कमलकांत सक्सेना की रचनाएँ

कविता गुण है तनहाई का

कविता गुण है तनहाई का।
जीवन धन है तनहाई का।
अस्तित्व पूछते हो अपना?
निरा छलावा तनहाई का।

बन्दगी में प्रात मिले या कि सायं हो।
जिन्दगी में धूप मिले या कि छांह हो।
शूल से भरा हो पथ या तम से घिरा
किन्तु मेरा नाम लिखा एक गांव हो॥

कोई ग़म नहीं, न जाने मेरी कैफियत कोई.
ग़म भी ग़म नहीं, न पूछे मेरी खैरियत कोई.
हाँ, मेरी रोशनी से रोशन कल ये होगी जमीं
आज न माने, न माने मेरी हैसियत कोई॥

चढ़ता हुआ सूरज हूँ मैं।
बहता हुआ पानी हूँ मैं।
लोग ‘कमल’ कहते हैं मुझे
पत्थर की कहानी हूँ मैं॥

तुम कहो 

एक सागर भावना का
तुम कहो, गोता लगा लूँ
तुम कहो, लहरें जगा दूँ
तुम कहो, शबनम बना दूँ,

एक बादल कामना का-
तुम कहो, नाचूं, नचा लूँ
तुम कहो तो, गीत गा लूँ
तुम कहो, झड़ियाँ लगा दूँ
तुम कहो, तन मन गला दूँ,

एक उपवन कल्पना का-
तुम कहो, खुशबू चुरा लूँ
तुम कहो तो, रूप ढा लूँ
तुम कहो, कलियाँ खिला दूँ
तुम कहो, कण-कण मिला दूँ,

एक दर्पण प्रार्थना का-
तुम कहो, सूरत सजा लूँ
तुम कहो तो, रंग पा लूँ
तुम कहो, पर्दा गिरा दूँ
तुम कहो अर्पण दिखा दूँ,

मुस्कराओ तुम 

मुस्कराओ तुम
और गाएँ हम
बांसुरी यों प्रीति की बजती रहे!

हो सबेरा, ओंठ की मुस्कान जैसा,
या कहो आषाढ़ सा, मधुमास जैसा,

कुनमुनाओ तुम और छेड़ंे हम
ज़िन्दगी यो गीत की बढ़ती रहे!
बांसुरी यों प्रीति की बजती रहे!

रीतता दिन, काम में, श्रमदान जैसा।
भींगता तन, प्राण में, विश्वास जैसा।

डगमगाओ तुम और साधें हम
हार बिन यों जीत ही पलती रहे।
बांसुरी यों प्रीति की बजती रहे!

मांग में सिंदूर हो वरदान जैसा।
सांझ का शृंगार श्रावण मास जैसा।

सिर नवाओ तुम, पांव देखें हम
वर्तिका यों रीति की बलती रहे!
बांसुरी यों प्रीति की बजती रहे!

हर गई हो ज्योति, तम मनुहार जैसी.
मन लगी हो आग, मेरे प्यार जैसी.

गुनगुनाओ तुम, सांस पी लें हम
रात, दिन यों रात फिर चलती रहे!
बांसुरी, यों प्रीति की बजतीरहे!

प्रीति के हिरण 

भरें कुलाचें प्रीति के हिरण।

जाने क्या बात हुई उस दिन
देखा ज्योंहि रूपसि हवा को
भूल ही गये चौकड़ी नयन
मौन मौन बैठा एकाकी
हो आया रोमांचित मौसम
पुलक उठा विश्वासों का मन।
भरे कुलाचें प्रीति के हिरण।

यही नहीं और भी कुछ हुआ
जंगली मोर ने छोड़े पर
गीत गुनगुनाने लगा सुआ
शांतमना लेटा रहा वरुण
लहरों ने नीला गगन छुआ
कैसे कैसे मिठ्भाषी क्षण।
भरें कुलाचें प्रीति के हिरण।

नीर की गाथा 

कुछ तो कहो तुम
नीर की गाथा प्रिये
बरसात बीती जा रही है।

कोयल की कुहू-कुहू, मोरों के नृत्य।
मीठे हैं मौसम के उद्घाटित कृत्य।
सतरंगी इंद्रधनुष सौंधी है गंध
सुमनों में उपवन के सम्मोहित सत्य।

हाँ, छेड़ दो तुम
प्यार की कविता प्रिये
बरसात बीती जा रही है।

है सर्वव्यापी मदभरा वातावरण।
कौन प्यासा अब रहेगा तृप्ति के क्षण?
आकाश में भी मन रहे उत्सव अजब
बादल उठाते चांदनी का आवरण।

अब खोल दोतुम
बूंद की कारा प्रिये
बरसात बीती जा रही है।

बरसाती मौसम

बहुत अकेलापन अब हृदय कचोटने लगा।
तिस पर ये बरसाती मौसम सालने लगा।

हर क्षण, हर पल मीलों-सा लम्बा है
दूर दूर तक छोर नहीं दिखता है।
अभिलाषाओं के बादल प्यासे हैं
मन को मन का मीत कहीं छलता है।
फूलों का शीशमहल आनन ढालने लगा।
तिस पर ये बरसाती मौसम सालने लगा।

कभी कभी किस्से भी सच लगते हैं
और कभी तो साये भी जगते हैं।
भोर नहीं हो पाती उससे पहिले
रोम रोम में कांटे से उगते हैं।
सपनों का कोलाहल जंगल पालने लगा
तिस पर ये बरसाती मौसम सालने लगा।

