ओम पुरोहित ‘कागद’ की रचनाएँ

सपनों की उधेड़बुन

एक-एक कर
उधड़ गए
वे सारे सपने
जिन्हें बुना था
अपने ही ख़यालों में
मान कर अपने !

सपनों के लिए
चाहिए थी रात
हम ने देख डाले
खुली आँख
दिन में सपने
किया नहीं
हम ने इंतज़ार
सपनों वाली रात का
इसलिए
हमारे सपनों का
एक सिरा
रह जाता था
कभी रात के
कभी दिन के हाथ में
जिस का भी
चल गया ज़ोर
वही उधेड़ता रहा
हमारे सपने !

अब तो
कतराने लगे हैं
झपकती आँख
और
सपनों की उधेड़बुन से !

पेड़ खड़े रहे

धरती से थी
प्रीत अथाह
इसी लिए
पेड़ खड़े रहे ।

कितनी ही आईं
तेज आँधियाँ
टूटे-झुके नहीं
पेड़ अड़े रहे ।

खूब तपा सूरज
नहीं बरसा पानी
बाहर से सूखे
भीतर से हरे
पेड़ पड़े रहे !

आज जाना 

गाँव में गाय ने
खूँटे पर बँधने में
जद्दोजहद की
आख़िर भाग गई
बाड़ कूद कर
घूँघट की ओट में
तब तुम
क्यों हँसीं थी
खिलखिला कर
आज जाना
जब चाह कर भी
नहीं लौट सकी
बेटी ससुराल से !

यादें तुम्हारी

यादें तुम्हारी
मीठी हैं बहुत
फिर क्यों टपकता है
आँखो से खारा पानी
जब-जब भी
सुनता-देखता हूँ
तुम्हारी स्मृतियों की
उन्मुक्त कहानी!

दिल में
यादें थीं तुम्हारी
जिन पर
रख छोड़ा था मैंने
मौन का पत्थर
इस लिए था
दिल बहुत भारी।

आँखों में थीं
मनमोहक छवियाँ
कृतियाँ-आकृतियाँ
लाजवाब तुम्हारी
जिनके पलट रखे थे
सभी पृष्ठ मैंने
अब भी चाहते हैं
वे अपनी मनमानी
इसी लिए टपकता है
रात-रात भर
लाल आँखो से
श्वेत-खारा पानी।

हर रात
ओस बूँद से
क्यों टपकते हैं
आँसू आँख से
घड़घड़ाता है
उमड़-घुमड़ दिल
जम कर कभी
क्यों नहीं होती बारिश!

दिन की मौत पर 

न जाने किस की याद में
गुज़र ही गया
एक अकेला दिन

इस रात की तन्हाई में
दिन की मौत पर
बाँच रहा है मर्सिया
एक अकेला चांद

मातमपुरसी को
आए हैं तारे अनेक

आसमान रोके बैठा है
आँखो में असीम आँसू
जो झर ही जाएँगे
कभी न कभी !

सपना टल गया

कल तुम आईं
नींद टल गई
सपना मचल गया
लो आज फिर
नींद उचट गई
आज फिर
सपना टल गया !

दिन को
दिन के लिए
रात को
रात के लिए
नींद को
नींद के लिए
छोड़ दो अब
बहुत खलल हो गया !

थार में प्यास

जब लोग गा रहे थे
पानी के गीत
हम सपनों में देखते थे
प्यास भर पानी।
समुद्र था भी
रेत का इतराया
पानी देखता था
चेहरों का
या फिर
चेहरों के पीछे छुपे
पौरूष का ही
मायने था पानी।

तलवारें
बताती रहीं पानी
राजसिंहासन
पानीदार के हाथ ही
रहता रहा तब तक।

अब जब जाना
पानी वह नहीं था
दम्भ था निरा
बंट चुका था
दुनिया भर का पानी
नहीं बंटी
हमारी अपनी थी
आज भी थिर है
थार में प्यास।

हाथ-1

ख़ुदा देता है
सब को
दो-दो हाथ
जन्म के साथ ही
दुआ-दया-खिदमत
इनायत के लिए

फ़िर भी
कुछ लोग
दो-दो हाथ
कर लेने का
भ्रम पालते हैं

फ़िर
उठ ही जाते हैं हाथ
बद सबब में ।

हाथ-2

मेरे हाथ
मेरे कंधों पर थे
फिर भी
लोगों ने
मेरे हाथ ढूँढ़े
क्राँतियों में
भ्राँतियों में
यानी
तमाम अपघटितों में
बेबाक गवाहियाँ
निर्लज्ज पुष्टियों में थी
जबकि मैं
असहाय मौन
दूर खड़ा
दोनों हाथ
मलता रहा ।

