उमेश कुमार राठी की रचनाएँ

प्यार बना उपहार हमारा 

प्यार बना उपहार हमारा
प्राण प्रिये आभार
याद रहेगा ताजीवन अब
यह मनहर उपकार

मुख पर है मुस्कान ज़रूरी
इसके बिन पहचान अधूरी
जोड़ रखी हो इन आँखों में
लाज हया का मान मयूरी
जीवन के अनुपम वैभव पर
एकल है अधिकार

वाणी में मृदु भाष भरा है
एक अनोखा हास भरा है
दामन के इस परिसीमन में
जीवन का अहसास भरा है
प्रेम सुवासित कस्तूरी से
महक रहा संसार

बौरायी आँगन में वृंदा
रूप लगे ज्यों पूनम चंदा
चख करके मकरंद नजर से
मीत मुदित है प्रेम परिंदा
मनभावन मीठी खुशियों पर
दिल होता अभिसार
प्यार बना उपहार हमारा
प्राण प्रिये आभार

मोहिनी मुस्कान कर ले

मन पखेरू उड़ गगन में मोहिनी मुस्कान कर ले
प्रीत के परिधान की अब पावनी पहचान कर ले

शाम का अवसान है परिदृश्य बंकिम देख ले तू
लालिमा खोने लगी वर्चस्व अंतिम देख ले तू
व्यस्त था पूरे दिवस पर अस्त पल में हो गया है
शक्ति का है पुंज दिनकर स्वत्व मद्धिम देख ले तू
डूबना अस्तित्व सबका सार्वभौमिक सत्य है ये
वक्त के दिनमान का आश्वस्त हो अनुमान कर ले…

दुष्ट कब संतुष्ट होता प्यार का सत्कार पाके
व्यक्ति कब आकृष्ट होता द्वार पर उपहार पाके
स्वर्थ में डूबा हुआ उपकार कब स्वीकार करता
भ्रष्ट मति अति भ्रष्ट होता और ज़्यादा प्यार पाके
शून्य के परिवेश में आवेश क्यों धारण किया है
मत रहो अनजान इतना ज्ञान से संज्ञान कर ले…

ज्वार से जगती विषमता सोचना सबको पड़ेगा
प्यार जब दिल में उमड़ता पोषना इसको पड़ेगा
नैन पुतली के निलय में स्वप्न आते दूरगामी
क्वाँर में होती चपलता मोड़ना मन को पड़ेगा
ज्ञान रूपी हिय सरित में स्नान करना है ज़रूरी
प्रेम का अनुदान करके आन का संधान कर ले…

जिंदगी का हर गुणक अब लग रहा है तानपूरा
साधना में लीन होकर कर दिया गुणगान पूरा
अर्थ सारे सार्थक हैं भाव से संचित किये हैं
रंग को अभिरंग करके कर लिया मधुपान पूरा
शब्द के आह्वान से ही कल्पना होती तरंगित
मीत अब उन्वान लिखके गीत का सम्मान कर ले

दिल पर तेरा अधिकार प्रिये

जाने अनजाने मान लिया
दिल पर तेरा अधिकार प्रिये
संयम ने तोड़े बाँध सभी
हम कर बैठे अभिसार प्रिये

तुम ही मृगनयनी चितवन हो
इस कोमल दिल की धड़कन हो
निश्चित खुशबू हो चंदन की
सच मानो जीवन दर्पण हो
रसवंती सुष्मित काया पर
सोहे पुष्पित शृंगार प्रिये

तुम ही सरिता की कलकल हो
हँसती गाती-सी हलचल हो
जब अलकें बिखरें आँचल पर
लगती बाला-सी चंचल हो
संजोग कहूँ या चमत्कार
हो मेरा पहिला प्यार प्रिये

पायल घुँघरू की प्रिय पुकार
करती निशदिन स्वर लय निसार
जब प्रीत हृदय की मीत बने
हर तार बने मधुमय सितार
नारी की पावन शुचिता से
परिवार लगे संसार प्रिये

सूखे तरुवर की शाखों पर

सूखे तरुवर की शाखों पर
ताल बजाते पण
जीवन की इस पगडंडी पर
शेष बचा पतझड़

खाल पसीने से गलती है
धूल भरी आँधी चलती है
रहता है अँधहड़

आब नहीं तेजाब मिला है
कैसा प्यार जवाब मिला है
हर हिजाब के अंदर केवल
दिखती है गड़बड़

