एहतिशाम हुसैन की रचनाएँ

अक़्ल पहुँची जो रिवायात के काशाने तक

अक़्ल पहुँची जो रिवायात के काशाने तक
एक ही रस्म मिल काबा से बुत-ख़ाने तक

वादी-ए-शब में उजालों का गुज़र हो कैस
दिए जलाए रहों पैग़ाम-ए-सहर आने तक

ये भी देखा है कि साक़ी से मिला जाम मगर
होंट तरसे हुए पहुँचे नहीं पैमाने तक

रेगज़ारों में कहीं फूल खिला करते हैं
रौशनी खो गई आ कर मिरे वीराने तक

हम-नशीं कट ही गया दौर-ए-ख़िज़ाँ भी आख़िर
ज़िक्र फूलों का रहा फ़स्ल-ए-बहार आने तक

सारी उल्झन है सुकूँ के लिए ऐ शौक़ ठहर
ग़म का तूफ़ान-ए-बला-ख़ेज़ गुज़र जाने तक

ज़ेहन मायूस-ए-करम शौक़-ए-नज़ारा सरशार
होश में कैसे रहूँ उन का पयाम आने तक

ज़ख़्म यादों के महकते हैं कि आई है बहार
है ये दौलत ग़म-ए-दौराँ की ख़िजाँ आने तक

बे-नियाज़ी है तग़ाफ़ुल है कि बे-ज़ारी है
बात इतनी तो समझ लेते हैं दीवाने तक

ज़िंदगी ग़म से उलझती ही रहेगी हमदम
वक़्त की ज़ुल्फ़ गिरह-गीर सुलझ जाने तक

मंज़िल-ए-राह तलब थी तो कहीं और मगर
रूक गए ख़ुद ही क़दम पहुँचे जो मय-ख़ाने तक

डर डर के जिसे मैं सुन रहा हूँ 

डर डर के जिसे मैं सुन रहा हूँ
खोई हुई अपनी ही सदा हूँ

हर लम्हा-ए-हिज्र इक सदी था
पूछो न कि कब से जी रहा हूँ

जब आँख में आ गए हैं आँसू
ख़ुद बज़्म-ए-तरब से उठ गया हूँ

छटती नहीं ख़ू-ए-हक़-शनासी
सुक़रात हूँ ज़हर पी रहा हूँ

रहबर की नहीं मुझे ज़रूरत
हर राह का मोड़ जानता हूँ

मंज़िल न मिली तो ग़म नहीं है
अपने को तो खो के पा गया हूँ

अपनी ही हवस थी सर-कशीदा
दामन से उलझ के गिर पड़ा हूँ

उर्यानी-ए-फ़िक्र खुल न जाए
ख़्वाबों के लिबास सी रहा हूँ

हर मंज़िल-ए-मर्ग-आफ़रीं में
सर-गश्ता-ए-ज़िंदगी रहा हूँ

धब्बे हैं बहुत से तीरगी के
किन रौशनियों में घिर गया हूँ

देख कर जादा-ए-हस्ती पे सुबुक-गाम मुझे

देख कर जादा-ए-हस्ती पे सुबुक-गाम मुझे
दूर से तकती रही गर्दिश-ए-अय्याम मुझे

डाल कर एक नज़र प्यार की मेरी जानिब
दोस्त ने कर ही लिया बंदा-ए-बे-दाम मुझे

कल सुनेंगे वही मुज़्दा मिरी आज़ादी का
आज जो देख के हँसते हैं तह-ए-दाम मुझे

देख लेता हूँ अंधेरे में उजाले की किरन
ज़ुल्मत-ए-शब ने दिया सुब्ह का पैग़ाम मुझे

न तो जीने ही में लज़्ज़त है न मरने की उमंग
उन निगाहों ने दिया कौन सा पैग़ाम मुझे

मैं समझता हूँ मुझे दौलत-ए-कौनैने मिली
कौन कहता है कि वो कर गए बदनाम मुझे

गरचे आग़ाज-ए-मोहब्बत ने दिए हैं धोके
लिए जाती है कहीं काविश-ए-अंजाम मुझे

तेरा ही को के जो रह जाऊँ तो फिर क्या होगा
ऐ जुनूँ और हैं दुनिया में बहुत काम मुझे