हाथ-3

कुछ लोग
जुबान चला रहे थे
कुछ लोग
हाथ चला रहे थे
कुछ लोग
इन पर
बात चला रहे थे
मामला शांत हुआ !
अब
लोग बतिया रहे थे;
मामला सुलझाने में
हमारी जुबान थी
कुछ ने कहा
हमारी बातों का
सिलसिला था
कुछ ने कहा
इस समझाइश में तो
हमारा ही हाथ था
में
ढूंढ रहा था
उन हाथों को
जिसने रचा था
इस घटनाक्रम को
आद्योपांत !

हाथ-4 

बहुत लोग थे वहीं
सब के सब
समझदार थे
धाए हुए भी थे
उनके बीच
किसी के हाथ
आसमान की ओर उठे
लोगों ने समझा
मांगेगा
या
मारेगा
कोई न था वहां
जो समझता
हाथ
कभी-कभी
दुआ में भी
उठते हैं.

हाथ-5 

लोगों ने
हाथ से हाथ मिलाए
दूर तक चलने की
शपथ ली
निकल भी पड़े
साथ-साथ
यात्रा में
किसी
मनचाही मंजिल की ओर
लेकिन
मन दौड़ रहे थे
विपरीत दिशाओं में
यात्रा के अंत में
लोग ढूंढ रहे थे
एक दूसरे का हाथ
खाली हाथ लौटने में ।

आती नहीँ सांस

थोड़ी सी
खुली हवा मिलते ही
हम ने बो दी
…फसल अधिकारोँ की
फिर किया इंतजार !
कुछ ही दिन बाद
कानून लहलहाए
आसमान छूने लगे
फल फिर भी न आए
अब कानूनोँ के झुरमुट मे
आती नहीँ सांस !
अब तो धरा
करनी ही पड़ेगी
फिर से तैयार
नई फसल के लिए ।

तस्वीर

तस्वीर बनाई मैँनेँ
रंग कोई और भर गया ;
चेहरे पर काला
…बालों पर मटमैला
पैरों मेँ नीला
और हाथोँ मेँ भगवां !

मैँ
अपनी ही बनाई
उस तस्वीर से डर गया !

सम्भल सको तो 

आंख उठा कर
कंधोँ से ऊपर
देखा तुम ने
अन्न से महकी
…सांसोँ की गंध पा कर
जीवन भर गर्वाए तुम
आंख झुका कर
देखो अब तो
पगथल के नीचे
कितने भूखे प्यासे
लाचार दबे हुए !
सम्भल सको तो
सम्भलो तुम
पैरोँ के नीचे से
धरा खिसकने वाली है
झुक कर देखो तो
वो दुनिया उठने वाली है।

समवेत

सब ने समवेत किया
चमन को नमन
करोड़ोँ हाथोँ ने
उगाई फसलेँ
लाखोँ हाथोँ ने
…किया श्रम
कारखानोँ-खदानोँ मेँ
हजारोँ हाथोँ ने
किया कागज पर हिसाब
फिर सब ने
दुआ मेँ उठाए हाथ
बहबूदी के लिए सबकी
अचानक न जाने कहां से
तुम आ गए
बटोर लिया सब !
करोड़ोँ भूखे पेट
तड़पे-चिल्लाए
तुम मुस्कुरा कर
भीतर चले गए !
निराश लोग
खेतोँ
खदानोँ
कारखानोँ
कागजोँ मेँ लौट आए !
कब तक चलता
यह सिलसिला
लाचार हाथ
अन्न अन्ना अन्न अन्ना
उचारते
मुठ्ठियां तान लौटे हैँ
कहां हो अब तुम ?

बटोर लो पत्थर

किसी ने
कोई पत्थर नहीँ उछाला
न कहीँ आस पास
कोई दुष्यन्त कुमार ही है
…फिर ये आसमान मेँ
छेद क्योँ कर हुआ !

आज
आसमान मेँ छेद है
ओजोन परत के पार
यह भी नतीजा है
तबीयत से
पत्थर न उछालने का !

