कबीर शुक्ला की रचनाएँ

अर्ज़-ए-पाक़ पर ये हवादिशें देखा तो रो दिया

अर्ज़-ए-पाक पर ये हवादिशें होता देखा तो रो दिया।
निग़ार-ए-ज़ीस्त को पामाल बनता देखा तो रो दिया।

आग लगे ऐ दुनिया तेरी इस कारगह-ए-ज़रदारी को,
ज़िस्म-ए-नाज़नीं ज़लबत बिकता देखा तो रो दिया।

मैं इन हवस-परस्त लोगों की चीरादस्ती को क्या कहूँ,
दोशीजा को कहवाखाने में चीखता देखा तो रो दिया।

शरम आती है मुझे मर्दों तेरी ये उरिआनियाँ देखकर,
ख़ूने-तमन्ना-ए-दिल किसी का होता देखा तो रो दिया।

वो बेखबर था सरहद पर महाज़-ए-जंग में मशरूफ़,
बहन की इस्मत को ज़लबत लुटता देखा तो रो दिया।

जिसे दुनिया देखना था और उस उफ़क को छूना था,
बुलबुल दार-ओ-रसन पर लटकता देखा तो रो दिया।

वो नटखट-सी गुड़िया जिसे हम शाने-गली कहते थे,
चारदिवारों में उसे धूधू कर जलता देखा तो रो दिया।

किसी से वफ़ा की उम्मीद अब कोई करे भी तो कैसे,
बाग्बाँ को मासूम कलियाँ मसलता देखा तो रो दिया।

पैर होते हुए भी इस सरमाए ने अपाहिज बना रखा है,
गिर गिर कर बारहाँ उसे सम्भलता देखा तो रो दिया।

तेरी खट्टी-मिट्ठी नोंक झोंक से

तेरी खट्टी-मिट्ठी नोंक-झोंक से जीने में लज़्ज़त है।
तेरी मुहब्बत तेरी इनायत से ही जीने में बरक़त है।

इशारा-ए-तबस्सुम पाकर ही सहर-ए-गुल है होती,
भले ही इस ख़ाकदाँ को लगे ये दस्ते-क़ुदरत है।

तेरे गेसुओं के साये में बेहिरास हो सूरज है सोता,
ख़ल्क सोचती है दिन रात का होना मशीयत है।

तेरी चश्मे-मगयूँ, नुक्तो-लब शराबे-दस्ते-साकी से,
तेरी चाल मस्तानी तेरी एक-एक अदा सबाहत है।

वस्ले-मनो-तू मेरे वफ़ा की मुहब्बत की है मेहर,
तू है तो निग़ारे-हयात वरना जीने में अज़ीयत है।

तू चारे-इंतेजार मज़ाके-जिन्दगी तू ही है जुस्तजू,
औजे़-ख़याल, सुकून-ए-कल्ब तू मेरी सदाकत है।

शक्ले-ज़मील का ज़िला है हर इक शै में जज़्ब,
आशियाँ-ए-कल्बे- ‘कबीर’ में शम्मा-ए-उल्फ़त है।

राह-ए-उल्फ़त में गुल कम 

राह-ए-उल्फ़त में गुल कम ज़्यादा पत्थर ही मिलेंगे।
उम्मीदे-गुल ना रखना हर डगर में नश्तर ही मिलेंगे।

जिनका इश्क चढ़ा परवान नादाँ ग़र्दिश में मिल गये,
यहाँ हाल-ए-दिल-ए-आश्ना बद से बदतर ही मिलेंगे।

सच कहा किसी ने कि इंसाँ तो बस बरबाद हुआ है,
इश्क मुकम्मल हुआ ऐसे फरिस्ते कमतर ही मिलेंगे।

ख़ुमारे-इश्क़ कहूँ इसे या बादिया-ए-ज़हर कह दूँ,
चख-चख के दो-दो बूँद अधमरे बेखबर ही मिलेंगे।

मैं अकेला नहीं जिसे है इश्क़े-तिजारत से शिकवा,
पूछ कर देखिये रूसवा शहर के शहर ही मिलेंगे।

रूख़्सारे-शादमानी फरेब है वफ़ा हिज़ाबों में कैद है,
वफ़ादार तुझे इक हजार में सत्तर बहत्तर ही मिलेंगे।

