उपेन्द्र कुमार की रचनाएँ

ये जो दर्द है अपने सीने में, ये नया भी है, ये अजीब भी 

ये जो दर्द है अपने सीने में, ये नया भी है, ये अजीब भी
कि उगा है दिल की ज़मीन से ये दिमाग से है क़रीब भी

जो क़दम हमारे ये तेज़ हैं ये उसी उम्मीद का फैज है
जो दिखाए मौत की घाटियाँ जो बनी है अपनी सलीब भी

यूँ जले नगर कि शवों को भी वो कफ़न न कोई दे सका
कि पहुँच के चाँद प आदमी, रहा किस कदर गरीब भी

मेरी पूँजी तमाम दर्द थी उसे किस तरह कोई जानता
ये जो दर्द होता ज़मीन-सा कोई माप लेती जरीब भी

कोई और वादे कीजिए कि समय का दु:ख तो दराज है
न ये वक़्त ही टलने की चीज़ है, न बदल सकेगा नसीब भी।

रहता हूँ, मगर शहर में आबाद नहीं हूँ 

रहता हूँ, मगर शहर में आबाद नहीं हूँ
बेचैन हूँ, बेहाल हूँ, बर्बाद नहीं हूँ

ज़ंजीर कहीं कोई दिखाई नहीं देती
उड़ने के लिए फिर भी मैं आज़ाद नहीं हूँ

नाकरदा गुनाहों की सजा भोग रहा हूँ
भगवान जिसे सुन ले वो फरियाद नहीं हूँ

मंज़िल के पास आके ही भटका हूँ हमेशा
कहते हैं लोग फिर भी मैं नाशाद नहीं हूँ

उसकी ही मुहब्बत में कटी उम्र, पर अफ़सोस
चाहा है जिसे जी से उसे याद नहीं हूँ।

ठिठका एक पत्ता 

क्षणांश को रुका हुआ है सब कुछ
बून्दें अभी बरसकर
रुकी थीं
पत्तों पर ठिठकी
चू जाने को आतुर
रुकी थी हवा
पत्ते भी रुके थे
आतुर हवा के साथ हिलने को
गति के पहले
एक क्षण का यह रुकना
उस सबका रुकना
जो थे बेताब
एक क्षण को ही सही
जैसे बुझी ईर्ष्या की आग
छीना-झपटी की चाह
युद्ध की घोषणा
चलने से पहले रुकी हुई तलवार
ऐन क़लम की नोक पर रुका हुआ फ़ैसला
बेसब्र काग़ज़ पर उतरने को
टूटकर पेड़ से गिरने को
ठिठका एक पत्ता
डैने पसारने के ठीक पहले
रुकी हुई उड़ान
प्रविष्ट जैसे एक क्षण को
सारी सृष्टि में
अन्तरिक्ष का शून्य
रुकने
ठिठकने का जादू यह
जो क्षणांश को चल जाता है सब पर
गति को बनाता
कुछ और ज़्यादा
गतिशील ।

इंतज़ार में कम्पित हो कर थकी आँख के खुले कपाट

इंतज़ार में कम्पित हो कर थकी आँख के खुले कपाट
पलकें झुकी नज़र शरमाई बड़े दिनों के बाद यहाँ

कैसी पूनो ये आई है महारास के रचने को
फिर चरणों ने ली अंगडाई बड़े दिनों के बाद यहाँ

मन के सूनेपन में कूकी आज कहीं से कोयलिया
मोरों से महकी अमराई बड़े दिनों के बाद यहाँ

है वैसी की वैसी इसमें परिवर्तन तो नहीं हुआ
आज ये दुनिया क्यूँ मन भाई बड़े दिनों के बाद यहाँ

दुःख में तो रोतीं थी अक्सर रह रह कर आतुर आँखें
सुख में भी कैसे भर आयीं बड़े दिनों के बाद यहाँ

चारों तरफ लहू का समंदर न देखिए

चारों तरफ लहू का समंदर न देखिए
हिंसा ने कर दिया है जो मंजर न देखिए

बाहर की ये चमक ये दमक और कुछ नहीं
ये तो लिखा हुआ है कि अंदर न देखिए

ख़ुद को संभालना कोई मुश्किल नहीं यहाँ
चल ही दिए हैं आप तो मुड़कर न देखिए

जख़्मों पे फिर नमक ही छिड़कना है क्या ज़रूर
मिल कर बिछड़ रहे हैं तो हँसकर न देखिए

संभव नहीं है आपका रहना अगर यहाँ
लालच भरी नज़र से मेरा घर न देखिए

टकरा गई नज़र तो सँभल ही न पाओगे
इस शहर में दरीचों के अन्दर न देखिए

हवा, पानी और धूप 

हवा, पानी और धूप
हवा
या पानी
चाहे जैसे भी फैलें
धूप की ही तरह
घुलते नहीं किसी भी सम्भावना में
बस धीरे से हो जाते हैं शामिल
घटनाओं में बारातियों की तरह
न धूप में सामर्थ्य है
हवा बनने की
न हवा में ताक़त है पानी बनने की
और चाहे जितना लहरा ले
चमक ले धूप में
पानी नहीं बन सकता धूप
कुछ और बनना है
केवल भटकना
सही तो है यही
कि रहे वह वही जो है
और बदलने की बजाय
अपने को बनाता रहे
समय के दुहराव में
क्रमशः बेहतर
हवा चले तो गुनगुनाती हुई
धूप पसरे तो उम्मीदें जगाती हुई
और पानी की धार मन को गुदगुदाती हुई

वादे थे फिर वादे ही वो टूट गए तो क्या कीजे

वादे थे फिर वादे ही वो टूट गए तो क्या कीजे
साथी थे फिर साथी ही वो छूट गए तो क्या कीजे

तन-मन से प्यारे थे सपने चाह ने जो दिखलाए
सोच की आँखें खुल जाने पर टूट गए तो क्या कीजे

प्यार के वो अनमोल खजाने आस रही तो अपने थे
उन्हें निराशा के अँधियारे लूट गए तो क्या कीजे

जीवन नैया के जो चप्पू हमने मिलकर थामे थे
अनहोनी के तेज़ भँवर मे टूट गए तो क्या कीजे

खुशहाली ने जिनकी खुशी में घर संसार सजाया था
बुरे वक़्त में मीत वही जो रूठ गए तो क्या कीजे

आस हवा का दामन निकली हम बेचारे क्या करते
इंतज़ार में भाग हमारे फूट गए तो क्या कीजे

दर्द के रिश्ते इनसानों में जब तक थे मज़बूत रहे
प्यार के धागे कोमल थे जो टूट गए तो क्या कीजे

शर्तें समय के दाँव लगाये हुए हैं लोग

शर्तें समय के दाँव लगाये हुए हैं लोग
क्या-क्या न ज़िन्दगी को बनाए हुए हैं लोग

ख़ुद को ही ख़ुद से खूब छुपाए हुए हैं लोग
सूरज पे मगर दोष लगाए हुए हैं लोग

अब आईना छुपाइए, चेहरा बचाइए
पत्थर हरेक ओर उठाए हुए हैं लोग

कानून जा छुपा किसी कातिल के शिविर में
इन्साफ की गुहार मचाए हुए हैं लोग

चलिए तिमिर के पार के मंज़र भी देख लें
उम्मीद की मशाल जलाए हुए हैं लोग

चुप्पी तो उनकी सिर्फ छलावा है वक़्त का
दिल में हज़ार ग़म भी छिपाए हुए हैं लोग।

सत्तू 

कोशल और मगध के
घुड़सवारों
और पालकीयुत वाहनों के
अवशेष
चाहे न हों
आज भी पूर्व की
यात्राओं का अपूर्व
विषय है राजनीति

राजनीति से ऊपर भी
कुछ है
और वह है सत्तू
जिसकी सजी है आज भी
मौके की जगह
सड़कों के किनारे
दूकानें
तिकोनी
छोटी पर परचम टिकाये
हरी मिर्च
खींचती है ध्यान
बैठें हैं
ज़मीं पर ही
सन्नद्ध
आस्वादक
पूरब में सबसे सहज
सबसे लुभावना
कैसेट का गाना
सत्तू का खाना

अनाज को भुनाना पीसना
सही अनुपात में मिलाना
कला है वैसी ही
जैसे पंच सितारा होटल में
खाना बनाना
अथवा
बनाना ही क्यों
ठीक-ठीक नमक पानी मिलाना
कायदे से सानना
चॉप-स्टिक या काँटे छुरी द्वारा
खाने से कमतर कला नहीं
हाथ से सत्तू खाना

भले ही हो हुसैन की
कामकला से लेकर
चित्रकला तक के
प्रशंसक और कलाकार
माने या न माने
मानते हैं इसे सच
भड़-भूजे से चक्की तक की
सत्तू की यात्रा के जानकार
और बड़े -बड़े कलाकार
जिनमें शामिल हैं–
रामू लोहार
भोलू चर्मकार
दमड़ी बढ़ई
और सरजू कुम्हार

ऐसी यात्राओं में
कभी-कभी तो सत्तू
आ बैठता है एकदम बगल में
किसी पोटली में बँधा
किसी झोली में ठुँसा

अब बौड़म जैसा
सवाल नहीं दागना है
कि पोटली में बँधा है सत्तू ही
कैसे पता
अरे भाई!
ताज़ा पिसे सत्तू की सोंधी खुशबू
कभी कैद हो सकती है क्या
किसी पोटली या एयर बैग में
सत्तू को
केवल सत्तू
समझने वालों के लिए
जरूरी है जानना
कि सत्तू का भी
अपना एक इतिहास है

गौरवशाली और महान
मगध साम्राज्य जैसा

स्वाद लाज़वाब
पौष्टिकता बेहिसाब
न बर्तन-बासन की खटपट
न चूल्हे-चौके की तक़रार
न पकाने का झंझट
न पानी
न उबाल
थोड़ा नमक
और हरी मिर्च हो तो बात ही क्या
बस
गमछे में ही साना
और खा लिया
निर्विघ्न

सत्तू के इन्हीं गुणों ने
बना डाला था इसे
सर्वोत्तम मार्शल फ़ूड
और मगध साम्राज्य की सेना
इसी के भरोसे निकलती थी
अपने विजय अभियानों पर

