कविता भट्ट की रचनाएँ

आज ये मन

आज ये आँखें
देखती रही राह तुम्हारी
पलकें मूँदकर डूबी रही सपनों में तुम्हारे
आज मेरे ये कान
तरस गए आहट तुम्हारी सुनने को
मीठी हँसी मीठे बोल तुम्हारे सुनने को
आज मेरा ये तन
अतृप्त सा तड़प गया
स्पर्श तुम्हारा पाने को
आज का ये दिन
सूना-सूना कार्तिक की लम्बी रात सा
जेठ की गर्मी और भादों की बरसात सा
आज ये मन
हो गया कितना विकल दूरी से तुम्हारी
तरसा कितना खातिर तुम्हारी
धोखा देकर छोड़ गया मेरा साथ
और साथ तुम्हारे हो गया.

यदि जान भी लोगे, तो क्या कर लोगे?

यदि जान भी लोगे, तो क्या कर लोगे?

पीड़ा में कराहते पहाड़ों का सच
दर्द- खेतों से पेट न भरने का
बर्तनों-गागरों के प्यासे रहने का
घरों के उजड़ने, खाली होने का
वनों के कटने, वानर-राज होने का

यदि जान भी लोगे, तो क्या कर लोगे?

सच-सड़कों पर सजती मौतों का,
रोते शिशुओं और सिसकती औरतों का,
खाली होते गाँवों और धधकते वनों का,
खोते अपनेपन, संवेदनहीन रिश्तों का।

यदि जान भी लोगे, तो क्या कर लोगे?

सच- खाली होती पंचाचतों स्कूलों का,
सूखते स्रोतों, खोते बुराँस के फूलों का,
बुनते हुए सड़को के अर्थहीन जालों का,
बिकते मूल्यों, उफनते राजनेताओं के वादों का

यदि जान भी लोगे, तो क्या कर लोगे?

मेरी मंथर आशाएँ

रोक रही थी जिनको मस्तिष्क की सीमाएँ,
मन अवसादयुक्त और गहन विस्तृत पीड़ाएँ,

पग धर रही अब सीमाविहीन निरन्तर,
उषा-परों पर झलमल, मेरी कल्पनाएँ, मेरी आशाएँ।

कुछ लजाती, कुछ मुस्काती, शीतल-उज्ज्वल मन में,
हँसी छलकती मुख उसके, लाली सफलता की जीवन में।

पहले बोली थी मुझसे आऊँगी न अब तेरे द्वारे,
रूठ गई तुझसे छोड़ चली तेरे आँगन को प्यारे।

विश्वास के नए परिधान में उसको मैंने मनाया प्रतिपल,
मैं तुझे स्नेह करूँ ओ प्यारी! तू क्यों मुख मोडे़ पल-पल?

अब उसने घूँघट हटाया तनिक,
अविलम्ब बोली उससे मैं ठिठक-

तू क्या जाने वियोग में तेरे मैंने अपना क्या-क्या खोया?
धैर्य गया, स्नेह गया मुस्कान गई मेरे होंठों की।

तम असफलता का छाया था,
काँच के टुकड़ों को-बर्फ समझ मस्तक अपना सेंका था।

आँचल तेरा, हाथों से मेरे- फिसल गया था,
ना मीठी चंचल बातें, तुम्हारे अतिरिक्त न कोई प्रतीक्षा।

मैंने तुम्हें मना ही लिया अब तुम्हें जाने न दूँगी,
चले न जाना तुम फिर से, कल्पनाओं आशाओं मेरी।

हृदय -भाव सेतु बाँधे काल पर, रुक-रुक कर,
चली आ रहीं हैं मेरी कल्पनाएँ, मेरी आशाएँ।

लड़खड़ाती किंतु सँभलती हुई मंथर-मंथर
चली आ रहीं हैं मेरी कल्पनाएँ, मेरी आशाएँ।

प्रथम प्रेमालाप 

मैं नहीं मानती धरणी-शून्य
मैं नहीं मानती पाप-पुण्य
अपने ही मन के किसी अंश पर
श्रद्धा हो चली है मुझे उसी अंश पर
न जाने तुम कैसे उतरे
पूजा के इस मन-मन्दिर में मेरे
आलोक की रेखा सी कोमल
इस निविड़तम में मुस्कुराते झलमल
मेरे ईश-उपासक मन में
मेरे निरीह सूने जीवन में
कामना की हँसी-हँसी शान्त
आ बसे देवता मेर मन में मन के कान्त

हँसी खिलखिलाई मन में ही मन की
मेरी विवशता मैं हँस न सकी
छोड़कर विश्व के समस्त प्रलाप
कर गई आँखें मेरी प्रथम प्रेमालाप

तुम क्या खोज रहे हो प्रियतम?

