एस. मनोज की रचनाएँ

जे छलै अभिशप्त मानव 

जे छलै अभिशप्त मानव वैह एखन अछि लड़ि रहल
श्वेदकण सँ सीचिंके ओ पेट सबहक भरि रहल

एक गज धरतीक टुकड़ा ओकरा नहिं अछि धर ल
दुधमुंहा नेना ओकर अछि नभकें नीचाँ जरि रहल

राति ओकर बीत जयतै सड़क वा फुटपाथ पर
शौच ल ओ कतय जयतै अहि सोचे डरि रहल

जय जवानक जय किसानक नारा की लगबै छलहुँ
सीमा पर आ खेतमे ओ नित एतय अछि मरि रहल

सप्तरंगी योजनामे कार्य बल तल्लीन अछि
ओ में जे अछि गरीब लेखे फाइलेमे सड़ि रहल।

प्रेम अछि त सृष्टि अछि श्रृंगार अछि

प्रेम अछि त सृष्टि अछि शृंगार अछि
प्रेम अछि त जीव ल सहकार अछि

प्रेम अछि त जीव ल मधुमास अछि
प्रेम अछि त हास अछि परिहास अछि

प्रेम सँ जीवन बनत आराधना सन
प्रेम सँ जीवन बनत एक साधना सन

जतय जतय प्रेम अछि सृष्टि ततय अछि
बिना प्रेमक सत कहू जीवन कतय अछि

चलू सभ मिलि प्रेमकें सरिता बहाबी
घृणा-द्वेष जे अछि एतय ओ सभ मेटाबी

काला आखर महिस समान

जहि धरती पर विद्यापति छथि
चंदा झा सन छथि विद्वान
ओहि धरती पर चलू देखाबी
काला आखर महिस समान
चलू मेटाबी अहि कलंककें

जे धरती अछि सोना उगलैत
पोखरि पोखरि माँछ मखान
ओहि धरती पर चलू देखाबी
भुक्खल अछि मजदूर किसान
चलू मेटाबी अहि पीड़ाकें

जहि भाषामे हरिमोहन छथि
यात्री जी सन गुण केर खान
ओ भाषा आय सिकुड़ि रहल अछि
सिमटि रहल मैथिल केर मान
चलू बढ़ाबी अप्पन भाषा

जहि धरती पर भारती गार्गी
मंडनमिश्रक जन्मस्थान
ओहि धरती पर बाढ़िक विपदा
सौंसे मिथिला अछि फिरिसान
चलू सजाबी लोकक जीवन

प्रियतमा

चान सन चेहरा अहाँक
अहैं छिटकल चाँदनी
राग जे सभ हम गबै छी
अहैं सभहक रागिनी

चानमे देखैत छलहुँ जे
प्रियतमा के रूप क’
पूखक’ ओ उष्णता बनि
खिलखिलाबैत धूप क’

फूल पर भौरा उड़ै छल
अहाँ छी एहसासमे
वेदनाक हर घड़ीमे
अहाँ मिललहुँ पासमे

दूबि पर जे ओस थिक ओ
विरहके ओ नोर थिक
मिलन ल’ नित रैन बरषै
वेदनाक शोर थिक

तिमिर के सभ बंध काटैत
अहाँ रहलहुँ संगमे
बनि हिमालय ठाढ़ रहलहुँ
जीवनक सभ जंगमे

बेटियो के सभ दियो पढ़ाउ

बेटियो के सभ दियो पढ़ाउ
पढाउ यै बहिना
बेटियो के सभ दियो पढाउ

बेटा आ बेटी मे फर्क हम कैलियै
बेटी क जिनगी बनैबे नहि कैलियै
बेटियो क जिनगी बनाउ
बनाउ यै बहिना
बेटियो के सब दियो पढाउ

अंधविश्वास मे सिमटल छी अहिना
ज्ञान विज्ञान सँ कोनो काजे नहि जहिना
ज्ञान दिश नजैर के घुमाउ
घुमाउ यै बहिना
बेटियो क सभ दियो पढाउ

लोकतंत्र मे समता चाही
सभ्य समाज के हम सब छी राही
अपनो आब जिनगी सजाउ
सजाउ यै बहिना
बेटियो क सभ दियो पढाउ