सुधियों के पंछी को उड़ा दिया है
नयनों का खारापन गला दिया है।
माटी में मिलना माटी का कंचन
इसीलिए आंगन को लिपा दिया है।
शबनम का उजलापन संयम टालने लगा।
तिस पर ये बरसाती मौसम सालने लगा।

सावन की रातें 

बूंदों की टप-टप धड़कनें बढ़ातीं
सांवली प्रिया की याद ये दिलातीं।

एकाकी कमरा स्वयं से लजाये
ऐसे में कोई गीत गुनगुनाये।
गीतों में विरही वेदना छिपी हो
संभव है स्वप्निल रूप मुस्कराये।
मौसम की लहरें धड़कनें बढ़ातीं।
सांवली प्रिया की याद ये दिलातीं।

बरस रहे रिमझिम बादल जो छाये
बोझिल अधरों पर दर्द उभर आये।
दर्दों की वंशी गाने लगी व्यथा
संभव है कोई मन को दुलराये।
सांसों को देकर प्यार की थपकियाँ
सांवली प्रिया की याद ये दिलातीं।

बूँद बूँद पीड़ा छहरी है 

मेरे अल्हड़ जज्बातों को,
मत छेड़ो, मत छेड़ो,
वरना, एक लहर आयेगी,
एक लहर जायेगी।

मैंने कितनी बार कहा है, जाने कितना दर्द सहा है।
मौन तुम्हारे नयन रहे हैं, कोई कभी न अश्रु बहा है॥
मेरे प्यासे अरमानों को,
मत छेड़ों, मत छेड़ो,
वरना, एक लहर आयेगी,
एक लहर जायेगी॥

मेरी प्यास बहुत गहरी है, अधरों तक आकर ठहरी है।
मुस्कानों के घन गहराये, बूंद-बूंद पीड़ा छहरी है॥
मेरे व्याकुल मन सपनों को,
मत छेड़ो, मत छेड़ो,
वरना, एक लहर आयेगी,
एक लहर जायेगी।

प्यार यही होता है बोलो, रूप जला जाता है बोलो।
बिखरे हुए कुन्तलों बोलो, दूर खड़े हमराही बोलो॥
मेरे गीतज मनुहारों को,
मत छेड़ो, मत छेड़ो,
वरना, एक लहर आयेगी,
एक लहर जायेगी।

आज कितना गर्म मौसम

आज कितना गर्म मौसम!
जल रहा है फूल का तन
और आंचित हो रहा मन!

सांस व्याकुल हो रही क्यों?
आस धीरज खो रही क्यों?
नीड़ में हलचल अजब है
आंख रस कण बो रही क्यों?
मीत कब आकार होंगे?
स्वप्न कब साकार होंगे?
ढेर सारे ऊगते प्रश्न
और शंकित हो रहा मन!
आज कितना गर्म मौसम!

आग धधकी है गगन में
धूल उड़ती है पवन में
प्यास धरती की बढ़ी है
राखजमती है हवन में।
गुम गया गौरव अकिंचन
प्राण किसको दे समर्पण?
हैं अपशकुन ही अपशकुन
और शापित हो रहा मन!
आज कितना गर्म मौसम!

मौन कहते हैं कथाएँ
कौन समझे ये व्यथाएँ?
शब्द ही जब साथ छोड़े
काव्य कैसे हों ऋचाएँ।
गीत धारा मोड़ना है
धार से तट जोड़ना है
सर्जना है व्याकरण प्रण
और कंपित हो रहा मन!
आज कितना गर्म मौसम!

कुलबुलाती भावनाएँ
कसमसाती कामनाएँ
गुनगुनाने के लिए ही
कुनमुनाती कल्पनाएँ।
विश्वास की अपनी डगर
हैं आस्थाएँ भी अमर
व्याप्त कण-कण में प्रकम्पन
और प्रेरित हो रहा मन!
आज कितना गर्म मौसम!

कैसे दर्द सहेगी शबनम

मादक मौसम के सिराहने,
मचले हों मीठे उलाहने
कैसे मौन रहेगी सरगम?
गाएगी वह गीत प्यार के, वासन्ती मनुहार के!

जब, जागी हुई जवानी हो,
नयनों में नयी कहानी हो,
सांसों में मल्हार छिपेहों,
मौजों में जगी रवानी हो,
खिलखिलाकर खिले गुलमुहरी,
गुदगुदाने लगे हवा अरी!
कैसे विरह सहेगी प्रीतम?
गाएगी वह गीत प्यार के, वासन्ती मनुहार के!

मेजबान हो अगर अंधेरा,
मेहमान हो जाए उजेरा,
प्रकृति प्रेमिका को हर लेगा,
ताक लगाए जो कि चितेरा।
चांद सितारे मौन देखते,
संयोगों को प्रश्रय देते,
कैसे दर्द सहेगी शबनम?
गाएगी वह गीत प्यार के, वासन्ती मनुहार के!