दुःखभरे मन की अँधेरी सीमा में
तुम क्या खोज रहे हो प्रियतम?

सूने निर्जल दृगों की श्वेत पृष्ठभूमि पर
भूरी पुतलियों के आस-पास
पीड़ा की अपरिचित गहनता से बर्बर
कंपित रक्तरंजित रेखाएँ उभरी सकुचाकर

इन असंख्य ज्वालाओं की चीत्कारों में
तुम क्या खोज रहे हो प्रियतम?

मन का विवश नीरव बीहड़
युगों से प्रतीक्षित मधुर हास
दीर्घावधि से मचल रहा था
पाने को कोई उद्वेलन-संवेदन
किन्तु, अब ये सब कहाँ हो पाएगा

उम्र के इस मध्यान्तर में
तुम क्या खोज रहे हो प्रियतम?

कायाओं का है मोहपाश
सम्बन्धों का वासना-लिप्त
अत्यंत संकीर्ण किंतु, विस्तृत आकाश
जिसमें तुम खोना चाहते हो उड़कर

अपरिभाषित सम्बन्धों की इस भूल-भुलैया में
तुम क्या खोज रहे हो प्रियतम?

बीते कल में थे मुझसे अपरिचित
आने वाला भी काला है कल
मुख मोड़ चुके जैसे मुझसे सब
तुम भी मुझसे नैन चुराओगे
फिर क्यों ? यह मृगतृष्णा-दीर्घ लिप्साएँ

स्वप्नों के इस बंजर रेगिस्तान में
तुम क्या खोज रहे हो प्रियतम?
आधी सदी से बैठी हूँ इन संकरी राहों में
टकटकी लगाए देख रही हूँ
प्वित्र प्रेम के गठबंधन की राहें
बिना दाँव जो निस्वार्थ हो
अब मन अविचल शैल बन चुका
निरुत्तर, निःसंवेदन और स्थिर

इस अभाव और सूनेपन में
तुम क्या खोज रहे हो प्रियतम?

अपराजिता के गंभीर पीड़ायुक्त हास में
या भटके हुए हृद्य के सूक्ष्म प्रवास में
तितर-बितर जीवन शैली के
उथल-पुथल होते विश्वास में
पुरुषत्व की ऊँची वर्जनाओं में
कुछ स्नेह क्या तुम पा पाओगे?

ये तो पागलपन है
तुम क्या खोज रहे हो प्रियतम?

दो पल अवकाश के

एक-दूसरे से नैना उलझाए,
दो एकाकी हृदयों की ध्वनियों को,
मिलकर गले लिपटने दें,
यदि मिले तुम्हें अवकाश के क्षण,
तो आओ मिलकर बैठें दो पल।
अविरल चलती भौतिक यात्रा को,
कुछ क्षण अल्प विराम दे दें।
निज मन में उठते भावों को,
शब्द ध्वनि में परिवर्तित कर,
स्वयं को व्यक्त करें दो पल।
मशीनों के इस कालखण्ड में,
हम भी मशीन जैसे ही हो गए,
बिन अपनत्व मधुर रिश्तों के,
जंग लग गया है हम में।

चमचमाते अर्थविषयी युग में,
तुम्हें शान्ति न अवकाश हमें,
मन-मस्तिष्क-शरीर को,
प्रेम का नया तेल देकर,
एक नई स्फूर्ति-स्निग्धता प्रदान करें दो पल।
जाने कब फिर मिलना संग चलना हो,
एक अल्पावधि वाले मिलन-पश्चात्,
एक दीर्घकालीन विलम्ब-वियोग,
आओं नैनों की भाषा को,
नए सम्बल देकर आलाप करें दो पल।
ओ प्रिय! इस मधुर स्पर्श को,
हम सदियों से चाह रहे थे,
जड़वत् जीवन है वर्षों से,
पाषाणवत् मन-मस्तिष्क शरीर,
काया-मन-आत्मा का संगम होने दें दो पल।
न वह सरसता न सरलता
न स्वाभाविकता बातों की रही
मात्र स्वार्थयुक्तता की जटिलता
पिछले कई युगों से चल निकली

