एहसान दानिश की रचनाएँ

आज भड़की रग-ए-वहशत तिरे दीवानों की

आज भड़की रग-ए-वहशत तिरे दीवानों की
क़िस्मतें जागने वाली हैं बयाबानों की

फिर घटाओं में है नक़्क़ारा-ए-वहशत की सदा
टोलियाँ बंध के चलीं दश्त को दीवानों की

आज क्या सूझ रही है तिरे दीवानों को
धज्जियाँ ढूँढते फिरते हैं गरेबानों की

रूह-ए-मजनूँ अभी बेताब है सहराओं में
ख़ाक बे-वजह नहीं उड़ती बयाबानों की

उस ने ‘एहसान’ कुछ इस नाज़ से मुड़ कर देखा
दिल में तस्वीर उतर आई परी-ख़ानों की

बख़्श दी हाल-ए-ज़ुबूँ ने जल्वा-सामानी मुझे

बख़्श दी हाल-ए-ज़ुबूँ ने जल्वा-सामानी मुझे
काश मिल जाए ज़माने की परेशानी मुझे

ऐ निगाह-ए-दोस्त ऐ सरमाया-दार-ए-बे-ख़ुदी
होश आता है तो होती है परेशानी मुझे

खुल चुका हाँ खुल चुका दिल पर तिरा रंगीं फ़रेब
दे न धोका ऐ तिलिस्म-ए-हस्ती-ए-फ़ानी मुझे

फिर न साबित हो कहीं नंग-ए-बयाबाँ जिस्म-ए-राज़
सोच कर करना जुनूँ माइल ये उर्यानी मुझे

मुंतहा-ए-ज़ौक़-ए-सज्दा ये कि इक फ़रेब
कुफ्र तक ले आई तक्मील-ए-मुसलमानी मुझे

मंज़िलों ‘एहसान’ पीछे रह गए दैर ओ हरम
ले चला जाने कहाँ सैलाब-ए-हैरानी मुझे

हंगामा-ए-ख़ुदी से तू बे-नियाज़ हो जा

हंगामा-ए-ख़ुदी से तू बे-नियाज़ हो जा
गुम हो के बे-ख़ुद में आगाह-ए-राज़ हो जा

हद भी तो चाहिए कुछ बे-ए‘तिनाइयों की
ग़ारत-गर-ए-तहम्मुल तस्कीं-नवाज़ हो जा

ऐ सरमदी तराने हर शय में सोज़ भर दे
ये किस ने कह दिया है पाबंद-ए-साज़ हो जा

ग़ैरत की चिलमनों से आवाज़ आ रही है
महव-ए-नियाज़-मंदी आ बे-नियाज़ हो जा

आ मिल के फिर बनाएँ मय ख़ाना-ए-मोहब्बत
मैं जुरआ-कश बनूँ तू पैमाना-साज़ हो जा

सीने में सोज़ बन कर कब तक छुपा रहेगा
उनवान-ए-राज़दारी तफ़्सील-ए-राज़ हो जा

अब सो चुकी उम्मीदें अब थक चुकी निगाहें
जान-ए-नियाज़-मंदी मसरूफ़-ए-नाज़ हो जा

सोज़ नज़र से छल्कें नग़्मात-ए-राज़-ए-हस्ती
ऐ उक़्दा-ए-तग़रफ़ुल रूदाद-ए-नाज़ हो जा

‘एहसान’ काश उट्ठें ये रंग-ओ-बू के पर्दे
ऐ महफ़िल-ए-हक़ीक़त बज़्म-ए-मजाज़ हो जा

इश्क़ की दुनिया में इक हंगामा बरपा कर दिया 

इश्क़ की दुनिया में इक हंगामा बरपा कर दिया
ऐ ख़याल-ए-दोस्त ये क्या हो गया क्या कर दिया

