उमा शंकर सिंह परमार की रचनाएँ

ये जो दिख रहे हैं 

ये जो दिख रहे हैं
इच्छाधारी लोग हैं
जो लगातार अपनी कविताओं मे
पूँजीवाद का पुतला फूँक रहें हैं
शाम होते ही
अपने अपने खेमे मे लौटकर
पलायन का शोकगीत
गुनगुनाते हैं
हर एक आत्महत्या के बाद
समाचार-पत्रों का हवाई-सर्वेक्षण
कर लेते हैं

ये जो दिख रहे हैं
बहुरूपिया हैं, इनके
इनके ड्राईंगरूम मे सजकर बैठा गाँव
शहर को अतीत मे पराजित कर चुका है

जुमले मौजूद हैं
बैनर लटके हैं
डायरी के हर पन्ने मे नारेबाज़ी है
अजीबोगरीब भाषा मौजूद है
प्रेम का चिन्तन है
पिकनिक मौजूद है

उनके ग़रीबख़ाने मे
यातनाएँ, हत्याएँ और करुणा
समेटकर डस्टबीन मे फेंक दी गई हैंं

तलाश

तुम असीम त्याग
मैं असीम भोग
हम दोनों के बीच
अन्तिम साँसे ले रहा हमारा प्रेम

“मध्यम” हो जाने की
सुरक्षित गली तलाश रहा है

महात्मा बुद्ध से लेकर वात्सायन तक
तय की गई प्रक्रियाओं में
एक पैराग्राफ तलाश रहा है

चूल्हे में धिक् रही जवान आग
में तपकर
बर्फ़ीली हवाओं की छुवन तलाश रहा है

सार्वजनिक सज़ा

युग बीते
हाथ रीते
अब तक जूझे
कभी न जीते

करते रहो करते रहो
आत्महत्या

सब मौंन हैं
सब की रजा है
तुम्हारे चुप रहने की
सार्वजनिक सज़ा है

चाँदनी

दिल्ली

नहीं दिखती तुझे
हिंसक, कलंकी, कुकर्मी
चन्द्रमा की चाँदनी

गाँव में, शहर में,
आफ़िस में, अख़बार में,
सड़कों पर, कारोबार में,
फैली निर्ववसना निर्लज्ज
ख़ून खौलाती चाँदनी

तारीख़ नहीं बताएँगे 

दंगे
रोज़ कराएँगे

सड़कें
नहीं बनाएँगे
बिजली
नही लगाएँगे
जनता
को धकियाएँगे

राम लला
हम आएँगे
मन्दिर
वहीं बनाएँगे
बस,
तारीख़ नही बताएँगे

सात जनम का रिश्ता

सुहाग के रंगीन
जोड़े में सजी बैठी
एम०बी०ए० पास लड़की
वैदिक मंत्रोच्चार के साथ
सात फेरों को तैयार

भटकते-भटकते
चप्पल घिस गई
बाल उड़ गए
अन्तहीन बहस में
मुश्किल से जोड़ा है
सात जन्मो का रिश्ता

बाज़ार सजा है
कानूनों की इस बस्ती में
पेट दबाया
कौड़ी-कौड़ी कमाया
पगड़ी बेची
सब कुछ गँवाया
बड़ी मुश्किल से ख़रीदा है
बेटी
सात जन्म का रिश्ता

बाज़ार आबाद रहेगा
सुहागिनी सजती रहेंगी
फेरे पड़ते रहेंगे
पगड़ी बिकती रहेगी

प्रेम-कविता 

भोर होते ही मैंने
खेतो की गीली माटी में
देख लिए थे
तेरे थकित कदमों के निशान

फूली सरसों के हरे पत्तों पर
फैली ओस की बून्दों में
डूबकर मैंने
नाप ली है
तेरे ह्रदय की गहराई