करै छी हम प्रणाम यौ

करै छी हम प्रणाम यौ

हम पतवार हमहीं छी नैया
हम सभकेँ छी अहैं खेबैया
बिन गुणवत्ता शिक्षण रहत त
होयबै अहाँ बदनाम यौ

शिक्षाक स्तर जँ खसले जैतै
नेनाक विकास नहि होयतै
त एक समयमे है यौ गुरूजी
अहौ होयबै बेकाम यौ

मोती बिन जँ शीपी पलतै
ज्ञानक बिन जँ कक्षा रहतै
शनैः शनैः सभ विद्यालय त
भ जाएत निष्प्राण यौ

शिक्षक होएत छथि युग निर्माता
बाल बोध केर भाग्य विधाता
भविष्य निर्माण जँ नहिये होएत
सभ करत कोना प्रणाम यौ।

दोहे 

दोहा
व्यर्थ भेल सभ राग अछि, व्यर्थ भेल सभ साज।
जीवन केर संग्राममे, बेसुर सभ आवाज ।

मोनक पीर नहूँ नहूँ, तन पर करै प्रहार
स्वास्थक अछि जँ कामना, नीक करू व्यवहार।

नारी गुण केर खान अछि, नर अछि सुधा समान।
नर नारी संयोग सँ, सुरभित सकल जहान।

शस्य श्यामला वसुंधरा भ’ रहली नित हीन।
विष घोलैत छी विश्वमे भ’ रहलहुँ हम दीन।

लिखू सदा जन पीड़ क’, पीड़ामे अछि देश ।
घोर अमावश राति अछि, मेटबू सभक क्लेश।

भौतिकवादी पंथ क’ ई कैसन उपहार ।
संवेदन सभ मरि रहल जीवन अछि लाचार ।

जिनका माथा पर रहल, भरि परिवारक भार।
वृद्धाश्रम मे आइ ओ, छथि बेबस लाचार ।

उपवन मे गूँजै लगल, रितु मधुमासक साज।
दिग दिगन्त पसरै लगल, कोइलि क’ आवाज ।

क्षण क्षण जंगल कटि रहल, भोगवादकें नाम ।
तप्त होइत अहि भूमिकें, सर्वनाश अंजाम।

पुष्प पुष्प पर गूँजैत अछि, भ्रमर भ्रमर केर गान।
रस चूसै ओ पुष्प सँ, सुधा करै अछि दान।

हृदय हृदय केर दीप जराउ 

हृदय हृदय केर दीप जराउ
आइल अछि दीवाली यौ
दीप मोनकेँ बिना जरैने
नहि आइत खुशहाली यौ

बरीख-बरीख सँ जरा रहल छी
घर-घर दीयाबाती
शिक्षा केँ बिन नहिंये आइल
कत्तहुँ सुख केँ राती
दीप ज्ञानकेँ बिना जरैने
भागत नहि कंगाली यौ

नेह प्रेम केर दीप जराउ
जाति धर्म क’ छोड़ू
घृणा केर जे आगू बढ़बै
ओ मटका केर फोड़ू
प्रेमक उपवन सींच सींच क’
बनियौ प्रेमक माली यौ

विजय पर्व थिक उजियाला ई
तम सँ मुक्ति पाउ
हृदय बीच जे सर्प छिपल अछि
ओकरा मारि भगाउ
भ’ जाइत मानव स्वलीन त’
के करतै रखवाली यौ।