बिना सत्तू
जहाँ मुश्किल है ग़रीब का खाना
वहीं यह भी सच है
कि नहीं कर सकते आप शामिल
सत्तू को शाही दावतों में
परंतु प्रत्येक शाही तामझाम
चाहे वह प्रजातंत्र का ही क्यों न हो
निश्चय ही टिका होता
सत्तू खानेवालों पर

सत्तू पर पले पेटों का ही दम है
जो दौड़ता चला जाता है
दहकते सूरज की ओर
फाँदता चला जाता है
ठिठुरते कोहरे की दीवारों के पार
मचाता रहता है घमासान
करता है जीना आसान

सत्तू की प्रशंसा
प्रशंसा है इन्हीं करोड़ों की
जिनके लिए सत्तू
महज साधन नहीं है
भूख मिटाने का
सत्तू ब्रह्म है
राम राज्य का
यथार्थ है और
गारंटी है
कि कमज़ोर आदमी
न केवल रहेंगे ज़िंदा
तमाम अभावों के बरक्स
वरन जीतेंगे
आनेवाले एक दिन
अपनी तमाम हारी हुई लड़ाइयाँ

और उसी दिन लड़ना पड़ेगा
फिर से
मामूलीपन के वेश में
असाधारण संग्राम
सत्तू की पक्षधरता में।

गुम हो गई है संसद 

कथा प्रवाह को
तोड़ते हुए
सदियों पहले के समय से
आवाज अपनी जोड़ते हुए
मैं बोल पड़ना चाहता हूँ
क्यों जूझ रहे हो व्यर्थ कर्ण
कीचड़ में धंसे रथ चक्र के साथ
तुम तो बहुत पहले ही
हार चुके हो युद्ध

हार गए थे तुम
उसी दिन जब
उस व्यवस्था से मिलाया तुमने हाथ
जिसने बहाया था कभी तुम्हें
नदी को धार के साथ
या फिर हारे थे उस समय जब
लगे थे खड़े होने
दानवीर होने के
खोखले दर्प के साथ
नदियों के किनारे
साथ वालों से बित्ता भर ऊपर
उठाए हुए सर

पक्ष या विपक्ष में
कहीं भी खड़े होने से
तो अच्छा था कि
तुम कवच-कुण्डल संभाले
उन रास्तों पर चलते
जो बचपन से थे
देखे भाले

कहीं मिल बैठते साथ
एकलव्य, शिखंडी, शकुनि
घटोत्कच और विदुर के
अपनी-अपनी व्यथाओं, विह्वलताओं को
कहते-सुनते एक-दूसरे से
सब के दुख-सुख
बँटते
साथ मिला, रस्सी-सा
और तान देते उसे
समय और सच के खूँटों के बीच
देखते फिर कहाँ होता धर्म
और कहाँ होता युद्धद्य
कृष्ण भी आते पास तुम्हीं लोगों के
गाने को गीता।

पर नहीं हो पाता है
कुछ भी
बदलाव नहीं आता है कोई
चलती रहती है कथा
वही की वही

सच में
कहाँ हैं वो रास्ते
गुज़रते नहीं जो
जंगलों से होकर
कब लिखी गई वो कविता
हुई नहीं जो अरण्य रोदन

झुण्ड
बिचौलियों के
मँडराते हैं साथ गिद्धों के
शिकार के साथ करके बलात्कार
बनाई जाती है भाषा वयस्क
नहीं होता जिसके लिए कोई अन्तर
किसी वेश्या से
पूछने में उसकी पसन्द, या
देने में चुनने का अधिकार
किसी भूखे पेट को

भेड़ियों का जुलूस गुज़रता है
लालच से चमकती आँखें लिए
हिंसक जबड़ों में सुन्दर शब्द सजाए
प्रजातंत्र की जय गोहराता

और हालात हैं कि
बच्चे जैसे बिछुड़े मेले में
स्वार्थ के रेले-पेले में
गए हैं बिछुड़
जन और तंत्र
अब रौशनी है, रौनक है
आतिशबाजी है
पर तंत्र नहीं राजी है
मेले से बाहर जाने को,
जन को लिवा लाने को,
पीढ़ियों का विश्वास और भरोसा
खो जाता है क्षणों में
और कहीं भी रहने बैठने को
तैयार हो जाता है आदमी
तटस्थ आँखों से देखता
पसलियों की ओर बढ़ते चाकू को

लहू-लुहान लाशें
सपनों की
सदाशयता
मनुष्यता की
आकर गिरती है
धड़ाधड़ वहीं
जहाँ हुआ था तय
प्रजातंत्र के ताजमहल की
नींव का खुदना

लगता है अभी वक़्त नहीं हुआ
ताजमहल बनाने का
वैसे भी पहचान सही वक़्त और
सही चीजों की गई है खो
जब से अन्धा इतिहास
लगाया गया है पाठ्यक्रमों में
भूख की कक्षा में हो रही है कोशिश
सिवा रोटी के हर चीज पढ़ाने की

और भी कोशिशें जारी हैं
जैसे
खड़े होकर मूतते आदमी के
धार्मिक संस्कार जानने की
उसके प्रमाण पत्रों के सहारे…..
विस्फारित नेत्रों से
देखती हे कविता कि
बनाया जा रहा है उसे असमर्थ
तीर को तीर
और तमंचा को कहने से तमंचा
जेल को जेल
और घर को कहने से घर

भुक्खड़ पेट के नंगेपन को
निरर्थक शब्दों से ढँकने की
अश्लील साजिश से
अफनाकर
बमकते हुए
वह उठा लेना चाहती है बन्दूक
और गाना चाहती है गोलियों के गीत
धमाकों और धुएँ के बीच
पहचान खोते रिश्तों
के अन्दर से खींच लाना चाहती है
उस आदमी को
जिसमें फूलों और तितलियों की
पहचान बाकी हो
और जो एक दुधमुँही किलकारी पर
हो जाए न्योछावर
बिना किए चिन्ता
अपनी फटी कमीज या
इस बात की
कि घटती रोटियों के बीच
आ गया है एक और नया हिस्सेदार

पर एक पाएगी क्या
कविता ऐसा चमत्कार
काफी नहीं है केवल
चाहना और कहना
कहाँ हैं?
ऐसे सधे हाथ
ऐसे विलक्षण माथ
ऐसे बाँके औजार
ऐसे मेहनती कामगार
कहाँ हैं…..
और फिर कविता की ओर
आता ही है कौन
सब देखते हैं टी.वी.
रहते हैं मौन

कोई नया नहीं है यह मौन
यह सन्नाटा
जो छाया है, छा जाता है अक्सर
होता है जब भी
द्रोपदी का चीर हरण
द्रोण का वध
या भीष्म का भूमि शयन
कटे पड़े की थुन्ही पर
बैठी चिड़िया
गा रही है या करती है रूदन
पहचान इसकी
खो देता है समाज जब
धोखे का एक महल
यातना के अनगिनत तहख़ानों के साथ
करती है तैयार सत्ता तब
हर युवा चेहररा
रक्त और कीचड़ में सना
करता है प्रतिवाद
नपुंसक क्रोध से निकल
गूँजती है करुण चीत्कार
कोई विशेष अर्थ नहीं
रह जाता तब
बच्चों के बस्ता दबाए
स्कूल जाने में
बच्चियों के गुड्डा-गुड्डियों से
मन बहलाने में

अकाल की नैतिकता का
पहला पाठ शुरू होता है क्रूरता से
और अन्त अयथार्थ स्वर्ग के
अश्लील सुखों के आश्वासनों में
काफिले सत्ता के गुज़रते रहते हैं
इन्हीं आश्वासनों के पुलों को
रौंदते हुए
कठुआये चेहरों को
बिछाते हुए लाशें
शिनाख्त जिनकी हो नहीं पाती
पुलिस की जाँच
और चीरघर के सारे मजाक के बाद भी

पेड़ों और पत्तियों
के सारे विरोधों के बावजूद
न तो मौसम
और न जंगल
तैयार हैं अपहृत साँसें लौटा
अपने रंग-ढंग बदलने को
थकी-सी धरती
जाकर लेट जाती है
दूर कहीं क्षितिज पर
काले आसमान के साथ
वनस्पतियाँ
उल्टा लटकने की तैयारी में
बहलाती फुसलाती हैं
तारों को
जिन्होंने सूरज और चाँद से
डरना छोड़ दिया है कब का

बढ़ता चला जा रहा है
कुर्सी का पेट
बहाल किया है उसने
अभी हाल ही में
छिनार राजनीति को
अपनी सेवा में
किताबों से साठ-गाँठ कर जो
गढ़ रही है नित नए नारे
कुर्सी की तरफदारी में
गनीमत है कि
जिन पर लिखने जाने थे ये नारे
उठा ले गए हैं
कुछ कंकाल वे दीवारें
लेकिन कब तक…..

