा है स्तब्ध गाँव

एक तरफ़ बेमेल विवाह का गड्ढा है दूजी तरफ़ कमउम्र का मातृत्व
निशीथ-रात्रि या सुनसान दुपहरों में कौन दैत्य इन बालिकाओं को गायब कर रहा
कौन बरगला रहा है इन सिया-सुकुमारियों को
हर छमाहे, साल बीतते कोई न कोई लड़की भाग जाती है
इस विकट दुष्चक्र को तोड़ना क्या संविधान में लिखना भूल गए थे मेरे पूर्वज
और उनके माताओं-पिताओं ने उन्हें बस समझा जाँघ पर बिठाकर पुण्य अर्जने का सामान

अनंत ध्वनियाँ 

स्मृतियाँ केवल अतीत की छांह भर नहीं होती
वे होती हैं जीवन का अब तक हुआ सम्वर्द्धन
गढ़ ली गयी कई मूर्तियाँ
समय के साथ भग्नावशेष मात्र हुई
लेकिन उनकी स्तुतियाँ गूँजती है अब भी
शब्द ब्रह्म है यह पढ़ा था मैंने
और जीवन ने सिखाया अन्न ब्रह्म है
लेकिन असल में तो ब्रह्म केवल पीड़ा है
सृष्टि के सबसे मधुरतम क्षणों का
उन्नयन होता है केवल पीड़ा में
ईश्वर नामक कल्पना ने उपहार में दी थी पीड़ा
कि हम याद करते रहे उसे
और जाप करते रहे मुक्ति मंत्र का
स्मृतियाँ होती हैं जीवन का इतिहास
किसी यम और चित्रगुप्त को
कोई बही नहीं रखनी पड़ती,
हम चुनते हैं अपना स्वर्ग-नर्क अपनी स्मृतियों से

तुमने कहा था कि एक तारा चुन लेना चाहिए
हर स्त्री को और समेट रखना चाहिए अपना आकाश
स्त्री के अन्तस् में बहते है कई-कई प्रशांत महासागर
उसे बन जाना चाहिए उर्ध्वगामिनी
उसे हँसना चाहिए ज़ोर से
उसकी हँसी में बह जाने चाहिए लोक-लाज
जानते हो, कई बार
चुने हुए तारे असल में धूमकेतु होते हैं
और दे जाते हैं अपनी ही ऊर्जा से जलती हुई इच्छाएँ
हँसी को अट्टाहास में परिणत होते देखना
कंठ से रोष भी फूटता है सस्वर
छिन्नमस्ता भी हंसी थी अपना ही मुंड हाथ में लेकर

ग्रीष्म, शरद, शिशिर और हेमंत के बीच
एक ऋतु ऐसी भी आती है
जिसमें खाना-पीना-जीना हो जाता है असंभव
आयुर्वेद में कहते हैं कि कफ का बाहुल्य हो तो
रक्त नहीं केवल कफ ही बनता है
तो यह क्या है कि केवल उब और निराशा
बहती है देह में
नींद से उठते ही हताशा कंधे पर बैठ जाती है
अरुचियों का भी उपाय सम्भव है,
लेकिन दर्शन, वेद, पुराण और विज्ञान ने भी
कोई उपाय नहीं सुझाया है
सृष्टि की हर स्त्री को यह अबूझ ऋतु
कभी भी कहीं भी ग्रस लेती है
हवन के धूम्र जैसी
कंठ में, नेत्रों में, प्राण में रहती है यह ऋतु प्रज्वलित

देह क्या मर जाती है जब मर जाती है आत्मा
जीवित रहना केवल साँस लेना भर हो सकता है क्या
कई धुनें और कई राग जिस देह में उमगते थे
उनके स्वर कहाँ खो जाते हैं
प्रेम छूटने के बाद क्या सागर भी सूखते होंगे
सुना है एक सागर मृत है और एक काला भी
तुमने कहा था कि प्रेम और देह दोनों
बोलते-पढ़ते हैं अलग भाषायें
स्पर्श की भाषा अलग होती है आँसुओं की भाषा से
सब भाषायें गड्डमगड्ड हो गयी है अब
और इन्हें पढ़ना नहीं आता
किसी भी स्त्री को