अक्स है तेरी आँखों की
मीठी चुभन का
मेरे जिस्म में
गेहुँवाई सीगुर की चुभन से
सर्द हवाओं में बहती
मरवा माटी की सुगन्ध
भोर होते ही आभास देती है
तेरी जुल्फों की उनींदी गन्ध

कडकडाती ठण्ड नंगा बदन
बर्फ़ीला नहर का पानी
फावड़ा लिए कँपकँपाती देह
सींचता हूँ खेत

रात भर अहसास
तेरे मधुकम्पित मदभरे
थरथराते लबों का
भोर होते ही
छिप जाता हूँ
तेरे आगोश में अविश्रान्त

प्रिये ! यही है यही है यही है
युग युगान्तर से चला आ रहा
मेरा अदम्य प्यार

यह हार नहीं

गर्दन झुकाकर
गर्दन बचा सकते हो
बन्द मुट्ठी खोलकर
हाथ जोड़ सकते हो
जुलूस के साथ
खड़े होकर क़दमताल कर सकते हो

लेकिन यह मत कहना
मैं हार चूका हूँ रण

यह हार नहीं
तमाम हत्याओं के पक्ष में
खड़ी नैतिकता
का अघोषित पतन है
मनुष्यता का
कायरतापूर्ण आत्मसमर्पण है

पण्डित बाबा

अधसूखी नदी-सी
कृषकाय देह लिए
उम्र की सन्ध्या में टिमटिमाते दिया
पण्डित बाबा तुम क्या हो?

चमत्कार के लेप से
सँवारा गया इंसान
या पराकाष्ठा के शिखर से
ज़मीन पर पदार्पित
इंसानी जीवन की चमक
ठण्ड से मुरझाए पीले पत्ते-सी
तुम्हारी रामनामी का पीलापन
बैठ गया है दिलों की अन्धेरी कोठरी में

मस्तिस्क के बन्द तहख़ानो में
तुम्हारी खडाऊँ की खटर-पटर से
सहम जाते हैं
हज़ारों भूख से बिलबिलाते
मज़बूरियों मे क़ैद मस्तक
झुकने लगते हैं

सदियों से
अकड़े हुए बेरहम दरख़्तों से मस्तक
भूख के पैदा होने से लेकर
मरने तक का इतिहास

भूगोल
समाया हुआ है तुम्हारी
काग़ज़ की जर्जर पोथी मे
हर रोज़ टूटती है
सर्द रातों की लम्बी नीद
तुम्हारे शंख की आवाज़ से

पण्डित बाबा
क्या तुम्हारी पोथी मे
नंगे बदन, उपनहे पाँव
गलियों मे भटकते
दाने-दाने पर पसीना बहाते
तुम्हारे रामू-श्यामू का इतिहास है?

या भूगोल है तुम्हारी उस झोपड़ी का
जिसके कोने मे रखा ठण्डा चूल्हा अभी भी
इन्तज़ार कर रहा है एक चुटकी आटे का

तुम्हें पता है? तुम्हारी झोपडी के बाहर
बिन माँ की बछिया तुम्हारी याद मे
बच्चों के साथ आँसू बहा रही है

क्या नदी यूँ ही सूख जाएगी?
क्या पीला पत्ता डार से टूट जाएगा?
पण्डित बाबा, जवाब दो ।

वे सत्ता में हैं

वे सत्ता मे हैं
इसलिए शक्तिशाली हैं

वो शक्तिशाली हैं
तो हम चुप हैं

हम चुप हैं
वो स्वतन्त्र हैं

कभी भी, कहीं भी,
किसी भी
ज़मीन के टुकडे को
मन्दिर बता सकते हैं
मस्जिद बता सकते हैं

सुनियोजित अफवाहों मे
कलाबाज़ियाँ करते हुए
कभी भी
दंगा करा सकते हैं

सुबह-सुबह 

सुबह ऊँघती रहती है
सड़क थकी-सी सोई
उसके क़दमों की आहट से
सूरज की आँख खुलती है

बगल मे दबाए झाड़ू
सिर मे टोकरी
हाथ मे फावड़ा
पीठ पर दुधमुहाँ बच्चा
वह करने लगती है
ज़िन्दगी-सी सपाट सड़क पर
फैले कचरे को
रोटियों मे तब्दील

