ओम नागर की रचनाएँ

हलौळ 

अस्यां तो कस्यां हो सकै छै
कै थनै क्है दी
अर म्हनै मान ली सांच
कै कोई न्हं अब
ई कराड़ सूं ऊं कराड़ कै बीचै
ढोबो भरियो पाणी।

कै बालपणा मं थरप्यां
नद्दी की बांळू का घर-ऊसारां
ढसड़ग्यां बखत की बाळ सूं
कै नद्दी का पेट मं
न्हं र्ही
अब कोई झरण।

होबा मं तो अस्यां बी हो सकै छै
कै कुवां मं धकोल दी होवै थनै
सगळी यादां
तज द्यो होवै
लोठ्यां-डोर को सगपण।

अस्यां मं बी ज्ये
निरख ल्यें तू
ऊपरला पगथ्यां पै बैठ’र
आज बी
कुवां को बच्यों-खुच्यों अमरत
तो अेक-अेक हलौळ
थांरा पगां को परस पा’र
हो जावैगी धन्न।

पतवाणों 

लूंठां सूं लूंठा दरजी कै बी
बूता मं कोई न्हं
परेम को असल पतवाणो ले लेबो।

छणीक होवै छै
परेम की काया को दरसाव
ज्यें केई नै
दीखता सतां बी न्हं दीखै
न्हं स्वाहै कोई नै फूटी आंख।

आपणा-आपणा फीता सूं
लेबो चाह्वै छै सगळां
नांळा-नांळा पतवाणा
उद्धवों कतनो ई फरल्ये भापड़ो
गुरत की फोटळी
माथा पै ऊंच्यां
ब्रज की गळी-गळी।

उद्धवों का कांधा पै धर्या
बारहा खांटां का बा’ण सूं बी
बुतबा म्हं न्हं आयो
परेमपगी गोप्यां को म्हैड़लो।

चौरासी कौस की परकमां छै
परेम को असल पतवाणों।

लैरा-लैरा

तू धार लेती तो
यूं धरकार न्हं होतो जमारो।

ठूंठ का माथा पै फूट्याती
दो तीत्याँ
हथैली की लकीरां सूं
नराळी न्हं होती
भाग की गाथा।

तू बच्यार लेती तो
यूँ न्हं ढसड़ती चौमासा मं भींत।

घर-आंगणा का मांडण्यां पै
न्हं फरतौ पाणी
पछीत पै मंण्डी मोरड़ी
न्हं निगळती हीरां को हार।

ज्यों दो पग धर लेती तू
लैरा-लैरा।

तो अतनौ बैगो न्हं ढसड़तौ
सांसा को सतूळ
सुळझातौ
लैंटा मं उळझी लूगड़ी
भल्याईं
धसूळ्यां सूं भर जाता म्हारा हाथ।

उडीक

सूरज उग
ढळग्यों/आंथग्यो
जाणै कतनी बेर।

पोवणी की नांई
तपबा लाग’गी धरणी
जेठ की भरा-भर दुपैरी मं
भर्रणाया बादळां की नांई
जी गैल पै
रूस’र चली’गी छी तू।

ऊं गैल पै
मन की रीती छांगळ ल्यां
ऊंभौ छूं हाल बी
थंई उडीकता।

थारो बस्वास 

सतूळ की नांई
कतनो बैगो ढसड़ जावै छै
थारो बस्वास
बाणियां की दुकान पै
मिलतौ हो तो
कदी को धर देतो
थारी छाला पड़ी हथेळी पै
दो मुट्ठी बस्वास।

बाळू का घर की नांई
पग हटता ईं
कण-कण को हो जावै छै
थारो बस्वास
खुद आपणै हाथां
आभै पै ऊलाळ द्ये छै तू
भींत, देहळ अर वो आळ्यां बी
जठी रोजीना धर द्ये छै तू
अेक दियौ
म्हैलाडी का उजास कै लेखै।

कदी-कदी
थारो बस्वास जा बैठे छै
खज्यूर का टोरक्यां पै
अर म्हूं खोदबा लाग जाऊ छूं
छांवळी
जतनी ऊंडी खुदती जावै छै
भरम की धरणी
उतनो ई बदतौ जावै छै बस्वास।