निहार रही थी तीव्र पुतलियाँ
राह कई सदियों से तुम्हारी
मनों की मधुर अठखेलियाँ
चाह रही थी संगत तुम्हारी
यह स्वर्ण शृंखला गूंथें दो पल।
आँचल का एक छोर बँधा है
रिश्तों की परिभाषा में
एक नया रिश्ता हम गूँथ रहे हैं
पाने को मन की थाहें
अस्तित्वों को परिभाषित करें दो पल।

आशाएँ निमिषों में भरकर
अंजुलियों से बाँटी हमने,
सुख के कुछ चंचल क्षण
जी भरकर लुटाए हमने

किंतु अब अपनी पारी में
क्या आशाएँ समाप्त हो गईं ?
कहाँ गई सकारात्मकता की अनुभूति?
और सद्गुणों का दिग्दर्शन कहाँ गया?
इनको भी उगने दें दो पल।

तुम्हारी स्मृति

मेरा छलता लघु जीवन!
जीवन के पथ पर
तुम्हारी स्मृति पग-पग पर।
मेरा नन्हा-सा मन
सरस स्नेहिल-सा मन
नव विकसित यौवन
फिर भी डोलता-सा जर्जर।
मेरे विक्षिप्त से मन !
कहाँ चला था तू धीरे-धीरे
किशोरवय का जटिल पथ चीरे
कभी थकता, कभी रुकता
चल-अचल, निश्छल पर चंचल
अब क्यों रुक गया तू थककर
कभी-कभी कुछ तो होता होगा तुझ को भी
अपना जानकर कह दे कुछ मुझको भी
यदि नहीं कहा, तो ये कैसी आस है?
ये कैसी प्यास है?
बुझती नहीं जो बुझ-बुझकर
ये कैसी आस है?
छूटती नहीं जो गिर-गिर कर
ओ मेरे लघु प्रेमघन !
जीवन के कंटक-पथ पर
तुम्हारी स्मृति पग-पग पर।

बिछड़ा साथी

क्या कभी नदिया का एक किनारा
दूसरे किनारे से जा मिला है?
बंजर -सूखे- कँटीले रेगिस्तान में
आशा का कोई फूल खिला है?
आम की कुसुमित डाली से
सुरभित मधुवन हुआ है?
जहर उगलती विषकन्या को
प्यार से किसी ने छुआ है?
क्या कभी मानव-देह का परिचय
समक्ष ईश्वर के हुआ है?
जीत कर भी सब हारे यहाँ पर
जिन्दगी तो एक जुआ है?
क्या कभी चांदनी रात में
तारों का कोई सिलसिला है?
खण्डहर फिर से बसा और
बिछड़ा साथी फिर से मिला है?

यह कैसा अस्तित्व?

स्वप्निल निशा सोती आँखें
देख रही थी सोच रही थी मैं

कुछ गतिशील होता जीवन मेरा भी
परिभाषित होता नाम मेरा भी
किनारे लुढ़कते पत्थरों को ठोकरें मारती
दिख गया मन्दिर एक तभी
चढ़ी सीढ़ियाँ पार की
भटकती रही बड़ी देर यूँ ही
अँधियारी सी एक मूरत दिखी तभी
किंतु यह क्या?
मूरत एकांकी, खण्डित और अधूरी
सम्भवतः नर के साथ नहीं थी नारी
शंकर के साथ नहीं थी शक्ति या गौरी
बस सभी पूज रहे थे मात्र ‘गौरी-शंकर‘
गौरी पहले पीछे शंकर
पर यह क्या मूरत तो बस शिव की

तो फिर प्रश्न उठा मेरे मन में कि
यह कैसा अस्तित्व गौरी का?
तो फिर क्या हो सकता था
मुझ सी साधारण नारी का

सुख-साज

पक्षियों के पर रँगीले
रेशम की बन्धन सजीले
हरीतिमा डाली निराली
नव किसलय, अमृत प्याली

रोक लेंगे क्या ये सब मुझे?

स्वप्नों की बारातें प्यारी
स्मृतियों की सौगातें न्यारी
नीलगिरि की बहती धारा
और भोर का उगता तारा

रोक लेंगे क्या ये सब मुझे?

पर्वतों के श्वेत सोते
प्राची मस्तक उषा अरुण होते
अश्रुओं की प्यारी करुणा
और ये सारी मृगतृष्णा

रोक लेंगे क्या ये सब मुझे?