अलस 

पावों से चढ़कर, सीने तक धूप आ गई!
तन अब तक बेसुध, अलस अपरिचित समा गई!
अंग अंग शीशमहल-सा चटक रहा
सृजन स्वर आज कंठ में अटक रहा
थपकी दे देकर बिस्तर तक हारा
मन जाने किस दुविधा में भटक रहा?
आवाज चेतना कानों को अनसुना गई.
तन अब तक बेसुध, अलस अपरिचित समा गई!
जागे अनजागे ऊग रहे सपने
कुछ तो भूले कुछ याद रहे सपने
कागज की रेखा विश्व नहीं होती
फिर भी आश्वासन बांध रहे सपने।
चमक रहे मोती, तारों में धुंध छा गई.
तन अब तक बेसुध, अलस अपरिचित समा गई!
दीर्घकाल से बंधे हुये हैं धागे
सोच सोच कर हारे हाथ अभागे
कभी धर्म, दर्द कभी अवरोध बनाएँ
जोर नहीं चलता परवशता आगे।
बहरी बस्ती में, मधु आकर खिलखिला गई.
तन अब तक बेसुध, अलस अपरिचित समा गई.
अब या तो हो जाये घना अंधेरा
या फिर किरण धरा पर डाले डेरा
लुका छिपी का खेल बुरा है सचमुच
साफ साफ हो जाये सजल सबेरा।
समय हुआ, कविता जीवन का गीत गा गई.
तन अब तक बेसुध, अलस अपरिचित समा गई.

व्यथा एक बाती की 

जीवन की यह बुझती बाती,
जलती कितना और जलाती!

बालकपन से यौवन तक,
यौवन से अंतिम क्षण तक
चलती कितना और थकाती!

वादों से परिहासों तक,
बिछुड़न से गम यादों तक
रुकती कितना और रुकाती!
आवरण से आचरण तक,
उलझन से निराकरण तक
रोती कितना और रुलाती!

इतिहासों से हासों तक,
भावों से विश्वासों तक
गिरती कितना और गिराती!
हर्षों से अवसादों तक,
दर्दों से मुस्कानों तक
जीती कितना और जिताती!

अपनी ही सीमाओं तक,
अपने ही आकारों तक
मिटती कितना और मिटाती!
जीवन की यह बुझती बाती,
जलती कितना और जलाती!

प्यार उतना ही खरा है

रातयों ही बीती जाती
यादें तुम्हारी पोसते।
अहसास करते योग का
ओ विरह क्षण को कोसते

जानता हूं-
तीर निकला जो कमां से
लौट कर आता नहीं है
बात निकली जो जुबां से
फिर कभी होती नहीं है। लेकिन-
संयोग की भाषा पढ़ी

आँखें गगन में देखतीं
ओंठ खुलकर बंद होते
कुछ बोलने की सोचते।
रात यों ही बीती जाती…!

मानता हूं-
प्यार उतरा ही खरा है
सूर्य का जितना किरण से
चन्द्रमा का चांदनी से
पूर्व का जितना अरुण से। लेकिन-
ठोकरें खाकर राह की
कदम धरती को देखते
हाथ बढ़कर लौट आते
बाहें परस्पर तौलते।
रात यों ही बीती जाती

यह प्यार है

रात सागर, प्रीति गागर से करे, मनुहार है।
प्राण होकर पर्त से गलते रहें, यह प्यार है॥

तप रही है अब धरा, गल रहा है आस्मां
वेदना से उरभरा, जल रहा है हर समां।
नीड़ सब झुलसे हुए, द्वार पर छहरे धुँए
नेह का आंचल गरम, चल रहा है कारवां।

सांवले तन याद में हिम से घुलें, बेकार है।
झील होकर प्यास से पहले रहें, यह प्यार है॥

निशि सदा ही चुप रही, टिमटिमाये दीप थे
चेतना भी जड़ रही, दिन रहे हैं ऊंघते।
आज कल बहरे हुये, आँख पर पहरे हुये
चांद का काजल तरल, पल घड़ी को पूजते।

दर्द भी हर सांस में कण से जुड़ें, धिक्कार है।
गीत होकर छंद में ढलते रहें, यह प्यार है॥

मुस्कराना थम रहा, चुप हुई है दास्तां
भावना भी मौन है, लुट गई है कामना।
देखकर गहरे कुँये, तीर पर ठहरे हुये
लाज का बादल “कमल” ओढ़ती हैं बिजलियाँ।

आदमी संसार में शव से रहें, यह हार है।
ज्योति होकर दीप में जलते रहें, यह प्यार है॥

तेरे बिन 

तेरे बिन प्रियतम,
पल भर भी
रह न सकूंगा॥

मेरे नयन स्वप्न से बोझिल
सुधियों में डूबे हैं।
अब मिलते हैं,
अब मिलते हैं
क्वांरे मनसूबे हैं।
मन से मन की किंचित दूरी,
सह न सकूंगा॥

तेरे बिन प्रियतम,
पल भर भी
रह न सकूंगा॥

यथाशक्ति
मैं बाट जोहकर
अपने घाव भरूंगा
मेरा क्या है पंछी हूँ मैं
नूतन नीड़ रचूंगा।
मेरा प्यार परम पावन है,
कह न सकूंगा॥

तेरे बिन प्रियतम,
पल भर भी
रह न सकूंगा॥

और दिवस भर

किश्तों में रात मिली
किश्तों में जागना,
और दिवस भर
आशा शूलों पर भागना।

प्राण रहे लोहू लुहान से
मोल भाव मन के दुकान से

सौदागर गीत मिले
बंजारिन भावना,
टूट टूट जाती है
जोड़ जोड़ कामना।

हाथों में ध्वज हैं अलाव से
चौराहे दिखते पड़ाव से

चेहरे यों बांट दिये
चटख गया आइना।
जीवन की अभिलाषा
लहरों पर बांचना।

याद

जीवन के घोर
निराशामय क्षण में
मुझको
तुम कर लेना याद
सारे दुख मिट जाएँगे,
सब संकट टल जाएँगे,

अंधियारों के द्वारों पर
मेरा प्यार
ज्योति जलायेगा,
शूलों वाली
राहों में
मेरा प्यार सुमन सजायेगा।

