ओम प्रकाश नदीम की रचनाएँ

हमने क़ुदरत की हर इक शै से मोहब्बत की है 

हमने क़ुदरत की हर इक शै से मोहब्बत की है ।
और नफ़रत की हर इक बात से नफ़रत की है ।।

क़ुदरत ने तो हर शख़्स को इंसान बनाया,
किसने उसे तफ़रीक़ का सामान बनाया ?
इंसान की ख़िदमत के लिए आया था इंसां,
किसने उसे मज़हब का निगहबान बनाया ?

जिसने इंसान को तक़्सीम किया ख़ानों में,
उसने क़ुदरत की अमानत में ख़यानत की है ।
हमने क़ुदरत की हर इक शै…

कोई भी यहाँ साथ में जब कुछ नहीं लाया,
किसने तुम्हें मालिक हमें मज़दूर बनाया ?
क़ुदरत का ख़ज़ाना तो ख़ज़ाना था सभी का,
किसने हमें मुफ़्लिस तुम्हें धनवान बनाया ?

हम भले चुप हैं मगर हम कोई नादान नहीं,
हमको मालूम है किसने ये सियासत की है ।
हमने क़ुदरत की हर इक शै…..

सपने जो हमारे थे उन्हें चूर किया है,
ईमान को बिक जाने पे मजबूर किया है,
पहले से बढ़ी फ़ीस को कुछ और बढ़ा कर,
कमज़ोर को तालीम से भी दूर किया है,

दिल में उट्ठा है जो उस दर्द की आवाज़ है ये,
हमको तकलीफ़ हुयी है तो शिकायत की है ।
हमने क़ुदरत की हर इक शै…..

तुम रूस के अख़बार से ये पूछ के देखो,
तुम चीन की दीवार से ये पूछ के देखो,
’बिस्मिल’ से ’भगतसिंह’ से ’अशफ़ाक़’ से पूछो,
तारीख़ के सरदार से ये पूछ के देखो,

ज़ुल्म चुपचाप सहे हमने हमेशा लेकिन,
ज़ुल्म जब हद से बढ़ा है तो बग़ावत की है ।
हमने क़ुदरत की हर इक शै से मोहब्बत की है ।।

हमें भी दिखा दो किताबों की दुनिया 

हमें भी दिखा दो किताबों की दुनिया ।

हमारा भी मन है कि स्कूल जाएँ,
पहाड़ा रटें और गिनती सुनाएँ,
ककहरा से बातें करें और सीखें,
कहाँ लगती हैं कौनसी मात्राएँ,

गुणा-भाग को जोड़-बाक़ी को समझें,
ज़रा हम भी देखें हिसाबों की दुनिया ।
हमें भी दिखा दो…..

ये सूरज का गोला ये चन्दा ये तारे,
हवा में टँगे हैं ये किसके सहारे,
इस आकाश में और क्या-क्या छुपा है,
हमें घेरे रहते हैं ये प्रश्न सारे,

हमारी तरह है कि हमसे अलग है,
फ़लक पर चमकते नवाबों की दुनिया ।
हमें भी दिखा दो…..

बहारों के मौसम ख़िज़ाओं के झोंके,
ये गर्म और ठण्डी हवाओं के झोंके,
ये बिजली ये बादल ये बारिश की रिमझिम,
लरज़ती गरजती सदाओं के झोंके,

कहाँ तक है रंग और ख़ुशबू का आलम,
कहाँ तक है काँटों गुलाबों की दुनिया ।
हमें भी दिखा दो.…

हमें अक्ल से कोई पत्थर न समझे,
जो बदले न ऐसा मुक़द्दर न समझे,
कि हम लड़कियाँ भी बराबर हैं क़ाबिल,
हमें कोई लड़कों से कमतर न समझे,

हमें भी तमन्ना है देखें तुम्हारे,
सवालों की दुनिया जवाबों की दुनिया ।
हमें भी दिखा दो.……

अगर हमको तालीम हो जाए हासिल,
तो आगे की नस्लों को मिल जाए मंज़िल,
मिला कर तुम्हारे क़दम से क़दम हम,
करें दूर मिलजुल के आए जो मुश्किल,

नया रूप दे कर नए रंग भरकर,
बना दें इसे कामयाबों की दुनिया ।
हमें भी दिखा दो……..