अभी बीते क्षण में
और मृदाकण में
जगी थी एक स्फूर्ति
सजी थी एक मूर्ति

फिर यह आलस्य कैसा
मुझे तो चले जाना है
कहीं दूर… अति दूर…
ये सब असीम भौतिक सुख-साज

रोक लेंगे क्या ये सब मुझे?

कँटीला-कटु सत्य

आग से कौंधती गर्म भट्टी में
कभी पत्थर तो कभी मिट्टी में
रक्त-पसीना होता पानी-पानी
तप्त आग-सी कौंधती जवानी

हो जलती गर्मी या नम बरसात
कर्कश सर्दी या स्निग्ध मधुमात
हर नया पुराना मौसम दे जाता
दग्ध-करुण कहानी झुलसाता

अधखुले-अधफटे चीथड़ों से
अधढका हुआ तन उसका
भटकाव भरे घने बीहड़ों से
भटका हुआ पीड़ित मन उसका

नित चौका-चूल्हा, बर्तन और सफाई
कभी स्वयं के घर और कभी पराई
भूखी कभी चाटती जूठन भरी पत्तल
हाय रे हाय ! प्रकृति तेरा यह छल

ओह! मानव के द्वारा इतना शोषण मानव का
और यह कटुसत्य कँटीला इस निर्मम जीवन का।

अन्तिम अनुभव

मृत्यु-शांति ! न जीवन-भय है आज मुझे
आज न बहाओ अश्रु-निर्झर
आज न जलाओ अग्नि-प्रियवर
आज मेरी आत्मा हुई है निर्भय

आज मुझे मिली मृत्यु- अभय

चिर-परिचित क्रान्ति न क्रन्दन है आज मुझे
हृदय सुलगता साँसें ठंडी
एकांकी मैं सूनी पगडंडी
मृत्यु पर मात्र तुमसे है दूरी
किन्तु जिजीविषा हुई अब पूरी

अब और नहीं कुछ चाहिए
किसी सुख का आभास नहीं
न तुमसे दूर जाने का दु:ख
न तुम्हारे आलिंगन का सुख

मृत्यु- शांति! न जीवन भय है आज मुझे
कामना थी रोने की अपनी मृत्यु पर
थके शिशु-सी सिसक-सिसककर
छलते जीवन की सरिता सुखाकर
कामना सोने की ,ठंडी रेत पर रखसर
स्निग्ध-सौम्य चिरस्थायी प्रेम सी छाँव है आज मुझे

कम्पित-शरीर, सम्भवतः ठंडा शरीर छूकर तुमने
मेरा पीला चेहरा लेकर हाथों में अपने
मेरे ठंडे-कोमल कपोलों पर उष्ण अधर रखे अपने
किन्तु आज देह में नहीं कोई सरसराहट
तेरे न मेरे अधरों पर कहीं नहीं कोई मुस्कुराहट

मृत्यु-शांति! है न प्रेम-लोभ है आज मुझे

परिवर्तन

दीर्घ श्वास की लघु ताल पर
धीमे-धीमे जीवन की लय पर
खोता चला गया कहीं
उसका निश्छल-सुंदर-सा मन
एक था उसका कोमल अंतःकरण
क्या मिल गया उसे पाकर यौवन
जिसके प्रकट होने पर
उलझता गया मन
सुख-समृद्धि की परिभाषा में
धन-वृद्धि की अभिलाषा में
एकत्र करना चाह रहा था
असीम भौतिक सुख-साज
भूल गया वह तुतलाना
माँ की गोदी में सिर रखकर सो जाना
जिस सुख के समक्ष सारे सुख हैं निरर्थक
कुर्सी, धन, मान प्रसिद्ध नाम का यद्यपि सुख।

कली चम्पा की

ओ चम्पा की कली!
सच को झूठ के आवरण में लपेटकर
संसारी छलते रहे तेरा मन अपनत्व समेटकर
मुस्कुराती हुई सकुचाई-सी ओ चम्पा की कली!