अब भी वक्त है
बटोर लो पत्थर
दुरुस्त कर लो
अपनी अपनी तबीयत
वक्त गुजरने के बाद
पानी सिर से
पार हो जाएगा
फिर कहीँ से भी
पत्थर हाथ नहीँ आएगा
तब ये नंगा आसमान
खूब चिड़ाएगा !

चिंताएं

दम तोड़ती सड़क के किनारे
फुटपाथ पर छितराए
कंकरीट पर तप्पड़ बिछा
…अपनी गृहस्थी के संग
सांझ ढले से बैठा
कितना खुश है नत्थू !
रोटी आज नहीँ मिलेगी
जानते हैँ उसके परिजन
मग़र उनकी चिंताओँ मेँ
रोटी नहीँ
फिक्र है
नींद मेँ सोई अम्मा की
जो नहीँ है शामिल
आज रात हथाई मेँ ।

उधर
अघाए पेटोँ के ऊपर
अटकी है सांसे
गिरवी पड़ी है
कई दिनोँ की नींद
अज्ञात चोरोँ के यहां !

घर

घर
घर है
और
बाहर
बाहर ही
…दोनोँ का
अपनी अपनी जगह रहना
बहुत जरूरी है
घर से बाहर होने पर
घर साथ रहे तो
घर कभी
बिखरता नहीँ
और यदि
घर लौटते वक्त
बाहर भी
घर के भीतर
आ जाए तो
कभी कभी
बिखर जाता है घर ।

मिटाओ सबब 

आंख के आंसू
पौंछ भी लूं
भीतर के आंसू तो
…कर ही देँगे नम
यह नमी
दिखेगी नहीँ
मेरा अंतस मगर
जला कर
कर देगी राख
यह राख
एक दिन
ढांप ही लेगी
तुम्हारा महल !

आंसू पौंछने के बजाय
मिटाओ सबब
और
वक्त रहते सीख लो
अंतस पढ़ना
जिस में
उफनता है बहुत कुछ
तुम्हारे विरुद्ध !

कबुत्तरपनि

आप
कबूतर की तरह
आंख मूंद कर
नहीँ बच सकते
…आपको देखना ही होगा
जो तुम्हारी ओर
बढ़ रहे हैं वे
पालतू बिल्लियोँ सरीखे
हरगिज नहीँ हैँ
तुम्हारा ये कबूतरपन
उनकी पूंजी
और
आपकी मौत का
साक्षात कारण है !

या तो आपको
दौड़ कर
बिल्लियों से
निकलना होगा
बहुत दूर
या फिर
झपटना ही होगा
पलट कर उन पर !

याद रखना
आपका कबूतरपना
जंग मेँ
हार की स्विकारोक्ति है
आपकी अपनी !

हम बोले रोटी

उन्होँने कहा-
देखो !
हम ने देखा
…वे खुश हुए ।

उन्होंने कहा-
सुनो !
वे बहुत खुश हुए !

उन्होंने कहा –
खड़े रहो !
हम खड़े रहे
वे बहुत ही खुश हुए ।

उन्होंने कहा-
बोलो !
हम ने कहा “रोटी” !
वे नाराज़ हुए !
बहुत नाराज हुए !!
बहुत ही नाराज़ हुए !!!

चलो चलेँ

समझदारोँ की भीड़ मेँ
नहीँ बचती संवेदना
बचती ही नहीं
…प्यार भरी मुस्कुराहट !
चलो वहां चलें
जहां सभी बच्चे होँ
पालनोँ मेँ झूलते
जो नाम पूछे बिना
मुस्कुराएं हमारी ओर !
उनके बीच
न ओसामा हो न ओबामा
न सैंसैक्स उठे न गिरे
न वोट डालने का झंझट
न भ्रष्टाचार न कपट !
वहां
सब के पास हो
सच मे करुण की निधि
कोई भी शीला
दीक्षित न हो
भ्रष्टाचार के खेल में !

मेरा सपना 

रात भर जागना
इबादत ही तो है
किसी अज्ञात की
ज्ञात के लिए वरना
…जागता कौन है !
तुम अज्ञात नहीँ हो प्रभु
तुम्हारे बारे मेँ सब
सुन जान लिया है मैँने
तुमने कहा भी है
मेरे भीतर
अंश है तुम्हारा
और फिर लौटना भी है
मुझे तुम्हारे भीतर !