कब तक
खै़र मनाएगी बकरे की माँ
चाकू, चाकू है और गोश्त, गोश्त
बहुत पुराना है
दोनों का सम्बन्ध
और उतना ही पुराना चला आ रहा है
ये सिलसिला
हाँ सच में
तुम्हारे पास खोने के लिए
अपनी गरदनों के अलावा कुछ भी तो नहीं

केवल शब्दों के सही चुनाव
और व्याकरण के अनुशासन
तक ही सीमित मत करो
कलम के चमत्कार
गढ़ने दो उसे कुछ नए आकार
क्योंकि
उम्मीद तो हर हाल में
बची रहती है
उसे बचाए रखना पड़ता है
अत्याचारों और चमत्कारों के बाहर
अलगी पीढ़ी के लिए
चाहे जितना भी तिरस्कृत होता रहे जीवन
भ्रूण हत्या के पाप से
बचना है इन्सानियत को
वादा है भालों और तलवारों का
वे बचाए रखेंगी
पृथ्वी पर इन्सानियत को

वैसे अजनबी होने की
शुरुआत तो हो गई थी
उसी दन
जब हमने तलाशी थी
अलग-अलग जगहें
अपनी बची हुई रोटियों को रखने के लिए

अब तो नई पहचान बनाने को
सोचे हुए नारे हैं
गढ़े हुए गीत हैं
हँसुए का गीत
रेडियो का गीत
हथौड़े का गीत
टीवी का गीत
पकी फसलों का गीत
उजड़े गाँवों का गीत
सड़कों का गीत
जूते का गीत
और सबसे ऊपर
जूतमपैजार का संगीत

संगीत देता है उत्साह, उमंग
संगीत देता है शक्ति, सबको
नंगे खुले सीनों को
बन्दूक थामे हाथों को
ज्यादा किसको
यह तो ठक-ठक करते बूटों की
तफ़तीस ही
कर पाएगी तय
पर मौत तो होती है मौत
और हत्यारे होते हैं हत्यारे
परिभाषा बदल जाए हत्या की
तो क्या पहचान भी बदलेगी हत्यारों की

अकाल, भुखमरी
और संक्रामक रोगों में हुई मौतों
से शायद ज्यादा
सभ्य और संस्कारवान होती हैं
साम्प्रदायिक दंगों, आजगनी, लूटपाट
और हिंसक मुठभेडों में हुई मौतें
इसी अनुपात में हो गए हैं
हत्यारे भी सभ्य
फेंक कर हथियार पुराने
ओढ़ लिए हैं विचार नए
नहीं रह गया है अब उनका
चेहरा जल्लादी
हँसते मुसकाते
फूल से खिले चेहरे वाले
हत्यारे जी आइए, आइए स्वागत है आपका
हम लाएँगे बन्दूकें
हम बनाएँगे बम
हम चलाएँगे गोलियाँ
फेकेंगे बम
एक दूसरे पर
होली के रंगों की तरह
मनाएँगे नरसंहार का आदिम उत्सव
आओ, नए विचारों के उद्घोषक
नई कालिमा, नए अन्धकार के भगीरथ
आओ हमारे बीच
फेंको स्वर्णिम जाल
ताकि महसूस कर सके
हर आदमी
अपने को जिम्मेदार
उन तमाम अनकिए गुनाहों के लिए
जो मन्दिर
और खेत के बीच
हुए हैं कभी-न-कभी
और भूल जाए वो वादा जो
हर बच्चा माँ से करता है
फेंक दे वो वचन जो
हर पिता अपने बेटे को देता है।

ये हत्यारे जो
तरह-तरह के रूप रंग धर
तरह-तरह की बोलियाँ लेकर
हर दिशा से आते हैं
इनका हथियार बनने से पहले
सावधान होना
जरूरी है हर किसी का
इन फरेबी सौदागरों का
शिकार होने से पहले ही
होशियार होना जरूरी है
वर्ना ये चला देंगे तुम्हीं को
तुम्हारे विरुद्ध
बना लंेगे अपना काम
तुम्हारी कटी गरदनों के नाम
लड़ लेंगे अगला चुनाव
और प्रतिनिधि बन तुम्हारे चल देंगे
कहीं दूर देश
इसलिए आगाह किया जाता है
हर खास व आम को
रहे सावधान वो अपने बाप से
रहे सावधान वो अपने आप से
अब कहीं जाकर
हुई है पूरी जनगणना
कितनी-कितनी मुश्किलों को पार कर
फिर भी कटे हुए हाथों की संख्या
नहीं गई है घटाई
और बड़ा हो या छोटा
हर पेट माना गया है एक ईकाई
होना है इसी आधार पर मतदान
मतपत्रों की पेटियाँ गई हैं सजाई
पर मना है उनके पास जाना
समझ-बूझ और विचारों के साथ
हाँ बम बन्दूक आदि
रख सकते हैं पास

अब देखो हुआ वही
जो होता है अक्सर
बहुत संभलकर रखी चीज
हो जाती है गुम
वक्त जरूरत पर तलाशते फिरो हर
सम्भावित-असम्भावित स्थान
एक बार फिर बार-बार
नहीं मिलती तो नहीं ही मिलती है पर
अब देखिए न
ये तो हर है
हद की भी है हद
कि ऐन वक़्त पर
गुम हो गई है संसद।

द्रौपदी और दुर्योधन 

फिर एक बार
घूम रही है द्रौपदी
इन्द्रप्रस्थ के
नये भव्य प्रासादों में

चढ़ती है सीढ़ियाँ
नहीं पहुँच पाती कहीं
उतरती है सीढ़ियाँ
नहीं पहुँच पाती कहीं

बन्द है गवाक्ष
बाहर का कुछ नहीं दीखता
द्रौपदी खोलती है गवाक्ष
नहीं दीखता भीतर का भी कुछ

न कहीं जाती है
न कहीं आती है द्रौपदी
बस तेज़-तेज़ चलती है
जाने किधर से किधर

तेज़-तेज़ चलती
द्रौपदी
गिर पड़ती है
महल के
उसी पोखर में
जहाँ कभी गिरा था दुर्योधन
पूरी तरह
उस पानी से कभी
नहीं निकल पाती है
दुर्योधन की ही तरह
द्रौपदी

एक अधूरी कविता सुनते हुए

एक नदी
जिसे जाना था समुद्र तक
अचानक ठहर गई
और बैठ मेरे सामने
सुनाने लगी कविता

दूर बजते
सितार, वायलिन या बाँसुरी
अथवा शाम घर लौटते बैलों की
घंटियों के स्वर-सा
मधुर/कुछ-कुछ रुकता
धीरे-धीरे पास आता-सा
उस कुँआरी नदी की कुँआरी कविता के शब्द
फैलने लगे थे

नदी में नहाते लोग
नदी किनारे बैठ
मेरे साथ
सुनने लगे नदी को
नदी के उस गीत को
जिसे सुनना था नदी ने समुद्र को
जिसमें थे
कितने ही अधूरे सपने
अधूरी इच्छाएँ/और अधूरे चित्र
जो तटों ने, नावों ने, पक्षियों ने
बादलों ने, बरसती बूँदों ने
उसके जल में प्रवाहित दीपों और पुष्पों ने
उस तेज भागती नदी के मन में जगाइ थीं
उसके वक्ष पर उकेरे थे
और वही तेज भागती नदी
बैठी थी मेरे सामने
सुनाती हुई कविता
कितनी-कितनी अधूरी चीजों की

मैं मंत्रकीलित / भावविभोर
आँखों में आँखें डाले
आत्मविस्मृत, मुग्ध, सुन रहा था
एक अधूरी कविता

जो धीरे-धीरे
मेरे अभ्यन्तर को पूरी तरह भरती
समाती प्राणों की रिक्तता में
बदलती/नफरत को
निश्छल निरुद्देश्य-रागात्मकता।
पाशविकता को
संगीतात्मक सृजनशीलता को
बनती जा रही थी सम्पूर्णता की नदी

एक नदी
जो बैठी नहीं थी मेरे सामने
सुनाती अधूरी कविता
वरन् वह रही थी मेरे अन्दर
समस्त अधूरेपन को
बहाकर ले जाती हुई

गौरेय्या और घर

सुबह होते ही
फिर आ जाती है गौरेया

बज रही है घर की घंटी

अब न पूछना
बजा सकती है गौरेया घंटी
हम तुम बजा सकते हैं जब
तब गौरेया भी बजा सकती है, मेरे
घर की यानी,
कविता के घर की घंटी-
बजाती है रह-रह
हर मौसम में कविता के घर की घंटी

पिछले दिन कविता के घर बैठे-बैठे
मैंने ही टाला था-
कल आना और सच में ही
आ धमकी
कल यानी
कविता रचने के कल में
ओह भगवान
क्या करूँ
तुम्हारे घरों में
जब वह आती है
तो क्यों नहीं कहते हो तुम-

गौरेया रानी, शुभ है तुम्हारा आना
जहाँ मन करे, लगा लो घोंसला

इधर के ओसारे में
या इधर दालान में

पर कविता के घर में
गौरेया ने
जैसे ही
बिखेरे
टूटे कटे तिनके
नीड़ पूरा हो गया
हाँ पूरा

निकल कविता से बाहर
गौरेया ने फैलाए पंख
और एक बयानी-सी
स्मृति में छप गई
कविता की तरह

नदियों की स्मृति

स्मृतियाँ भी
होती हैं
नदियाँ
जब तब
जिन में डुबकी लगाना
सार्थक है
नदी-स्नान या
पीपल पर चल चढ़ाने-सा
विस्मृत होता जा रहा है
एक / आम रिवाज
मांगलिक अवसरों पर
नदियों को निमंत्रित करने का

बड़े भाई के विवाह का
निमन्त्रण-पत्र मैं स्वयं
देकर आया था गंगा को

यह भूलना कुछ यूँ है कि
नदियों की बातें
अब हम पूछने लगे हैं
संस्कारों की बजाय
भूगोल से
जिसे यह तक नहीं मालूम कि
नदियों के वंशज हैं
आदमी और वृक्ष

आदिम पुरखिनें
हमारी ये नदियाँ
जानती हैं हमारी व्यथा को
जानती हैं वे
वृक्षों को
उनकी कथा को

परन्तु हम तो भूल कर सब
बदलते समय में
व्यस्त हैं नदियों के खिलाफ
रचने में षड्यंत्र

नदियों की स्मृति आज भी
चाहती है सुनहरी कांति बाली
छवियाँ
क्योंकि उन्हीं से
उपजी है पवित्रता

व्यस्तताएँ

हो गई हैं इकट्ठी
बहुत सारी व्यस्तताएँ
चलें
अपरिचित
निरापद जगह
और छोड़ आएँ
व्यस्तताएँ

मुक्त हो बोझ से
चल दें
कहीं भी
पानी में भीगने
बूंदों से पुलक कर मिलने
या मूसलाधार पर हँसते हुए
रुकें किसी कोने में
और कसकर थाम लें
एक दूसरे की हथेलियाँ

जब हम निकलेंगे
घूमने
तो हवा शीतल होगी

हल्की
पारदर्शी
चाँदनी
पिघली होगी
पगडंडियों पर
जो गुजर रही होगी
हमसे होकर

जब चल रहे होंगे
साथ-साथ
तुम्हारे पद-चिन्हों पर
उग आएँगी कोपलें
उन्हें हथेलियों के बीच रखूँगा मैं
छतनार वृक्ष बनने तक