जाने क्या हस्र होगा सफ़ीना-ए-मुहब्बत-ए- ‘कबीर’ ,
तुझे जहाने-इश्क में तूफाँ दरिया समंदर ही मिलेंगे।

इफ़लास-ज़दा दहकानों ने ख़लिहान बेच डाला 

इफ़लास ज़दा दहक़ानों ने ख़लिहान बेच डाला।
टूटे बिखरे अपने ख़्वाब-ओ-अरमान बेच डाला।

तख़रीब मिली है फिर नादान अलमनसीब को,
तामीर बनाने की खातिर जो पहचान बेच डाला।

टूटा सा’ मकाँ गिरवी था लाख लगान बकाए थे,
ईमान बचाने की खातिर वो’ मक़ान बेच डाला।

बेटी घर में ही इक बिन व्याह जवाँ पड़ी हुई थी,
फिर व्याह कराने को हर एक समान बेच डाला।

दो वक्त की रोटी के खातिर फिरता है इधर उधर,
फिर आखिर अपने अंदर का किसान बेच डाला।

मेरे टूटे ख़्वाबों की अधूरी दास्ताँ हो तुम

मेरे टूटे ख़्वाबों की अधूरी दास्ताँ हो तुम।
तुम ही इब्तिशाम हो सोज़े-पिनहाँ हो तुम।

तुम दिल दरिया के बालीं पर शफ़क-सी हो,
दर्द की जम्हाती नींद शाम-ए-हिज़्राँ हो तुम।

तुम मेरा ख़्वाब मुन्तशिर, बेसुध तमन्ना हो,
अधूरे सफ़रे-इश्क़ का मीरे-क़ारवाँ हो तुम।

तुम मेरी बेरब्त ख़्बाहिशे-निगारे-हयात-हो,
जो मुकम्मल ना हो सका वह मुकाँ हो तुम।

तुम मेरा अनकहा एहसास अनकही चाहत,
मैं पा न सका वह ख़लूशे-ख़ाकदाँ हो तुम।

आँखों आ़खो में मुहब्बत की नुमाईश की है

आँखों आँखों में मुहब्बत की नुमाइश की है।
आज मैंने अपने दिल की आजमाइश की है।

शम्मा-ए-उल्फ़त जलाकर निगाहे-मुंतज़िर ने,
सफ़रे-मुहब्बत में चलने की फर्माइश की है।

कहीं नज़र ना लगे मेरे चाँद से महबूब को,
अक़ीदत से दरीचों पर पैरहन-आराइश की है।

परवरदिगार उसे हर अज़ाब से महफ़ूज़ रखे,
ख़ानमाँ-ख़राब नें अमीरों से मुबाहिश की है।

ख़ुदा ख़ैर करे इस नादान को हिम्मत बख़्शे,
एक परिंदे ने आफ़ताब की ख़्वाहिश की है।

रेज़ा-रेज़ा ही दौरे-ग़मे-हयात गुजर जाने दो

रेजा़-रेज़ा ही दौरे-ग़मे-हयात गुजर जाने दो।
यूँ आँसुओं में ही मेरी कुछ रात गुजर जाने दो।

यकींनन तख़रीब के बाद फ़स्ले-बहार आयेगी,
फिरहाल यह ज़ागुँजी बरसात गुजर जाने दो।

अफ़शा-ए-राज़ होगा कबा-ए-गर्दे-चश्म हटेगा,
ज़रा तुम ये तिलिस्मे-कायनात गुजर जाने दो।

हाँ मिन्नतों की तक़मील होगी, मंजिल मिलेगी,
क़रार के ये मुंतशिर ख़यालात गुजर जाने दो।

तुम वाक़िफ़ नहीं ज़रा भी यूरिशे-सरसर से,
पहले मुझे ऐ अहले-मशाफात गुजर जाने दो।

बैतुलहरम में देर है रफीकों पर अंधेर नहीं है,
पा-ए-ग़नी से पामाल ज़ज्बात गुजर जाने दो।

हुज़ूरे-ग़ैब में लुत्फो-करम-ओ-सुकून मिलेगा,
बस ये अह्दे-ग़म की बारात गुजर जाने दो।

महताब भी मोहताज़ होगा महबूब के दीदार का

महताब भी मोहताज़ होगा महबूब के दीदार का।
तारीक में नूरे-सहर मानिंद अक्से-रुख़े-यार का।