वह फावड़े से
उलीच देना चाहती है
घिनौना वर्तमान
वह देखना चाहती है
झाड़ू के हथियार मे बदल
जाने का स्वप्न
वह टोकरी मे भरकर
सहेज लेना चाहती है
सड़ी दुर्गन्धों के बीच से
मुक्ति की सुवासित हवा

क्योंकि वह नही चाहती
कि उसका दुधमुँहा बच्चा
पेट के लिए
वर्तमान मे जीने को
मज़बूर हो जाए
आहट से पहले ही
भविष्य दूर हो जाए

आदमी मुद्दा है 

अपराध की ईमानदार
सम्भावनाओं में
शान्ति की मनमानीपूर्ण दलीलों में
आदमी ख़ुद की उपस्थिति के ख़िलाफ़
एक मुद्दा है

बाज़ार की शानदार दहशत में
ख़ूनी दंगों की साज़िश में
आदमी ख़ुद की उपस्थिति के ख़िलाफ़
एक मुद्दा है

मुल्क की जेलों में सड़ रहे
जल, ज़मीन, जंगल की लड़ाई में
चिन्हित किए गए
देशद्रोहियों की
सज़ा-ए-मौत के ख़िलाफ़
आदमी एक मुद्दा है

भूख की भव्य इमारतों में
नज़रबन्द
सरकारी दस्तावेज़ों से बहिष्कृत
लाशों की सामूहिक हड़ताल में
दागी गयी गोलियों के ख़िलाफ़
आदमी एक मुद्दा है

बसन्त

पद्माकर का बसन्त

नदी के कूल पर
केलि नहीं करता बसन्त
बालू माफ़िया के ट्रकों पर
लद गया है बसन्त
बनन में बागन में अब नहीं बगरता बसन्त

जंगल माफ़ियाओं की महफ़िल में
निर्वसन बैठता है बसन्त
पातन में पिक में
दूनी देश देशन में
अब नहीं आता है बसन्त

विकास के रेड लाइट एरिया में
अपना जिस्म नुचवाता बसन्त
पौनहू में पराग
नहीं भरता बसन्त
जाम में फँसी गाड़ियों सा काला धुआँ
उगलता है बसन्त

बस एक मुट्ठी बसन्त
मेरे सीने में अभी शेष है
कविराज पद्माकर
इसी उम्मीद में जी रहा हूँ
की दुनिया का बदलाव अभी शेष है

डरा आदमी 

डरी सड़कें
डरा आदमी
हवाएँ बता रहीं है लाशों का पता

कल के सियार
शेर में तब्दील
ख़ूनी जबड़ों में दबाकर
विश्व का सबसे बड़ा लोकतन्त्र होने का प्रमाणपत्र
ख़ुद को संविधान का
रक्षक घोषित कर चुकें हैं

डरा आदमी
नहीं समझ पा रहा
ईमानदार, जनप्रिय, विकासपुरुष,
होने के शब्दशास्त्र में
फूहड़ता की पराकाष्ठा है

पत्थर के बुत 

अभी कुछ दिन पहले
पत्थर के बुत
जो लम्बे समय से
बहिष्कृत थे पूजा से
इंसान बनने की कोशिश मे
अचानक
हत्यारों मे तब्दील हो गए

वे लोग
पुराने पड़ चुके इतिहास से विक्षुब्ध
सब कुछ एक झटके मे
बदल देना चाहते हैं

जब कभी क़रीब आया अतीत
अतीत का हमशक़्ल
क़रीब आ जाता है

तीव्र असुरक्षा-बोध
भयग्रस्त कुण्ठाएँ
वे लोग बाज़ार की भाषा मे
पौराणिक यशोगान
दोहराने लगते हैं