फिर
अमृत बन
दूर तक फैलेगी छाया

चलो छोड़ आएँ अब
व्यस्तताएँ

रखना खुले द्वार

वातायान द्वार
लगते हैं करने बन्द
न होने पर
ऋतुओं के थोड़ा भी
मनोनुकूल
या तेज होते ही हवा की गति तनिक-सी भी
जाते हैं बैठ बन्दी बने
गृह-कारा में निश्चिंत
वायु के तरंगायित कम्पनों
तथा मौसम के इंगितों से
कर अलग स्वयं को

चली होती है हवा
आकाशों के भी
ऊपर वाले आकाशों से
सूक्ष्तम कम्पनों की तरंगें ले
पेड़ों ने, पत्तों ने
झूम-झूम कितना कुछ कहा होता है उसमें
फूलों ने उसे कितना दुलराया
पक्षियों ने उसे कितना फड़फड़ाया
और सूरज तथा बादलों ने
जोन क्या-क्या भरा होता है उसमें।
और यह सब साथ ले
तेज-तेज चलती हुई
जब आती है वो
पास हमारे
तो बैठे होते हैं हम
बन्द कर अपने मन-द्वार
चुम्बकीय आकर्षण में आबद्ध
नृत्यरत पृथ्वी
और सूर्य के
मृदुल संकेतों पर
कर नित नूतन शृंगार
रिक्षा मानिति प्रकृति को
रंग उसे अपने रंग में
स्वयं की सफलता पर
उत्साहित, किंचित उत्तेजित-सा
नाचता, इठलाता
ऐसे ही जब मौसम भी
आता है पास हमारे
तो होते हैं बैठे हम
बन्द दरवाजों खिड़कियों से पीछे
असम्पृक्त

नहीं ज्ञात
किस सर्प के
ललचाने पर
कर लिया
अविष्कृत
और फिर
परम्परा के उत्तराधिकार में
पाते रहे
ये द्वार, ये गवाक्ष।
रहे ढूँढ़ते
नए-नए रास्ते
इनके उपयोग के।
बनते गए पाषाण
अंशों में
धीरे-धीरे।
किसी अनिश्चित अपरिचित
राम के आगमन तथा प्रज्ञा स्पर्श हेतु
प्रतीक्षारत रहने से तो होगा बेहतर
कि हर कोई सुने
हवा के प्रत्येक कम्पन को
करे प्रयत्न समझने का
उसमें निहित सन्देशों को
जो हो सकता है कुछ भी
अर्थहीन
अथवा विभिनन सृष्टियों के
अगम्य रहस्यों से
आविष्ट इतना
कि न हो पाए सम्प्रेषित
अविष्कृत शब्दार्थों से
परिचित ध्वनियों से।
जोन हुए त्यों की सीमा के भीत
यदि हर कोई सुने
शताब्दियों के
समस्त द्वारों को खोल
नहीं मानते हुए
परिचित ध्वनियों
शब्दों उनके अर्थों को
समझ की लक्ष्मण रेखा
और वो सब कुछ
जो जाए समझ की परिपूर्णता की परिधि में
उसे भी करे अविष्कृत

मंत्रों की भाँति
उचारे
मिलाए उन्हें
मिलाए उन्हें
खुले द्वारों, वातायनों से
आए इंगितों, संकेतों के साथ
बिना किए उन्हें
आन्दोलित या विचलित
गूँज की अनुगूँज की तरह
ताकि हवा फिर बहे
जा निकले बाहर
मौसमों के बीच
पेडों की ओर
जो सम्भव है
खड़े हों
या रहे हों झूम
निभाते हुए भूमिका अपनी
प्रकृति के निर्देशन में
रहे हों गा
स्वर मिला
बादलों तथा आकाशगंगा के संग

वहीं तो
मिलेगी हवा मौसम से
बताएगी
निष्प्रयोजन प्रयासों के रहस्य
द्वारों के खुलने का समाचार
मनाएगी
प्रज्ञा मुक्ति का पर्व
और बहला कर
ले आएगी
मौसम को
हम सबके बीच
ताकि मिलकर दोनों
कर सकें शुरू अपना काम
जो भी पाषाण-खंड
हों विद्यमान
हों वे अतीत या वर्तमान
चुन-चुन कर उन्हें
दे पहुँचा
भविष्य के भी पार
बस खुले रखना द्वार…

उठो चलो मेरे साथ 

क्या टकटकी लगाए हो
असाधारण की तरफ
तोड़ो इसे
उठो चलो मेरे साथ

जो मिलना है
साधारण से मिलेगा
जो खिलना है
धरती से खिलेगा
भूलो साधारण को साधारण समझना
सीखो साधारण को भी
असाधारण ढंग से जीना

देखो हर विशेष आया है
अविशेष से
दुनियाँ की समस्त क्रान्तियाँ जन्मी हैं भूख से

एक कठिन समय 

समय द्वारा उठाए
प्रश्नों का उत्तर
न तो धरती ने दिया है
ने आसमान ने

वैसे भी माटी
कहाँ देती है जवाब
आसमान कब सुझाता है समाधान

फिर भी
ये जो कर सकते थे किया
धरती के धारण किया
बीज बना सारे प्रश्न
आसमान
गाहे-बेगाहे
रहा उन्हें सींचता

बीजों से फसलें
फसलों से विकसित बीज
विकसित बीजों से

ऐसे ही
चलता रहा
सिलसिला
प्रश्नों के साथ
जुड़ा था समय
जो रहा बदलता उनके साथ-साथ
और आ गया
आज का समय
यानी एक कठिन समय

संध्या का दिव्यालोक 

घर जाने की
जल्दी में
जब तेजी से
कदम उठा रहे होते हैं आप
उस
पतली पगडण्डी पर
छपते निशानों और
दर्ज होती
पगध्वनि के साथ
तब देख सकते हैं
कुछ देर तक
धरती पर उतरने वाला
दिव्यालोक

असताचल मुखी
सूरज
जब रंगों को
रंगों से बदलता
लगा देता है
एक प्रदर्शनी
तक क्या आप चुन पाते हैं
अपनी प्रियतमा के लिए
कोई ओढ़नी या चुनरी
जब दिखाई पड़ता है गाँव का
धुँधला सिवान
छप्परों के बीच से उठते
धुएँ के बड़े-बड़े स्तूप
देख पाते हैं क्या
उनमें बनते-बिगड़ते विभिन्न आकार
ठिठक सोचते हैं क्षणांश
इतना कम धुँआ
क्यों उठता है कुछ टोलों से

लगते हैं
सजातीय
वे शीशम के अबोध
लम्बे ऊँचे वृक्ष
छायाएँ जिनकी
होती जाती हैं लम्बी
दिनांत में
साथ देने के लिए

बतियाने की ललक में
दौड़ता आया वो पहला तारा
उमग/उचक पंजों पर
पूछता है-
कहाँ/कौन
तो क्या आप उत्तर में
रह जाते हैं मौन

दीखती है जब पहली चमक
दीए या लालटेन की
अँधेरों के बीच
तो क्या आपके भीतर नहीं होती
प्रज्वलित कोई लौ
मन के कोनों को
करती आलोकित
किसी तरफ से आती
दूध धार की
मोहक… गर… गर… ध्वनि
खींचती है
तेज चाल को
और छोड़ देती है
किसी याद के
घने एकान्त में

पहुँचती है जब कानों तक
थकी बूढ़ी / रामचरितमानस / गाती आवाज
तो आता है याद
राम का वनवास
उभरता है बरसों घर से
बाहर रहने का
पश्चाताप

पोखर किनारे मन्दिर में
आरती की घंटी
किसी प्रौढ़ को भी
बना देती है शिशु
और तेजी से बढ़ते हैं कदम
सच, क्यों नहीं जान पाते
ये सब
जब लौट रहे होते हैं आप
जल्दी में घर
क्यों नहीं देख पाते
अपनी ही किसी विस्मृति में
संध्या का दिव्यालोक

एक दिन 

सुबह जागते ही
फड़फड़ाता हुआ
एक कबूतर आ बैठा
मेरे कन्धों पर और बोला-
मैं आज का दिन हूँ
मैं नहीं बता सकता / दिन और कविता
दोनों की शुरुआत में ही
कहाँ से आ गया कबूतर
फिर भी मैंने देखा उसकी ओर / किसी संदेशे के
अंदेसे में

संदेशे तो अब डाकिए लाते हैं
कबूतर तो केवल/फड़फड़ाते हुए
दिन बनकर आते हैं

मैंने सोचा-
कैसा दिन है
नहीं है जिसके पास कुछ भी
कहने के लिए

क्यों, तुम्हारे पास है क्या कुछ
उस दिन से कहने के लिए
पलट कर जबाव आया

गोआ का चेहरा

मेरी डायरी के
कुछ पन्नों पर
फैला है समुद्र

ये वे दिन हैं
जब मैं समुद्र के पास गया था
उसे छुआ था
उसके साथ जिया था
उसे महसूस किया था
और उसके अन्दर घुस
निकाल लाया
खारे पानी से भींगे
कुछ पृष्ठ
बहुत दिनों बाद तक
सुखाता रहा था मैं जिन्हें
मैदानी हवाओं में

फेनिल लहरों से लेकर पानी तक के
स्पर्श से उत्तेजित मदमाते
नाचते गाते लोग
भरे पड़े हैं इन पृष्ठों में-
विदूषकों से रंगीन परिधानों में सुसज्जित
रंगीन लोग
भोंडे और अश्लील ढंग से
प्रसन्न लोग
जो न देखते हैं
न पहचानते हैं

सागर का तातत्य
या विक्षुब्ध लहरों का
सर पटकना बार-बार
पथरीले तटों पर

बहुत से रंग-बिरंगे फूल
इन पृष्ठों पर
सजे हैं
एक टहक पीला फूल
जो आ जाता था हर कहीं
मुझसे मिलने।
एक हल्का गुलाबी
खुशबू से भरपूर
मुस्कुराता फूल
जो सदा रहा मेरे साथ
जीवन को करता
वसंत-वसंत

आगे के बयान में
नाच-गाने
और खाने-पीने से बेहतर है कि
मैं आपको बताऊँ
उस चित्र की बात