फागक रंग

आबू सभ मिलि खेलू फाग
रहै न मनमे कनिको दाग।

सलमा क’ संग राधा खेलै
पीटर संग कन्हैया
फागक रंग चढ़ै सभ पर त’
नाचै ता ता थैया

मिलि-जुलि सभ रंग लगाबै
संग जोगीरा गाबै
ऊँच नीच क’ भेदभाव क’
सभ मिलि दूर भगाबै

रंग अबीरक बरखा होय आ
सभ मिलि खूब नहाबै
प्रीतक रंग चढ़ै सभ पर त’
सबहक मन हरखाबै

अछि सनेश ई नबका युगकेँ
जीवन सफल बनाबी
बैरभाव सभ भूलि बिसरि क’
रंगक पर्व मनाबी।

यक्ष प्रश्न 

मनुखक विकास यात्रा
हुनक कल्पनाक संग विकसित भेल छल
चिड़ैक पाँखि पर चढ़ैक लिलसा
उड़नी जहाज बनैलक
चान मामा सँ भेंट करबाक मनोकामना
चन्द्रयान बनैलक
सूईया सँ सेटेलाइट धरि सभक निर्माण
मनुखक परिकल्पनाक पाँखि
लगैक प्रमाण थिक।
विज्ञान क’ रहल अछि विकास
आ बदलि रहल अछि समाज
मुदा ओ आइ धरि मेटा नहि सकल
गरीबी, बेमारी
शोषण, अपराध
धार्मिक उन्माद
भेद, भ्रष्टाचार
अत्याचार, व्यभिचार।
आ नहि दिआ सकल सबहक
न्याय आ सम्मान
शिक्षा, रोजगार
स्वास्थ्यक सुविधा।
चान आ मंगल परकेँ यात्राक बादो
पृथ्वी परकेँ लोकक जीवन
कल्पनाशील मनुख आ
विज्ञानक सोझाँमे ठाढ़ अछि
यक्ष प्रश्न बनल ।

साजिश वा शाप

हम मिथिलावासी शापित छी
दहारक विपदा सँ
वा कोनो साजिशक शिकार होइत छी
साले साल
विज्ञान बड़ विकास क’ चुकल अछि
मनुख चान आ अंतरिक्षक नापि
रहल अछि डेग सँ
उपग्रह सँ अनेकानेक सूचना
प्राप्त होइछ प्रतिपल
ड्रोन कैमरा सँ निगरानी भ’ जाइत अछि
धरती सँ आकाश घरि।
फेर कियैक बांधक सुरक्षा
अछि अनियंत्रित।
हमर विपदा थिक कोनो
प्राकृतिक विपदा
वा योजनाकार कोनो एहन योजना
जे हमरा लेल शाप थिक
आ हुनका लेल वरदान।

बाबूजी 

जहिया रहथि बाबूजी
हम रही निश्चिंत।
मुदा घरक सभ लोक
रहैत छलै सैदखन फिरिसान
कतय रोकता बाबूजी
कतय टोकता बाबूजी।
बाबूजीक छलनि
समाजक ज्ञान
व्यवहारक ज्ञान
समयक ज्ञान
पोथीक ज्ञान।
तें ओ
सैदखन रहथि सचेत
करैत रहथि
सबहक सचेत।
मुदा आइ जखन
नहि छथि बाबूजी
घरक सभ लोक अछि निश्चिंत
आ हम छी फिरिसान
कोनाक बढ़तै घर
आ कोनाक बढ़तै समाज
बिना बाबूजीक।

एक सहारा बाबूजी 

जीवन के हर गम में, तम में
एक सहारा बाबूजी
कठिन काल, गहरे मातम में
एक सहारा बाबूजी

सर्जनरत माता मरियम का
एक सहारा बाबूजी
अंकुर, कोंपल, किसलय सबका
एक सहारा बाबूजी

छू ले हाथ गगन को कैसे
एक सहारा बाबूजी
कटे न जीवन जैसे-तैसे
एक सहारा बाबूजी

लक्ष्य हिमालय शिखर सरीखा
एक सहारा बाबूजी
दुर्गम पथ पर चलना सीखा
एक सहारा बाबूजी

अंधकार जब कभी डराता
एक सहारा बाबूजी
तूफानों से मन घबराता
एक सहारा बाबूजी

नीति, न्याय, सत पथ पे चलना
एक सहारा बाबूजी
तप्त लौह बन साँचे ढलना
एक सहारा बाबूजी।