विचारों के रेगिस्तान मे
नंगे खड़े वे लोग
क़ब्रिस्तान मे सदियों पहले
दफ़्न हो चुकी लाशों को
ज़िन्दा करने के लिए
अपने अघोषित आदर्शों के विरुद्ध
घोषित हड़ताल में जा रहे हैं

शब्द

1

शब्द
भूँज दिया गया
भूख की दहकती
भट्टी में
अभिधा, लक्षणा, व्यंजना
तीनो जलकर राख
बेस्वाद हो गया अर्थ

2

शब्द
लड़ते लड़ते
थक चुका है
पुरानी क़िताबों में
दबकर सो चुका है

3

थरथराते थे हुक़्मरान
जब बेख़ौफ़ सिंह का
दहाड़ता था शब्द
राजदरबार के फर्श पर
पसरा हुआ
आज का दोगला शब्द

4

फुटपाथ पर
बैठा वह
भूखा आदमी
ताज़ा अख़बार में
मरे हुए किसान, बलत्कृत औरत की
ख़बर में
चटपटी नमकीन रखकर
अब शब्द बेंचने की
कला सीख चुका है

एक ख़बर 

ताज़े अख़बार में
एक टुकड़े पर पड़ी
लावारिश लाश
हर पाठक का ध्यान खींच रही है
सरकारी रिकार्ड में
यह एक मामूली घटना है
एक बदचलन बीबी के पति की
शर्म से की गई आत्महत्या है

(अख़बार में छपी फ़ोटो के शब्द)

मैं आत्महत्या नही हूँ
एक निर्मम हत्या हूँ
क़र्ज़ ने चूस लिया
मेरी उम्मीदों का ख़ून
भूख ने मेरे सपनों को
चबा डाला है
मेरे मर्ज़ के मुकम्मल
इलाज में
व्यवस्था ने
आश्वासनों का
ओवरडोज़ दे डाला है

तुम्हारी आँखें 

तुम्हारी आँखें
अगर सपनों मे जीना चाहतीं हैं
तो शौक से जिएँ

अब वतन आज़ाद है
तुम्हारी आँखें
अगर रचना चाहतीं हैं
कुछ नये सपने
तो पहले
सपनों और आज़ादी के बीच
बढ़े हुए फ़ासले को
समझना ज़रूरी है

तुम्हारी आंखें
अगर देखना चाहतीं हैं
ख़ूबसूरत सपने
तो अपनी आँखों से कह दो
पहले इस दुनिया को ख़ूबसूरत बनाएँ

मेरे साथी ! अब तुम समझ गए होंगे
आज़ादी सपने का नाम नहीं है
आज़ादी आदमी के
मजबूत इरादों से
लिखी गई ज़िन्दा भाषा है

जो न सपने देखती है
न सपने रचती है
न सपने जीती है
ज़िन्दा रहने के लिए अक्सर
बेचैन कविता-सी
बदलाव की ज़िद करती है

चुनाव

आदमी
लाश मे तब्दील

जल उठे
सियासती चूल्हे
पक रही हैं रोटियाँ फरेब की

भूख से बिलबिलाने का
वक़्त आ गया ….

सखि ! चुनाव आ गया

भीड़

वह अकेला
ख़ामोशी ओढ़े गुमसुम
खो गया भीड़ मे

राजपथ, जनपथ, जन्तर-मन्तर
पट गया भीड़ से

न विवाद न संवाद
न विनाश न आबाद

चिकटा फटा काँच पहने
अधनंगा, गुमशुदा ’रामराज’
कराहता दिखा भीड़ में

ज़िद है

उन्हे सब कुछ
बदल देने की ज़िद है

आपको
हमको
और उन्हे भी जो
गर्भ मे पल रहे हैं
भूमिकाएँ
तथ्य
भंगिमाएँ
और इतिहास

उन्हे सब कुछ
बदल देने की जिद है

दो पैर
दो हाथ
एक सिर वाले
समूचे आदमी को
आदमख़ोर बना
देने की ज़िद है

उन्हे सब कुछ
बदल देने की ज़िद है

यह दौर 

अनिश्चितता के दौर मे
उन्होने गढ़ दिया है
एक कामयाब प्रतिमान

समय के पक्ष मे खड़ा बाज़ार
संविधान की जगह ले चुका है
और
भूख की जगह क़ीमत ने
अध्यादेश जारी किया है