चटख और हल्के
इन्द्रधनुषी रंगों के बीच
भूरे और मटमैले रंगों पर
सुनहरी रंग चढ़ा
बनाए गए उस चित्र की बात
जिसमें एक चेहरा
किसी बुढ़ाती औरत
या शायद
किसी जवान होती लड़की जैसा
विवाहिता अथवा कुमारी
ठीक पता नहीं चलता
आँखों में टँगी है किसी
चिर-कुमारी की खिसियाई-सी प्रतीक्षा
और होंठ ऐसे जो बस अभी
तुरंत सुनाने वाले हों-
कोई डिस्को नम्बर
या फिर एक लम्बा उदास गीत

यह चेहरा
डूबता है
डोना पाउला के प्रत्येक सूर्यास्त के
साथ
और उग आता है
प्रत्येक सूर्योदय के साथ

पुश्तैनी मकान

इस बार जब गाँव गया
तो देखा-थोड़ा और ढह गया था
मेरा पुश्तैनी मकान

आने की खबर सुन
लोग मिलने आए
पता नहीं किससे
मैं सामने पड़ा/तो मुझी से कहा
मरम्मत नहीं हुई
तो गिर जाएगा
जल्दी ही किसी दिन
पूरा का पूरा मकान शायद इसी बरसात में

गरमी के दिन थे
बरसात की बात से
ठंडक मिली/अच्छा लगा
यह सोचकर भी
कि मुक्त होने वाला है शीघ्र ही
धरती का वह टुकड़ा
जिसकी छाती पर
नींब एक ऐड़ियाँ धसा
नाखून गड़ा
खड़ा है मेरा
पुश्तैनी मकान

उसे ही बनना है समर्थ 

उपस्थिति की निरंतरता से
अभ्यस्त
हो जाते हैं
कि पहचानते हैं
हवा को
जब वह हो जाती है तुम
पानी को
जब वह सूख चुका होता है

टूटती है
आश्वस्ति हमारी
केवल
निरंतरता की
किसी अनुपस्थिति से

कविता भी
क्षण भर को
कौंधती है
जब वह लगी होती है
लगातार
बदलने की कोशिश में
और गुजर रही होती है
चीजों के आर-पार
जब कविता
दीखती नहीं है
तब किसी सूप में
फटक रही होती है
शब्दों के कचरे को
उड़ कर अर्थहीन
सार्थक बच रहते हैं
जटिल प्रक्रिया में
ताकि
बन सकें
समर्थ

समर्थ शब्द ही
उछाल सकते हैं
कुछ प्रश्न
मुस्कुराते हुए
संकेतों से

आखिर
शब्दों के साथ-साथ
प्रश्नों को भी बनना है
समर्थ
अर्थ के लिए

कालजयी

ओ मेरे पूर्वज,
अनादि, अनन्त और अविजित
काल की निरन्तर प्रवाहमान धाराओं में बहकर
बहुत कुछ तुम्हारा
आया है, आता है, पास मेरे

तुम्हारे लिए हुए अनेक क्षण
ठीक वैसे के वैसे ही
बहते हुए आते हैं मेरे पास
मैं इस प्रवाह से अपनी अंजुरी भरता हूँ
आचमन करता हूँ
और फिर पाता हूँ
तुम्हारे क्षणों के साथ, मेरे कुछ क्षण मिलकर
बहते जा रहे हैं, प्रवाह के साथ, आगे ओर आगे
पता नहीं कौन-कौन लोग
अपनी अंजुरी भरेंगे, आचमन करेंगे
हर तरफ बिखरी इस भीड़ और शोर के बावजूद, ओ, मनु
सृष्टि के आरम्भ का
एकान्त और अकेलापन जो तुमने जिया था
मुझ तक आता है, मेरे चारों ओर मँडराता है, पसरता है

तुम्हारा प्रसाद समझ
अंजुरी में भरता हूँ
मैं भी उसे जीता हूँ
पर इस संक्रमण युग में
समझ नहीं पाता, कालजयी क्या है
सृष्टि के आरम्भ का वह अकेलापन
या
तुम्हारा उसे जीना

चुप नहीं है समय

स्वयं ही तो तुम
उलझे थे
संख्याओं के इस खेल में
अपने ही हाथों तो
फेंके थे पासे तुमने युधिष्ठिर
अब संख्याओं को
सिळान्तों के चीर-हरण हेतु
उद्यत देख
क्यों हो रहे हो अधीर

क्या नहीं था ज्ञात तुम्हें
कि ऐसे खेलों में
हों कोई भी नियम
कुछ भी हों शर्तें

दाँव पर लगा हो कुछ भी
हारेगा वही
होगा जो सही

राम-पुरुष होकर
फिर क्यों स्वीकारी
वह गलती
करता आया है जो
हर युग में
आम आदमी

अनेक काल खंडों के
अनेकानेक प्रसंगों में
संख्याओं ने
उठाए हैं
प्रश्नों के ध्वज

अनगिनत
मनोरंजक शतरंजी प्रश्न
जो सिद्धांतों को घेर
करते हैं विजयोत्सव का
झूमर नृत्य
गाते हुए
तरह-तरह के गीत

प्रश्न जो पूछते हैं
संख्या बड़ी है
पाँच की अथवा सौ की
कितना सरल है चुनना
अकेले कृष्ण की तुलना में
चौदह अक्षौहिणी सेना को

अथवा
कितने सहस्त्र हाथी, घोड़े और सैनिक
महारथी, रथी और अर्ळरथी
होते हैं काफी
जीतने को एक महाभारत

अनवरत
चलता जाता है यह नृत्य
अविराम
गूँजते रहते हैं ये गीत
जब तक सिळान्त
अपनी भुजाएँ उठा
मुठ्ठियाँ खोल
करते नहीं है मुक्त
कुछ प्रयंलकर झंझावात, उठाते नहीं सुदर्शन
छोड़ते नहीं वे अग्नि-बाण
जो ले जाते हैं उड़ा
तिमिर भेद
संख्याओं का काला जादू
या फिर
देख नहीं लेता विभीषण
‘रावुन रथी’ के सम्मुख डटे
‘विरथ रघुवीरा’ के
‘जेहि जय होई सो स्यंदन’
का आना
डूब जाता है
जिसके पहियों की घरघर ध्वनि में
असंख्य संख्याओं का
डरावना कोलाहल

हर बार की तरह
फिर एक बार
उतर आए हैं हम
संख्याओं के खेल पर
उठाए जाने लगे हैं
सारे प्रश्न
दिए जाने लगे हैं
सारे समाधान
संख्याओं के संदर्भ में
किस सम्प्रदाय की संख्या में
कौन सी बिरादरी की संख्या
जोड़ने पर बनेगा बहुमत
कौन सी दी जाएं घटा
तो हो जायेगा अल्पमत
किस दहाई की होगी कौन सी तिहाई
संसद में
रस्सा तुड़ा
बगटुट भाग जाने के लिए
पड़ेगी कितनी लोठियों की जरूरत
लोगों की पेटियों से खदेड़
घरों में घुसेड़ देने के लिए
चाहिए होंगी कितनी बन्दूकें
किसी लोकतंत्र को
भ्रष्टाचार के गर्त में डुबोने के लिए
काफी होंगे कितने बम

होते हैं उपस्थित
चार्वाक के वंशज
आएँ
सम्मिलित हों
लालसा-लोलुप नृत्य में

मूल्यों के ये व्यापारी
करते हैं घोषित
गलत था सारा अतीत
कौटिल्य का अर्थशास्त्र
महज एक धोखा है
और सारे पंडित महात्मा
मात्र अव्यावहारिक स्वप्नदर्शी
मुँह फाड़े भौचक
पाते हैं सब
कि अब यहाँ
नहीं है कोई राष्ट्र
नहीं है कोई देश
है तो है
केवल एक बाजार
सौदागरों के स्वागत में
हिमालय से कन्याकुमारी तक फैला हुआ
जिसमें लोग नहीं रहते
रहती हैं संख्याएँ
इकाइयाँ और उनकी विभिन्न दहाइयाँ
रहते हैं विभिन्न उपभोक्ता समूह
अलगाए गए एक दूसरे से
अनैतिक, आर्थिक, मानदंडों पर
निहित, व्यापारिक, स्वार्थों द्वारा

आकर्षक विज्ञापनों की
रंगीन झंडियाँ लगाए
गुज़रते हैं जुलूस
आयातित प्रशंसा के प्रमाणपत्र ढोते
तटस्थ आँखों से
देखते हैं उदासीन लोग
जिन्हें महाकाय कम्प्यूटर
निगल जाते हैं
विवरण और संख्याओं के रूप में

कविता
दौड़ती है
हाथ हिलाते
पर गुज़रता जाता है जुलूस
उसकी समस्त अकुलाहट के बीच से

चतुर ऐय्यारों के बनाए
रंगीन तिलिस्मों के बीच
व्याकुल हो घूमती है
पर आवाज़ कविता की
पहुँच नहीं पाती
जंगल के हाशिए पर खडे़
सिद्धांतों तक
खो जाते हैं उसके शब्द
भूख और भीख के बीच की खाई में
जहाँ भाषा व्यस्त है
चाटुकारिता के
नए व्याकरण-निर्माण में
और हो नहीं पा रहा है निर्णय
कि चाँद, सूरज और हवा का
समान रूप से उपलब्ध होना
सबके लिए
उनकी मजबूरी है
या महानता

निर्णायक
कर गए हैं प्रस्थान
बगलों में दबाए वे किताबें
जिनके पृ ष्ठों में
तितलियाँ नहीं
दबी हैं केवल मक्खियाँ
प्रमाण स्वरूप
मौसमों की बर्बरता के

नचिकेता
खड़ा यम-द्वार पर
है विचारमग्न
सत्य को भी सिद्ध करने हेतु
जहाँ आवश्यक है प्रमाण
वहाँ ले कौन से समाधान
लौटेगा वह वापस
कुछ सार्थकता भी होगी क्या
मृत्यु के रहस्यों के अनावरण की
जीवन ही जहाँ
नित्य नए ढंग से
हो रहा है तिरस्कृत

बुरी तरह पस्त हो
तटस्थ बनती जा रही
कौम की मानसिकता
अपने यथार्थ
और व्यावहारिक नैतिकता के मानदण्डों पर
गढ़ रही है नए मूल्य
या मूल्यों के अवमूल्यन के
नए समीकरण