ग़म में इक मौज़ सरख़ुशी की है 

ग़म में इक मौज़ सरख़ुशी की है
इब्तिदा सी ख़ुद आगही की है

किसे समझाँए कौन मानेगा
जैसे मर मर के ज़िंदगी की है

बुझीं शमएँ तो दिल जलाए हैं
यूँ अंधेरों में रौशनी की है

फिर जो हूँ उसे के दर पे नासिया सा
मैं ने ऐ दिल तिरी ख़ुशी की है

मैं कहाँ और दयार-ए-इश्क़ कहाँ
ग़म-ए-दौराँ ने रहबरी की है

और उमड़े हैं आँख में आँसू
जब कभी उस ने दिल-दही की है

क़ैद है और क़ैद-ए-बे-ज़ंजीर
ज़ुल्फ़ ने क्या फ़ुसूँ-गरी की है

मैं शिकार-ए-इताब ही तो नहीं
मेहरबाँ हो के बात भी की है

बज़्म में उस की बार पाने को
दुश्मनों से भी दोस्ती की है

उन को नज़रें बचा के देखा है
ख़ूब छुप छुप के मय-कशी की है

हर तक़ाज़ा-ए-लुत्फ़ पर उस ने
ताज़ा रस्म-ए-सितमगरी की है

कुछ मिरे शौक़ ने दर-पर्दा कहा हो जैसे

कुछ मिरे शौक़ ने दर-पर्दा कहा हो जैसे
आज तुम और ही तस्वीर-ए-हया हो जैसे

यूँ गुज़रता है तिरी याद की वादी में ख़याल
ख़ारज़ारों में कोई बरहना-पा हो जैसे

साज़ नफ़रत के तरानों से बहलते नहीं क्यूूँ
ये भी कुछ अहल-ए-मोहब्बत की ख़ता हो जैसे

वक़्त के शोर में यूँ चीख़ रहे हैं लम्हे
बहते पानी में कोई डूब रहा हो जैसे

कैसी गुल-रंग है मशरिक़ का उफ़ुक़ देख नदीम
नदी का ख़ूँ रात की चौखट पे बहा जो जैसे

या मुझे वहम है सुनता नहीं कोई मेरी
या ये दुनिया ही कोई कोह-ए-निदा हो जैसे

बहर-ए-ज़ुल्मात-ए-जुनूँ में भी निकल आई है राह
इश्क़ के हाथ में मूसा का असा हो जैसे

दिल ने चुपके से कहा कोशिश-ए-नाकाम के बाद
ज़हर ही दर्द-ए-मोहब्बत की दवा हो जैसे

देखें बच जाती है या डूबती है कश्ती-ए-शौक़
साहिल-ए-फ़िक्र पे इक हश्र बपा हो जैसे

उन आँखों को नज़र क्या आ गया है

उन आँखों को नज़र क्या आ गया है
मिज़ाज-ए-आरज़ू बदला हुआ है

न जाने हार है या जीत क्या है
ग़मों पर मुस्कुराना आ गया है

मिरी हालत पे उन का मुस्कुराना
जवाब-ए-ना-मुरादी आ गया है

नहीं इक मैं ही नाकाम-ए-मोहब्बत
यही पहले भी अक्सर हो चुका है

सबा की रौ न ग़ुंचों का तबस्सुम
चमन वालो कहो क्या हो गया है

शब-ए-ग़म सहमी सहमी याद उन की
अंधेरे में दिया सा जल रहा है

नहीं मिलता सुराग़-ए-मंज़िल-ए-शौक़
मोहब्बत से भी जी घबरा गया है

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