हुस्न-ओ-शबाब-ए-नाज़नीन-ए-निग़ार के सामने,
फ़ीका लगता है सतवत-ओ-ऐवान ज़रदार का।

उसके हसीन-ओ-मुनक्कश-रू को देख-देखकर,
शर्माता होगा गुले-गुलजार मौसम चमनगार का।

मौजे-नसीम से उसकी ख़ुश्बू, आवाज़ह सुनकर,
तलबगारे-दीदे-यार होता दिल वफाशेआ’ र का।

उसकी बर्क-सिफ़ात नज़रों से रूबरू होकर के,
एस्तादा रहना मुश्किल है दिले-नाकर्दकार का।

वो रानाई-ए-हर्फ़ है वह शान-ए-ग़ज़ल-मुशायरा,
इस्तिआरे-तशबीहो वह शायर के अफ़कार का।

सब्र-आज़मा तिलिस्मे-मजाज़ हुस्न बनाने में,
दस्ते-क़ुदरत है या करिश्मा परवरदिगार का।

मुन्तशिर कोई किस्सा-ए-पारीना हो गया हूँ 

मुन्तशिर कोई किस्सा-ए-पारीना हो गया हूँ।
वफ़ाशेआ’ र रुस्वा हरदमे-दैरीना हो गया हूँ।

मस्तानाँ हूबहू हुस्न-मरहूने-जोशे-बादे-नाज,
हर्फ़े-तमन्ना, ख़ुमारे-मए-दोशीना हो गया हूँ।

ख़्वाहिशे-निहाले-ख़लूश ले सहरा में भटका,
मैं दश्ते-ख़िजाँ या रंगते-नौशीना हो गया हूँ।

ग़म-ए-रोजगार, ग़मे-उल्फत दस्तो-गरेबाँ हैं,
रुख़्सते-फ़स्ले-गुल, ख़्वाबे-हीना हो गया हूँ।

सदलख़्ते-तमन्ना लिये मंजिल की जुस्तजू में,
हुज़ूमे-ग़ुबार में फँसा कोई सफ़ीना हो गया हूँ।

बड़ा रंग लाया हैमेरा ग़ज़ल लिखना भी

बड़ा रंग लाया है आज मेरा ग़ज़ल लिखना भी।
महबूब के चेहरे को गुलाब कवँल लिखना भी।

आरिंद को गुलिस्ताँ अब्सारों को दरिया लिखना,
उसके गेसू-ए-शबगूँ को घना बादल लिखना भी।

शक्ल-ए-ज़मील को जेबाई-ए-महबाब लिखना,
उसे ख़ुदा ख़ुद को उसका कायल लिखना भी।

सादिक गुलबदन खुशरवे-शीरीदहना लिखना,
ख़ुद ग़फ़लत-शिआर उसे अव्वल लिखना भी।

गोशा-गोशा मेरे आशियाँ का महका जाता है,
ख़ुश्बू-ए-जिस्मे-नाजनीं को संदल लिखना भी।

इब्तिशाम अता करता है मेरे अह्दे-हिज़्र को,
दिले-बेक़रार को खुशियों का महल लिखना भी।

नादाँ नाकर्दकार को सुकूने-कल्ब देता है ‘कबीर’ ,
ख़्वाबे-परीशाँ को बारहाँ मुकम्मल लिखना भी।

ऐ दिल तू इबादत के लिये जायेगा किधर

ऐ दिल! तू इबादत के लिए जाएगा किधर।
लोग कहते हैं ये मंदिर ये मस्जिद की डगर।

इस कदर अंधा है इंसाँ यहाँ क्यूँ मेरे मौला,
बाँट डाला है ख़ुदी में उस खुदा का ही घर।

हाय रे इंसान और हाय क्या तेरी समझ है,
बाँट डाला रंगों को भी मजहब के नाम पर,

कपड़े पग टीका पहचान बने इंसान की,
धरम के नाम पर ही पहचाने जाते हैं शहर।

उम्र गुजरती है जहाँ में प्यार की जुस्तजू में,
प्यार था देना जिनको उसने बरपाया कहर।