तुम्हारी तरह ये हमारा भी हक़ है,
हमारा भी हक़ है हमारा भी हक़ है,
हमें भी दिखाओ हमें भी दिखाओ,
हमें भी दिखाओ किताबों की दुनिया ।

ये सारे मज़हबी सियासत के आक़ा

ये सारे मज़हबी सियासत के आक़ा
मोहब्बत के दुश्मन हैं नफ़रत के आक़ा
इन्हें भूल कर भी हुकूमत न देना

अक़ीदत के ताजिर हैं ठगते हैं सबको
ये पा जाएँ मौक़ा तो छोड़ें न रब को
इन्हें भूल कर भी हुकूमत न देना

ये औरत से पढ़ने का हक़ छीन लेंगे
रिवायत से लड़ने का हक़ छीन लेंगे
इन्हें भूल कर भी हुकूमत न देना

ये इंसानियत की ज़बाँ काट देंगे
ये हक़ बात को बोलने भी न देंगे
इन्हें भूल कर भी हुकूमत न देना

लड़ाते हैं मासूम लोगों को अक्सर
कराते हैं ये मुल्क में ख़ून-ख़च्चर
इन्हें भूल कर भी हुकूमत न देना

अगर चाहते हो कि अम्न-ओ-अमाँ हो
कि कुछ और कुछ और बेहतर जहाँ हो
इन्हें भूल कर भी हुकूमत न देना
इन्हें भूल कर भी हुकूमत न देना

फुटकर शेर

1.

उल्फ़त में रुसवाई का भी हिस्सा है ।
इस पानी में काई का भी हिस्सा है ।

2.

पेट काटा है ख़ुद अपना जिस्म ढकने को ’नदीम’
यूँ भी कुछ लोगों ने बस्ती में मनाई, ईद है ।

3.

हर तरफ़ से मुझ पे डाली जा रही है रोशनी,
क़द न बढ़ पाए तो साया ही बड़ा हो कुछ तो हो ।

4.

सफ़दर हाशमी को बतौर खिराज-ए-अक़ीदत

सफ़दर तुम्हारे क़त्ल ने तुमको सुला दिया,
लेकिन तुम्हारी नींद ने सबको जगा दिया,
तुम तो ख़मोश हो गए बस ’हल्ला बोल’ कर,
लेकिन तुम्हारे ख़ून ने हल्ला मचा दिया ।

5.

ये बेदारी जो उग आई है ज़ह्नों में,फले-फूले ।
ये ग़ुस्से का ग़ुबार उठ कर सड़क से आसमाँ छू ले ।

6.

उसका क्या वो दरिया था उसको बहना ही बहना था ।
लेकिन तुम तो पर्वत थे तुमको तो साबित रहना था ।

7.

हर किसी की हाँ में हाँ करता नहीं हूँ ।
इसलिए मैं आदमी अच्छा नहीं हूँ ।

8.

दीवाली पर

बना दी है हमारे दौर ने हर चीज़ बाज़ारी,
कोई कुछ बेचता है कोई करता है ख़रीदारी,
हमें मालूम है रस्मन है ये सब कुछ मगर फिर भी,
मुबारक हो अन्धेरे में उजाले की तरफ़दारी ।

9.

भरे बाज़ार से अक्सर मैं, ख़ाली हाथ आता हूँ,
कभी ख़्वाहिश नहीं होती, कभी पैसे नहीं होते ।

पेट मैंने उसके एहसास-ए-सख़ावत का भरा 

पेट मैंने उसके एहसास-ए-सख़ावत[1] का भरा।
तब बमुश्किल उसने मेरी चाह का कासा[2] भरा।

अब भी गुंजाइश बहुत है तेरे मेरे दरमियाँ,
निस्फ़[3] ख़ाली तू भी है और मैं भी हूँ आधा भरा।

खा रहा हूँ एक मुद्दत से मैं रिश्तों के फ़रेब,
इन सराबों[4] से अभी तक दिल नहीं मेरा भरा।

हैसियत तो मैकदे से कम न थी उसकी मगर,
जब उसे परखा गया मुश्किल से पैमाना भरा।

ग़र्क़ होने की तमन्ना फिर से जागी थी मगर,
फिर न वो मौसम ही पलटा और न वो दरया भरा।