दिनकरकें सुत छी

दीप बनि-बनि जरब
तमकें प्रतिपल हरब
हम त दिनकरकें सुत छी
दिवाकर बनब।

अछि विषमता जतय
दुःखकें कारण बनल
ओतय समता ल झंडा
उठैबे करब।

जनकें परिचय जतय
जाति सँ, धर्म सँ
कर्मवादी व्यवस्था
बनैबे करब।

अछि जे पहरा पड़ैत
कोखि पर घोघ पर
ओ सभ पहराकें हम त
हटैबे करब।

जँ किसानी-मजूरी ल
आफैत पड़त
त हम सत्ता-व्यवस्था
हिलैबै करब।

घून लागल जतय
लोककें तंत्र मे
तंत्र लोकक सुनरका
बनैबे करब।

चन्ना मामा

चन्ना मामा,चन्ना मामा, कनिये इम्हर आउ
कोनाक इ राति दिन होय, हम सभकेँ समझाउ

कोना बादल चलै गगन मे, तारा टिम टिम चमकै
रंग बिरंगक खिलल फूल सभ, कोना गम गम गमकै

कोनाकें बिजुरी चमकै छै, कोना बरखा आबै
चिड़ै चनमुनी उड़ै छै कोना, मोनक जे हर्षाबै

फूल पात सभ रंग पबैत अछि, कोनाकें बतलाउ
मुरै बेचारा बिन रंगक अछि, कियैक से समझाउ

दीप बारिकें उड़ै छै कोना, भगजोगनी यौ मामा
राह चलैत जे सभ राही छथि, कियैक चलैत छथि वामा

प्रश्न सुनिकें बिहुँसके मामा, बौआ के समझौलनि
एक एककें प्रश्नक उत्तर बौआकें बतलौलनि

सभ क्रिया आ सभ रचनाक मूलमे अछि विज्ञान
पढ़ू लिखू विज्ञानक पोथी ,तखनहि भेंटत ज्ञान

आय काल्हि त घार घारमे छथि गुगल महाराज
प्रश्न अहाँ जे बाजि रहल छी सभहक खोलता राज

करिया बादल

करिया बादल बरखा देत
बरखा बुन्नी पड़तै खेत

खेतमे तखनहि उगतै धान
अपना सभहक माँछ मखान

कृषक मजूर ल भेंटतै काम
नहिये रहतै कियो बेकाम

फसल उपजतै भेंटतै पाय
नबका कपड़ा देतै माय

डबरा पोखरि हेतै पानि
सभे खुछ अछि ई सभ जानि

गाछ लगाबू

गाछ लगाबू बरखा लेल

पानिकेँ सोता टूटि रहल अछि
डबरा पोखरि सूखि रहल अछि
गाछ बिरीछ पर संकट होयतै
मनुखोमे आब ठेलमठेल
गाछ …….
गाछ कटि रहल सालों साल
पर्यावरण भ’ रहल कंगाल
जल संकट विकराल भ’ रहल
जनजीवन भ’ जायत फेल
गाछ….
धरती सभ बंजर भ’ जयतै
माछ मखान कतहु नहि पयतै
बून बून ल’ तरसत सभ कियो
हमर वचन नहि बूझू खेल
गाछ……

बोली बाजव 

करै कबूतर गुटरगूँ
चिड़ै छै चहकै चूँ चूँ चूँ
कौआक बाजब काँव काँव
बिलाड़क बाजब म्याऊँ म्याऊँ
मोर करै अछि कें कें कें
सूआ बजैत अछि टें टें टें
भेड़क बाजब भें भें भें
बकरीक बाजब में में में
हाथी त’ चिग्घाड़ैत अछि
झिंगुर त’ झंकारैत अछि
बतास चलैत अछि सन सन सन
चूड़ी बाजै खन खन खन

नबका बरीख 

बनबू नबका बरीखकें शुभे हो शुभे
सबहक आशा शुभे अभिलाषा शुभे
बनबू…..
खेती पथारी नहि जीवन चलाबै
कृषक सभ खेतमे नोर चुआबै
झूलै न फसरी, होय जीवन शुभे
बनबू….
रोजी आ रोटी ल’ गाम छोड़ै छै
बाल बच्चा बाप बिनु बिलटैत रहै छै
नवतुरिया ल’ बनबू योजना शुभे
बनबू….
आय धरि जे किछु पयबे नहि कयलकै
श्रमशक्ति सँ जगकें सुन्नर बनैलकै
ओ श्रमिक लेल बनबू आब दुनिया शुभे
बनबू…..
शिक्षा आ रोजीक अवसर दियाबू
पिछड़ल जे अछि ओकरा आगू बढ़ाबू
दुखिया ल’ बनबू सभ नियम शुभे
बनबू….

