कलीम आजिज़ की रचनाएँ

दिन एक सितम, एक सितम रात करो हो 

दिन एक सितम, एक सितम रात करो हो ।
वो दोस्त हो, दुश्मन को भी जो मात करो हो ।।

मेरे ही लहू पर गुज़र औकात करो हो,
मुझसे ही अमीरों की तरह बात करो हो ।

हम ख़ाकनशीं तुम सुखन आरा ए सरे बाम,
पास आके मिलो दूर से क्या बात करो हो ।

हमको जो मिला है वो तुम्हीं से तो मिला है,
हम और भुला दें तुम्हें? क्या बात करो हो ।

दामन पे कोई छींट न खंजर पे कोई दाग,
तुम क़त्ल करो हो कि करामात करो हो ।

यूं तो कभी मुँह फेर के देखो भी नहीं हो,
जब वक्त पड़े है तो मुदारात करो हो ।

बकने भी दो आजिज़ को जो बोले है बके है,
दीवाना है, दीवाने से क्या बात करो हो ।

शे’र-ओ-सुखन

1.
वह शेर था जिसे कभी लाल किले के मुशायरे में आजिज़ साहब के मुँह से सुनकर इन्दिरा गांधी बिदक गई थीं!

दिन एक सितम एक सितम रात करो हो,
क्या दोस्त हो दुश्मन को भी तुम मात करो हो।
दामन पे कोई छींट, न खंजर पे कोई दाग़,
तुम क़त्ल करो हो, के करामात करो हो।

2.
सुलगना और शै है जल के मर जाने से क्या होगा
जो हमसे हो रहा है काम परवाने से क्या होगा।

3.
बहुत दुश्वार समझाना है ग़म का समझ लेने में दुश्वारी नहीं है।
वो आएं क़त्ल को जिस रोज़ चाहें यहाँ किस रोज़ तैयारी नहीं है।

4.
मरकर भी दिखा देंगे तेरे चाहनेवाले
मरना कोई जीने से बड़ा काम नही है।

5.
मज़हब कोई लौटा ले और उसकी जगह दे दे
तहज़ीब सलीक़े की इन्सान क़रीने के।

6.
ये पुकार सारे चमन में थी, वो सेहर-हुई, वो सेहर हुई
मेरे आशियाँ से धुआँ उठा तो मुझे भी इसकी ख़बर हुई।

आश्ना गम से मिला राहत से बे-गाना मिला 

आश्ना गम से मिला राहत से बे-गाना मिला
दिल भी हम को खूबी-ए-किस्मत से दीवाना मिला

बुलबुल-ओ-गुल शम्मा ओ परवाना को हम पर रश्क है
दर्द जो हम को मिला सब से जुदा-गाना मिला

हम ने साकी को भी देखा पीर-ए-मैखाना को भी
कोई भी इन में न राज़-आगाह-ए-मै-ख़ाना मिला

सब ने दामन चाक रक्खा है ब-कद्र-ए-एहतियाज
हम को दीवानों में भी कोई न दीवाना मिला

हम तौ खैर आशुफ्ता-सामाँ हैं हमारा क्या सवाल
वो तो सँवरें जिन को आईना मिला शाना मिला

क्या कयामत है के ऐ ‘आजिज़’ हमें इस दौर में
तबा शाहाना मिली मंसब फकीराना मिला

बुलाते क्यूँ हो ‘आजिज़ को बुलाना क्या मज़ा दे है

बुलाते क्यूँ हो ‘आजिज़ को बुलाना क्या मज़ा दे है
ग़ज़ल कम-बख़्त कुछ ऐसी पढ़े है दिल हिला दे है

मोहब्बत क्या बला है चैन लेना ही भुला दे है
ज़रा भी आँख झपके है तो बे-ताबी जगा दे है

तेरे हाथों की सुर्खी ख़ुद सुबूत इस बात का दे है
के जो कह दे है दिवाना वो कर के भी दिखा दे है

गज़ब की फित्ना-साज़ी आए है उस आफत-ए-जाँ को
शरारत खुद करे है और हमें तोहमत लगा दे है

मेरी बर्बादियों का डाल कर इल्ज़ाम दुनिया पर
वो ज़ालिम अपने मुँह पर हाथ रख कर मुस्कुरा दे है

अब इंसानों की बस्ती का ये आलम है के मत पूछो
लगे है आग इक घर में तो हम-साया हवा दे है

कलेजा थाम कर सुनते हैं लेकिन सुन ही लेते हैं
मेरे यारों को मेरे गम की तल्ख़ी भी मजा दे है