हमने अपने ज़र्फ़ का मेयार रक्खा बरक़रार,
जितना ख़ाली हो गया उतना ही दोबारा भरा।

शब्दार्थ
  1. ऊपर जायें उदारता का भाव
  2. ऊपर जायें कटोरा
  3. ऊपर जायें आधा
  4. ऊपर जायें मृग मरीचिका

जाने कितनी बार पढ़ डाली तमन्ना की किताब

जाने कितनी बार पढ़ डाली तमन्ना की किताब
कुछ समझ में ही नहीं आती तमन्ना की किताब

आस्मानी सब किताबें देखती ही रह गईं
आदमी को ले उड़ी उसकी तमन्ना की किताब

गुम न हो जाएँ तुम्हारे बेख़बर होश-ओ-हवास
तुम न पढ़ लेना कभी मेरी तमन्ना की किताब

हल न कर पाते पहेली अपने मुस्तक़बिल की हम
पास में होती न जो अपनी तमन्ना की किताब

ख़्वाहिशों की बेरुख़ी ने जाने क्या जादू किया
अब मुझे पढ़ती है बेचारी तमन्ना की किताब

कोई चूहा भी नहीं इसको कुतरता है ’नदीम’
ख़ुद से भी फाड़ी नहीं जाती तमन्ना की किताब

फ़ैसले ने कर दिया तै कौन किसके हक़ में है

फ़ैसले ने कर दिया तै कौन किसके हक़ में है
बस हमारा हौसला ही अब हमारे हक़ में है

मैं ख़फ़ा हो जाऊँ तुमसे तो बुरा मत मानना
ये ख़फ़ा होने का मेरा हक़ तुम्हारे हक़ में है

वो जुनून-ए-इश्क़ मेरा और ये उसका सिला
वो भी तेरे हक़ में था और ये भी तेरे हक़ में है

ऐ समुन्दर पार कर सकता हूँ मैं तुझको मगर
डूबना मेरा तेरी गहराइयों के हक़ में है

फ़िक्र के जो भी दिए रौशन हैं सब बुझ जाएँगे
ये गलैमर की हवा है तीरगी के हक़ में है

फिर से नारा-ए-बग़ावत ने ये साबित कर दिया
वो असर हक़ में नहीं है जो सदा-ए-हक़ में है

माँ के लिए

सभी ये कह रहे हैं तू जहाँ से उठ गई है माँ
मगर मुझे ये बात सबकी झूट लग रही है माँ

वही कहावतें , वही मुहावरे , वही ज़बाँ
मेरी ज़बान से दरअस्ल तू ही बोलती है माँ

तेरी बहू से जब कभी भी मनमुटाव हो गया
मेरी निगाह में उसे तू ही दिखाई दी है माँ

तेरा ही रूप रंग मुझमें है तेरा ही ढंग है
तेरा जमाल मुझमें है तेरा जलाल भी है माँ

तेरे खयाल-ओ-ख़्वाब हैं तेरी दुआएँ साथ हैं
हज़ार रूप में है तू मगर तेरी कमी है माँ

उन्हें बस पीसना है बाजरे मक्के से क्या लेना

उन्हें बस पीसना है बाजरे मक्के से क्या लेना
हवस का पेट भरना है किसी आटे से क्या लेना

हमारी क़द्र का इण्डेक्स गिरने पर है आमादा
हमें सेंसेक्स के आकाश छू लेने से क्या लेना

अक़ीदा तो अक़ीदा है चढ़ावा तो चढ़ावा है
जो आता है वो आने दो, खरे खोटे से क्या लेना

पुराने ज़ख़्म पर लिक्खी इबारत ठीक से पढ़ लें
सिवा इसके हमें इतिहास के चश्मे से क्या लेना

अभी तो एक ही दूकान के लायक़ नहीं हैं हम
हमें दस मंज़िला बाज़ार खुल जाने से क्या लेना

