एन. मनोहर प्रसाद की रचनाएँ

कौन है दलित

कौन है दलित?
हम में से हर कोई—
कहाँ थे हम आज तक?
कुचले जाते रहे हैं हम—
दूसरे जमात के पाँव-तले
चूँकि यह क़ौम—यह समाज
नहीं थे कभी हमारे / न हैं / न होंगे ही
भले ये धरती हमारी है
और हम हैं इस धरती की सन्तान!

क्या करते रहे हैं हम आज तक
आपस में बँटे-बँटे, जुदा-जुदा?
हम रोते-रोते सहलाते रहे
ख़ुद ही अपने घाव अकेले
चाहे वे घाव
कितने ही संगीन और ख़तरनाक
क्यों न हों?
क्या है हमारी योजना?
हम नहीं रहना चाहते हैं अब गूँगे

तब क्या करें हम?
हमारी आवाज़ें साफ़ हैं
तेज़ और ज़ोरदार हैं
वे आवाज़ें गूँजें और पड़ें— सुनाई
अपनों के ही बीच अपने ही समुदाय में
सुनते तो आये ही हैं हम निरन्तर
अब नहीं सुनेंगे दूसरों को।
बस बहुत हो चुका—
आओ हम खोजें
कौन-सी आवाज़ है समझदार
कौन-सी साफ़ और सुनाई पड़ने लायक़
किसके विचार हैं स्पष्ट, किसके शुभ
उन्हें बढ़ाएँ—
पहले अपनों में— फिर ग़ैरों के बीच
पूरे समाज में
देश की चौहद्दियों के बाहर भी
राष्ट्र की चौहद्दियों के भी बाहर

बस बहुत हो चुका अब
दूसरों द्वारा शोषण
हमारी समस्याओं को सुनने-सीखने
देखने-मनन करने का—
दूसरों द्वारा उपदेश-परामर्श का नाटक
वह भी उनसे
जो हमारे पुश्तैनी-परम्परागत शोषकों के हैं—
वारिस
आओ हम अपनी आवाज़
काउन्सिल, विधानसभा, लोकसभा
और विश्व-मंच तक ख़ुद ले जाएँ
हमें क्या चाहिए अब?
हमें चाहिए अब अतीत-वर्तमान और भविष्य
हमारे हिस्से का हर अंश
हमें नहीं चाहिए
दूसरों की दी हुई रियायतें या उपहार
मुआवज़ा या अनुदान भी नहीं
न ही अतीत में भोगे हुए नुक़सान का ख़ामियाज़ा
न ही बख़्शीश-न ही रहम
दूसरों के हिस्से का
हम नहीं चाहते हैं एक भी कण
लेकिन हमारे भूत-वर्तमान-भविष्य का

चाहिए हमें हर हिस्सा
अगर कोई बैठा है दबाए
अतीत का हिस्सा हमारा
या हमारे बाप-दादाओं का भाग
उन्हें अब आगे अपने पास रखने का
न कोई काम है, न कोई हक़
अच्छा हो यदि वे ख़ुद ही दें छोड़ उसे
भलमनसाहत के साथ
उन्हें नहीं है ज़ार-ज़ार रोने की दरकार
या कि रहम माँगने का हक़
न वो माँगे क्षमादान
अपने आकाश से— स्वर्ग से
फ़रिश्तों-देवों और देवियों से
न दें वो दलील कोई
अपनी मासूमियत और बेगुनाही की
न करें बहस कि उन्हें—
क्यों माना जाए जिम्मेवार
या किया जाए दंडित
उन पापों, ग़लतियों, और ज़ुल्मों के लिए—
जो किया उनके पूर्वजों ने

हम भी नहीं देना चाहते हैं
इन सबके लिए उन्हें कोई दंड
पर ये कहकर ही बस उन्हें
क़त्तई छोड़ नहीं देना चाहते
हम नहीं चाहते कि वे रहें क़ाबिज़
हमारे किसी भी हिस्से पर
उनके पूर्वजों ने ठगा था हमें
लूटा भी था
छीना और चुराया भी था
पहले तो हम चाहते नहीं
कि हमसे कुछ कहे कोई
दे नसीहत या मशविरा
या कुछ करे या बोले
हमारी तरफ़दारी में
कहीं-भी किसी भी वक़्त-किसी भी जगह
अब या भविष्य में!
हम सोचें नहीं— जागें
हाथ से हाथ मिलाएँ—
सोचें
संगठित होवें— आगे बढ़ें!