धड़कता जाता है दिल मुस्कुराने वालों का

धड़कता जाता है दिल मुस्कुराने वालों का
उठा नहीं है अभी ऐतबार नालों का

ये मुख़्तसर सी है रूदाद-ए-सुब्ह-ए-मैं-ख़ाना
ज़मीं पे ढेर था टूटे हुए पियालों का

ये खौफ है के सबा लड़खड़ा के गिर ने पड़े
पयाम ले के चली है शिकस्ता-हालों का

न आएँ अहल-ए-खिरद वादी-ए-जुनूँ की तरफ
यहाँ गुज़र नहीं दामन बचाने वालों का

लिपट लिपट के गले मिल रहे थे खंज़र से
बड़े गज़ब का कलेजा था मरने वालों का

हकीकतों का जलाल देंगे सदाकतों का जमाल देंगे 

हकीकतों का जलाल देंगे सदाकतों का जमाल देंगे
तुझे भी हम ऐ गम-ए-ज़माना गज़ल के साँचे में ढाल देंगे

तपिश पतंगों को बख़्श देंगे लहू चरागों में ढाल देंगे
हम उन की महफिल में रग गए हैं तो उन की महफिल सँभाल देंगे

न बंदा-ए-अक्ल-ओ-होश देंगे न अहल-ए-फिक्र-ओ खयाल देंगे
तुम्हारी जुल्फों को जो दराज़ी तुम्हारे आशुफ्ता-हाल देंगे

ये अक्ल वाले इसी तरह से हमें फरेब-ए-कमाल देंगे
जुनूँ के दामन से फूल चुन कर खिरद के दामन में डाल देंगे

हमारी आशुफ्तगी सलामत सुलझ ही जाएगी जुल्फ-ए-दौराँ
जो पेच-ओ-खम रह गया है बाकी वो पेच-ओ-खम निकाल देंगे

जनाब-ए-शेख अपनी फिक्र कीजे के अब ये फरमान-ए-बरहमन है
बुतों को सज़दा नहीं करोगे तो बुत-कदे से निकाल देंगे

हर चोट पे पूछे है बता याद रहेगी

हर चोट पे पूछे है बता याद रहेगी
हम को ये ज़माने की अदा याद रहेगी

दिन रात के आँसू सहर ओ शाम की आहें
इस बाग की ये आब ओ हवा याद रहेगी

किस धूम से बढ़ती हुई पहुँची है कहाँ तक
दुनिया को तेरी जुल्फ-ए-रसा याद रहेगी

करते रहेंगे तुम से मोहब्बत भी वफा भी
गो तुम को मोहब्बत न वफा याद रहेगी

किस बात का तू कौल ओ कसम ले है बरहमन
हर बात बुतों की ब-ख़ुदा याद रहेगी

चलतें गए हम फूल को बनाते गए छाले
सहरा को मेरी लग्ज़िश-ए-पा याद रहेगी

जिस बज़्म में तुम जाओगे उस बज़्म को ‘अज़िज’
ये गुफ्तुगू-ए-बे-सर-ओ-पा याद रहेगी

इम्तिहान-ए-शौक में साबित-कदम होना नहीं 

इम्तिहान-ए-शौक में साबित-कदम होना नहीं
इश्क जब तक वाकिफ-ए-आदाम-ए-गम होता नहीं

उन की खातिर से कभी हम मुस्कुरा उट्ठे तो क्या
मुस्कुरा लेने से दिल दर्द का दर्द कम होता नहीं

जो सितम हम पर है उस की नौइयत कुछ और है
वरना किस पर आज दुनिया में सितम होता नहीं

तुम जहाँ हो बज़्म भी है शम्मा भी परवाना भी
हम जहाँ होते हैं ये सामाँ बहम होता नहीं

रात भर होती है क्या क्या अंजुमन-आराइयाँ
शम्मा का कोई शरीक-ए-सुब्ह-ए-गम होता नहीं

माँगता है हम से साकी कतरे कतरे का हिसाब
गैर से कोई हिसाब-ए-बेश-ओ-कम होता नहीं

इस नाज़ इस अँदाज से तुम हाए चलो हो 

इस नाज़ इस अन्दाज से तुम हाए चलो हो ।
रोज़ एक ग़ज़ल हम से कहलवाए चलो हो ।।

रखना है कहीं पाँव तो रक्खो हो कहीं पाँव,
चलना ज़रा आया है तो इतराए चलो हो ।

दीवाना-ए-गुल क़ैदी-ए-ज़ंजीर हैं और तुम
क्या ठाट से गुलशन की हवा खाए चलो हो ।

जुल्फों की तो फितरत ही है लेकिन मेरे प्यारे
जुल्फों से ज़ियादा तुम्हों बल खाए चलो हो ।