उच्चारण सँ बूझब अर्थ

अंशक माने हिस्सा होय आ अंसक माने होय कंधा
शूरक माने वीर होय आ सूरक माने होय अंधा

पानिक माने जल होय आ पाणिक माने होय अछि हाथ
संघक माने संगठन आ संगक माने होय अछि साथ

कपिशक माने मटमैला आ कपीशक माने छथि हनुमान
अभिज्ञक माने जानैबाला अनभिज्ञक माने होय अनजान

अविलम्बक माने शीघ्र होय आ अवलम्बक माने अछि सहारा
तकुलक माने वंश होय आ कूलक माने होय किनारा

यूतिकें माने मेल होय आ यतिकें माने होय विराम
च्युतक माने गिरल होय आ चूतक माने होय अछि आम

अस्रक माने नोर होय आ अस्त्रक माने होय हथियार
कृपणक माने कंजूस होय आ कृपाणक माने होय तलवार

प्रकृतिक लीला

प्रकृतिक लीला अपरंपार
पढ़ि-लिखिकें बूझब यार

कखनहुँ बरखा खूब कराबय
कखनहुँ वनमे आगि लगाबय
बाढ़िक विपदा एहन बनै जे
कय दैत अछि सभकेँ लाचार

चमचम चमकै चान गगनमे
सूरज एकसर रहै मगनमे
भुवन भास्कर पर अवलंबित
जीवनकें जे रूप हजार

इन्द्रधनुष अछि कतयसँ आबैत
नभमे जाकें फेर नुकाबैत
बादल पर जे किरण पड़ै त’
पनिसोक्खा बनिकें तैयार

हिमकण कियै गलि रहल अछि
सागरमे की पलि रहल अछि
सूक्ष्म रूप सँ वृहत रूप धरि
जीक जगत कें विविध प्रकार

भालू 

देखें देखें देखें भालू
उछल कूद अछि कयने चालू

करिया भालू गड़ामे पट्टा
देखहीं लागैत अछि अलबत्ता

मॉथ पर टोपी देहमे अंगा
नाचैत अछि सौंसे दरिभंगा

डमरू जखनहि बाजैत अछि
तखनहि नाच देखाबैत अछि

घूमि घूमि के नाच देखाबय
नाच देखाके पाय कमाबय

वसंत 

कुहू कुहू कय रहल कोयलिया
सजल धजल घरती केर रूप
बाध बोन सभ गमैक रहल अछि
गुनगुन गुनगुन लागै धूप

दिग दिगन्त घरि फूल खिलल अछि
प्रकृतिक सुषमा अपरंपार
ऋतु वसंत मे प्रकृति रानी
कय लैत अछि सोलहो शृंगार

मंद मंद चलि रहल पवन सँ
डोलि रहल अछि गाछक पात
अलसायल अलमस्त जीव आ
चहुँ दिस निखरै नवल प्रभात

धरा धाम सुरभित भ जाय आ
सभहक भेंटै पुनि पुनि प्राण
जीव जगत मुस्काबै सदिखन
प्रीत सुमेलित सकल जहाँन

मतदान

लोकतंत्र क’ राज चलैबै
नर नारी सभ वोट खसैबै
वोटे सँ आब जुग बदलै छै
वोटे क’ करबै गुणगान
चलै चलू करबै मतदान।

भाग्यक रेखा वोट सँ बनतै
अंधकार सभ वोटे हरतै
लाठी बाला तंत्र न आबै
सभहक सिखबू यैह सद्ज्ञान
चलै चलू करबै मतदान।

व्यस्क लोक सभ वोट खसैतै
कानून बाला राज चलैतै
लोकतंत्र क’ पाबनि थिक ई
यैह बढ़ाबै अप्पन शान
चलै चलू करबै मतदान।

गुड़िया क बियाह

गुड़ियाक हम बियाह रचैबै
ढोलक पिपही खूब बजैबै

दीदी, काकी ,मामी अयथिन
बिद्ध बिद्ध कें गीतक गयथिन

सभ मिलिकें मटकोरा करबै
आम महुआक बियाह रचैबै

गुड्डा बनतै दुल्हा राजा
नाच गान अंगरेजी बाजा

दुअरिलग्गी वरमाला होयतै
परिछन बाला गीतक गयतै

भोज भात भंडारा होयतै
टोल पड़ोसक सभ मिलि खयतै

राति भरिमे शादी होयतै
भिनसर गुड़िया सासुर जयतै

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