जीवन प्रतीक्षा में रुकी हुई साँस है
मैंने तुम्हारे हर प्रश्न के उत्तर में यही कहा था
और तुम मुस्कुराकर सर हिला देते थे
वह सहमति थी या नकारना
मैं नहीं पूछती थी
निर्निमेष तुम्हें देखते रहना सुख हो सकता है
तुम नहीं मान पाते थे
प्रतीक्षा पूर्ण होगी तो क्या करोगी
होता था तुम्हारी दृष्टि में
इस क्षण को रोक रखूँगी
कब तक कह तुम बीच में हँस देते थे
कुछ भी नहीं होता आदि से अंत तक
प्रेम भी मार्ग में हो जाता है विचलित, विघटित
बचा रहेगा अंतरिक्ष के माथे पर
सूरज की लाल गोल बिंदी
जला करेगी पृथ्वी अनंत…

संसार के सब युद्ध
लड़े गये स्त्रियों की सूनी आँखों पर
उनके शिशुओं की मृत देहों पर
मापचित्रों और नक्शों के पीछे से
झाँकती रहती हैं असंख्य उदास आँखे
इतिहास लिखा जीती हुई सेनाओं ने
ट्रॉय की हेलेन का रूप
द्रौपदी का गर्व और क्लियोपेट्रा का मद
युद्ध के बताये गए कारण
हारी हुई सेनाओं ने उद्घोष किया
सत्य है! सत्य है!
तबसे दुनिया के हर युद्ध का कारण है स्त्रियाँ
देह बनी उनकी युद्धस्थल अनंत

प्रेम में डूबी हुई स्त्री की आँखे
होती हैं दीप्त नक्षत्रों-सी धवल
कई सभ्यताओं और संस्कृतियों का
उत्थान-पतन बन जाते हैं उनके अश्रु
उनका स्वेद बन जाता है स्फटिक
उन नक्षत्रों की लौ से गढ़ते हैं पुरुष
कई चित्र, कई कवित्त, कई गद्य
प्रेम में डूबी स्त्रियाँ बनती है प्रेरणा
पुरुषों ने ऐसे समर्पण का उत्तर दिया है
छल से…
म्लान होकर सर झुकाए
प्रेम और प्रतीक्षा शिथिल पड़ जाते हैं
स्त्री बन जाती है अंत में विसर्जन भी

आदत 

जब मैं पढ़ने लगती हूँ दुनिया भर में सिमटते पहाड़-पठार,
और पृथ्वी के तल से कमता पानी
विलुप्त होते जंगल
नष्ट होते वन
साल दर साल कम होती बारिश
सूरज से आता असह्य ताप
तभी अचानक
कहीं दूर से आये
रातरानी की सुगन्धि की तरह याद आते हो तुम
और…
कितने जमे हुए पहाड़ पिघलने लगते हैं
पृथ्वी के तल से पानी जो कम हुआ
वो उतर आता है पक्षाभ मेघ बनकर नयनों में
विलुप्त हुए सब जंगल तुम्हारी पलकों में छिप जाते हैं
मैं सोचती हूँ
नष्ट वनों ने नहीं सुनी थी
तुम्हारी हरियाली सी आवाज़
तुम्हारे रूठने भर से मेघ भूल उठते हैं अपनी पगडंडी
सूरज उगलता है आग
देखा! कहती रही हूँ न
जरा नाराज़ कम हुआ करो।

जब मैं लिखने लगती हूँ मन की साध
तो उग आती है
तुमसे मिलने की इच्छा
जब लिखती हूँ मीत
तो नाम तुम्हारा होता है
जब लिखती हूँ तुम्हारी आँखो का रंग
तो मेरे होंठो की वलय पर
एक अलभ्य लालसा उग आती है
जब लिखती हूँ गंध
देह से आती है लज्जा की धूम
मीत मेरे, एक दिन तुम नहीं होगे
मैं भी नहीं होऊंगी
प्रेम बन जायेगा स्मृति
स्मृति बन जाएगी चिता की अग्नि
अग्नि की जिह्वा पर देह छोड़कर
हम-तुम मिलेंगे किसी और लोक में
लेकिन इन कविताओं में पढ़ा जा सकेगा तुम्हें