ज़र्रे ज़र्रे ने मिरा अफ़्साना सुन कर दाद दी
मैं ने वहशत में जहाँ को तेरा शैदा कर दिया

तूर पर राह-ए-वफ़ा में बो दिए काँटे कलीम
इश्क़ की वुसअत को मस्दूद-ए-तक़ाज़ा कर दिया

बिस्तर-ए-मशरिक़ से सूरज ने उठाया अपना सर
किस ने ये महफ़िल में ज़िक्र-ए-हुस्न-ए-यक्ता कर दिया

चश्म-ए-नर्गिस जा-ए-शबनम ख़ून रोएगी नदीम
मैं ने जिस दिन गुलसिताँ का राज़ इफ़्सा कर दिया

क़ैस ये मेराज-ए-उल्फ़त है कि एजाज़-ए-जुनूँ
नज्द के हर ज़र्रे को तस्वीर-ए-लैला कर दिया

मुद्दआ-ए-दिल कहूँ ‘एहसान’ किस उम्मीद पर
वो जो चाहेंगे करेंगे और जो चाहा कर दिया

इश्क़ को तक़लीद से आज़ाद कर 

इश्क़ को तक़लीद से आज़ाद कर
दिल से गिरया आँख से फ़रियाद कर

बाज़ आ ऐ बंदा-ए-हुस्न मजाज़
यूँ न अपनी ज़िंदगी बर्बाद कर

ऐ ख़यालों के मकीं नज़रों से दूर
मेरी वीराँ ख़ल्वतें आबाद कर

नज़अ में हिचकी नहीं आई मुझे
भूलने वाले ख़ुदा-रा याद कर

हुस्न को दुनिया की आँखों से न देख
अपनी इक तर्ज़-ए-नज़र ईजाद कर

इशरत-ए-दुनिया है इक ख़्वाब-ए-बहार
काबा-ए-दिल दर्द से आबाद कर

अब कहाँ ‘एहसान’ दुनिया में वफ़ा
तौबा कर नादाँ ख़ुदा को याद कर

जब रूख़-ए-हुस्न से नक़ाब उठा 

जब रूख़-ए-हुस्न से नक़ाब उठा
बन के हर ज़र्रा आफ़्ताब उठा

डूबी जाती है ज़ब्त की कश्ती
दिल में तूफ़ान-ए-इजि़्तराब उठा

मरने वाले फ़ना भी पर्दा है
उठ सके गर तो ये हिजाब उठा

शाहिद-ए-मय की ख़ल्वतों में पहुँच
पर्दा-ए-नश्शा-ए-शराब उठा

हम तो आँखों का नूर खो बैठे
उन के चेहरे से क्या नक़ाब उठा

आलम-ए-हुस्न-ए-सादगी तौबा
इश्क़ खा खा के पेच-ओ-ताब उठा

होश नक़्स-ए-ख़ुदी है ऐ ‘एहसान’
ला उठा शीशा-ए-शराब उठा

मिरे मिटाने की तदबीर थी हिजाब न था

मिरे मिटाने की तदबीर थी हिजाब न था
वगरना कौन से दिन हुस्न बे-नक़ाब न था

अगरचे नाज़कश-ए-साग़र-ए-शराब न था
ख़ुमार-ख़ाने में मुझ सा कोई ख़राब न था

खुला तिलिस्म-ए-तमन्ना तो खुल गया ये भी
कि इक फ़रेब-ए-नज़र था तिरा शबाब न था

ख़याल-ए-दोस्त तिरी जल्वा-ताबियों की क़सम
जो तू न था मिरी दुनिया में आफ़्ताब न था

तिरे फ़िराक़ की रातें थीं इस क़दर मग़्मूम
कि दाग़-ए-ख़ातिर-ए-महज़ूँ था माहताब न था