ना बनाना किसी जाति धरम का मुझको,
फिर बनाना मुझे इंसाँ इस जहाँ में अगर।

बस्तियाँ सहमी हुई चमन फूटकर रोता है,
‘कबीर’ कर ले तू इबादत पहर दो पहर।

इस बेनाम मुहब्बत की चलो रुसवाई ही ले चलें

इस बेनाम मुहब्बत की चलो रुसवाई ही ले चलें।
खाली हाथ क्या लौटना चलो बेवफाई ही ले चलें।

सुना है मिलते नहीं कभी दरिया के दो किनारे,
अपने चाहत की निशानी चलो तन्हाई ही ले चलें।

अंजाम-ए-इश्क जुदा होना बगर लिक्खा हुआ है,
निभा रिवाज-ए-इश्क हम चलो जुदाई ही चलें।

नींद उड़े आँखों से शब गुजरे करवट बदल कर,
नशीली आँखों से कुछ चलो जम्हाई ही ले चलें।

इजहार-ए-इश्क का अंजाम तो बड़ा दर्दभरा है,
अपनी सुनवाई के वास्ते चलो दुहाई ही ले चलें।

मरीज-ए-इश्क बना दिल फिरे गलियों में तेरी,
दर्दे-दिल के वास्ते कुछ चलो दवाई ही ले चलें।

अब दुबारा कभी भी मुहब्बत ना होगी किसी से,
बेवफा गली से दीवाना कबीर सौदाई ही ले चलें।

दर्द में लिपटा हुआ है मेरा ख़्वाब कोई

दर्द में लिपटा हुआ-सा है मेरा ख्वाब कोई।
जैसे लिपटा हुआ हो काँटो से गुलाब कोई।

दिल मेरा टूटा हुआ है काँच-सा हूबहू है,
दर्द देता है मुझे उस पर बेहिसाब कोई।

जिन्दगी प्यास बनी है रेत-सी सागर सी,
दर्द के स्याह में लिपटी किताब कोई।

उम्मीदे-दिल है जख्मो को मरहम देगा,
कोई इन्साँ रहमदिल याफताब कोई।

अपने सवालों के पुरिन्द में जल रहा हूँ,
कहीं नहीं मेरे सवालों का जवाब कोई।

मेरा महबूब मेरा हमदम चाँद के हूबहू है 

मेरा महबूब मेरा हमदम चाँद के हू-ब-हू है।
ऐसा लगता है कोई परीवश मेरे रू-ब-रू है।

गो वह सिर्फ़ मेरा है कोई नक़दे-शमसो-क़मर,
वो तजल्ली-सा मिस्ले-सबा-सा कू-ब-कू है।

वो है खुसरवे-शीरीदहनाँ वह गुलो-गुलबदन,
जिस्मे-नाजनीं में गुले-गुलिस्ताँ की खुशबू है।

वो गुलबदन है चारागर दवा दुआ-ओ-मरहम,
वो मसीहा-ए-दिले-दिलजदहाँ-सा मू-ब-मू है।

वो ही मए वह ही है लग्जिशो-नहकते-मस्ताना,
वो ही है बादिया-ए-आबे-हयात जामो-सुबू है।

वो रानाई-ए-महताब है मीरे-कारवाँ-ए-इश्क,
वो मेरा हबीब है वह ही महरम वह ही अदू है।

निगाहे-मुंतजिर भी दीद-उमीद में है मुजतरिब,
दीद-ए-अक्से-रुखे-यार ख़्वाहिशो-जुस्तजू है।

हमसफीराने-चमन मिले पर तरो-ताजगी ना मिली

हमसफ़ीराने-चमन मिले पर तरो-ताज़गी न मिली।
लक़ा-ए-नाज़ तो मिला पर वह दीवानगी न मिली।

अहले-दिल अहले-मशाफ़ात मिले हमको सदहा,
उस ख़ुशखिराम आली इंसान-सी सादगी न मिली।

गेसू-ए-शबगूँ दीदनी हुस्नो-शबाब मिले लेकिन,
जिस्म-ए-जानाँ में फिर कवँल-सी तुर्फगी न मिली।

उफ़क़ चूमते महल-दो-महले कोठे-अटारियाँ देखा,
ख़ल्क-ए-तामीर में लेकिन वह आरास्तगी न मिली।