पृथ्वी घूम जाती है एक दिन में
अपनी धुरी पर
शुक्ल पक्ष से कृष्ण पक्ष में अंतर है आधे महीने का
और चंद्रमा भी
कर लेता है सत्ताईस दिन में एक परिक्रमा पूरी,
हर ढाई महीने में
बदल जाती है मौसम की चाल
हर बारह महीने पर
बदल जायेगा पंचांग
छह साल पर एक बार होगा अर्द्धकुंभ
मीत मेरे, ग्यारह दिन लगते हैं स्पर्श भूलने में
इक्कीस दिन में बदल सकती है
याद की सीढ़ी
छियासठ दिनों में बदल जाती है आदत
उतने दिनों का ही है मेरा जीवन-चक्र।

उदास औरत 

(एक)

जब तय था कि समझ लिया जाता
मोह और प्रेम कोई भावना नहीं होती
रात को नींद देर से आने की
हज़ार जायज़ वजहें हो सकती हैं
ज़रा सा रद्दोबदल होता है
बताते हैं साईन्सगो,
हार्मोन्स जाने कौन से बढ़ जाते हैं
इंसान वही करता है
जो उसे नहीं करना चाहिए
गोया कुफ़्र हो

जब दीवार पर लगे कैलेंडर पर
दूध और धोबी का हिसाब भर हो तारीखें
उन तारीखों का रुक जाना
क्या कहा जायेगा

साल के बारह महीने एक सा
रहनेवाला मौसम अचानक
बदल जायेगा तेज़ बारिश में,
जब ऐसी बरसातों में वो पहले
भीग कर जल चुकी थी,
जब मान लिया जाना चाहिए
कि ज्यादा पढ़ना दिमाग पर करता है
बुरा असर
ये तमाम किताबें और रिसाले
वक़्त की बर्बादी भर हैं
जो इस्तेमाल किया जा सकता था
पकाने-पिरोने-सजाने-संवारने में
और बने रहने में तयशुदा

जब समझ लिया गया था
चाँद में महबूब की शक़्ल नहीं दिखती
न प्यार होने से हवाएं
सुरों में बहती हैं
न धूप बन जाती है चाँदनी
न आँसू ढल सकते हैं मोतियों में
न जागने से रातें छोटी होती है

उस उम्र में अब ऐसा नहीं होना था
उन उदासी से भरे दिन-दुपहरों में
हल्दी और लहसन की गंध
में डूबी हथेलियों वाली
औरत को उसदिन
महसूस हुआ कि उसके पाँव
हवा में उड़ते रहते हैं।
उसने कैलेंडर पर एक और
कॉलम डाला है-
रोने का हिसाब….

(दो)

उस बेकार, मनहूस औरत ने
कई दिनों से आइना नहीं देखा था
उसे हुक़्म था कि फ़ालतू के कामों में
वक़्त जाया न किया जाए
बेध्यानी में एक दिन
उस औरत ने कैलेंडर पर
एक तारीख़ के नीचे
लिख दिया था कि ‘रोना है’

वो तारीख़ कब की बीत गयी थी
बीत गयी बारिशों की तरह
उसे फ़ुरसत का एक दिन चाहिए था
जब वो रोने का हिसाब करे
दिन बीत जाते थे
तवे पर पड़ी पानी की बूंदों से
ऐसे में उसने एक दिन आइना देखा
रातों की स्याही आँखों के नीचे देखी
उसने वो कैलेंडर उतारकर
कल रात हाथ सेंक लिया
और अपने बदन की कब्र में
कुछ और आँसू दफ़्न किये।

(तीन)

औरत की पीठ पर एक तिल था
और एक था उसकी दाईं कान के नीचे
दुनिया के सब हसरतें
उन दो हिस्सों में कैद थीं,

औरत अक़्सर जोर-जोर से हँसती
और बदले में सुनती
‘कैसे हँसती हो तुम के ताने’
आँखों में पढ़ती ‘पागल औरत’