जब भी
आंखों में आंसू आ जाएँ
मुझको, तुम कर लेना याद
सारे दर्द कुम्हलाएँगे,
सब आंसू मुस्काएँगे।

जीवन के घोर
हताशामय क्षण में
मुझको, तुम कर लेना याद
सारे घन छँट जाएँगे
सब बादलटल जाएँगे।

सहारे

मेरे अधरों पर
गीत तुम्हारे हैं
सच पूछो तो
जीस्त के सहारे हैं।

जब सुधियांे के बादल लहरे
रूप तुम्हारा पल-पल छहरे
प्यासा मन सावन हरियाया
संग संग गुजरे क्षण आ ठहरे
मेरे नयनों में
अश्रु तुम्हारे हैं।
सच पूछो तो
जीस्त के सहारे हैं।

यों इठला कर केश झुलाये
नीरभरी गागर छुप जाये
फिर धीरे से दृष्टि चुराकर
मन ही मन पूनम मुस्काये
मेरे सपनों में
चित्र तुम्हारे हैं।
सच पूछो तो
जीस्त के सहारे हैं।

धुंध भरे पथ 

जब जब ऐसा ला कि मंजिल मिलने वाली है
तब तब सच मानो राह स्वयं प्रतिकूल हो गई!

जाने अनजाने क्या पाप किया है
अरे हाथ की रेखाओं ने?
इस्पाती दीवारें गला सके वह ताकत
छली रेत की बाधाओं ने।

जब जब ऐसा लगा कि कोई अपना होता है
अपना पाने की चाह स्वयं प्रतिकूल हो गई!

हमने बोये बीज सत्य के, झूठउगा है
बिछा सूर्य के घर अंधियारा है।
काव्य सुमन कुम्हलाये, रीते मधु के प्याले
पिये गरल ही अब बंजारा।

जब जब ऐसा लगा कि मन शंकर हो जायेगा
तब तब संघर्षी सांस स्वयं प्रतिकूल हो गई!

हम भी धुव्र हैं, दृढ़ प्रणधारी एकलव्य हैं
भला हार कैसे जाएँगे?
धुंध भरे पथ उत्साहों के नाम करेंगे
साहस के दीप जलाएँगे।

जब जब ऐसा लगा कि प्रीत तोड़ती सीमाएँ
नीर पी लिया नैराश्य स्वयं प्रतिकूल हो गई!

बहुत गढ़े हैं गीत आपने

बहुत सुने हैं गीत आपने नर नारी के प्यार के.
घरवा के, पुरवा के, मीठी-फागुन चली बयार के.
नहीं सुने हैं किन्तु किसी ने, दर्दीले अफ़साने
सुने बहुत हैं गीत सभी ने, हास, वीर शृंगार के.

बचपन विरह कहानी है, कांटों भरी जवानी है,
उम्र का दर्शन है कविता मिटती नहीं निशानी है।
बहुत गढ़े हैं गीत आपने सागर के, संसार के.
मछली के, मगरों के, सावन-ढली फहार के.
नहीं लिखे हैं किन्तु किसी ने पतवारी सह गाने
लिखे बहुत हैं गीत सभी ने, धीर, वीर, गंभीर के॥

ममता जिनका सपना है, ना कोई भी अपना है
श्रम का अर्जन है आंसू, लोहू इनका चुकना है।
बहुत लिखे हैं दृश्य आपने अम्बर के, आकार के.
रजनी के, तारों के, आंगन जली कतार के.
नहीं लिखे हैं किन्तु किसी ने विषधर से परवाने
लिखे बहुत हैं खेत सभी ने, गन्ना, गेहूँ, ज्वार के॥

धन दौलत तो मिली वहीं है, मुश्किल इनकी साथी है
ऋण का अर्जन है पटना, लाश, करम ही ढोती है
बहुत पढ़े हैं शब्द आपने, वाणी के, व्यापार के.
भाषण के, नारों के, झीने दामन पली खुमार के॥

गुने नहीं हैं किन्तु किसी ने, बारूदी अफसाने
गुने बहुत हैं खेल सभी ने, जीत, मीत के, हार के॥

मीत मेरे तू कहां है?

मैं अकेला बन्द कमरा, रात तन्हा, नम हवा है।
सांस चुगली खा रही है, मीत मेरे, तू कहाँ है?

अरमानपूरित लौटती है हर लहर,
तट मगर छू पाती नहीं है।
बनती सुहागिन प्यार लेकिन हर नज़र,
हर नज़र से पाती नहीं है।

गूँजता है बांसुरी से सुर मधुर, भीगी निशा है
रात रीती जा रही है, मीत मेरे तू कहाँ है?

मंदिरों की घण्टियाँ उल्लास देतीं,
मस्जिदों की आयतें उपदेश देती,
मन को सुकूं देती नहीं है।

गिरजाघरों में प्रीति-धुन जो मचलती, इक वफा है।
उम्र ढलती जा रही है, मीत मेरे तू कहाँ है?

पत्थरों की पायलें मुजरा किये हैं
मन को पवन भाती नहीं है
लाख गा लें, तुम बिना, सूने सभी सुर
गमगीं ग़ज़ल तो आती नहीं हैं

तम सबेरा, दूर सूरज, पास मौसम, कुछ नशा है।
प्यास प्यासी जा रही है, मीत मेरे तू कहाँ है?
मीत मेरे तू कहाँ है?