बुरा हो नाला-ए-पैहम का कुछ दिनों पहले
ख़ामोश रात के दिल में ये पेच-ओ-ताब न था

निगाह मिलते ही ग़श खा के गिर पड़ीं नज़रें
थी एक बर्क़-ए-मुशक्कल तिरा शबाब न था

अज़ल के दिन से हैं हम मस्त-ए-जल्वा-ए-साक़ी
हमारे साामने किस रोज़ आफ़्ताब न था

कुछ अपने साज़-ए-नफ़स की न क़द्र की तू ने
कि इस रबाब से बेहतर कोई रबाब न था

दिल-ए-ख़राब का ‘एहसान’ अब ख़ुदा-हाफ़िज़
ख़राब था मगर ऐसा कभी ख़राब न था

परस्तिश-ए-ग़म का शुक्रिया क्या तुझे आगही नहीं 

परस्तिश-ए-ग़म का शुक्रिया क्या तुझे आगही नहीं
तेरे बग़ैर ज़िंदगी दर्द है ज़िंदगी नहीं

देख के ख़ुश्क-ओ-ज़र्द फूल दिल है कुछ इस तरह मलूल
जैसे मिरी ख़िज़ाँ के बाद दौर-ए-बहार ही नहीं

दौर था इक गुज़र चुका नशा था इक उतर चुका
अब वो मक़ाम है जहाँ शिकवा-ए-बे-रूख़ी नहीं

इशरत-ए-ख़ुल्द के लिए ज़ाहिद कज-नज़र झुके
मशरब-ए-इश्क़ में तो ये जुर्म है बंदगी नहीं

तेरे सिवा करूँ पसंद क्या तिरी काएनात में
दोनों जहाँ की नेमतें क़ीमत-ए-बंदगी नहीं

लाख ज़माना ज़ुल्म ढाए वक़्त न वो ख़ुदा दिखाए
जब मुझे हो यकीं कि तु हासिल-ए-ज़िंदगी नहीं

दिल की शगुफ़्तगी के साथ राहत-ए-मय-कदा गई
फ़ुर्सत-ए-मय-कश्ती तो है हसरत-ए-मय-कशी नहीं

अश्क-ए-रवाँ की आब-ओ-ताब कर न अवाम में ख़राब
अज़्मत-ए-इश्क़ को समझ गिर्या-ए-ग़म हँसी नहीं

अर्सा-ए-फ़ुर्क़त-ओ-फ़िराक़ ऐसा तवील तो न था
भूल रहे हो तुम मुझे मैं कोई अजनबी नहीं

ज़ख़्म पे ज़ख़्म खा के जी अपने लहू के घूँट पी
आह न कर लबों को सी इश्क़ है दिल-लगी नहीं

एक वो रात थी कि जब था मिरे घर वो माहताब
एक ये रात है कि अब चाँद है चाँदनी नहीं

मुज़्दा कि ना-मुराद-ए-इश्क़ तेरी ग़ज़़ल का है वो रंग
वो भी पुकार उठे कि ये सेहर है शाइरी नहीं