औरत डरती नहीं थी पिंजड़ों से
सदियों से साथ रहकर
वो जानती थी जंजीर भी
उसकी ही तरह बेबस है
पीठ के तिल से जरा नीचे
कोई नीला निशान नहीं होता था
न ही दाएं कान के पास
होती थी कोई खरोंच
दोनों हाथ उठाकर जूड़ा बाँधते हुए
औरत अक्सर बुदबुदाती थी
शायद कोई प्रार्थना या
किसी बिसरे यात्री का नाम

मरा हुआ ईश्वर

सती की निर्जीव गात से कट-कट कर
गिरते अंग हूँ मैं
अक्षय-वैभवा लक्ष्मी की संतानहीनता का
दारुण दुख हूँ मैं
द्रौपदी के खुले केशों
और अविरल अश्रुधार के बीच
उसकी आत्मा से उठती पुकार मैं ही हूँ
मैं हूँ उसकी नग्न छाती भी
मैं हूँ गर्भिणी सीता के मुख पर पसरा विषाद
उसके नेत्रों में ठहरा हुआ प्रश्न हूँ मैं
मैं ही हूँ कैकेयी का हठ भी
वय-हीन संधि मैं ही हूँ
मैं हूँ उर्वशी का वचन-भंग
उसका स्वर्ग से निर्वासन भी मैं ही हूँ
मैं हूँ शापग्रस्त शकुंतला कि भ्रांति
उसके चरित्र पर उठता हुआ हर प्रश्न हूँ मैं
मैं हूँ मल्लिका कि प्रतीक्षा
प्रियंगुमंजरी का ताप मैं हूँ
मैं हूँ माधवी का बंटा हुआ यौवन
मैं हूँ जंगल में विश्वास की गहरी नींद सोती
दमयंती का खंडित चीर
मैं हूँ यशोधरा का परित्यक्त जीवन
तिष्यरक्षिता कि वासना मैं ही हूँ

निविड़ रात्रि में
सड़कों, गलियों, नालियों के पास
गहन अंधकार में
फेंके गए निःस्पंद शरीरों पर
उभरे असंख्य घाव हूँ मैं
मैं ही हूँ उन अनावृत देह से बहता रक्त
सामर्थ्य से अधिक पीड़ा वहन करती
चेतना कि बारीक लकीर समेटे
पलकों की धीमी फरफराहट
और कंठ में घोंट दी गयी आवाज़
मैं ही हूँ
मैं हूँ वह झुका हुआ सिर
लज्जा से हज़ार मृत्यु भोगता
अपनी ग्लानि में गलता हुआ,
उनकी आत्माएँ नोचकर
खाने वाला पिशाच मैं ही हूँ

मैं हूँ गर्भ की चुप चीखें
जांघों पर लिथड़ा रक्त मैं ही हूँ
चूल्हे में जलती,
अदहन में खदकती
हर चौक, चौराहे पर उबलती
तेज़ाब से जलती
पँखे से लटकती
उन सभी देहों के संग मैं भी हूँ
मैं हूँ तुम्हारा ईश्वर, टुकड़ो में बंटा हुआ
मैं हूँ तुम्हारा ईश्वर मरा हुआ

स्मृति

1

दुःख-सुख की कई अवस्थाओं में से
समय ने जो छाँट लिया था
वह बच गया था मेरा अभीष्ट
वह बन गयी थी स्मृति

2

तुम्हें उतना बचा रखा था
जितना जिए जाने में बाधक नहीं था
जितना ला सकता था
एक छोटी मुस्कान कभी भी

3

तुम्हें उतना भुला दिया गया था
जितना उठा सकता था अमर्ष
जो जगा सकता था कोई
सुप्त असह्य पीड़ा

4

चुन लिया था समय ने
स्वर्ग- सब सुन्दर याद रखकर
भोर के स्वप्नों में बहुधा
नर्क झाँक जाता था

5

क्या और हो सकता था
ने उतना ही ठगा है भीरुता को
जितना ‘हम ने क्यों नहीं समझा’
ने कातरता को