विश्व-व्यापकता
होती नहीं है प्रमाण
औचित्य का
परन्तु भ्रष्टाचार की सफलता से
ललचाए सभासद
इसी व्यापकता का तर्क
चाहते हैं तान देना
ढाल की तरह
अंतरात्मा की धिक्कारों के समक्ष
अंधेरी सुरंग में उतरने से पहले

गेंद की तरह
ज़िम्मेदारियों को
एक दूसरे की तरफ उछालते हुए
पारदर्शी निर्लज्जता से भरी
बयानबाजी
होती है जन-प्रतिनिधियों की सभा में
और लोगों के मुँह में पड़ते ही
चीनी का स्वाद
हो उठता है कसैला

गणित की कक्षा में
लगाया जाने लगता है
हिसाब
देश की सोच पर चढ़ी
बकाया ऋण की राशि का
विश्व बैंक की ब्याज की दर्रों
के आधार पर

छिनाल राजनीति के साथ
लम्बे सहवास से
हो गए हैं
एड्स ग्रसित बुळिजीवी
जो फड़फड़ाते अखबार
और लड़खड़ाते पेट के बीच
तनी रस्सी पर
नटों की दक्षता के साथ
हैं प्रदर्शनरत
अर्थव्यवस्था के विश्वीकरण
और मलाई के निजीकरण
के समर्थन में
उनकी माँग है
कि गर्भाशयों
और गुदाज़ जाँघों पर
नहीं लगाना चाहिए
कोई भी सम्पत्ति कर

चुनाव आयोग के सर्कस का
पालतू शेर
पा खुला पिंजरा
अपनी पहचान खोजने
निकल भागा है
पूँछ फटकारता, दहाड़ता
राजधानी के जंगल का राजा बनने।
राज्याभिषेक के समारोह का
बनने
चश्मदीद गवाह
तालियाँ बजाते
इकट्ठे हो गए हैं हिजड़े
जो समर्थ सभासदों की तलाश में
एकत्र समुदाय में हर एक की
पूँछ उठा देखते हैं
और निराशा से हिला देते हैं सिर

घोड़ा क्यों अड़ा
पान क्यों सड़ा
फेरा नहीं गया था की तर्ज पर
सारी समस्याओं
उलझनों, विफलताओं का
ले सरल समाधान
बहुरूपिए खड़े हैं
बताते हुए
मूल कारण है विस्फोट जनसंख्या का
उनकी महत्वाकांक्षाओं का
उपभोक्ताओं का
उनकी इच्छाओं का
और इस तरह
एक बार फिर
कर दी गई है खड़ीं
सबके सामने संख्याएँ
लो अब निबटो इनसे
इन उछलती-कूदती
नाचती-गाती
करोड़ों करोड़ संख्याओं से

कविता
अपसंस्कृति के दौर में
धैर्य के साथ
प्रेरित करने को है प्रयत्नशील
कि आदमी करे प्रज्ज्वलित
वैश्वानर अपने क्रोध का
बनाए पर्वताकार
अपनी ऊब को
चिढ़ और असंगता से
बाहर निकल
करे मुक्त कुछ प्रलयंकर झंझावात
जो ले जाएँ उड़ा
कर दें नष्ट
संख्याओं का काला जादू
ताकि
भेज सके वह
जय-घोष का निमंत्रण-पत्र
अलाव के गिर्द बैठे
बूढ़े इतिहास से बोध कथाएँ सुनते
सिद्धांतों को

पढ़ते हुए समय को 

चाहे वह
एक सिसकी हो
हल्की-सी
अथवा निःशब्द ढुलकते अश्रु-कण
बाँसुरी की स्वर-लहरी
अथवा हों कविता के तैरते हुए शब्द
देती है प्रकृति सबका उत्तर-
बदलते हुए मौसमों
गुनगुनाती हुई हवा
तूफान सैलाब और भूकंपों से
पढ़ते हुए समय को
अकेला नहीं होता
कोई चेहरा
पिघलती हुई
स्मृतियों में

जब झर रहे होते हैं
फूल निःशब्द चाट
रही होती है गाय
बछड़े को
पावन स्पर्शों की
वैसी ही रातों में
उतरते हैं देवदूत
बुहारने धरती
उस क्षण बदलते होते हैं
विज्ञान के गणितीय सिळांत
शून्य में हमारे जुड़ते ही
बनने लगते हैं पूर्णांक
जो बढ़ते हैं
बनते पिरामिड से
और यह निर्माण
फैल जाता है
सदियों तक
नदियों के पवित्र जल-सा

व्यतीत होता

जंगल से लड़कियाँ काट
जब बना रहा होता है वर्तमान
एक सुन्दर-सा पालना
भविष्य के लिए
तो अतीत
लगा होता है सदा साथ उसके
समझाता और
सावधान करता

सदियों को चीर
बहती इस नदी का क्या भरोसा?
आवश्यक नहीं
गंगा की तरह जब यह बहाए अपने पुत्र धारा में
तो वे प्राप्त कर लें
मुक्ति

निर्माण में ध्वस्त
अतीत और वर्तमान भी
नहीं जानते
लहरों पर हिलता-डोलता
कहाँ तक जाएगा
किसी सदी के स्तन भर कर
तन जाएँगे
वात्सल्य-दुग्ध से
और हाथ बढ़ा
मध्य धार से
खींच लेगी
पालना

नहीं जानते हुए
कुछ भी ठीक-ठीक
संभावित दृश्यों के आनन्द में
हैं मग्न
लयबद्ध क्रम में
उठते-गिरते हैं हाथ
होंठ गुनगुनाते हैं लोरी
साथ बैठा अतीत
सिर हिलाता है
गीत की टेक पर
पुलकित होता है
सोच
संग्रहालय में रखा
पालना बनेगा पहचान
भविष्य वापस मुड़
देखेगा मुझे
काम समेट
औजार संभाल
दौड़ पड़ता है
हाथ-मुँह धोने
नदी तीर
अतीत
बनता व्यतीत
होता वर्तमान

फूल सा वो शहर

जब मैं लौटा
अपने पुराने शहर तो वह
स्वागत में खिल उठा
फूल-सा

पूछा इतने दिन कहाँ रहे
क्या करते रहे। बताया
यहाँ गया, वहाँ गया
ये देखा, वो किया
फलाँ-फलाँ को पटका
फलाँ-फलाँ से झटका
ये खरीदा, वो बेचा
ये जुटाया, वो सहेजा
बस बातें और बातें
और फिर नई बातें

सुनते-सुनते अकबकाकर
पूछा मुझे बीच में ही टोककर
मेरे लिए क्या लाए
अपनी नवअर्जित वाक्-पटुता दिखाई
दाँत चमकाए
आँखें नचाईं
बोला
मैं अपने आपको जो लाया हूँ
तुम्हारे लिए

यह सुनते ही अचकचाकर कहा मेरे पुराने शहर ने
तुम तो यहाँ थे ही।
फिर तुम्हारे जाने का
क्या हुआ मतलब?
और देखो न इस बीच
प्रतीक्षा से ऊब
मौसमों की सारी खुशबुएँ जेबों में भर
अनजान राहों पर चली गई
तुम्हारी पहचान
और पेड़ उदासियाँ लपेट
सो गए अपरिचय में।

इतना बना
मेरा पुराना शहर
मेरे स्वागत में झर गया
किसी फूल-सा।

पुनर्जन्म 

पुनर्जन्म
प्रमाण और अधूरी यात्राओं का
परन्तु
नहीं होता पुनर्जन्मित
पर्यायवाची नहीं हो सकता
मोक्ष का

जैसे समय
जो सतत् है
उसे न जन्मना है
न समाप्त होना
उसकी यात्रा
पूरी न होते हुए भी
कहीं नहीं जा सकती अधूरी
वैसे कितनी संतोषजनक है
अवधारणा
पुनर्जन्म की
कोई क्लेश नहीं
अधूरी यात्राओं का
कोई दुःख नहीं
अधूरे छोड़े गए कामों का
जब आना है फिर-फिर
और उठाना है वह सब कुछ
जहाँ जो छोड़ा था वहीं से
तो फिर क्या पूरा
और क्या अधूरा

अच्छा है
बची रहे कुछ प्यास
तुम्हारी चाह
बहुत-सी चीजों की आस

ऋचाओं जैसे

इस सूखी झुलसी
त्वचा में भी
कर देता है पैदा
सिहरन
यह सोचना
कि जो हवा छू रही है मुझे
आई होगी तुम्हें भी छूकर
और तुम्हें पता भी नहीं
इस बात का

बावजूद सब कुछ के
एक हैं
तुम्हारे और मेरे
वे पर्वत शिखर
जिन्हें तुम छूती हो
नित्य दृष्टि से
और मैं
स्मृति में

उन शिखरों पर
जमा श्वेत हिम
कब गलकर गिर जाता है
तुम्हारी आँखों से
मैं जान भी नहीं पाता
परन्तु जानता हूँ-
ऐसा बहुत-कुछ
जो तुम सोचती हो
मैं नहीं जानता

जैसे कामना के
उस सिरे से
जो तुम्हारे पास है
उपजा वह भाव
जिसमें अंकित है तुम्हारा
निःशब्द चुम्बन
अथवा प्राणों की वह आग
जो अपनी दुलार भरी छुअन से
रोमांचित करती
हमारे भीतर उतर
ले जाती है वर्षों पीछे

तुम्हारे होंठों के
छुअन की
मादकता लिए गीत
पहुँचते हैं
समय के दूसरे छोर पर बैठे
मुझ तक
अपने अमरत्व में-
ऋचाओं जैसे

सागर मंथन

न भूतो
न भविष्यति
जैसी कोई घटना
नहीं है सागर-मंथन
यह नहीं है
अतीत का कोई ऐसा
सामूहिक अभियान
जिसे भविष्य दुहरा न सके

मिथक होते हुए भी
हैं कहीं इतिहास
सागर-मंथन
अभिशप्त अपने आपको दुहराने के लिए
नितान्त वैयक्तिक स्तर पर
एकांतिक रूप से
मंथन
उस सागर का
लहराता है जो
सबके भीतर

कभी ज्वार, कभी भाटा
सुखों का
दुचिंताओं का
विचारों का सागर
जिसे
जीवन, समय
परिस्थितियाँ और पूर्वाग्रह
मथते जाते हैं
निरंतर

