एन. सिंह की रचनाएँ

ये वही हैं

समरसता की रामनामी ओढ़कर
वे फिर आ गये हैं
अब तुम्हें ही तय करना है कि
ये मनुवादी समरसता
कहाँ ले जाएगी तुम्हें ?
गाय की पूँछ पकड़कर
घर में घुस आए
कसाई की
सज़ा तुम्हें ही तय करनी है
पहचानो
कहीं ये वे ही तो नहीं हैं
जो शम्बूक की हत्या करते और कराते हैं
मन्दिर के द्वार बन्द करते हैं
अनावृत्त मूर्ति को गंगाजल से धोते हैं
घर और गाँव जलाते हैं
गाँवों में नंगा घुमाते हैं
नारायणपुर, बेलछी और पिपरा के अपराधी
कहीं ये ही तो नहीं हैं
भूल की सज़ा
कभी-कभी बहुत भयानक होती है
गले लगाने की साज़िश को समझो
भूलो मत कि
ये वही हैं।

आओ साथ बढ़ें 

दुकान हमारी भी है
और तुम्हारी भी
ये बात और है कि
हमारी दूकान पर बिकता है
जूता
और तुम्हारी दुकान पर
रामनामी
हमारे लिए जूते का महत्त्व
वही है
तुम्हारे लिए जो है रामनामी का
आओ समानता का
ये तार पकड़ें
एकता के सूत्र गढ़ें
साथ बढ़ें!

धीरे-धीरे जाग रहे हैं अब मेरी बस्ती के लोग

धीरे-धीरे जाग रहे हैं अब मेरी बस्ती के लोग
रामराज झूठा सपना था, जान गये बस्ती के लोग

बेईमान तो लूट रहे, कुछ ईमानदार बनकर छलते
एक हैं दोनों, समझ गये हैं, अब मेरी बस्ती के लोग

चाहें इसकी हो या उसकी, मार-मार ही होती है
नहीं सहेंगे, वार करेंगे अब मेरी बस्ती के लोग

कमज़ोर हाथ में आ जाने से, लाठी भी ताक़त खोती है
अपनी ग़लती जान रहे हैं, अब मेरी बस्ती के लोग

शान्ति-वन से राजघाट तक, हर रंग के क़स्मे-वादे हैं
झूठ-सत्य में भेद समझते, अब मेरी बस्ती के लोग

धरती पर सब ठीक-ठाक है 

धरती पर सब ठीक-ठाक है, पर हलचल अख़बारों में
बुद्धि कैसे बिकती है, ये देखो भरे बाज़ारों में

सदियों तप कर-करके तुमने घृणित अर्थ को शब्द दिये
वही शब्द तो बदले हैं, अब शब्दों से हथियारों में

आहत अहं नकार रहा है, परिवर्तन की आँधी को
कुछ बदला है वे कहते हैं, लेकिन महज़ इशारों में

वे सिर जोड़े सोच रहे हैं, बालू की दीवार बने
या फिर कैसे छेद बने, उन मज़बूत किनारों में

नादान नहीं अपमानित-जन, अपना दुश्मन पहचान लिये
अब वो सज्दा नहीं करेंगे, धर्मों के दरबारों में

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