6

अवचेतन में सिमटी रही
और जो एकाएक सामने आकर
कर गयी थी क्लांत
वह थी तुम्हारी गंध

7

स्पर्श आता था नहीं
स्मृति की ज्यामिति में
वह मिटता है सबसे पहले
रहता है सुरक्षित व्याप्ति में

8

स्मृति बन जाती है पगडंडी
जिसपर चलकर कभी भी
जाया जा सकता है
पुल के उस पार, अनामंत्रित

9

स्मृति इतिहास नहीं है
अतीत का पुनर्पाठ भी नहीं
स्मृति नहीं है वरदान
स्मृति है- केवल भंग आवृत्ति

आत्मस्वीकृति

नींद की चौहद्दी पार कर
स्वप्नों के धुँधले रास्ते पर
चलने लगती हैं कुछ अबूझ पीड़ाएँ
जो खींचती है एक बारीक महीन रेखा
अकेले होने और अकेले पड़ जाने के बीच
अपने को समझाने के कई तरीकों में
हम सृष्टि के नियम एक बार फिर दुहरा लेते हैं
‘जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च’
मन के शून्य-मंदिर में
न कोई स्वर है न कोई सुगंध
सब कठोर है प्रस्तर पिंडो सा
जिसे होना चाहिए था नये जन्मे
शिशु की मुस्कान सा कोमल
मनुष्य का वही हृदय
दुनिया की सबसे कठोर वस्तु भी हो सकता है

दिन-रात

बनिये की दुकान से सौदा लेकर
लौटती, दो चोटियाँ लहराती रहती उसकी
हाथ में रहती एक रुपये वाली टॉफी अक्सर
जो चिल्लर की जगह उसे थमाया जाता
एक दिन लौटी
टॉफी की जगह
आँखो में आँसू लेकर
उस एक ही दिन में ही बड़ी हो गयी लड़की

एक रात
नींद की गोद में दुबकी हुई
लड़की की दोनों जाँघों में
कोई बाँध गया, मन भर वज़न
पेट में उठी एक लहर
बेधड़क जो नींद की चारदीवारी में भी घुस आयी
उसकी चद्दर, गिलाफ और कपड़ों में
कोई रच गया था रक्तिम बेल-बूटे
उस एक रात में बड़ी हो गयी लड़की

बाढ़ के समय प्रार्थना

ओ मेरी माँ! मेरे पूर्वजों की माँ!
अपनी उद्दंड बेटियों को डाँटो!
तुम्हारी ये जिद्दी बेटियाँ ये धारायें उमगकर दौड़ती चली आ रही हैं
गाँव के सीमांत पर!
खेतों को, फसलों को पकड़-पकड़ लोटती है
देखो! ये ले गईं आम का बगीचा भी

याद है तुम्हें! चार साल पहले तुम्हारे खुले केशों की जटाओं जैसी ये चंचल बालिकायें
खिलखिलाती हुई ब्रह्म-वृक्षों के जोड़े में से एक को ले गयी
समझाओ इन्हें!

ऐसे दिन-दहाड़े अपने घर से इतनी दूर-दूर ना आया करें
इनके आगमन से गाँव में अकाल मृत्यु की घण्टियाँ बजती हैं
पशु-पक्षी-मनुष्य-वृक्ष अवाक इन्हें ताकते हैं
इन बिगड़ैल किशोरियों का हठ क्या बाँध को ठेलकर ही मानेगा

मेडुसा के केशों के अनगिनत सर्पमुखों-सी ये तुम्हारी लड़कियाँ जहाँ से गुजरती हैं, खेल-खलिहानों को नष्ट करती चलती हैं
दिशा-दिगन्तर को ध्वस्त करती चलती हैं।
ओ मेरी मातृमुखी माँ
अब समेटो इन्हें, वापिस बुलाकर अपनी गोद में सुलाओ

महामाया 

ओ मेरी कुलदेवी!
कृष्ण की भगिनी
तुम्हारा नाम महामाया किसने रखा!
किशोरवय में ‘माया महाठगिनी’ सुनकर मैं विस्मित होती थी
सोचती थी तुमने किसका क्या ठगा!
बाद में बताया गया कि ‘ब्रह्म सत्यम् जगन्मिथ्या’
सत्य तो तुम्हारा भाई था और तुम मिथ्या!