जद बी मांडबा बैठूं छूं कविता 

जद बी मांडबा बैठूं छूं कविता
घर का अंधेरे घप्प खूण्यां में
थारा ऊजळा अणग्यारा की तोल पाड़ द्ये छै
टमटमाती दो आंख्यां का
हीरा की चमक।

अर म्हूं
धोळा कागद पे खूण्यां को अंधेरो ल्ये
थारी आंख्यां का हीरां की चमक कै भरोसै
मांड द्यूं छूं
कविता की भैंत का दो-च्यार
कैरक-भैरक आखर।

चाहूं तो म्हूं बी छूं मांडबो
जिनगाणी की अबखायां
सांती की बांच्छ्यां में
लड़ता-कटता-मरता मनख का
संदा का संदा दंद-फंद।

पण, संदी दंद-फंद कै पाछै बी
मनख हेरतो फरै जद
प्रेम अर सांती
जिनगाणी का आखरी पैहर तांई
तो फेर
कांई दोस छै म्हारो ज्ये
जद बी मांडबा बैठूं छूं कविता
आपू-आप मंड जावै छै
धोळा फक्क कागद पे
रंगीचंगी प्रेम कविता!

थारी ओळ्यूं को मतलब 

थारी ओळ्यूं को मतलब
बिसर जाबो
खुद कै तांई।

जिनगाणी का खेत में
दूरै, घणै दूरै तांई
हाल बी दीखै छै तूं
ऊमरा ओरती
भविस का बीज मुट्ठी में ल्यां।

थारी-म्हारी आंख्यां में भैंराती
जळ भरी बादळ्यां
ज्ये बरसै तो तोल पाड़ द्यै छै
कै कोई न्हं अब आपण
एक दूजा कै ओळै-दोळै
लाख जतन बी न्हं मिला सकै
रेल की पटरी की नांई
लारै-लारै चालता थकां बी।

थारी ओळ्यूं को मतलब
और हो बी कांई सकै छै
कै म्हैं हेरतो फरूं छूं
बावळ्या की नांई
दुनिया भर का घणकरां उणग्यारां में
थारो प्हली-प्हल को
लाज सूं लुळतो उणग्यारो।

हिलोर

ऐसा तो कैसे हो सकता है
कि तुम जो भी कहो
मान लूं मैं उसे सच
कि इस किनारे से उस किनारे तक
के बीच नहीं है अब
अंजुरी भर पानी ।

कि बचपन में नदी की रेत से
बनाए गए घर-आंगन
ढह गए हैं वक्त की मार से
कि नदी के पेट में
नहीं बची है अब कोई झरन।

होने को तो यह भी हो सकता है
कि कुंए में धकेल दी हों तुमने
समूची स्मृतियां
और अनदेखा कर दिया
लोटा और डोर का रिश्ता।

यदि आज भी निरख लो तुम
कुंए की मुंडेर पर बैठ
बचे-खुचे अमृत जल को
तो उसकी एक-एक हिलोर
तुम्हारे चरणों के स्पर्श को पाकर
हो जाएगी धन्य।

नाप 

बड़े से बड़े दरजी के भी
बस में नहीं है
प्रेम का सही-सही नाप लेना।

क्षणिक होते है
प्रेम की काया के दर्शन
जो किसी को
दिखते हुए भी नहीं दिखता
और नहीं सुहाता किसी को फूटी आंख।

अपने-अपने फीतों से लेना चाहते है
सबके सब
अलग-अलग नाप
उद्धव बेचारा कितना ही फिर लें
ज्ञान की पोटली माथे पे रख
ब्रज की गली-गली।

उद्धव के कांधे पर रखे
बारह खाटों के बाण से भी
नहीं नापे जा सके
प्रेम पगी गोपियों के अंतस्।

चौरासी कोस की परिक्रमा है
प्रेम का सही नाप

साथ-साथ

तुम निश्चय कर लेतीं
तो यूं निरूद्देश्य न होता जीवन।

ठंूठ के माथे पर फूट आती दो कोंपलें
हथेली की रेखाओं से
निराली नहीं होती
भाग्य की कहानी।