मेरे चमन में एक नया गुल खिला है गन्नू

मेरे चमन में एक नया गुल खिला है गन्नू
क़ुदरत ने अनमोल-सा तोहफा दिया है गन्नू

मुझको पापा कहने वाला कितना ख़ुश है
उसको पापा कहने वाला मिला है गन्नू

इससे बढ़कर और कोई आनन्द कहाँ है
मेरी गोद में बैठा है हँस रहा है गन्नू

मैं क्या उसकी दादी और बड़े पापा भी
ख़ुश होकर कहते हैं हम पर गया है गन्नू

होड़ लगी रहती है पहले कौन खिलाए
एक खिलौना घर भर को मिल गया है गन्नू

मम्मी की ममता आँखों में भर आई है
आँखों से मम्मी-मम्मी कह रहा है गन्नू

उसका हुक्म बजाना पड़ता है मुझको भी
दादा जी का भी दादा आ गया है गन्नू

ख़ूब फले-फूले जीवन सुखमय हो तेरा
तेरे हक़ में हम सब की ये दुआ है गन्नू

उसको लेकर तनाव है अब भी

उसको लेकर तनाव है अब भी
यानी उससे लगाव है अब भी

पार पाना ग़मों का मुश्किल है
मुझमें इतना बहाव है अब भी

सीना ताने हैं क्या बताएँ मगर
कुछ न कुछ तो झुकाव है अब भी

लोग पहले ही सा समझते हैं
मुझमें वो रखरखाव है अब भी

फ़िक्स हैं रेट जाने कब से मगर
सोच में मोल-भाव है अब भी

फ़ासला कम तो हो गया लेकिन
रास्ते में घुमाव है अब भी

आज सवेरे फिर से हमने उठते ही अख़बार पढ़ा

आज सवेरे फिर से हमने उठते ही अख़बार पढ़ा ।
पढ़ कर फिर मायूस हुए फिर पछताए बेकार पढ़ा ।

उसको तो प्रवचन करना था उसने गीता रट डाली,
हमको मर्म समझना था सो हमने केवल सार पढ़ा ।

हमको दरबारी ओहदे से ख़ारिज तो होना ही था,
हमने गीत लिखा जम्हूरी और सर-ए-दरबार पढ़ा ।

उसके बर्तावों ने मेरे ज़ह्न में जाने क्या बोया,
उतने ही मतलब उग आए उसको जितनी बार पढ़ा ।

शायद उसने कुछ पोशीदा लफ़्ज़ों में भी लिक्खा हो,
इस उम्मीद में उसके ख़त को जाने कितनी बार पढ़ा ।

गर्दिश में अगर मेरा सितारा नहीं होता

गर्दिश में अगर मेरा सितारा नहीं होता ।
मुझको तेरा उपदेश गवारा नहीं होता ।

थोड़े ने जगा दी है बहुत-कुछ की तमन्ना,
अब क्या करें थोड़े में गुज़ारा नहीं होता ।

दुनिया से हमें इतनी मोहब्बत नहीं होती,
दुनिया में अगर कोई हमारा नहीं होता ।

हर ज़र्रे को सूरज में बदल दे कोई फिर भी,
नज़रें नहीं होतीं तो नज़ारा नहीं होता ।

कुछ सोच न पाता कि मैं लौटूँ कि न लौटूँ,
कुछ सोच के तुमने जो पुकारा नहीं होता ।

जिसे जो चाहिए उसको वही नसीब नहीं

जिसे जो चाहिए उसको वही नसीब नहीं ।
मगर ये बात यहाँ के लिए अजीब नहीं ।

हवाएँ आग बुझाने की बात करने लगीं,
कहीं चुनाव का माहौल तो क़रीब नहीं ।

ज़मीन-ए-ज़र से ही इफ़लास जन्म लेता है,
जहाँ अमीर नहीं हैं वहाँ ग़रीब नहीं ।

कोई बताए कि आख़िर मरीज़ जाएँ कहाँ,
कहीं दवाएँ नहीं हैं कहीं तबीब[1] नहीं ।

हमें भी अपने लिए मार्केट बनाना है,
दुकानदार हैं हम सब कोई अदीब[2] नहीं ।

शब्दार्थ
  1. ऊपर जायें डॉक्टर
  2. ऊपर जायेंसाहित्यकार

किसी की चाह किसी जुस्तजू के चक्कर में 

किसी की चाह किसी जुस्तजू के चक्कर में ।
वो फँस गया है फ़रेबी गुरु के चक्कर में ।

कोई तो डूब गया आचमन के पानी में,
उलझ के रह गया कोई वज़ू के चक्कर में ।

तुम्हारे वक़्त की क़ीमत है जाओ कैश करो,
कहाँ पड़े हो मेरी गुफ्तगू के चक्कर में ।

बुरी न लगती हमें अपनी चाकदामानी,
पड़ा न होता जो दामन रफ़ू के चक्कर में ।

उसे अब अपने किए पर बहुत निदामत है,
लहू बहा दिया उसने लहू के चक्कर में ।

जिस आरज़ू ने हमें गामज़न किया था ’नदीम’,
ठहर गए हैं उसी आरज़ू के चक्कर में ।

जफ़ा की तेग़ से करके मेरे अरमान के टुकड़े

जफ़ा की तेग़ से करके मेरे अरमान के टुकड़े ।
मुझे लौटा रहा है वो मेरे एहसान के टुकड़े ।