भाद्रपद के कृष्ण-पक्ष की मध्यरात्रि में
तुम भी तो जन्मी थी
लेकिन तुम्हारे प्राण का मोल कम था जोगमाया
भाई के अनमोल जीवन में अनगिनत बहनों का
चुपचाप मार दिया जाना पुरानी परंपरा रही देवि!

सोचती हूँ तुम अगर बचपन में चोरियाँ करती तो क्या वैसा दुलार मिलता!
तुम भी गाँव के सभी पुरुषों संग रास रचाती तो क्या भगवती कहलाती
गौ-चारण के बहाने तुम कालिंदी-तट पर प्रेयस से मिलती तो गाँव आह्लादित हो भावमग्न रहता!

पांचजन्य फूंकती, चक्र चलाती, गीता का ज्ञान देती हुई
तुम्हारी ओजस्विनी काया कि कल्पना करती हूँ
धर्म के नाम पर अपने बाँधवों का रक्त बहाने पर संसार तुम्हें पूजता!
मुझे भय है कि तुम्हें हर क़दम पर इतना लांछित और अपमानित किया जाता कि तुम्हें जन्मते ही मर जाना बेहतर लगता…

गीदड़ के दाँत

आठ महीने की गर्भवती वह स्त्री
रुग्ण काया और शिथिल कदमों से कछुए की तरह
पैरों को घसीटती हुई दवा कि दुकान गयी थी

इस देश की असंख्य स्त्रियों की तरह न वह पति को प्यारी थी
न ससुराल को
मायका भी कन्यादान को तिलांजलि मान संतुष्ट बैठा था

उसकी खोज-ख़बर कोई नहीं लेता था तो वह कितने दिनों की भूखी थी या रक्त कितना कम था यह कौन पूछता
थककर खरगोश की तरह लौटती बेर एक पेड़ के नीचे सो गई

कार्तिक की ठंडी भोर में मिला उसका शव
परदेसी पति लौट आया शरीर पर बने घावों का दाम लेने
गाँव के चुनाव का खेल ही उलट गया

अगड़े-पिछड़े, झूठ-सच, दुष्कर्म-अकाल मृत्यु, पुलिस-अस्पताल, अग्नि-आकाश, राजनीति-जाति, खुदबुद-खुदबुद

सरकारी अस्पताल में चुपचाप बैठा वह जूनियर डॉक्टर हतप्रभ होकर सोचता है आदमी और गीदड़ के दांतों का अंतर

लौटना और भूलना

खिड़कियों पर जमी ओस पर
मैं उकेरूँगी कोई आसान चिन्ह
कोई सीधी लकीर या कोई टूटता तारा
या कुछ भी जो न लिखे तुम्हारा नाम
सुबह सुने जा सकते हैं कई स्वर
कई धुनें, कई राग-रागिनियाँ
कई बूझ-अबूझ संगीत भी
जो भुला रखे तुम्हारी आवाज़ पहनने की लत
सुबह की जा सकती हैं कई प्रार्थनाएं
रात की कई धुँधली कामनाओं के बाद
उन प्रार्थनाओं में तुम न आओ

एक अधजली इच्छा रखूँगी दिए की जगह
किसी सुन्दर कविता की किसी ठहरकर
पढ़ी जाने वाली पँक्ति को पढूँगी
बिना तुम्हारी मुस्कान याद किये
बिना तुम्हारे चेहरे की छांह छुए
रंग-फूल-गंध-धूप-हवा-पानी-रात-दिन
सब शाश्वत हैं फिर भी बदल जाते हैं

मर जाना नहीं होता साँस लेना बंद करना
जन्म लेना नहीं होता है नयी देह पाना
मैं इस तरह कई छोटे कदम चलूँगी
वापसी की ओर,
लौट आना और भूल जाना दोनों
लगते एक हैं, होते अलग हैं

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