गाँव का गीत

यह हमारे गांव की पहचान है,
हर अधर पर मोहिनी मुस्कान है।

जो पथिक आया यहाँ पर,
रह गया होकर यहीं का,
ढूँढ़ता था प्यार कण भर,
पा गया सागर सरीखा,
देवता-सा गंध में मेहमान है।

नीतियाँ जीवित यहाँ पर,
सत्य का सूरज उगा है
हर अँधेरा डूबता है,
यह यहाँ की मान्यता है,
त्याग का ही गांव को वरदान है।

गांव ने सम्पन्नता दी,
मन दिया, वैभव दिया है,
संस्कृति दी, सभ्यता दी,
धर्म औ दर्शन दिया है,
गांव जैसा गांव का परिधान है।

गांव गोरी, गीति गुंजन,
गांव माटी, प्रीति चंदन,
गांव पूजा, रीति श्रद्धा,
गांव माता, भक्ति वंदन,
गांव को तो पूजता भगवान है।
यह हमारे गांव की पहचान है।

तेरे नग़मो को मैं गा रहा हूं 

अपने सीने को सुलगा रहा हूँ।
तेरे नग़मों को मैं गा रहा हूँ॥

चलते जाते हो तुम,
चलता जाता हूँ मैं,
दूरियाँ कम हुईं कब?
थकता जाता हूँ मैं,

अपने हाथों को मलता रहा हूँ।
तेरे नग़मों को मैं गा रहा हूँ॥

मेरी पूजा हो तुम,
तेरा अपना हूँ मैं,
तुमने पुकारा मुझे,
आता जाता हूँ मैं,

अपने सपनों को सुलझा रहा हूँ।
तेरे नग़मों को मैं गा रहा हूँ॥

मेरा जीवन हो तुम,
तेरा जीवन हूँ मैं,
शाश्वत चाहत हो तुम,
अमर समर्पण हूँ मैं,

अपने गीतों को दुहरा रहा हूँ।
तेरे नग़मों को मैं गा रहा हूँ॥

आशा

आँखों ही आँखों में हो जायें बातें
सपनों ही सपनों में खो जाये रातें
तो, सुधियों को सच्चा प्राण मिले!

यौवन तो यौवन होता है
नहीं किसी का ऋण होता है
मनमानी की यही उम्र है
यही नेह दर्पण होता है।

खेल खेल में आओ आधार बना लें
साथ साथ रहने को संसार बसा लें
तो, जीवन को मन का ग्राम मिले!

दो तट बीच नदी होती है
अपनी लाज नहीं खोती है
घाट घाट की मिट्टी ढोकर
अमृतमय गंगा होती है।

तूफानों से निर्भय हो दर्द गलायें
मझधारों में हंसकर पतवार चलायें
तो, नौका को मंजिल धाम मिले!

वीणा तो साधक होती है,
साधक का पूजन होती है
कवितामय सरगम लहराकर
तार तार गुंजन होती है।

अगर अभावों को मधु संगीत बना लें
गरल पचाकर हर क्षण को गीत बना लें
तो, छंदों को ‘आशा’ नाम मिले!

तुम ही बन जाते अगर किनारा

प्रिय काश दिया होता तुमने,
बस थोड़ा-सा मुझे सहारा,
यह बन जाती कुछ और ज़िन्दगी,
तुम ही बन जाते अगर किनारा!

तुम नारी थीं अबला, बन्धन में बँध जाने वाली नारी
इतनी जल्दी विवश बनोगी, मुझको ये आभास नहीं था
तुम रो भी सकती हो, घुट-घुट कर मर जाने वाली नारी
फिर भी अपनी जिह्वा मौन रखोगी, यह विश्वास नहीं था

प्रिय खोल दिया होता तुमने,
निज दर्दों का रुंधा पिटारा।
यह बन जाती कुछ और ज़िन्दगी,
तुम ही बन जाते अगर किनारा।

मैं ही लड़ा जमाने से, तुमसे न दी गई खड्ग मात्र भी
जिस दिन कि मिलकर इस बैरी जग ने मुझको था ललकारा,
हार गया, मन, मार गया पर तुम रहीं देखती खड़ी हुई
क्यों ना तुमने साहस कर इन भुजदंडों को आन संवारा?

प्रिय आज दिया होता तुमने,
यह बन जाती कुछ और ज़िन्दगी,
तुम ही बन जाते अगर किनारा।

नारी हो, कोमल मन हो, मैं इससे कब इंकार कर रहा
किंतु भ्रमित हो जाना, डिग जाना अपने पथ से भला नहीं,
पल भर में, विश्वास डिगाना यद्यपि नारी का काम रहा
लेकिन, प्राण, प्रणय के पथ में पीछे रह जाना भला नहीं,

प्रिय त्याग दिया होता तुमने,
दुर्बलता का क्षीण सहारा!
यह बन जाती कुछ और ज़िन्दगी,
तुम ही बन जाते अगर किनारा!

ममता-माया में रमने वाली ओ भोली भाली नारी,
जीवन का संग्राम बड़े ही दुष्करतर पथ पर होता है!
बगिया में क्या शेष रहेगा, अगर सूख जाएगी क्यारी?
खिला फूल मुस्काता है, तो मुरझाने वाला रोता है!

प्रिय रोक दिया होता तुमने,
लावारिस-सा बहा शिकारा!
यह बन जाती कुछ और जिन्दगी,
तुम ही बन जाते अगर किनारा!

गांवों के जंगल शहर बो रहे हैं 

गांवों के जंगल शहर बो रहे हैं
क्या करती हैं परिपाटियाँ इशारे?