उठा लो तुम भी इक टुकड़ा बना लो तुम भी इक परचम,
पड़े हैं हर तरफ़ बिखरे मेरी पहचान के टुकड़े ।

जिन्हें अत्तार[1] ने पुड़िया के रुतबे से नवाज़ा था,
वो काग़ज़ थे फ़िराक़-ओ-मीर के दीवान के टुकड़े ।

बहादुरशाह जैसा जज़्ब:-ए-ईसार हो जिसमें,
उसे तोहफ़े में मिलते हैं उसी की जान के टुकड़े ।

फ़क़त आँगन के बँटने से नहीं पूरा हुआ मक़सद,
“नदीम” अब चाहते हैं वो कि हों दालान के टुकड़े ।

शब्दार्थ
  1. ऊपर जायें दवा बेचने वाला

हवा बन कर तुम्हारी ख़ुश्बू को फैला दिया हमने

हवा बन कर तुम्हारी ख़ुश्बू को फैला दिया हमने ।
ज़रा सोचो कहाँ थे तुम कहाँ पहुँचा दिया हमने ।

भले ही जल के हमको राख हो जाना पड़ा लेकिन,
तुम्हारे प्यार को उस राख से चमका दिया हमने ।

हमारे झूट को भी सच समझ कर मुतमइन है वो,
बहुत हैरान हैं हम वाह क्या समझा दिया हमने ।

किसी के दर्द की आवाज़ सुन कर चीख़ कर रोए,
अचानक अपने ही एहसास को चौंका दिया हमने ।

न हमसे जब सुलझ पाया तो फिर सुलझे तरीक़े से,
उस उलझे मसअले को और भी उलझा दिया हमने ।

क्या कहा मुश्किल में राहत का नहीं होता वजूद

क्या कहा मुश्किल में राहत का नहीं होता वजूद ।
धूप ही के साये में होता है साये का वजूद ।

ऐे तअस्सुब इस तरह तू फूल कर कुप्पा न हो,
इस समुन्दर में है तेरा बुलबुले का सा वजूद ।

धर्म से आदम नहीं है आदमी से धर्म है,
गुल का ख़ुश्बू से नहीं गुल से है ख़ुश्बू का वजूद ।

मैं समुन्दर हूँ कोई तालाब या पोखर नहीं,
क्या मिटाएगी तमाज़त मेरे पानी का वजूद ।

मत उछालो मज़हबी नारों के पत्थर ऐे ’नदीम’
इनसे ज़ख़्मी हो न जाए भाईचारे का वजूद ।

तुम्हारा रुख़ बदल जाने से दिल में आस उग आई 

तुम्हारा रुख़ बदल जाने से दिल में आस उग आई ।
ज़मीं सूखी थी पानी पा गई तो घास उग आई ।

सुना है मज़हबों ने बीज बोए थे मोहब्बत के,
कहाँ से फिर ये नफ़रत भी उसी के पास उग आई ।

अभी अच्छी तरह जिद्दत पनपने भी न पाई थी,
अचानक ज़ह्न में अज्दाद की बू-बास उग आई ।

ये मंज़र देखने की ताब भी लानी पड़े शायद,
जहाँ पर फर्श पक्की थी वहाँ भी घास उग आई ।

ज़माने का असर आब-ओ-हवा पर पड़ गया ज़ालिम,
उमीदों ही के साए में निगोडी यास उग आई ।

जहाँ सहरा है सोचो तो वहाँ का हाल क्या होगा,
जहाँ दरियादिली थी अब वहाँ भी प्यास उग आई ।

जो महल तामीर करते हैं कड़कती धूप में

जो महल तामीर करते हैं कड़कती धूप में ।
उनके दिन अक्सर गुज़रते हैं सड़क की धूप में ।

जल रही है आदमीयत यूँ मज़हबी धूप में,
जिस तरह जलती है धरती गर्मियों की धूप में ।

फूल ग़ज़लों के खिले थे जो अदब की छाँव में,
आज वो कुम्हला रहे हैं जिन्सियत की धूप में ।

