कमल जीत चौधरी की रचनाएँ

नमक में आटा

हमने
कम समय में
बहुत बातें की
बहुत बातों में
कम समय लिया

कम समय में
लम्बी यात्राएँ की
लम्बी यात्राओं में
कम समय लिया

कम समय में
बहुत समय लिया
बहुत समय में
कम समय लिया

इस तरह हम
कम में ज़्यादा
ज़्यादा में कम होते गए
हमें होना था
आटे में नमक
मगर हम नमक में आटा होते गए !

15 अगस्त 1947

तुम बरत रहे हो रोज़
जनसमूह पर
13 अप्रैल 1919

मैं पड़ोसियों का
मुँह देखे बगैर
23 मार्च 1931
हो जाने के लिए तैयार हूँ

आएगा
ज़रूर आएगा
15 अगस्त 1947
भी आएगा

आएगा
और अब की कभी न जाएगा

जनता जाने नहीं देगी

कवि के लिए

तुम्हारे पैर भूत की तरह
पीछे उलटे मोड़ दिए जाते हैं
तुम चुप रहते हो

तुम्हारा चेहरा पीठ की तरफ दरेर दिया जाता है
तुम चुप रहते हो

तुम्हारे शब्दों को नपुंसकता के इँजेक्शन लगा कर
अर्थ तक पहुँचने दिया जाता है
तुम चुप रहते हो

तुम्हारी ऑंखें और कान छीन लिए जाते हैं
तुम चुप रहते हो

तुम्हारे दाँतों की मेहनत के अखरोट
दूसरा खा जाता है
तुम चुप रहते हो

तुम्हारी कविता सुनकर
मुख्य अतिथि का कुर्ता झक सफ़ेद हो जाता है
तुम चुप रहते हो

जब एक मीटर आसमान को तरसती
एक धरती के यौनाँगों में
पूरी दिल्ली नमक उड़ेल रही थी
उस रात भी तुम चुप ही थे

तुम इससे भी बुरी रातों में चुप रहते हो

ज़रा, थोड़ा सा ज़्यादा नमक डल गया है तुम्हारी सब्ज़ी में
आज फिर तुमने आसमान सिर पर उठा लिया है

दाँत और ब्लेड

 

दाँत सिर्फ़
शेर और भेड़िए के ही
नहीं होते

चूहे और गिलहरी
के भी होते हैं

ब्लेड सिर्फ़
तुम्हारे पास ही
नहीं हैं

मिस्त्री और
नाई के पास भी हैं



तुम्हारे रक्त सने
दाँतों को देख
मैंने नमक खाना
छोड़ दिया है

मैं दाँतों का मुक़ाबला
दाँतों से करूँगा

तुम्हारे हाथों में
ब्लेड देख
मेरे ख़ून का लोहा
खुरदरापन छोड़ चुका

मैं धार का मुक़ाबला
धार से करूँगा



बोलो तो सही
तुम्हारी दहाड़ ममिया जाएगी

मैं दाँत के साथ
दाँत बनकर
तुम्हारे मुँह में निकल चुका हूँ

डालो तो सही
अपनी जेब में हाथ
मैं अन्दर बैठा
ब्लेड बन चुका हूँ

साहित्यिक दोस्त

मेरे दोस्त अपनी
उपस्थिति दर्ज करवाना चाहते हैं
वे गले में काठ की घण्टियाँ बान्धते हैं
उन्हें आर-पार देखने की आदत है
वे शीशे के घरों में रहते हैं

पत्थरों से डरते हैं
काँच की लड़कियों से प्रेम करते हैं
बम पर बैठ कर
वे फूल पर कविताएँ लिखते हैं
काव्य गोष्ठिओं में खूब हँसते हैं
शराबख़ानों में गम्भीर हो जाते हैं

यह भी उनकी कला है
अपनी मोम की जेबों में
वे आग रखते हैं

एम० एफ़० हुसैन के लिए

मेरे ईश्वर के पाँव में
चप्पल नहीं है
सिर पर मुकुट नहीं है

वह सिर से लेकर पाँव तक
शहर से लेकर गाँव तक नँगा है
पल-प्रतिपल खूँखार जानवर द्वारा
बलात्कृत है

सोने की खिड़कियों के परदे
उसे ढकने का बहुत प्रयास करते हैं
पर शराबी कविताएँ
उफनती सरिताएँ
किलों को ढहाती
ख़ून से लथपथ मेरे ईश्वर को
सामने ला देती हैं

उसे देखकर
कोई झण्डा
नीचा नहीं होता

मेरे ईश्वर को नँगा बलात्कृत
बनाने वाले
मेरे देश के ईश्वर को
कोई कठघरा नहीं घेरता …

उधर जब पाँच सितारा होटल में
सभ्य पोशाक वाली दूसरे की पत्नी
तथाकथित ईश्वर की बाँहों में गाती है
इधर सड़क पर नग्नता
रेप ऑफ गॉड से लेकर सलत वाक तक
गौण मौलिकता दर्शाती है

नग्न होने पर
सच निगला नहीं जा सकता —
वह तो और भी पैना हो जाता है

तीन आदमी

एक आदमी
गाँव में है

उसमें शहर है

एक आदमी
शहर में है

उसमें गाँव है

एक आदमी
दिल्ली में है

उसमें दिल्ली है

एक सपना 

वहाँ
सब ज़ोर-ज़ोर से कह रहे थे —

औरत
ख़ाली स्लेट होती है
उस पर बहुत कुछ
लिखा-मिटाया जा सकता है

औरत ने चुपचाप
अपनी स्याही उठाई
और
चल दी

आगे मेरी नींद खुल गई

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