रहना होता है
सदा सचेत
निजी सागर-मंथन के प्रति
वर्ना कभी-कभी
धर लिए जा सकते हो
ऐसी वस्तुओं को
रखने के अपराध में
जिनका लाइसेन्स
नहीं होगा तुम्हारे पास,
मसलन
स्वतंत्र विचार
सही सिद्धांत
या फिर एक निर्भय मन
बन सकते हो,
दूसरों की ईर्ष्या का पात्र
यूँ ही
मर सकते हो
असावधानी बरतते हुए
हलाहल के प्रति

मंथन से निकले
स्वर्ग और नर्क
तुम्हारे ही रहेंगे
जिन्हें एक-दूसरे से
बदलते रहोगे तुम
अपनी लक्ष्यहीन अनन्त यात्राओं में
सम्भावनाओं की धरती पर
सब कुछ सजा
खोल सकते हो तुम
एक डिपार्टमेंटल स्टोर
मंथन से उत्पन्न
दुस्तर फेनराशि
बना सकती है तुम्हें
कभी भी सफल व्यापारी
क्योंकि प्रत्येक ग्राहक
संतुष्ट नहीं होता जब तक
खरीद न ले वह ऐसा कुछ
जो उपलब्ध ही न हो
बिक्री के लिए

तुम्हारा यह
व्यक्तिगत सागर मंथन
कम नहीं
किसी मिथक से
यह तुम्हें
सारे अँधेरों समस्त भटकनों
के पार
पहुँचाएगा एक दिन
और अगस्त्य-सा
सोख लोगे तुम
दुश्चिंताओं का लहराता सागर

छतरियाँ 

समुद्रों के पार से
आयी हवाएँ
रूपान्तरित स्वयं को
वर्षा की बूँदों में
बरसती हैं जब हमारे सिरों पर
तो जानते हैं
उनके विरूद्ध हम
अपनी छतरियाँ

गौर से चीजों को
देखने-परखने वाले अवगत होते हैं भयावह सत्यों से
मसलन
छातों की
कमानियाँ जर्मन
और कपड़ा विलायती

जब सीख लेते हैं हम
पुर्जा-पुर्जा अलगा कर
जोड़ना दुबारा
तक कहीं जान पाते हैं
जिस टार्च के प्रकाश में
चलाते रहे हैं
अपना काम
लगी हुई हैं उसमें
आयातित बैटरियाँ

आज के दिन मेरे लिए
सबसे विस्मयकारी सूचना है-
सुबह जो आदमी मिला था
चौराहे पर
भीख का कटोरा लिए
वह एक खाते-पीते घर का बुजुर्ग है

आवृत्ति

कमरे में फँसी गौरेया
उड़ती है, गिरती है, फिर उड़ती है
अर्थ की तलाश में शब्द
और अभिव्यक्ति के लिए
बेचैन नाद

गौरेय्या
टकराती है
दीवाल से, खिड़की के काँच से
पंखे से टकरा कर लहू-लूहान।
मरीचिका-सी
बाहरी उजाले की
कोई छोटी-सी फाँक
शायद कल्पना में ही कौंधती हो।
वह भरती है छलाँग
काश निकलती
सर्र…..
आकाश के शून्य और खुलेपन में

लौटती है गौरेय्या पृथ्वी की ओर
धरती के चुम्बक में।
लौटता है एक अमूर्त नाद
यहाँ वहाँ
शब्द
और अर्थ
आपस में टकराते
टक….टक….टक
गौरेय्या भटकती है
यहाँ, वहाँ

प्रश्न, प्रश्न और प्रश्न
लाल, पीले, उजले
हर रूप रंग धरे।
मन
खोजता कोई फाँक
कोई उत्तर
करने को सबको
निरुत्तर।
पीछे सीधे ओर सरल के
भागता है
बेदम हो हाँफता है
सड़कों, गलियों के ओर-छोर भुलावों में
माप बहुत दूरी
रह जाता है
वहीं का वहीं

पता नहीं लगता जाना
सम्भव नहीं हो पाता आना।
रचता है ऐसा चक्रव्यूह कौन
क्या अपनी ही अंतरात्मा का मौन?

विचित्र संरचना है
न द्वारों पर
न केन्द्र में
तैनात महारथी हैं
फिर चक्करदार गलियों की गुंजलकों में
चकरा-चकरा रह जाता है।
और फिर गलियों की क्या हस्ती है
फैला है यह तो
सीधी सपाट सड़कों तक।
जो लगता है,
जाती है शहरों से गाँवों तक
पर
आती है गाँवों से नगरों तक।
सपनों के आने के
मोहभंग कदमों के जाने के
सभ्यता से सभ्यता तक
या अभ्यता से असभ्यता तक
फैले ये रास्ते भी
बस दीखते ही सीधे हैं
वर्ना कहीं घूमते हैं
वर्तुलाकार
न कहीं से लाते हैं न कहीं पहुँचाते हैं
केवल उलझाते हैं
उसी चक्रव्यूह में फँसाते हैं

चक्रव्यूह
जो शायद है
या शायद है ही नहीं
परिधिविहीन है
अथवा अपरिमित।
शायद बड़ा धरती की गोलाई से
जीवन की हर छोटी-बड़ी अच्छाई-बुराई से

बाहर निकल नहीं पाता
हार मान रोता है
या ढीठ हो हँसता है
खींच रेखाएँ सरल
वृत के भीतर
चलता है उन पर
यहाँ से वहाँ
इठलाता है
हाथ हवा में लहराता है।
बाकी सबको बताता है-

निदान है सरल
उपचार है सम्भव
जब चाहूँगा
बता दूँगा
अभी थोड़ा व्यस्त हूँ
और कुछ बातें हैं
उनसे ही त्रस्त हूँ

बार-बार
घूम-घूम
लगती है हाथ वही
बाहर की चुप्पी
अन्तर का मौन
प्रश्नों को दिखाता लाल कपड़ा
पागल-सा पीछे दौड़ता

समूह हो, व्यक्ति हो, निजता हो
लौट आता है, उजाले का सारा सोच-विचार
गौरेय्या की तरह
धरती के चुम्बक की ओर
खींचता है यह पतनशील ठोस पथरीला अस्तित्व
शब्द और अर्थ से परे।

जलावतन 

बेगाने शहर को
हर ठोकर
उस अगले पड़ाव की
हादसा भरी घटना है
जो एक अमानुष होने की यात्रा है।

तपिश कायम रहे
बहते लहू की
इसीलिए
ईंधन बन जल रहा हूँ मैं
अब न करो मुझसे
मेरे गाँव की चर्चा

गाँव
जहाँ होता था मैं
गामा, कुश्ती लड़ते हुए
पेले, खेलते हुए
कपड़ों के लत्तों से बनी फुटबाल
कृष्ण कन्हैया
माई के फटे गँधाते आँचल के नीचे
कथरी पर सोते हुए
लाल बहादुर
बापू से डाँट सुन
पढ़ने जाते हुए
जो रह गया है
यादगार बन
कभी न खत्म होने वाले कर्ज का
लाठियों, कट्ठों, फूटते सिरों, गंधाती लाशों का
कुवांरियों के
अन्तिम समर्पण का
त्रासद वृत्तान्त

अब तो रह गया है
गाँव
जतन से सहेजकर रखी हुई
एक सुन्दर पुरानी तस्वीर
आ गिरा है लद्द से
जिस पर
वक्त का थूका हुआ बलगम

ईंधन बना
जानता हूँ
जब भी अभाव होता है
महानगर में
जलावन की खातिर
झोंक दिया जाता है
कोई एक गाँव
और पैशाचिक नृत्य में
रौंदते हैं
सब कुछ जनतंत्र की
चिता पर उत्सव मनाने।

अपने ही घाव से बहते
लहू को
कुत्ते की तरह
चाटने का भी
होता है एक सुख
जलावन बनने के सुख जैसा ही
बुने जा सकते हैं
स्वप्न
प्रतिहिंसा और दुराशा से भी

ईंधन बन जलता में
सही समय और सही हाथों में
ले सकता हूँ आकार
मशाल का
पर
राख बनने से पहले
धरती की गोद में समाने से पहले
प्रमुदित हो सकता हूँ
रोम को जलते देख
नीरो की जगह न बैठाओ मुझे
मैं जलते हुए
ठीक हूँ
गाँव के विकल्प में

प्रतीक्षा में पहाड़

कितना गलत
जानते हैं हम
पहाड़ों के विषय में
जैसे सर्दी-गर्मी के मौसम का
नहीं होता उन पर कुछ भी असर

बेचारे
बरसात से गीले
अपने कपड़े सुखा भी नहीं पाते
कि सिर पर आ धमकती हैं सर्दियाँ
सूखने लगता है
शरीर का हरा खून
पड़ जाते हैं चेहरे सफेद
पसरता है चतुर्दिक
साँय-साँय सन्नाटा
डूब जाते हैं पहाड़
चिर प्रतीक्षा में
निस्तब्ध

माघ के
सूरज को ताप
होती है दूर अकड़न
हाथ-पाँव की
दौड़ना शुरू होता है शिराओं में
पुनः हरा रक्त
हथेलियों से चेहरा पोंछ
फिर सारी ठंड ढँक देते हैं पहाड़
आकाश में बादल बना
परन्तु करते हैं धन्यवाद ईश्वर का
तपते मैदान
बारिश के लिए

कितना गलत
जानते हैं हम
पहाड़ों के विषय में
मसलन पहाड़ होते हैं केवल पहाड़

कितना कुछ करते हैं
पालते हैं पूरा का पूरा कुटुम्ब
गाँव से गाँव अपनी गोद में
बुलाते हैं बच्चों को
गर्मियों में मित्रों सहित
मायके आयी नदियों को
करते हैं विदा बरसात में
भेजते हैं फलों-फलों के उपहार
दूर-दराज के मित्रों को
जो जाते हैं भूल
धन्यवाद करना पहाड़ों का

कितना गलत
जानते हैं हम
पहाड़ों के विषय में

जो है यहाँ 

ये जो विचार है
क्या देगा जन्म
किसी सरोकार को
या यूँ ही गुजर जाएगा
बिन बरसे बादल की तरह