तुम विचार लेतीं तो
यूं न धसकती चौमासे में भीत
घर-आंगनों के मांडणों पे
नहीं फिरता पानी
पिछली दीवारों पर चित्रित मोरनी
नहीं निगलती हीरों का हार।

जो दो पग रख लेती तुम साथ-साथ
तो इतनी जल्दी नहीं टूटती
सांसों की सरगम
सुलझाता झाड़ में उलझी लूगड़ी
भले ही
कांटों से भर जाते मेरे हाथ।

प्रतीक्षा

सूरज उग के ढल गया
अस्त हो गया
जाने कितनी बार
तवे की तरह तपने लगी धरती
जेठ की भरी दुपहरी में
भन्नाए बादलों की तरह
जिस राह रूठ के चली गयी थीं तुम
उसी राह पर
मन की रीती छांगल ले
आज भी खड़ा हूं मैं
तुम्हारी प्रतीक्षा में।

तुम्हारा विश्वास 

सतूल की तरह
कितनी जल्दी धसक जाता है
तुम्हारा विश्वास
बनिये की दुकान पर
मिलता होता तो
कब का धर देता
तुम्हारी छाले पड़ी हथेली पे दो मुट्ठी विश्वास।

बालू के घरौंदों की तरह
पग हटाते ही
कण-कण बिखर जाता है, तुम्हारा विश्वास
खुद अपने हाथों से आकाश में उछाल देती हो तुम
दीवारें, देहरी
और वो आले भी जहां रोजाना रखती हो तुम
एक दिया
भीतर की रोशनी के वास्ते।

कभी-कभी
तुम्हारा विश्वास जा बैठता है
खजूर के शीर्ष पर
और मैं खोदने लग जाता हूं
परछाई
जितनी गहरी खुदती चली जाती है
भ्रम की धरा
उतना ही बढ़ता जाता है विश्वास।

पिता की वर्णमाला 

पिता के लिए
काला अक्षर भैंस बराबर।

पिता नहीं गए कभी स्कूल
जो सीख पाते दुनिया की वर्णमाला
पिता ने कभी नहीं किया
काली स्लेट पर
जोड़-बाकी, गुणा-भाग
पिता आज भी नहीं उलझना चाहते
किसी भी गणितीय आंकड़े में।

किसी भी वर्णमाला का कोई अक्षर कभी
घर बैठे परेशान करने नहीं आया
पिता को।

पिता
बचपन से बोते आ रहे हैं
हल चलाते हुए
स्याह धरती की कोख में शब्द बीज
जीवन में कई बार देखी है पिता ने
खेत में उगती हुई पंक्तिबद्ध वर्णमाला।

पिता की बारखड़ी
आषाढ़ के आगमन से होती है शुरू
चैत्र के चुकतारे के बाद
चंद बोरियों या बंडे में भरी पड़ी रहती है
शेष बची हुई वर्णमाला
साल भर इसी वर्णमाला के शब्दबीज
भरते आ रहे है हमारा पेट।

पिता ने कभी नहीं बोई गणित
वरना हर साल यूं ही
आखा-तीज के आस-पास
साहूकार की बही पर अंगूठा चस्पा कर
अनमने से कभी घर नहीं लौटते पिता।

आज भी पिता के लिए
काला अक्षर भैंस बराबर ही है
मेरी सारी कविताओं के शब्दयुग्म
नहीं बांध सकतें पिता की सादगी।

पिता आज भी बो रहे है शब्दबीज
पिता आज भी काट रहे है वर्णमाला
बारखड़ी आज भी खड़ी है
हाथ बांधे
पिता के समक्ष।

मेरे गाँव के स्कूल के बच्चें 

मेरे गाँव के स्कूल के बच्चें नहीं सीख पाते
पहली, दूसरी, तीसरी कक्षा तक भी
बारहखड़ी, दस तक पहाड़ा
जीभ से स्लेट चाटकर मिटाते रहते है दिनभर
‘अ’ से ‘ज्ञ’ तक के तमाम अक्षर ।