कौन है फिर वो
जिसके लिए
जागता हूं मैँ
रात भर ;
जरूर कोई सपना है वह
जिसके आने से
डरता हूं मैँ !

सपने 

तेरी आंखों मेँ
मेरे सपने
मेरे सपनोँ मेँ
तेरी आंखें !

कभी कभी
मेरे सपनोँ से
मगर हर पल
डरता हूं
तेरी आंखोँ से !

तेरी आंख के सपने पर
मेरा नियंत्रण
हरगिज नहीँ
सपनोँ पर
तेरा नियंत्रण
बहुत डराता है
फिर भी
न जाने क्योँ
खुली आंख भी
भयानक सपना आता है !

दीया जलाएं

आसमान साफ
बादल और बिजलियां मौन
गतिमंद है पौन
पसरा है अंधेरोँ मेँ
…मौन सन्नाटा
मगर
निस्तेज नहीँ है सूरज
सारी गतियोँ को
कर देगा सक्रिय
अपने किसी एक फैसले से ।
आओ
हम करें प्रतिक्षा
सूरज के उगने की
तब तक
आओ जलाएं
एक एक दीया
अंधेरोँ से लड़ने के निमित
घरोँ की मुंडेर पर।

बारिश

मरुधरा पर
बारिश का बरसना
केवल पानी का गिरना नहीँ
बहुत कुछ बंधा है यहां ।

जैसे कि पेड़-पोधोँ की रंगत
मोर का नृत्य
प्रेमी वृंद के
मिलन की चाह
किसान की उम्मीद
सरकारी योजनाएं
बजट की परवाज !

बारिश सोख भी सकती है
कर्ज मेँ आकंठ डूबे नत्थू
अधबूढ़ी कंवारी बिमली के
कई सावन से टपकते आंसू ।

मरुधर जिन्हे
संजोए बैठी है
बारिश की आस मेँ
अंकुरित हो
कुंठित बीज
बचा सकते हैँ
मिटती लाज मरुधर की
बारिश मेँ !

फिर कविता लिखेँ 

आओ
आज फिर कविता लिखें
कविता मेँ लिखेँ
प्रीत की रीत
…जो निभ नहीँ पाई
याकि निभाई नहीँ गई !

कविता मेँ आगे
रोटी लिखें
जो बनाई तो गई
मगर खिलाई नहीँ गई !

रोटी के बाद
कफन भर
कपड़ा लिखें
जो ढांप सके
अबला की अस्मत
गरीब की गरीबी !

आओ फिर तो
मकान भी लिख देँ
जिसमेँ सोए कोई
चैन की सांस ले कर
बेघर भी तो
ना मरे कोई !

चलो !
अब लिख ही देँ
सड़कोँ पर अमन
सीमाओँ पर सुलह
सियासत मेँ हया
और
जन जन मेँ ज़मीर !

मन चले

तेरे-मेरे-सब के
मन माने की बात
मन चले तो मनचले
…मौन मन मलीन !

मन के हारे
हार कथी सब ने
जीते मन ;
दौड़ाया जब भी जिस ने
उस के हाथ लगी
हार हर बार !

मन मेँ बसते
कितने सपने
कितने अपने
पालूं चाहत
सब से हो
साक्षात मिलन
इस उपक्रम मेँ
क्या मानूं जीत
क्या मानूं हार !

तेरी जीत-मेरी हार
मेरी जीत-तेरी हार
किस की जीत
किस की हार
होता साक्षात्कार
सब मन माने की बात !

पुरुष का जन्म 

कांसे के थाल
घनघनाए
चारदीवारी मेँ
… ऊंची अटारी पर
पुरुष के जन्म पर ।

स्त्री के हाथोँ का
कोमल स्पर्श
शायद गिरवी था
पुरुष के यहां
तभी तो
थाली पर पड़ती थाप मेँ
पौरुष था मुखर !

उस दिन
दिन भर
बंटी भरपूर
मिठाइयां-बधाइयां
मिलीं मगर पुरुष को !

बाप दादाओँ ने
मरोड़ी मूंछे
चौक चोराहे
नए सम्बोधनोँ पर
भीतर
स्त्री लुटाती रही
ममता
नवजात पुरुष पर !

किन्नर भी
नाचे पुरुष के घर
स्त्री का घर
नहीँ उच्चारा किसी ने ।

क्या होता नहीँ
स्त्री का घर
स्त्री का वंश !