डर है
आशंका उसकी
जो हो भी सकता है
और नहीं भी
परन्तु डर
तो हो जाता है
और फिर बना रहता है
कुछ यूँ कि
होती है चिंता
डर की
बस डर की
वह अनजाना-सा डर
जो अकरण ही
बचपन में
बैठ गया कुंडली मार पेट के गड्ढे में
करता रहा है यात्राएँ साथ-साथ
जब चाहता है
उठा लेता है फन
बादल जो बरसता नहीं
है दुःख
या चिंता
रहता है वहीं
आकाश में टँगा

पोशाकें बदल
बन-ठनकर चलने
बेफिक्र हँसी हँसने से
क्या हो जाता है बचाव?
उस सबसे
जो है यहाँ

हमारे लिए

सारे जोड़-घटाव
गुणा-भाग के बाद
जो बचता है शेष
वही होता है हासिल
अर्थात्
मिलेगा वही
जो बचा रहेगा
सब के बाद

पंगत के
उठ जाने के बाद
बही-खातों के समेट लिए जाने
के बाद
अख़बारों के
छप जाने के बाद
जब कर चुके होंगे
सब लोग हासिल
वो सब कुछ
जो बटोर सकते हैं
उनके हाथ
और मनाया जा रहा होगा जश्न
तब जो होगा शेष
वही होगा
हमारा हासिल
उसे हम गिनेंगे
बार-बार
और नहीं जान पाएँगे कभी
कि गिनने
और गिनकर सहेजने जैसा
कुछ भी तो नहीं था
वह
जो था
हमारा हासिल

पेड़ों के लिए 

रहते हैं पेड़
समान रूप से प्रफुल्लित
भीड़ और एकान्त में
क्योंकि सन्नाटा भी है
नाद/शून्य के अकर्म का

अस्तित्व
भौतिकता के दलदल में
विलीन होने से पहले
जिस भाषा में/देता है
अपना बयान

उसी में तो बतियाते हैं
धूप और आसमान
बरसता से/ताकि बची रहे वह

कितना अच्छा है
कम से कम बोल-चाल में ही सही
वह बची तो है

क्योंकि भविष्य में
वही आएगी काम
जब पड़ेगा भेजना हमें
पेड़ों को/निमन्त्रण-पत्र

राजगीर

राजगृह में थे
गर्म जल के सोते
घने जंगल, पत्थर और पहाड़

राजगृह में अक्सर/आते थे युद्ध
देते थे प्रवचन
ठहरते थे/कई-कई दिन

अभी भी हैं
बचे-बचे कुछ/जंगल, पहाड़
सोते गर्म पानी के

आते हैं चर्म-रोगी और
बौद्ध पर्यटक/बनवाते है
चौड़ी सड़कें
भव्य शान्ति-स्तूप
देखने आते हैं/और पर्यटक

नहीं आता इतिहास/अब यहाँ

छू नहीं पाता/पत्थरों को
कोई प्रवचन

हस्तिनापुर निर्णय नहीं करता 

अनिर्णय में जीवित है
हस्तिनापुर
लोग मुँह लटकाए
पक्षधर और तटस्थ
प्रतीक्षा में हो गए
जड़

कुछ पहले ही
कूदे थे दोनों पक्ष
दोनों पक्ष चाहते थे
निर्णय हो

लम्बी बहस के बाद
निर्णय न हो सका
हाथ मलता कर्ण
और प्रतिपक्षी सभी
थे उद्विग्न

कम से कम
निर्णय के साथ
लौटने पर तृप्ति तो है।
अतृप्त लोग जड़ हो गए।
स्तम्भित
अपवाद हो सकते थे
लौटने वाले

हस्तिनापुर से
कोई नहीं लौटता शायद कभी निर्णय हो
शायद कभी नहीं

रति

तुम्हारे नहीं आने की
व्यग्रता, और
आ जाने की
समग्रता
के बीच
अन्धेरे पुल पर खडे़
अनुमान के
वलयों, वृत्तों के बीच
डूबता-उतराता हूँ

परोसी भोग्यता को
बर्बरता से
चींथता
भीतर तक अतृप्त
पारदर्शी तुम
हवा में घुलकर
बनती हो गीत
लिखा गया था जो कभी
छातियों, नितम्बों की युगलबन्दी में।

किसी अंधेरी गुफा में
चरम परितृप्ति की कल्पनाएँ बिखरती हैं
तभी
गिरती है बर्फ
किरणें
सूरज चाँद की
आपस में उलझ
बना लेती हैं गुच्छे
जिनसे हम रहते हैं
तन्मय आबद्ध
परन्तु अन्त के बहुत पहले आरम्भ के बहुत नजदीक ही
फिसल जाती हो तुम
मैं खोजता डुबकियाँ लेता हूँ।

संतुष्टि से भरी मुस्कान
तृप्त आँखों से उड़ेल मेरे अंगों पर
परछाईं और देह की सीमा रेखा पर
डोलती तुम
रोमावलियों
केशगुच्छों की अतल गहराइयों से
बरसाती बिजली के कोड़े
छोड़ती असंख्य आलोक विशिख
खनकती
हो उठती हो विभोर।

अंगुलियों की बरसती बूँदें
सर्दी की ठिठुरन, गर्मी की तपन
के बीच तने मौसम में अटकी देखती हैं
निर्निमेष नीचे फैला सारा विस्तार
किसी हिमखंड-सा
धीरे-धीरे गल कर गुम होता

चमदागड़-सा उल्टा लटका हुआ सुख
चिंचियाता उड़ता है
किसी निशाचरी देह गंध में तृप्त होने
नाभी के गहरे वृत्त में
जहाँ से शुरू होती हैं
ढलान, गहराइयाँ
समतल पठार, पर्वतीय ऊँचाइयाँ।
कुंडली मारे चमकीला सर्प जागता है
लहराता है
लपलपाती जिह्वा
चाटती ओस
अंगारे चबाती
करती है विष-वमन अमृत कलशों में
चढ़ता है ज़हर तेज ओर तेज
अपनी सारी तपिश और तड़प के साथ
सनसनाता हुआ नसों में
कोड़े की तरह फटकारता
रात के बिस्तर में पड़ी
प्रसन्नता में उछलती तुम
सौंप देती हो नदी देह
मेरे हाथों को
पाटों की तरह अपने बीच से वे
देते हैं तुम्हें बहने
किनारों तक आती हैं
अंगूर गुच्छों से लदी बलें
और टहनियाँ प्यासे वृक्षों की।

ऊर्ध्वमुखी प्राण
आदिम लय में नृत्य करते
समेटते हैं प्रकाश पुंज
करते हैं तिरोहित
सारी सृष्टि को
धरती के अन्तरतम में।

नदी को पारदर्शी स्वच्छता
तल पर पड़े पत्थर।
विस्तृत बालुका राशि
हो जाती है
जलते रेगिस्तान-सी
खड़ी जिसके बीच तुम
तलुवे जलाती
ढँकती लज्जा आवरणों से
अपनी नग्नता

फैला देता हूँ
मकड़जाले
तरह-तरह के
ढँकते हैं वे जितना
करते हैं उतना ही निर्वस्त्र
सिहरती है त्वचा
मकड़ियों के चलने से
और वे बुनती ही जाती हैं
ढँकने को तुम्हें
घिनौने ढंग से आकर्षक
मकड़-जाले
और पहुँचते-पहुचते संगम तक
हो जाती है सरस्वती गुम
फिर वहीं
इन्द्रधनुषी पुल पर टंगा मैं
सुनता हूँ रुदन
तृप्ति की अतृप्ति से जन्मे
क्षोभ का
जिसे धारण नहीं किया गर्भ में कभी

रुदन, हाँ
कल्पना पुष्पों का रुदन
उजाले से अँधेरे को
वेदनासिक्त वीथियों में
फिर से पुत जाता है काला रंग
सारे इन्द्रधनुषों पर
उन्हीं हाथों
जिनसे रची जाती है कविता

वसीयत

नई चीजों की तरह
नव वर्ष पर
जमा हो जाती हैं
सुन्दर जिल्दवाली
नई चमचमाती डायरियाँ भी

दे जाते हैं,
मित्र, शुभचिंतक।
मैं भी उसी क्रम में
आगे सरका देता हूँ
ठीक उसी भाव से
शायद कोई काम सध सके।

फिर हो लेता हूँ व्यस्त
वर्षों पुरानी अपनी
उस प्रिय डायरी के संग
जो थी कभी/नई नकोर
जैसे वसंत की भोर
डगमगाते पैरों से चलती
चाँद-सूरज लेने को मचलती
अबोध मुस्कानों से सजी
परियों, तितलियों, फूलों के चित्रों से भरी
अब तो
धीरे-धीरे / हो चली है वो मैली
कहीं-कहीं से तो / लगी है फटने
फिर भी
पहाड़ी झरने-सी है निरंतरता
नियमितता सूरज सी
हर सुबह
सामने मेरे
स्वचालित ढंग से
कर देती है प्रस्तुत एक नया पन्ना

हर रंग हर भाव के चित्र
इन पन्नों पर / मैंने हैं उकेरे
कहीं छूट गए हैं पृष्ठ कोरे
उन पर दर्ज हैं
घटनाएँ जिन्हें सिर्फ मैं देख सकता हूँ
तरतीब से।

कहीं पन्नों पर
हल्के से रंग हैं/कहीं तेज
कहीं आदमी/कहीं जानवर
कहीं फटा आसमान
और ऐसे ही / मैं पढ़ लेता हूँ
उनके पीले पड़ते वर्ण में
अपना अतीत

कभी किसी रेगिस्तान, जंगल
या अंधेरी, सुरंग से गुजरते
अगर तुम भी इन्हें देख सको
तो पढ़ लोगे
जिन्हें मैं पढ़ता हूँ
बिना शब्दों
आकृतियों के।

लौट आओ

हम सब
लगातार
बन्द होठों के बीच
रहत हैं चीखते
लौट आओ

नीरवता में
आवाज़ देते हैं हम
धूप और बरसात की
मार सह
बदरंग हुए मौसमों को
लौट आओ
ढहती मुंडेरों
पर चढ़
पुकारते रहते हैं
चुपचाप
जवानों और बच्चों को
लौट आओ

लौट आओ
बन्द दरवाजों और खिड़कियों के बीच
जहाँ रखी है हमने
कुछ स्मृतियाँ
और हवा

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