मय में कोई ख़ामी है न सागर में कोई खोट
पीना नहीं आए है तो छलकाए चलो हो ।

हम कुछ नहीं कहते हैं कोई कुछ नहीं कहता
तुम क्या हो तुम्हीं सब से कहलवाए चलो हो ।

वो शोख़ सितम-गर तो सितम ढाए चले है
तुम हो के ‘कलीम’ अपनी गज़ल गाए चलो हो ।

मेरे ही लहू पर गुज़र औकात करो हो 

मेरे ही लहू पर गुज़र औकात करो हो
मुझ से ही अमीरों की तरह बात करो हो

दिन एक सितम एक सितम रात करो हो
वो दोस्त हो दुश्मन को भी तुम मात करो हो

हम ख़ाक-नशीं तुम सुख़न-आरा-ए-सर-ए-बाम
पास आ के मिलो दूर से क्या बात करो हो

हम को जो मिला है वो तुम्हीं से तो मिला है,
हम और भुला दें तुम्हें क्या बात करो हो

यूँ तो कभी मुँह फेर के देखो भी नहीं हो
जब वक्त पड़े है तो मदारत करो हो

दामन पे कोई छींट न खंज़र पे कोई दाग
तुम कत्ल करो हो के करामात करो हो

बकने भी दो ‘आजिज़’ को जो बोले है बके है
दीवाना है दीवाने से क्या बात करो हो

मुँह फकीरों से न फेरा चाहिए 

मुँह फकीरों से न फेरा चाहिए
ये तो पूछा चाहिए क्या चाहिए

चाह का मेयार ऊँचा चाहिए
जो न चाहें उन को चाह चाहिए

कौन चाहे है किसी को बे-गरज
चाहने वालों से भागा चाहिए

हम तो कुछ चाहें हैं तुम चाहो हो कुछ
वक्त क्या चाहे है देखा चाहिए

चाहते हैं तेरे ही दामन की खैर
हम हैं दीवाने हमें क्या चाहिए

बे-रूखी भी नाज़ भी अंदाज भी
चाहिए लेकिन न इतना चाहिए

हम जो कहना चाहते हैं क्या कहें
आप कह लीजिए जो कहना चाहिए

बात चाहे बे-सलीका हो ‘कलीम’
बात कहने का सलीका चाहिए

नज़र को आइना दिल को तेरा शाना बना देंगे

नज़र को आइना दिल को तेरा शाना बना देंगे
तुझे हम क्या से क्या ऐ जुल्फ-ए-जनाना बना देंगे

हमीं अच्छा है बन जाएँ सरापा सर-गुजिश्त अपनी
नहीं तो लोग जो चाहेंगे अफसाना बना देंगे

उम्मीद ऐसी न थी महफिल के अर्बाब-ए-बसीरत से
गुनाह-ए-शम्मा को भी जुर्म-ए-परवाना बना देंगे

हमें तो फिक्र दिल-साज़ी की है दिल है तो दुनिया है
सनम पहले बना दें फिर सनम-खाना बना देंगे

न इतना छेड़ कर ऐ वक्त दीवाना बना हम को
हुए दीवाने हम तो सब को दीवाना बना देंगे

न जाने कितने दिल बन जाएँगे इक दिल के टुकड़े से
वो तोड़ें आईना हम आईना-खाना बना देंगे

काएम है सुरूर-ए-मै-ए-गुलफाम हमारा 

काएम है सुरूर-ए-मै-ए-गुलफाम हमारा
क्या गम है अगर टूट गया जाम हमारा

इतना भी किसी दोस्त का दुश्मन न हो कोई
तकलीफ है उन के लिए आराम हमारा

फूलों से मोहब्बत है तकाज़ा-ए-तबीअत
काँटों से उलझना तो नहीं काम हमारा

भूले से कोई नाम वफा का नहीं लेता
दुनिया को अभी याद है अंजाम हमारा

गैर आ के बने हैं सबब-ए-रौनक-ए-महफिल
अब आप की महफिल में है क्या काम हमारा

मौसम के बदलते ही बदल जाती हैं आँखें
यारान-ए-चमन भूल गए नाम हमारा

ये आँसू बे-सबब जारी नहीं है 

ये आँसू बे-सबब जारी नहीं है
मुझे रोने की बीमारी नहीं है

न पूछो ज़ख्म-हा-ए-दिल का आलम
चमन में ऐसी गुल-कारी नहीं है

बहुत दुश्वार समझाना है गम का
समझ लेने में दुश्वारी नहीं है

गज़ल ही गुनगुनाने दो मुझ को
मिज़ाज-ए-तल्ख-गुफ्तारी नहीं है

चमन में क्यूँ चलूँ काँटों से बच कर
ये आईन-ए-वफादारी नहीं है

वो आएँ कत्ल को जिस रोज चाहें
यहाँ किस रोज़ तैयारी नहीं है

ये दीवाने कभी पांबदियों का गम नहीं लेंगे

ये दीवाने कभी पांबदियों का गम नहीं लेंगे
गिरेबाँ चाक जब तक कर न लेंगे दम नहीं लेंगे