हमारी मुट्ठियों में गगन
गगन में गलतफहमियाँ हैं।

इतिहास है हमारा ‘कमल’
तुम्हारी परछाइयाँ हैं।

रूप मदिर आँखों में लेकिन बात प्यास की है
गर्म-गर्म सांसों ने दी सौगात प्यास की है।

कानाफूसी करके हमको बेघर करवाया, वह
अब अपने ही कपड़े फाड़ रहा है, बचना लोगो।

दो चार घड़ी ठहरेंगे, मन की बातें कह देंगे।
मन के उपवन में प्रियतम, सदा ‘कमल’ ही महकेंगे।

तुम-सी कोई नदिया होगी
हम-सा कोई सागर होगा।

हर सुबह व्यापार जैसी ज़िन्दगी

हर सुबह व्यापार जैसी ज़िन्दगी
सांझ है अखबार जैसी ज़िन्दगी।

शुष्क पत्ते ही तुम्हें बतलाएँगे
टूटते कचनार जैसी ज़िन्दगी।

दर्पणों में दीखती है गुलमोहर
जबकि है तलवार जैसी ज़िन्दगी।

मान खो दे मांग भी सिन्दूर का
तब मिले कलदार जैसी ज़िन्दगी।

जी रही है प्यास के तालाब में
बांझ के शृंगार जैसी ज़िन्दगी।

लोग जीते हैं खिलौनों की तरह
खेलते संसार जैसी ज़िन्दगी।

कीच में ऊगा ‘कमल’ ईश्वर बना
पूजिये अवतार जैसी ज़िन्दगी।

भोर से साँझ तक धूप पीता कमल

भोर से सांझ तक धूप पीता कमल
रात की याद में चिलचिलाता कमल,

बात जब भी चली आपके नाम की
आँख में यार क्यों कुलबुलाता कमल,

दूर जाने लगे जान कर आप क्या
सोचिए साथ है आत्मा-सा कमल

मेघ का दर्द क्या आग थी पी गया
नीर में डूबता-तैरता-सा कमल,

आज भी पीर के गांव में नेह की
चिट्ठियाँ बांटता, बांचता-सा कमल

सांस की बांसुरी बज रही है वृथा
मीत बिन गीत भी अधमरा-सा कमल

चांदनी गुलमुहर प्यार भर दो हृदय
देखिये फिर सदा मुस्कुराता कमल

ज़िन्दगी लश्कर हुई

ज़िन्दगी लश्कर हुई,
झाबुआ-बस्तर हुई
स्वप्न आसामी हुये
आँख अमृतसर हुई,
वियतनामी ओंठ पर
प्यास छू मंतर हुई,
हौंसला इज़रायली
ज़िन्दगी बेघर हुई.
गीत नेता बन गया
गीतिका अवसर हुई.
लेखनी वाले लुटे
इन्दिरा रहबर हुई.
वे तमिल, कोलम्ब वे
चोट लंका पर हुई.
है नियम बहुमत मगर
अल्पमत रूलर हुई.
जो धरा का स्वर्ग थी
वो जमीं बंजर हुई.
वे हुए अफसर बड़े
और वह तस्कर हुई.
चाल बुन्देली अरे
डिस्को डांसर हुई.
रोशनी ही रोशनी
रोशनी नश्तर हुई.
नाम लेते ही ‘कमल’
यश कथा घर-घर हुई.