अब कोई संकटग्रस्त नही
सभी बेरोक-टोक कही भी बिक सकते है
कहीं भी नंगे हो सकते हैं

प्रिये !
अब तुम बाइज़्ज़त
किसी पुरुष के साथ
शयनकक्ष मे अनावृत होकर
ख़ुश हो सकती हो

क्योंकि वे चाहते हैं
तुम्हारे जिस्म पर अपना अधिकार
देखना चाहते हैं
तुम्हारी आँखों मे
वासना का लहराता समन्दर

क्योंकि अब
तुम्हारा हक़
तुम्हारी स्वतन्त्रता
तुम्हारी आवश्यकताएँ नहीं
अनावृत जिस्म में गड़ी
क़ीमतखोर निगाहें तय करेंगीं

प्रेम

तुम्हारे जिस्म
और मेरे जिस्म
की ख़्वाहिशों के बीच
मजबूत दीवार है प्रेम

तुम्हारी पवित्रता
मेरी असफलताओं का
अकाट्य तर्क है प्रेम

कोर्ट के आदेश से
नहीं तय की गई हैं
हमारे प्रेम की मर्यादाएँ
सज़ायाफ़्ता सपनो की तरह
बाज़ार के हवालात में
क़ैद कर दिया गया है प्रेम

दूरियाँ ही तो हैं
कोई विप्लव नहीं
दूरियाँ
जीवन के साज़ पर
साँसों की उँगलियों के
चलते रहने का संकेत हैं

प्रिये ! प्रतीक्षा करो
एक दिन जल्द ही
बेक़सूर क़ैदी की तरह
सरेआम सूली पर
चढ़ाया जाएगा प्रेम

प्रिये !

हे प्रिये !
विकास के प्यालों मे
ये जो उँड़ेली जा रही हैं
राष्ट्रवादी शराब

आश्वासनों के साथ पिलाकर
मदहोश करके
तुम्हारे जिस्म को
बाँहों मे समेटकर
ख़ूनी चुम्बनों से
लहूलुहान कर देने की
सुनिश्चित प्रक्रिया है

अफ़वाहों की रगड़ से
चमकते चेहरे
तुम्हारे हाथों मे रखकर हाथ
उनकी आँखो का
किया गया नाजुक वादा
तुम्हारी आँखों मे उतरकर
जिस्म पा जाने की
पुरानी कला है

कविता

तुम्हारे पाँव मे बाँधकर रुनझुना
गले मे रेशमी रूमाल
बाँधा जाएगा
हल्दी उबटन के पीले लेप से

तुम्हे चमकाकर
चन्दन का शीतल तिलक
मस्तक पर लगाया जाएगा
धूप घी से सजी आरती
घन्टों के रव से नचाकर
तुम्हे सजाया जाएगा

पीपल के हरे नव कोपल
प्रेम की कैंची से कुतर कुतर
तुम्हे खिलाया जाएगा

आ जा आ जा बेटा
भक्तों की मुराद पूरी कर दे
लहराता गण्डासा तुम्हे बुला रहा है
बड़ी श्रद्धा से उतारी जाएगी
तुम्हारी गर्दन
काटीं जाएँगी बोटियाँ जिस्म की
तुम्हारी चीख़ों की दस्तक से
खुल जाएँगे
स्वर्ग के दरवाज़े

हर लोथड़े मे भरी होगी
पुण्यों की मिठास
अरे बेटा जीवन-चक्र बडा निरीह है
बँधा है पुण्य की डोर से सदूर
गर्दनो की सीढ़ी बनाकर
उतरता है धरा पर

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