लहू देंगे तो लेंगे प्यार मोती हम नहीं लेंगे
हमें फूलों के बदले फूल दो शबनम नहीं लेंगे

ये गम किस ने दिया है पूछ मत ऐ हम-नशीं हम से
ज़माना ले रहा है नाम उस का हम नहीं लेंगे

मोहब्बत करने वाले भी अजब ख़ुद्दार होते है।
जिगर पर ज़ख़्म लेंगे ज़ख़्म पर मरहम नहीं लेंगे

ग़म-ए-दिल ही के मारों का ग़म-ए-अय्याम भी दे दो
ग़म इतना लेने वाले क्या अब इतना ग़म नहीं लेंगे

सँवारे जा रहे हैं हम उलझती जाती हैं जुल्फें
तुम अपने ज़िम्मे लो अब ये बखेड़ा हम नहीं लेंगे

शिकायत उन से करना गो मुसीबत मोल लेना है
मगर ‘आजिज़’ ग़जल हम बे-सुनाए दम नहीं लेंगे

दिन एक सितम, एक सितम रात करे हो 

दिन एक सितम, एक सितम रात करे हो
वो दोस्त हो, दुश्मन को भी मात करो हो

हम खाक-नशीं, तुम सुखन-आरा-ए-सर-ए-बाम
पास आ के मिलो, दूर से क्या बात करो हो

हमको जो मिला है, वो तुम्ही से तो मिला है
हम, और, भुला दें तुम्हें, क्या बात करो हो!

दामन पे कोई छींट, न खंजर पे कोई दाग
तुम कत्ल करे हो, के करामात करो हो

बकने भी दो अज़ीज़ को, जो बोले है सो बके है
दीवाना है, दीवाने से क्या बात करो हो

ज़ालिम था वो और ज़ुल्म की आदत भी बहुत थी

ज़ालिम था वो और ज़ुल्म की आदत भी बहुत थी
मजबूर थे हम उस से मुहब्बत भी बहुत थी

उस बुत के सितम सह के दिखा ही दिया हम ने
गो अपनी तबियत में बगावत भी बहुत थी

वाकिफ ही न था रंज-ए-मुहब्बत से वो वरना
दिल के लिए थोड़ी सी इनायत भी बहुत थी

यूं ही नहीं मशहूर-ए-ज़माना मेरा कातिल
उस शख्स को इस फन में महारत भी बहुत थी

क्या दौर-ए-ग़ज़ल था के लहू दिल में बहुत था
और दिल को लहू करने की फुर्सत भी बहुत थी

हर शाम सुनाते थे हसीनो को ग़ज़ल हम
जब माल बहुत था तो सखावत भी बहुत थी

बुलावा के हम “आजिज़” को पशेमान भी बहुत हैं
क्या कीजिये कमबख्त की शोहरत भी बहुत थी

गम की आग बड़ी अलबेली कैसे कोई बुझाए

ग़म की आग बड़ी अलबेली कैसे कोई बुझाए ।
अन्दर हड्डी-हड्डी सुलगे बाहर नज़र न आए ।

एक सवेरा ऐसा आया अपने हुए पराए,
इसके आगे क्या पूछो हो आगे कहा न जाए ।

घाव चुने छाती पर कोई, मोती कोई सजाए,
कोई लहू के आँसू रोए बंशी कोई बजाए ।

यादों का झोंका आते ही आँसू पाँव बढाए,
जैसे एक मुसाफ़िर आए एक मुसाफ़िर जाए ।

दर्द का इक संसार पुकारे खींचे और बुलाए,
लोग कहे हैं — ठहरो-ठहरो, ठहरा कैसे जाए ।

कैसे-कैसे दुःख नहीं झेले, क्या-क्या चोट न खाए,
फिर भी प्यार न छूटा हम से आदत बुरी बलाय ।

आजिज़ की हैं उलटी बातें कौन उसे समझाए,
धूप को पाग़ल कहे अन्धेरा दिन को रात बताए ।

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