जब भी कोई ग़ज़ल कहने को हुआ मैं

जब भी कोई ग़ज़ल कहने को हुआ मैं।
तन्हाइयों के पल सहने को हुआ मैं।

दर्पण के दर्द को दुलरा दिया किसने
देखकर रूप सजल छलने को हुआ मैं।

हलचल ये कैसी हुई आपसे मिलकर
रोम रोम आजकल जलने को हुआ मैं।

जिनसे होकर आप यों ही कभी गुजरे
उन राहों का गरल पीने को हुआ मैं।

प्यार करने वाले क्या-क्या नहीं सहते
बनाके ताजमहल मिटने को हुआ मैं।

यों न जी पाएँगे मन का जीवन ‘कमल’
हो जाओ तुम तरल, गलने को हुआ मैं।

रात भर सोना नहीं, याद में खोना नहीं 

रात भर सोना नहीं, याद में खोना नहीं।
देखकर ही तृप्त हो, रूप को छूना नहीं।

खिल नहीं पाती उषा, दिख नहीं पाती प्रभा
प्रात से ही तृप्त हो, ओस को छूना नहीं।

गीत गायेगी हवा, चहचहायेगी सदा
ध्यान में ही तृप्त हो, शब्द को छूना नहीं।

प्यार संज्ञा ढूँढ़ता, मन विशेषण खोजता
तीर पर ही तृप्त हो, धार को छूना नहीं।

आपकी गूंगी कला, बन गई प्यासी कथा
दृश्य भर ही तृप्त हो, ओंठ को छूना नहीं।

क्या अजब उलटवासियां हैं

क्या अजब उलटवासियाँ हैं
रानियाँ बनीं दासियाँ हैं।

मंदिरों में अकुलाहट है।
कहवों में खामोशियाँ हैं।

यंत्रों की चीखें, ग़ज़ल हैं
रागमय गीत मर्सिया हैं।

आपका भरोसा नहीं है
आपके नाम कुर्सियाँ हैं।

मस्ज़िदें भी झगड़ने लगीं
ये सुन्नी हैं, वे शिया हैं।

कुनबापरस्ती है कि ग़जब
हम कायस्थ, कुदेशिया हैं।

अफ़साना बदल गया तुम नहीं बदले 

अफ़साना बदल गया तुम नहीं बदले।
कि जमाना बदल गया तुम नहीं बदले।

नज़रों से झरने लगे सावनी दिवस
मयखाना मचल गया तुम नहीं बदले।

मेरे सामने है पानी का पहाड़
नज़राना दहल गया तुम नहीं बदले।

मैंने कहा मुहब्बत कीजिये ज़रा
मुस्काना पिघल गया, तुम नहीं बदले।

हो गये यत्न सारे निष्काम जैसे
अनजाना बहल गया, तुम नहीं बदले।

बेगुनाह था मैं, बेगुनाह हूँ मैं
गिड़गिड़ाना विफल गया, तुम नहीं बदले।

छोड़ यादों के दरख़्त जाऊंगा अगर
दीवाना ‘कमल’ गया, तुम नहीं बदले।

यह हमारा घर, वह तुम्हारा घर

यह हमारा घर, वह तुम्हारा घर।
इस तरह बांटा गया सारा शहर।

नित नये उपचार, खोजें भी नयी
चढ़ गया बीमार को आपात् ज्वर।

कुर्सियों ने भूख को बंदी किया
प्यास को किसने दिया मीठा जहर?

क्यों भला मजबूर इतना हर नगर
मत नहीं, अभिमत नहीं देते अधर?

आ गया मनमानियों का दौर अब
जल रहा है कायदा आठों पहर।

वह हमारे देवता का ग्रंथ है
खा रही हैं दीमकें जिसका कव्हर।

आ गया है वक्त में तूफान सा
डोलती-सी दीखती हैं हर उमर।

अब नया इतिहास लिखना चाहिये
साहसी सूरज लिये मन की लहर।

छोड़ देंगी चिमनियाँ भी चीखना
खेत की सौंधी हवा पी लें अगर।

आपने खत में लिखा है, हाँ वही हमने पढ़ा है 

आपने खत में लिखा है, हाँ वही हमने पढ़ा है।
मुश्किलों की ज़िन्दगी में, प्यार का मंदिर मढ़ा है।

लोग तो अपनी कहेंगे, लोग तो अपनी सुनेंगे।
आपने मेरी कथाएँ और मैंने ‘तुम’ पढ़ा है।

आ गया फिर याद मौसम, गंधवाही रूप-चन्दन
आज भी पूजा यथावत, प्रश्न तो परशाद का है।

यह जमाना हँस न पाया और आँसू पी न पाया
दर्द पीकर हम हँसे, गो, आदमी ग़म से बड़ा है।

क्या कहें कैसे हुए हैं, लोग देखो आजकल

क्या कहें कैसे हुए हैं, लोग देखो आजकल।
हर जगह बिखरे हुए हैं, लोग देखो आजकल।

पराए तो पराए हैं, गैर अपने भी हुए
इस कदर बिफरे हुएहैं, लोग देखो आजकल।

वक्त की पाबन्दियाँ क्यों रास आएँगी उन्हें
हर समय ठहरे हुए हैं, लोग देखो आजकल।

झील, नदियाँ और सागर डूब तो जाएँ मगर
रेत से लहरे हुए हैं, लोग देखो आजकल।

चीखती हैं साँस लेकिन दंश देकर छिप गये
सर्प हैं, बहरे हुए हैं, लोग देखो आजकल।

यौवना के रूप पर नज़रें गड़ाते सब यहाँ
उम्र पर उतरे हुए हैं, लोग देखो आजकल

भूख, प्यास है, नंगे बदन, रहनुमा भी बदचलन 

भूख, प्यास है, नंगे बदन, रहनुमा भी बदचलन
और फिर भी चुप रहे अख़बार खानाब्दोशियों के.

कह रहे हैं लोग, इस कान में कुछ उस कान में कुछ
हाय! बनते मीना-ए-बाज़ार कानाफूसियों के.

धर्म, नीतियों के राज लद गये वे दिन सही
आजकल तो गर्म हैं व्यापार सत्ताधीशियों के.

वायदों की रोटियाँ सिक जाएँगीं, इस आस में
बेशरम से देखते हर बार ‘किस्से कुर्सियों के’।

सावधानी स्वाभिमान के ही वास्ते हो ‘कमल’
बढ़ रहे हैं दायरे खूँखार-से परदेशियों के.

एक ओर है बाढ़ दूसरी ओर मरुस्थल 

एक ओर है बाढ़ दूसरी ओर मरुस्थल।
भारत की धरती पर अक्सर मिलता मृगजल।

विश्वशान्ति की बात, घात घर में ही होती
नंगे-भूखे रह कर भी भेद रहे बादल।

दोष कौन दे? क्यों? किसे? स्वयं प्यास संत्रास
प्यास-पहेली पनपाती हैं भ्रम-छल प्रति पल।

स्वतंत्रता मिली, ठीक है, लेकिन, बतलाओ
कहाँ गया मित्रवर तुम्हारी आँख का काजल?

उर्वरा धरा, लोग परिश्रमी और विद्वान
फिर भी अपना राष्ट्र क्यों अविकसित रहा कमल?