जुर्आ-जुर्आ जी लिया फिराक़े-हयाते-मरमरी में,
कश्मकशे-मर्गे-बेअमाँ मिली पर ज़िन्दगी न मिली।

किया मुहब्बत भी औ इकरार-ए-गुनाहे-इश्क भी,
इश्के-सितमगर में लेकोनकोई उफ़्तादगी न मिली।

इश्तेआरे तशबीहो से भरी बैते-नज़्म थी लेकिन,
नवा-ए-शायर में वह सुकूँ-ओ-आसूदगी न मिली।

हमनवा हमसफर शादकामे-हयात मिले लेकिन,
मकाने-कल्ब को ग़मगुस्सार हमसायगी न मिली।

छलावा दिखावा फरेब चप्पे-चप्पे दिखा ‘कबीर’ ,
खाकदाँ में वासफा़ फिर आदाबे-बंदगी न मिली।

तू जो साथ नहीं मेरे तो जहाँ छोड़ जायेंगे 

तू जो साथ नहीं मेरे तो जहाँ छोड़ जायेंगे।
छत ही नहीं है अगर तो मकाँ छोड़ जायेंगे।

होशे-अनादिल हूँ हँसी-ए-बर्गे-नबात खातिर,
सोजे-पिनहाँ लेकर आशियाँ छोड़ जायेंगे।

ग़िला शिकवा शिकायत इश्क में ममनूअ है,
चश्मे-पुरआब ले इश्क बेजुबाँ छोड़ जायेंगे।

अब्सारे-निगार में दिखेगी हमेशा शरहे-इश्क,
रुख़्सारे-यार पर तबस्सुमे-पिनहाँ छोड़ जायेंगे।

रह लेंगे हम दर-ब-दर हू-ब-हू खानाबदोश,
तेरे हक में जमीं-ओ-आशमाँ छोड़ जायेंगे।

ये सुराब ये इशवागारे ये लौउ-ओ-ख़फ़गी,
तेरी सरमस्तियों का हन जिन्दाँ छोड़ जायेंगे।

दराज़ ख़ाकदाँ से शब-ए-अलम में हम तन्हा,
जाने-इज्तेराब लेकर दिलो-जाँ छोड़ जायेंगे।

बरहना लाश सा बना है हर बसर जमाने में 

बरहना लाश-सा बना है हर बसर जमाने में।
चली है बेहयाई बेहोशी की सरसर जमाने में।

नुमाइशे-जिस्म नुमाइशे-शोहरत में इजाफ़ा है,
तमद्दुन कदीम भटकती है दरबदर जमाने में।

जैसे तूफान में बह जाते हैं घर-मकाँ सदहा,
हू-ब-हू गर्द में मिल रही है सहर जमाने में।

नजरों की हवस-परस्तगी उरियानियाँ देखो,
देखती खतो-खाल मक्तल कमर जमाने में।

खूने-तमन्ना खूने-इंसाँ खूने-वफ़ा खूने-जिगर,
लहू-ए-कल्ब से लहूलुहान है डगर जमाने में।

हर चेहरे पर कई रंगों की रिदाएँ हैं मयस्सर,
कौन काबिले-एतबार जायें किधर जमाने में।

जज्बात की तिज़ारत हर-शू होती है ‘कबीर’ ,
ताजिरों की बस्ती बना घर शहर जमाने में।

टूट टूटकर तरासा हुआ पत्थर बन रहा हूँ 

टूट टूटकर तरासा हुआ पत्थर बन रहा हूँ।
बिखर बिखर मैं बद से बदतर बन रहा हूँ।

ज़र्ब पर ज़र्ब मरहम का अता-पता नहीं है,
अपने ज़ख़्म-सी कर चारागर बन रहा हूँ।

मेरे ज़ख़्मों को तो मरहम नसीब न हुआ,
औरों के ज़र्ब के लिये कारगर बन रहा हूँ।

क्या कहूँ किससे कहूँ कैसे कहूँ राज़े-दिल,
सीने में छिपा दर्दो-ग़म समंदर बन रहा हूँ।

जल रहा जुर्आ-जुर्आ आबे-तल्ख़ पी पी,
जू-ए-आतिश मैंअंदर ही अंदर बन रहा हूँ।

सीने में दबा रखा है दर्दो-ग़म की आँधियाँ,
ख़ुद में ही कोई तूफान बवंडर बन रहा हूँ।