मेरे भीतर

मेरे भीतर
एक बच्चा
एक युवा
एक जवान
… एक प्रोढ़
एक स्त्री भी है
स्त्री डरती है
बाकी मचलते हैँ
बुढ़ापे के जाल फैँक
मेरे भीतर को
कैद किया जाता है
इस जाल से भयभीत
मेरे भीतर के सभी
मेरा साथ छोड़ जाते हैँ
पासंग मेँ रहती है
एक स्त्री
जो हर पल
डरती रहती है !

सन्नाटोँ मेँ स्त्री

दिन भर
आंखोँ से औझल रही
मासूम स्त्री को
रात के सन्नाटोँ मेँ
… क्योँ करते हैँ याद
ऐ दम्भी पुरुष !

दिन मेँ
खेलते हो
अपनी ताकत से खेल
सूरज को भी
धरती पर उतारने के
देखते हो सपने
ऐसे वक्त
याद भी नहीँ रखते
कौन हैँ पराये
कौन है अपने !

सांझ ढलते ही
क्यो सताती है
तुम्हेँ याद स्त्री की
भयावह रातोँ का
सामने करने को
साहस तुम्हारा
कहां चला जाता है ?
गौर से देखो
तुम्हारे भीतर भी है
एक स्त्री
जो डरती है तुम से
वही चाहती है साथ
सन्नाटोँ मेँ अपनी सखी का !

घटता नहीँ मगर 

जो घटा
वह चाहत नहीँ थी
जगत मेँ किसी की
… चाहत तो हमेशा
अघटित ही रही !

मैँने चाहा
खिले फूल
बंजर मेँ
बरसे पानी
मरुधर मेँ
नदियां आ जाएं
बह कर खेतोँ मेँ
शब्दोँ को मिल जाएं
निहित अर्थ
हाथ को मिल जाए
हाथ किसी का
अपना सा
स्पर्श मेँ अनुभूतियां
तैरने लगें मछलियोँ सी
याद आने पर
आ जाए अगले ही पल
वांछित दिल का
कोई अपना सा
लगने वाला
हो ही जाए अपना !

घटता नहीँ मगर
घटता जाता है विश्वास !

पहाड़ बिफर गया

ऊपर उठे-तने
पहाड़ोँ के शिखर
छू कर क्या बोली हवा
पूछने झुका दरख्त
… चरमरा कर टूट गया
अंग अंग बर्फ रमा
बैठा मौन साधक
साक्षात शिव सरीखा
कई कई नदियोँ से
अभिषेक पा कर भी
पहाड़ नहीँ बोला
बोला तो तब भी नहीँ
जब तूफानोँ ने झकझोरा !
पहाड़ उस दिन
बोला और सरक गया
जब उसके भीतर
कुछ दरक गया
अंतस की अकुलाहट
लावा दर्द घुटन का
बिखर गया
दूर जंगल मेँ
मौन पहाड़ बिफर गया ।

कविता

कविता
न तो लिखीजै
अर
न बांचीजै ।
कविता
इन्नै-उन्नै
खिंडियोड़ी
अबखायां रै अंगारां नै
आपरै अंतस मांय भेळ
बुझावण री
एक क्रिया है
इण मांय
बळण री संभावना जादा है
बचण सूं ।
इणी क्रिया नै
उथळ’र
आपरै मांय
मै’सूस करण रो नाम
कविता रो
बांचिजणो ।
इसै समै
कविता बांचणो
अनै लिखणो
किणी जुद्ध सूं स्यात ई कम हुवै
कुण है जिकै मांय इण जुद्ध नै
जीतणै रो दम हुवै ।

इस कविता का हिंदी अनुवाद

कविता
ना तो लिखी जाती है और
ना ही पढ़ी जाती है ।

कविता तो इधर-उधर
बिखरी हुई कठिनाइयों के अंगारो को
अपने अंतस में बीन कर
बुझाने की क्रिया है
और इस में आग लगने की संभावना अधिक है
बचने की बजाय ।

इसी क्रिया की पुनरावर्ती
अपने भीतर ही भीतर
महसूस करने की कला होती है
कविता को पढ़ना ।

इस दौर में
कविता पढ़ना और लिखना
किसी युद्ध से शायद ही कमतर हो
कौन है
जिसके भीतर
इस युद्ध को जीतने का दम है ।

अनुवाद : नीरज दइया

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