रानाई-ए-कौनैन से बे-ज़ार हमीं थे 

रानाई-ए-कौनैन से बे-ज़ार हमीं थे
हम थे तिरें जल्वों के तलबगार हमीं थे

है फ़र्क़ तलबगार ओ परस्तार में ऐ दोस्त
दुनिया थी तलबगार परस्तार हमीं थे

इस बंदा-नवाज़ी के तसद्दुक़ सर-ए-महशर
गोया तिरी रहमत के सज़ा-वार हमीं थे

दे दे के निगाहों को तसव्वुर का सहारा
रातों को तिरे वास्ते बेदार हमीं थे

बाज़ार-ए-अज़ल यूँ तो बहुत गर्म था लेकिन
ले दे के मोहब्बत के ख़रीदार हमीं थे

खटके हैं तिरे सारे गुलिस्ताँ की नज़र में
सब अपनी जगह फूल थे इक ख़ार हमीं थे

हाँ आप को देखा था मोहब्बत से हमीं ने
जी सारे ज़माने के गुनहगार हमीं थे

है आज वो सूरत कि बना-ए-नहीं बनती
कल नक़्श-ए-दो-आलम के क़लमकार हमीं थे

अर्बाब-ए-वतन ख़ुश हैं हमें दिल से भुला कर
जैसे निगह ओ दिल पे बस इक बार हमीं थे

‘एहसान’ है बे-सूद गिला उन की जफ़ा का
चाहा था उन्हें हम ने ख़ता-वार हमीं थे

रहे जो ज़िंदगी में ज़िंदगी का आसरा हो कर

रहे जो ज़िंदगी में ज़िंदगी का आसरा हो कर
वही निकले सरीर-आरा क़यामत में ख़ुदा हो कर

हक़ीक़त-दर-हक़ीक़त बुत-कदे में है न काबे में
निगाह-ए-शौक़ धोके दे रही है रहनुमा हो कर

मआल-ए-कार से गुलशन की हर पŸाी लरज़ती है
कि आख़िर रंग-ओ-बू उड़ जाएँगे इक दिन हवा हो कर

अभी कल तक जवानी के ख़ुमिस्ताँ थे निगाहों में
ये दुनिया दो ही दिन में रह गई है क्या से क्या हो कर

मिरे सज़्दों की या रब तिश्ना-कामी क्यूँ नहीं जाती
ये क्या बे-ए‘तिनाई अपने बंदे से ख़ुदा हो कर

सिरिश्त-ए-दिल में किस ने कूट कर भर दी है बेताबी
अज़ल में कौन या रब मुझ से बैठा था ख़फ़ा हो कर

ये पिछली रात ये ख़ामोशियाँ ये डूबते तारे
निगाह-ए-शौक़ बहकी फिर रही है इल्तिजा हो कर

बला से कुछ हो हम ‘एहसान’ अपनी ख़ू न छोड़ेंगे
हमेशा बेवफ़ाओं से मिलेंगे बा-वफ़ा हो कर

वफ़ाएँ कर के जफ़ाओं का ग़म उठाए जा 

वफ़ाएँ कर के जफ़ाओं का ग़म उठाए जा
इसी तरह से ज़माने को आज़माए जा

किसी में अपनी सिफ़त के सिवा कमाल नहीं
जिधर इशारा-ए-फ़ितरत हो सर झुकाए जा

वो लौ रबाब से निकली धुआँ उठा दिल से
वफ़ा का राग इसी धुन में गुनगुनाए जा

नज़र के साथ मोहब्बत बदल नहीं सकती
नज़र बदल के मोहब्बत को आज़माए जा

ख़ुदी-ए-इश्क़ ने जिस दिन से खोल दीं आँखें
है आँसुओं का तक़ाज़ा कि मुस्कुराए जा

नहीं है ग़म तो मोहब्बत की तर्बियत नाक़िस
हवादिस आएँ तो नरमी से पेश आए जा

थी इब्तिदा में ये तादीब-ए-मुफ़लिसी मुझ को
ग़ुलाम रह के गुलामी पे मुस्कुराए जा

बदल न राह-ए-ख़िरद के फ़रेब में आ कर
जुनूँ के नक़्श-ए-क़दम पर क़दम बढ़ाए जा

उम्मीद ओ यास में जीनाम है इश्क़ का मक़्सूद
इसी मक़ाम-ए-मुक़द्दस पे तिलमिलाए जा

चमन में फ़ुर्सत ओ तस्कीं है मौत का पैग़ाम
सुकूँ पंसद न कर आशियाँ बनाए जा

यही है लुत्फ़-ए-मोहब्बत यही है कैफ़-ए-हयात
हक़ीक़तों की बिना पर फ़रेब खाए जा

वफ़ा का ख़्वाब है ‘एहसान’ ख़्वाब-ए-बे-ताबीर
वफ़ाएँ कर के मुक़द्दर को आज़माए जा

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