तू भी ज़ख़्मे-दिल की दवा ले-ले ‘कबीर’ ,
चारागरी कर करके मैं कलंदर बन रहा हूँ।

आज मैं तुझे मुहब्बत का वो किस्सा सुनाता हूँ

आज तुझे मैं मेरी मुहब्बत का वह किस्सा सुनाता हूँ।
तू दो पैग और पिला मैं अहिस्ता-आहिस्ता सुनाता हूँ।

ऐ साक़ी! ये मुहब्बत है तू ज़रा दिल थामकर रखना,
किस्सा झूठा हो या सच मैं बहुत संजीदा सुनाता हूँ।

तू तो मैख़ाना ही लाकर आज मेरे प्याले में उड़ेल दे,
मैं पीता बहुत हूँ जब-जब भी वह वाक़िया सुनाता हूँ।

मेरा हाथ पकड़के रखना और ज़रा सम्भालना मुझे,
मैं लडखड़ाता भी बहुत हूँ जब वह हिस्सा सुनाता हूँ।

ये मैक़दा, बोतलें, शराबें और प्याले सब वाक़िफ़ हैं,
आज राज़े-लग्ज़िश मैं तुझे ऐ साक़िया! सुनाता हूँ।

खाली क्या बैठे हो कुछ काम किया करो

खाली क्या बैठे हो कुछ काम वाम किया करो।
मिटा मिटाकर बारहाँ उसका नाम लिखा करो।

उसे हिचकियाँ आयेंगी, तुम्हारा दिल बहलेगा,
इसी बहाने कुछ दफ़ा उसका नाम लिया करो।

इन ख़तों के पुरिन्द में क्या ख़ुद को जलाना है,
अब हवाओं से अपना पैगाम लिया दिया करो।

क्या हालत बना रखे हो रान्झे मजनूँ मानिंद,
कभी ज़िन्दगी ज़रा खुलकर भी जिया करो।

यूँ तो ईद के चाँद जैसे दिखते हो कभी कभी,
मिलते हो तो दोस्त ज़रा हँस कर मिला करो।

नस्ले-नौ को कुछ नुस्खे कुछ नियमो-कायदे,
अब सिखाया करो और तुम भी सिखा करो।

महबूब से भी मिलते हो तो नज़रें झुकाकर,
अरे हरकतें तुम भी कुछ किया विया करो।

वो इस दफ़ा लौट कर आये और सफाई दे दे 

वो इक दफ़ा लौटकर आये और सफाई दे दे।
बेवफाई से कुछ बाकी हो तो वह रुसवाई दे दे।

मेरी सूजी पलकें तुमसे देखी ना जायेंगी साकी,
दो चार दिन के लिये मुझे मैक़दे से रिहाई दे दे।

शराब के आगे दवा हलक से उतरती ही नहीं,
शराब में ही मिलाकर तू मुझे कुछ दवाई दे दे।

आँखों में नींद नहीं शब करवट में गुजरती है,
ऐसा कर बोतल में छिपाकर मुझे जम्हाई दे दे।

मेरे ज़माने के लोग मुझे बेबस बेक़स कहते हैं,
कहीं से कर के मुझे किराये की ही लुगाई दे दे।

दर्दे-दिल हमने दिल में ही दबाये रक्खा है

दर्दे-दिल हमने दिल में ही छिपाये रक्खा है।
झूठी ही सही लबों पर हँसी बनाये रक्खा है।

जबाँ खुले और जमाने में सैलाब आ जाये,
होठों को भींच सिसकियाँ दबाये रक्खा है।

मैं और ये आँधियाँ दोनों ही जिद पर हैं अड़े,
हथेलियाँ जली पर चराग जलाये रक्खा है।

नींद की आगोश में रात अँगड़ाई लेती रही,
मैने चाँद की चाँदनी को जगाये रक्खा है।

किसी को देख दिल में कोई चाहत ना जगे,
मैने ख़्वाहिशो-अरमान भी सुलाये रक्खा है।

मैं नहीं हूँ मालिक! तेरी रहमतों के काबिल,
दुआओं ने फिर भी उमीद लगाये रक्खा है।

जाने कब क़फ़स से ये परिंदा आज़ाद होगा,
पा में जो काकुले–गेती उलझाये रक्खा है।

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