लोग हैं अब राह में, सर्प के मानिन्द

लोग हैं अब राह में, सर्प के मानिन्द।
लोग बिल्कुल हो गये, सर्प के मानिन्द।

दिन दहाड़े देवता, रात आदमखोर
लोग चेहरे ओढ़ते, सर्प के मानिन्द।

पगडण्डियाँ पहिचान खोने को विवश
लोग गड्ढों में छिपे, सर्प के मानिन्द।

आस्थाएँ रेत जैसी डूबने लगीं
लोग ऊपर तैरते, सर्प के मानिन्द।

कारखानी सभ्यता का क़ायदा यही
लोग चन्दन छोड़ते सर्प के मानिन्द।

आस्तीनें प्यार कर नहीं पातीं ‘कमल’
लोग जंगल में मिले, सर्प के मानिन्द।

अपना ऐसा शहर दोस्तो

अपना ऐसा शहर दोस्तो।
आतंक आठ पहर दोस्तो।

हंसने रोने की छूट नहीं
गुमसुम रहना कहर दोस्तो,

वक्त की नब्ज टटोलिएगा
है शैतानी असर दोस्तो।

भाले, बरछी, तोप क्या करेंगे?
यह तन, यह मन, जहर दोस्तो,

मतला-ए-ग़ज़ल बनकर दिखा
मिल जायेगी बहर दोस्तो।

तू दिखा दे आज मुझको रूप अपना खोलकर

तू दिखा दे आज मुझको रूप अपना खोलकर।
और ले सर्वस्व मेरा दो मिनिट हंस बोलकर।

फिर घटा न श्याम होगी खिलखिलाएगा न मौसम
गीत दे-दे धड़कनों में, सांस अपनी घोलकर।

सूर्य को यह पता है जल रही है चांदनी
है गगन भी तप रहा बरसात तू अनमोल कर।

छोड़कर मन का किनारा चुगलियाँ खाएँ लहर
तू न देना कान सागर प्यार के वश डोलकर।

फूल कांटों में उलझ कर रह गये वरना कभी
फूल ही वरदान होते गन्ध के भूगोल पर।

काँपतीं अभिव्यक्तियाँ, लेखनी भयभीत है क्यों?
क्यों हुई सरकार बंधक वोट के भूगोल पर?

क्या करें स्वावलम्बन के लिए?

क्या करें स्वावलम्बन के लिए? चरखा चलाइये।
क्या करें सद्आचरण के लिए? चरखा चलाइये।

नियम विरोधी मानसिकता और मन में दासता
क्या करें मन जागरण के लिए? चरखा चलाइये।

आदमी बौना हो गया, समस्याएँ सुरसा-सी
क्या करें हम नियंत्रण के लिए? चरखा चलाइये।

पोथियों के पृष्ठ रीते जैसे जीवन आजकल
क्या करें आत्म-चिंतन के लिए? चरखा चलाइये।

हिन्दू, हिन्दी, हिन्दुस्तान और हक के वास्ते
क्या करें हर बांकपन के लिए? चरखा चलाइये।

वर्ण कृपण, ओछे शब्द, अनुभूतियाँ हैं खोखली
क्या करें नव-व्याकरण के लिए? चरखा चलाइये।

शांति होगी इस धरा पर या कि अराजकता ‘कमल’
क्या करें मत-आकलन के लिए? चरखा चलाइये।

आज से कल बेहतर होगा

आज से कल बेहतर होगा।
अपना कोई आखिर होगा।

धरती पर जन्मे और मरे
ऐसा घर और किधर होगा।

कांटों के पथ पर चल लेंगे
यदि आगे फूल नगर होगा।

तुमसी कोई नदिया होगी
हम-सा कोई सागर होगा।

दर्पण में कचनार खिलेंगे
आँखों में गुलमोहर होगा।

कह लेंगे जब एक ग़ज़ल हम
एक कमल भी अक्षर होगा।

कौन किसका जानता है हाल शिव शिव 

कौन किसका जानता है हाल शिव शिव।
है दिलों में आज तो भूचाल शिव शिव।

मत उठाना रास्ते का माल शिव शिव।
कह रहा है पुलिसिये का लाल शिव शिव।

हो गया बहती नदी कैलाश पर्वत शिव शिव।
और धरा पर ऊगता पाताल शिव शिव।

नाज पानी के जिसे लाले रहे थे
बन गया मजलूम मालामाल शिव शिव।

इस कदर सुइयाँ चुभोई हैं सभी ने
बोलते हैं हर तरफ घड़ियाल शिव शिव।

खानदानी शासकों के राज-रथ में
अब कहाँ नारद रहे वाचाल शिव शिव

पंक पीड़ा से भरा है यह सही है।
किन्तु बजते हैं ‘कमल’ के गाल शिव शिव।

मक़्तानामा

लो जले अंगार अधरों पर कमल।
हो गये शृंगार ग़ज़लों पर कमल।

आपकी अनुभूतियों के गांव में
नाचते झंकार गीतों पर कमल।

लोग तो कहते रहे सुख से जियो
पर चले दुश्वार राहों पर कमल।

जब चले निज पांव पर ही तो चले
कब चले दो चार कांधों पर कमल।

है कहाँ रस प्यास वालों के लिए
कब मिले पतवार धारों पर कमल।

कुममुनातीं आस्थाएँ दोस्तो
टूटते घर-द्वार सिक्कों पर कमल।

वेदना-प्रासाद में कैदी हुए
रूप के आकार आँखों पर कमल।

अब अंधेरे ज्योति के अग्रज बने
घूमते परकार-चांदों पर कमल।

यहाँ तो कुण्डली मारे लोग बैठे हैं

यहाँ तो कुण्डली मारे लोग बैठे हैं।
जाने किस डर के मारे लोग बैठे हैं।

चौपाल का अलाव भी अब तक नहीं जला
हुआ क्या है? मौन सारे लोग बैठे हैं।

कोई तो पहल करे कि सन्नाटा टूटे
शायद यही सोच सारे लोग बैठे हैं।

हमने कहा ‘सूरज उगा, तुम भी तो जगो’
किन्तु! अनमने मन-मारे लोग बैठे हैं।

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