नाजायज़ फेंके हुए बच्चों की तरह

दलित सदैव रहे
नाजायज़ फेंके हुए बच्चों की तरह
पूरी क़ौम से उपेक्षित
समूचे समाज से परित्यक्त
सभी धर्मों द्वारा शोषित
राजसत्ता द्वारा विस्मृत
दलितों को दिए गये ज़ख़्म
छोड़ दिया गया उन्हें बेसहारा
ख़ुद ही करने को अपनी मरहम-पट्टी

अब हमारे बीच आयी हैं
सौम्य रूप में कार्यरत
सम्भ्रान्त स्वैच्छिक संस्थाएँ
जो दूसरों द्वारा होती हैं संचालित—
हमारे नाम पर,
ताकि वह खा सकें उसका फल
रसदार गूदा
और हमारे लिए छोड़ दें
गुठली और छिलके
यह कहते हुए कि
‘फलों का सबसे पौष्टिक तत्त्व इन्हीं में है।’

कहाँ हैं दलित लेखक

दलित बुद्धिजीवी?
हम उन्हें पहचान नहीं सकते
न ही दे पाते उन्हें सम्मान
हम भोग रहे दासत्व
मुद्दतों से रहते आ रहे ग़ुलाम
कि हम सब सत्ताधीशों से ही हैं डरते
और सम्मान भी उन्हीं का करते
कि वैभव के तमाशे और नंगी सत्ता को ही
हम पूजते— उनके ही आज्ञाकारी होते—
हम होते हैं प्रभावित
तुच्छ आकांक्षाओं और रोटी के चन्द टुकड़ों से
क्षुद्र उपहारों या कलदारों (पैसों) —
और चुटकी भर लाभों से!

हम नहीं माँगते स्वर्ग 

हम नहीं माँगते स्वर्ग
इस धरती पर
हम तो किंचित राहत-उपराम और आराम
या दम मारने की फ़ुर्सत चाहते
जगह चाहते
जगह एक कॉलम भर,
शायद अर्ध-कॉलम भर,
या बस एक कॉमा भर,
बस यही है मेरी ज़िन्दगी का पूर्ण प्रश्न?
और यही प्रश्न है मेरे अभागे लोगों का भी
तुममें से कोई है इस से अवगत
या है कोई ऐसा जो कम से कम इसे समझे?

विस्मयादिबोधक

आश्चर्य!
सचमुच आश्चर्य!
सचमुच जीवन्त आश्चर्य!
गुज़रते आनन्द पर नहीं!
किन्तु हमारे अनन्त दुर्भाग्य पर!
डूबते हुए अन्तहीन पीड़ाजनक समस्याओं पर—
थोपी गयी हमारी सर पर अन्तहीन सहस्त्राब्दियों से!
अवांछित शत्रु नस्ल होने पर भी—
आश्चर्य है कि हम अपने समुदाय के रूप में हैं बरक़रार!

कोड 

I -!  :  ; , ?
मैं चाहता हूँ एक पूर्णविराम लगाना।
चहुँ और फैली समस्याओं पर—
लेकिन सब हैं जो समयातीत रहस्य!
अन्तहीन असीम पीड़ाओं का सातत्य :
मैं बहाता रहता हूँ आँसू कुछ शान्ति की आशा में;
कम से कम अस्थायी विराम त्रास
क्षणिक दम भरने भर मिले समय,
क्या हमारे जैसे लोगों या समाजों के लिए कहीं है कोई आशा?

विराम 

विराम।
पूर्ण विराम।
एक पूर्ण विराम।
रोकने के लिए चदुर्दिक फैले सब अन्याय!

उनका लक्ष्य 

बच्चों को शिक्षा से
जन को धन से
जनता को राज-सत्ता से वंचित
रखना ही है लक्ष्य—
अभिजात शासकों उनके हाकिमों
और सरकारों का!

अप्प दीपो भवः

बुद्ध ने आनन्द से कहा
‘अप्प दीपो भव’—
आओ हम दलित सब
स्वयं अपने लिए बनें मार्गदर्शक।

(रमणिका गुप्ता द्वारा अँग्रेज़ी से अनूदित)

शिक्षा

बुद्धि प्रदीप्त करने के लिए
शिक्षा की है ज़रूरत
न कि कुछ को दें रोज़गार
बाक़ी को रखें बेरोज़गारी से अभिशप्त!

Share