तू कितने संघर्षों के परिणामतः
इस रंग-रूप में ढली
तूने अपने रूप-सुगंध की खातिर
सहा कितनी बरखा बौछार को

कभी तीर सी बूँदों ने
कभी धूप की तीखी गरमाहट ने
कभी शाम के अंधियारों ने
कभी मौसम की सर्द रातों की कडु़वाहट ने

किस तरह तुझे सताया-रुलाया
फिर चली पवन यह मदमाती
यौवन को बरसाती
एक सवेरे आया तेरे जीवन में

एक रंगीन हवा का झौंका
सूरज की किरणों में
खिल उठा यौवन तेरा मंद मुस्कान लिए ओ कली!
कितने कटु-संघर्षों से निखरा रंग रूप तेरा

हँसते कुछ समय भी न बीता था
किंतु अंधे मानव ने न देखी तेरी पीड़ा
न देखी तेरी स्वप्न कल्पना न जीवन

तोड़ ले गया मानव एक
स्वार्थ रूपी राक्षस की खातिर
निज स्वार्थ को पूजन का नाम देकर
तेरे यौवन में, तेरे जीवन को मिटाकर

फिर माँग रहा ईश-वन्दन में
धन-वैभव-नाशवान् जीवन की अमरता
और तुझे बिछोह सहना पड़ा उस डाली का
जिसने तुझे सहलाया खिलाया उस माली का
अब तू प्रसन्नता देने योग्य हुई तो हो गई
जिसने तुझे सँवारा उसी के लिए अनछुई

किसी ने तुझे सहलाया और किसी ने रुला दिया
ओ चम्पा की कली
लघु तेरा जीवन
अचिर होकर भी तेरा चिर यौवन
स्वार्थी मानव ने नोंच डाला उसे भी।

तुम क्या हो

सँजोया था मन में मैंने
एक स्वप्न सी कल्पना को
जिसे कहीं पाया नहीं था
उस चिरकालीन खोज का
साकार सुन्दर परिणाम हो तुम

इस तन-मन जैसे अपने
आँखों में बसे सुन्दर सपने
दीपशिखा के जैसे उज्ज्वल
प्रकाशित करते दर्पण-तल
मेरा ही एक नाम हो तुम

धागे की माला के मोतियों से
प्रस्फुटित असंख्य ज्योतियों से
प्रकृति की अनोखी रचना
और इस मन की प्यारी मृगतृष्णा
मन का स्नेहिल आयाम हो तुम

मेरे हृदय की उछलती-गिरती लहरों को
स्थायी करते विराम हो तुम

श्वेत-पत्र दुग्ध-सरिता जैसे
मेरे मन के निर्मल जीवन
ओस-बिन्दु से पारदर्शी
और सुगन्धित करते मधुवन
मेरे मन जैसे निष्काम हो तुम

बाल्यकाल के मधुर हास की
किशोर मन के कल्पित आभास की
यौवन की प्रस्तर परिभाष की
तन की एक-एक श्वास की
उगती उषा-निशा-ढलती शाम हो तुम

मैतियों के आर्से-रूटाने

बसन्त के वो गीत पुराने कहाँ गए?
थड़िया, चौफुला, फुलेरों के जमाने कहाँ गए ?

ऋतुराज आता था झलकाता पौधों में कोंपलें
और बिछाता था डाँडियों में हरी घास की मखमलें
स्वप्न-सभाएँ लगाए रहता था नैनों में
मिष्ठान्नों की मिठासें भर देता था थौल़ मेलों में

माँगुल़ों के गुंजन सुहाने कहाँ गए?
दादी की लोरियों के जमाने कहाँ गए?

घूघूती की घू-घू के मधुर-स्वर
खलिहानों के दांदों में सूपों की सर-सर
कोयल की मधुर झंकार खो गई
निन्यारों की सुंदर गुंजार खो गई

मैतियों के आर्से और रुटाने कहाँ गए?
कंडियाँ, लाल कपड़े लुभावने कहाँ गए?

मंडाड़ों और झूमते झुमेलों का मौसम
मकरैणी और पंचमी के मेलों का मौसम
पापड़ियों, स्वाल़ों और फुलकंडियों का मौसम
सजी-धजी थौले़रों से भरी पगडंडियों का मौसम

मसकबाजे और दमौं के साज सुहाने कहाँ गए?
लाल डोली दुल्हन की, छतर रुलाने कहाँ गए?

सड़कों के तो जाल बन गए
जिनमें सारे धारे ताल छन गए
कट गए चीड़-बांज-बुरांस-अंयार
हट गए मन्दिर पुराने और घर-द्वार

