एजाज़ फारूक़ी की रचनाएँ

आहया

असा-ए-मूसा
अँधेरी रातों की एक तज्सीम मुंजमिद
जिस में हाल इक नुक़्ता-ए-सुकूनी
न कोई हरकत न कोई रफ़्तार
जब आसमानों से आग बरसी
तो बर्फ़ पिघली
धुआँ सा निकला
असा में हरकत हुई
तो महबूस नाग निकला
वो एक सय्याल लम्हा
जो मुंजमिद पड़ा था
बढ़ा
झपट कर
ख़िज़ाँ-रसीदा शजर की सब ख़ुश्क टहनियों को निगल गया

अपना अपना रंग

तू है इक ताँबे का थाल
जो सूरज की गर्मी में सारा साल तपे
कोई हल्का नीला बादल जब उस पर बूँदें बरसाए
एक छनाका हो और बूँदें बादल को उड़ जाएँ
ताँबा जलता रहे
वो है इक बिजली का तार
जिस के अंदर तेज़ और आतिश-नाक इक बर्क़ी-रौ दौड़े
जो भीउस के पास से गुज़रे
उस की जानिब खींचता जाए
उस के साथ चिपट के मौत के झूले झूले
बर्की-रौ वैसी ही सूरअत और तेजी से दौड़ती जाए

मैं बर्ग-ए-शजर
सूरज चमके मौन उस की किरनों को अपने रूप में धारूँ
बादल बरसे मैं उस की बूँदें अपनी रग रग में उतारूँ

बाद चले मैं उस की लहरों की नग़मों में ढालूँ
और ख़िजाँ आए तो उस के मुँह में अपना रस टपका कर पेड़ से
उतरूँ
धरती में मुदग़म हो जाऊँ
धरती जब मुझ को उगले तो पौदा बन फूटूँ

चुप

तू ने सर्द हवाओं की ज़ुबाँ सीखी है
तेरे ठंडे लम्स से धड़कनें यख़-बस्ता हुईं और मैं
चुप हूँ

मैं ने वक़्त-ए-सुब्ह चिड़ियों की सुरीली चहचहाहट को सुना
और मेरे ज़ेहन के सागर में नग़मे बुलबुले बन कर उठे हैं
तेरे कड़वे बोल से हर-सू हैं आवाज़ों के लाशें
और मैॅं चुप हूँ
मैं ने वो मासूम प्यारे गुल-बदन देखे हैं
जिन के मरमरीं-जिस्मों में पाकीज़ा मोहब्बत के नशेमन हैं
तेरे इन खुरदुरे हाथों ने ये सारे नशेमन नोच डाले
और मैं चुप हूँ

मैं ने देखे हैं वो चेहरे चाँद जैसे ग़ुंचा सूरत
जिन की आँखें आइना हैं आने वाले मौसमों का
तू ने इन आँखों में भी काँटे चुभोए
और मैं चुप हूँ

बा-कमाल ओ बा-सफ़ा लोग भी देखे हैं मैं ने
जिन के होंटों से खिले हैं सिद्क़ ओ दानाई के फूल
तू ने उन होंटों को घोला ज़हर में
और मैं चुप हूँ

हर्फ़

वादी वादी सहरा सहरा फिरता रहा मैं दीवाना
कोह मिला
तो दरिया बन कर उस का सीना चीर के गुज़रा
सहराओं की तुंद-हवाओं में लाल बन कर जलता रहा
धरती की आग़ोश मिली
तो पौदा बन कर फूटा
जब आकाश से नज़रें मिलीं
तो ताएर बन के उड़ा
गारों के अँधियारों में मैं चाँद बना
फिर भी मैं दीवाना रहा
अपने सपनों ख़्वाबों की उल्टी सीधी तस्वीर बनाई
टेढ़ी मेढ़ी लकीरें खींचीं
लेकिन जब इक हर्फ़ मिला
गोया नूर की किरनें मेरे दो होंटों में सिमट आई हैं
मैं चराग़-ए-अल्ला-दीं ले कर
ग़ारों के अँधियारों में खोए हुए मोती ढूँढ रहा हूँ

कतबा

ये कतबा फ़लाँ सन का है
ये सन इस लिए इस पर कुंदा किया
कि सब वारियों पर ये वाज़ेह रहे
कि इस रोज़ बरसी है मरहूम की
अज़ीज़ ओ अक़ारिब यतामा मसाकीन को
ज़ियाफ़त से अपनी नवाज़ें सभी को बुलाएँ
कि सब मिल के मरहूम के हक़ में दस्त-ए-दुआ का उठाएँ
ज़बाँ से कहीं अपनी मरहूम की मग़फ़िरत हो
बुज़ुर्ग-ए-मुक़द्दस के नाम-ए-मुक़द्दस पे भेजें दरूद ओ सलाम
सभी ख़ास ओ आम
मगर ये भी मल्हूज़-ए-ख़ातिर रहे
अज़ीज़ ओ अक़ारिब का शर्ब ओ तआम
और उस का निज़ाम
अलग हो वहाँ से
जहाँ हों यतामा मसाकीन अंधे भिकारी
फटे और मैले लिबासों में सब औरतें और बच्चे
कई लूले लंगड़े मरीज़ और गंदे
वही जिन को कहते हैं हम सब अवाम
वहाँ होगा इक शोर-ओ-ग़ुल-इजि़्दहाम
ये कर देंगे हम सब का जीना हराम

तक्मील

वो तीरगी भी अजीब थी
चाँदनी की ठंडक गुदाज़ चादर से सारा जंगल लिपट रहा था
गुलों के सद-रंग
धुँदले धुँदले से
जैसे इक सीम-तन के चेहरे के शोख गाजे पे
आँसुओं का गुबार हो
पेड़, मुंतजिर
अपनी नर्म शाखों के हाथ फैलाए
और कभी शाख चटकी
तो साए निकले
मुलूक फूलों को चूम कर
चाँदनी की चादर पे नाचते थे
कहाँ से आई
वो इक किरन
जिसने फैलती तीरगी की गँभीरता को चीरा
तो मेरे भीतर में एक किरनों का सिलसिला यूँ उतर रहा था
कि कोह-ए-आतिश-फ़शाँ से लावा नशेब को बह रहा हो
मेरे लहू से सोज उबल पड़े
जिन की तेज़ हिद्दत से तीरगी के मुहीब यख़-बस्ता संग पिघले
तो नूर के रास्तों का इक जाल खुल गया

मगर अभी तो मुहीब काले पहाड़ कुछ और भी नज़र आ रहे हैं
और मैं सफ़र की हिद्दत से जल रहा हूँ
ज़रा मैं अब चाँदनी की ठंडी गुदाज़-चादर में
दम तो ले लूँ
कहीं उबलती हुई ये आतिश
मुझे जला कर भसम न कर दे

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