तेज हवा के झोंके आते
गंध सुगंध विभा ले आते
चुनरी उड़ती जब दामन से
करती है फड़फड़

आदत में बदलाव नहीं कुछ
चाहत से अलगाव नहीं कुछ
सिर पर पल्लू रखने से भी
होती है चिड़चिड़

रेत नदी में जब बचती है
जेठ दुपहरी में तपती है
दुख देता पग के छालों को
रेतीला कण कण

सेज सुमन पर प्यार मिला था
प्रीतम का उपहार मिला था
सुधियों की प्रेमिल खिड़की अब
करती है खड़खड़

होती जब बरसात अचानक
बन जाती तब रात कथानक
मीत सदा अंबर में बिजुरी
करती है तड़तड़

जिस गली में हमारी निगाहें मिलीं 

जिस गली में हमारी निगाहें मिलीं
बेकली मिट गयी जब दुआयें मिलीं
प्यार उपहार हासिल हुआ इश्क़ में
साथ में ढेर सारी अदायें मिलीं

हम खड़े हैं अभी तक उसी मोड़ पर
तुम गये थे जहाँ पर हमें छोड़कर
राह अनजान है प्यार नादान है
किस जगह खो गये प्रीत को जोड़कर
प्रेम पथ प्रीत का याद कर लो प्रिये
जिस डगर में जिगर को सदायें मिलीं

प्रेम सत्संग है जीव का अंग है
मोह का रंग है मोद का संग है
इस हृदय में पला हर कमल दल खिला
प्रेम के रूप से सृष्टि भी दंग है
बौर जब छा गया आम के पेड़ पर
कूकती कोकिला को घटायें मिलीं

मेघ की वृष्टि में राग मल्हार है
गेह की दृष्टि में जाग मनुहार है
प्रेम पूरक रही नेह की भूमिका
देह की पृष्ठ में त्याग उपकार है
छाँव सत्कार है मीत मधु प्रीत में
तप्त तन को मलय गिरि हवायें मिलीं

मधु मुस्कान बखेरी होगी 

मधु मुस्कान बखेरी होगी
दिल में मित्र बसाया होगा
कर शृंगार मिलन बेला में
मोंगर इत्र लगाया होगा

चुनके शब्द पिरोये होंगे
भाव सँजोये होंगे निर्मल
जब अनुभूति उड़ेली होगी
आखर थिरके होंगे आँचल
अधरों की पाँखुर से छूकर
प्रेमिल पत्र सजाया होगा
मधु मुस्कान बखेरी होगी
दिल में मित्र बसाया होगा

धूप उतरती घर आँगन में
रूप रुपहला लगता दामन
जब भी नूर निहारा जाता
स्वप्न दिखाने लगता दर्पण
चंदन का आलेप लगाके
आनन चित्र लजाया होगा
मधु मुस्कान बखेरी होगी
दिल में मित्र बसाया होगा

जागी होगी रति अभिलाषा
सुनके प्यार पयोदित भाषा
मीत अभीप्सा जैसी होती
गढ़ जाती वैसी परिभाषा
पेंग भरी होगी बाँहों में
नूतन सत्र चलाया होगा
मधु मुस्कान बखेरी होगी
दिल में मित्र बसाया होगा

मौन हुये अब शब्द हमारे 

मौन हुये अब शब्द हमारे
ये खत लिखने से पहले
रूठ गये सब भाव हमारे
अश्क़ टपकने से पहले

धुँधलाया है मन का दर्पण
धूल जमीं उसके ऊपर
छूटा सूरत का आकर्षण
मोह नहीं उस पर निर्भर

देख लिया हर रूप तुम्हारा
सूरज ढलने से पहले
मौन हुये हैं शब्द हमारे
ये खत लिखने से पहले

शेष नहीं अवशेष पुराने
जो दिल को आहत कर दें
पीड़ा की सौगात थमाकर
फिर से मर्माहत कर दें

अक्स मिटा डाले हैं सारे
संशय पलने से पहले
मौन हुये हैं शब्द हमारे
ये खत लिखने से पहले

शूल दिया करता है पीड़ा
फूल व्यथा देता अतिशय
सुधियों का जब लगता ताँता
छीन लिया करता सुरलय