ज़ुल्म और मज़लूम को रंगीन चश्मे से न देख,
बर्फ़ में भी है वही जो है सफ़ेदी धूप में ।

ये भरे सावन की आमद की अलामत है ’नदीम’,
ख़त्म होने के लिए बढ़ती है गर्मी धूप में ।

सलाम 

गर न होते राहबर राह-ए-सदाक़त के हुसैन ।
मर्तबा शायद शहादत का नहीं पाते हुसैन ।

पानी-पानी आज तक है दोस्तो जू-ए-फ़रात,
क्योंकि उसके पास रह कर भी रहे प्यासे हुसैन ।

इक हिसार-ए-क़ौमियत में क़ैद मत रक्खो ये नाम,
फैलने दो ताकि दुनिया जान ले क्या थे हुसैन ।

ख़ुद रहे प्यासे पिलाया दुश्मनों को अपना ख़ून,
दो क़दम ईसार से भी बढ़ गए आगे हुसैन ।

बुतपरस्ती को अगर माना’ नहीं होता ’नदीम’,
बुत बना कर रोज़ तेरे पाँव हम छूते हुसैन ।

जड़ों तक हो असर पत्तों में जुम्बिश हो तो ऐसी हो 

जड़ों तक हो असर पत्तों में जुम्बिश हो तो ऐसी हो ।
समूचा पेड़ हिल जाए, जो कोशिश हो तो ऐसी हो ।

जलाया जिसने हमको रौशनी उसको भी दी हमने,
सख़ावत हो तो ऐसी हो नवाज़िश हो तो ऐसी हो ।

तअस्सुब के तमाम आतिशकदों में आग लग जाए,
शरर आपस में लड़-मर जाएँ साज़िश हो तो ऐसी हो ।

दर-ओ-दीवार पर जो ख़ून के धब्बे हैं धुल जाएँ,
हमारे शह्र में इमसाल बारिश हो तो ऐसी हो ।

जिएँगे प्यार की ख़ातिर मरेंगे प्यार की ख़ातिर,
तमन्ना हो तो ऐसी हो जो ख़्वाहिश हो तो ऐसी हो ।

आज नहीं तो कल बदलेंगे मौसम के हालात 

आज नहीं तो कल बदलेंगे मौसम के हालात ।
कुछ तो हद है आख़िर कब तक होगी ये बरसात ।

प्यार-मोहब्बत, इश्क़-ओ-वफ़ा के इंसानी जज़्बात,
मुफ़्त मिले हैं हमको, हम भी बाँटेंगे ख़ैरात ।

सूरज को गन्दा करने का देख रहे हैं ख़्वाब,
आँधी के झोंके में ज़र्रे भूल गए औक़ात ।

कुछ अंगारे इसने डाले कुछ डाले उसने,
मुझको जला कर सेंक रहे हैं दोनों अपने हाथ ।

इस दुनिया में मैनें देखी हैं दो दुनियाएँ,
इक दुनिया में दिन होता है इक दुनिया में रात ।

छान डाले उसने परदेसी गगन के रास्ते 

छान डाले उसने परदेसी गगन के रास्ते ।
तय न कर पाया मगर अपने वतन के रास्ते ।

आओ बैठें मिल के सोचें कैसे पिघलेगी ये बर्फ़,
मुद्दतों से बन्द हैं आवागमन के रास्ते ।

हौसला हूँ मंज़िलों से पहले की मंज़िल हूँ मैं,
ख़त्म हो जाते हैं मुझ पर सब थकन के रास्ते ।

लग रहा है आज फिर सय्याद[1] आएगा कोई,
फिर सजे हैं खैरमकदम[2] को चमन के रास्ते ।

फ़ासले भी चलते-चलते आख़िरश थक ही गए,
आ के यकजा[3] हो गए गंग-ओ-जमन के रास्ते ।

जिस तरफ़ मुड़ने से भी परहेज़ करते थे ’नदीम’
उस तरफ़ ही जा रहे हैं इल्म-ओ-फ़न[4] के रास्ते ।

शब्दार्थ
  1. ऊपर जायें बहेलिया
  2. ऊपर जायें स्वागत
  3. ऊपर जायें एक हो जाना
  4. ऊपर जायें शिक्षा, ज्ञान और कला

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