मेरे गाँव के स्कूल के बच्चें
अच्छी तरह से बता सकते है
बनिये की दुकान पर मिलने वाले
जर्दे के पाउच या सिगरेट के पैकेट
का मूल्य/खरीदने जाना जो पड़ता है
माड़साब की तलब की वास्तें
बच्चें तो बच्चें होते है
उन्हें नहीं पता होता
किस मुश्किल से पक पाता है घर में रोटी-साग
या क्यँू खरिदती है माँ
कभी-कभी अनाज के बदले
अच्छे से करेलें, आलू, गोभी, खरबूजा ।
मगर कई बार डर जातें है/
किसी माड़साब की आँखो में तैरती वहशत से ।

मेरे गाँव के स्कूल के बच्चें
अधिकतर ले लेते है
कार्य दिवस होते हुए भी
बेबात छुट्टियों का आनन्द
ऐसे मे, जल्दी घर पहुँचे बच्चो से
नही पूछता कोई कि क्यों लौटा है वह
समय से पूर्व
समझ जाते होगें शायद सभी अपने आप
कि आज फिर से हाजिरी मार कर गायब है
चारों के चारांे माड़साब ।

मेरे गाँव के स्कूल के बच्चें
नहीं भूलते, स्कूल जाते समय
साथ ले जाना टाट से बना आसन
उसी पर बैठकर पढ़ना है उन्हें
दिन हवा हुए! जब पढ़ा करते थे कहीं
सुदामा और कृष्ण एक साथ
अब महलो के वारिस बैठें होगें
किसी शहरी कान्वेन्ट की कक्षा में
तो सोचिये ! फिर
तीन मुट्ठी चावल पर राज
कौन द्वारकाधीश देगा ?

गिद्धों की चांदी के दिन 

खास गिद्ध बचे होते पहले जितने
या उतने
जितना जरूरी ही था गिद्धों का बचा रहना
तो यह दिन
गिद्धों की चांदी के दिन होते।

हाडोड़ में एक जैसे स्वाद से उकतायें गिद्ध
अब आसानी से बदल सकते जीभ का स्वाद
कोई न कोई शैतान
अपने तहखाने में बसा लेता गिद्धों की बस्ती
आराम से चुन-चुनकर खाते
आंख, नाक, कान
गुलाब की पंखुड़ियों से नाजुक होंठ
यहां तक दिन की धड़कन को अनसुना कर
नोंच लेते
कलाईयों पर गुदे हरे जोड़ीदार नाम।

अब पहले की तरह
खुले आकाश में नहीं भटकते दिखते गिद्ध
सबके-सब जा बैठे है
राजधानियों की मुंडेरों पर
बुगलों का वेश धर
अपनी ही प्रजाति की लुप्तता का रच रहे है व्यमोह।

गांव, इन दिनों

गांव इन दिनों
दस बीघा लहुसन को जिंदा रखने के लिए
हजार फीट गहरे खुदवा रहा है ट्यूवैल
निचोड़ लेना चाहता है
धरती के पेंदे में बचा रह गया
शेष अमृत
क्योंकि मनुष्य के बचे रहने के लिए
जरूरी हो गया है
फसलों का बचे रहना।

फसल जिसे बमुश्किल
पहुंचाया जा रहा है रसायनिक खाद के बूते
घुटनों तक
धरती भी भूलती जा रही है शनैः-शनैः
असल तासीर
और हमने भी बिसरा दिया है
गोबर-कूड़ा-करकट का समुच्चय।

गांव, इन दिनों
किसी न किसी बैंक की क्रेडिट पर है
बैंक में खातों के साथ
चस्पा कर दी गई है खेतों की नकलें
बहुत आसान हो गया है अब
गिरवी होना।

शायद, इसलिये गांव इन दिनों
ओढ़े बैठा है मरघट सी खामोशी
और जिंदगी से थक चुके किसान की गर्म राख
हवा के झौंके के साथ
उड़ी जा रही है
राजधानी की ओर…..।

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