भूल गया हूँ मिष्ट सुधारस
खुद मुरझाने से पहले
मौन हुये हैं शब्द हमारे
ये खत लिखने से पहले

दूर हुयी है “मीत” कल्पना
गीत नहीं रच पाता अब
फीकी लगती रंग अल्पना
नेह नहीं भर पाता अब
आकर कह दो तुम दो आखर
मेरे जाने से पहले
मौन हुये हैं शब्द हमारे
ये खत लिखने से पहले

चहुँ तरफा फैली आशायें

ना ही बंधन ना सीमायें
चहुँ तरफा फैली आशायें
अनुप्राणित हर जीवन रखता
मुदित मौन मन अभिलाषायें

होता हृदय बहुत ही कुंठित
पीड़ा देती जब चिंतायें
थक जाता एकांतवास भी
सह सहके कटु जीव व्यथायें
ना ही बंधन ना सीमायें
चहुँ तरफ़ा फैली आशायें

मानव मन का अद्भुत चिंतन
कभी रुलाये कभी हँसाये
हृदय सरित की गहन उर्मियाँ
पता नहीं कब शोर मचायें
ना ही बंधन ना सीमायें
चहुँ तरफ़ा फैली आशायें

हर्षित हो जाता है मनवा
जब मुस्काती मधु कलिकायें
सुष्मित होत हृदय की वृंदा
निरख हरित बौरात लतायें
ना ही बंधन ना सीमायें
चहुँ तरफ़ा फैली आशायें

होठों पर प्यार निसार करूँ 

होठों पर प्यार निसार करूँ
दिल में यह चाह घनेरी है
चुपचाप सुनो ये बात प्रिये
मुस्कान मधुरिमा मेरी है

जब धूप बरसती मूरत पर
देखा तब मैंने वातायन
मधु रश्मि सरसती सूरत पर
पसराया प्रभु ने रूपायन
सचमुच लगता है प्राण प्रिये
ये आभ अरुणिमा मेरी है
चुपचाप सुनो ये बात प्रिये
मुस्कान मधुरिमा मेरी है

आँगन में झूम रहा सावन
जब से तुमने शृंगार किया
तेरी नखरैली चितवन ने
चुपके दिल पर अधिकार किया
तन में माधुर्य समाया है
ये सौम्य तरुणिमा मेरी है
चुपचाप सुनो ये बात प्रिये
मुस्कान मधुरिमा मेरी है

निशदिन सुनके वाणी वंदन
अविभूत करे घर को चंदन
अँगनाई छूकर पुरवायी
जीवन का करती अभिनन्दन
मनमीत सुवासित यौवन की
परिणीत वरुणिमा मेरी है
चुपचाप सुनो ये बात प्रिये
मुस्कान मधुरिमा मेरी है

ताल कहरवा बाजे निशदिन

ताल कहरवा बाजे निशदिन
आयी द्वार बहार
राग बिहाग सुनाओ साजन
करके प्यार गुहार

याद तुम्हारी आयी प्रीतम
अश्क़ किये बरसात
शाम ढले ही घिर आया तम
कैसी ये सौगात
चैन मिलेगा कोमल दिल को
पाकर लाड़ दुलार
राग बिहाग सुनाओ साजन
करके प्यार गुहार

देह नदी में होती कलकल
बढ़ता रक्त प्रवाह
कर देता जीवन में हलचल
अक्सर सिक्त विवाह
रीत रिवाज़ करें कुछ अनबन
उठती पीर अपार
राग बिहाग सुनाओ साजन
करके प्यार गुहार

लिखते लिखते प्रेमिल पाँती
सिसकी आयी रात
रोक न पायी नेहिल हिचकी
रूठ गये जज़्बात
शब्द वियोग पिरोयी विरहन
लिखके रूह पुकार
राग बिहाग सुनाओ साजन
करके प्यार गुहार

सिलने पर होती है सिहरन
सुख दुख के पैबंद
धुँधलाता जीवन का दर्पण
अभिमुख रहता कुंद
जब भी होता मन में क्रंदन
उठता दर्द ग़ुबार
राग बिहाग सुनाओ साजन
करके प्यार गुहार

बाबुल की चिंता मिट जाये
जल्दी हों परिणीत
आकुल दिल का गम घट जाये
शादी हो मनमीत
डोली में होगा अभिवंदन
लाओ संग कहार
राग बिहाग सुनाओ साजन
करके प्यार गुहार

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