मेरे लय्या-गेहूँ के खेत न जाने कहाँ गए?
बसन्त के वो गीत पुराने कहाँ गए?
-0-
शब्दार्थ:
मैतियों =मायके वाले, समारोह, रुटाने=विवाह आदि तथा उसके बाद भी मायके आने पर बेटी को विदा के समय दी जाने वाली गुड़ व गेहूं के आटे से बनी मिठाई,आर्से= भी ऐसे ही बनती है, मात्र गेहूँ के स्थान पर चावल को भिगो ,ओखल में कूटकर बनने वाली स्वादिष्ट उत्तराखंड की विशेष मिठाई , थड़िया, चौफुला ,झुमैलो– उत्तराखंडी लोकनृत्य,
मांगुल- उत्तराखंडी वैवाहिक लोकगीत[ मंगल गीत ]
डाँदों – खलिहानों के चारों ओर बनी पत्थरों की थोड़ी ऊँची किनारियाँ,
निन्यारों- झिंगुर, स्वालों- कचौड़ी, मकरैणी- मकर संक्रान्ति,
फुलकंडियों- बच्चों द्वारा उपयोग में लायी काने वाली फूलों की डलिया,
मसकबाजे– विवाह आदि में बजाया जाने वाला बैगपाइपर बाज़ा, दमों- नगाड़े जैसा उत्तराखंडी वाद्ययंत्र,
थौल- मेला, मंडाण – उत्तराखंडी लोकनृत्य ,. फुलेरों– चैत्र मास में फूल एकत्र कर प्रतिदिन एक मास तक प्रातःकाल देहरियों पर फूल डालने वाले छोटे बच्चे,लय्या= सरसों

भूरी पुतली-से बादल

आएँगे कब और कैसे बादल
बरखा की बूँदों को लेकर
शीतलता के घरौंदों को लेकर
चुभती धूप का अनुभव भुलाने
काली घनघोर दिशाओं को सहलाने

आएँगे कब और कैसे बादल
रेशम का सा ओढे आँचल
सम्भवतः अस्पर्श हुआ मलमल
बेला साँझ की सुरभित स्वप्निल
घुमड़-घुमड़ और मचल-मचल
लाएँगे कब और कैसे बादल

पेड़ों की सरसराती पत्तियों पर
चाँदी की चमकती बूँदें बिखेरकर
अपने कोमल तन को पिघलाकर
जल लाएँगे कब और कैसे बादल

कभी-कभी तो तरसा जाते हैं
मेरे मन को चोल़ी पंछी-सा
भीगे स्पर्श की कल्पनाएँ लेकर
मेरे मन को कल्पनाओं को साकार कर
आएँगे कब और कैसे बादल

किसी रूपसी के काले केशों-से
किन्हीं नैनों के सुन्दर काजल-से
और भूरी पुतलियों के कजरारे आभास से
भूखण्डों के नीले पर्वत- शिखरों पर
जलधारा के श्वेत सोते
लाएँगे कब कहाँ से बादल

छोटा जीवन

बहुत ही छोटा-सा जीवन
पर्वतों की सीमाओं में
उन ऊँचाइयों के संसार में
जीवन की कठिन परिभाषा से

दूर जाकर रहना है मुझे
इस छोटी सी जीवन सीमा में
देख न सकूँगी मैं वह स्वर्णिम संसार
थोड़ा और बढ़ा दे मेरा जीवन ओ ईश्वर

मापना चाहती हूँ पर्वतों की ऊँचाइयाँ
और सागर की गहराइयाँ
आनन्द ले लूँ जरा उस सुन्दर संसार का
यदि उन प्रकृति-हरीतिमाओं के

दर्शन नहीं करवा सकता है यदि मुझे
तो बस इतना ही जीवन काफी है
नहीं चाहती बोझिल इस संसार में रहना और मैं
अब थककर सो जाना चाहती हूँ मैं।

उस पार

दिवस के उस पार
जीवन का विस्तार
ढलती सन्ध्या का निशा से मिलाप
दिवस के उस पार

सुरमई आँचल बादल का थामे
चाँदनी रूपसी की खनकती
चूड़ियों की रेखा का आभास
दिवस के उस पार

चमकते नर्म अधरों की मुस्कान
सिंदूर की रेखा महकती मांग का जादू
एक नई पहचान, मेहँदी की सुगन्ध
दिवस के उस पार

किसी के साथ चलने
किसी का नाम लेकर पुकारने
किसी के साथ जीवन गुजारने की ललक
दिवस के उस पार

मखमली महकते वस्त्रों की
झिलमिल चूनर में लगे सितारों सी
महकते सावन की हवाओं सी
एक सपने का अपना बनाने की चाहत

दिवस के उस पार
जिससे कभी कोई रिश्ता न था
एक दूसरे से अपरिचित
उसको अपनाने की रंगीन चाहत
दिवस के उस पार

मुस्कुराहटें पीड़ा भरी
निःसंवेदन और उलझन
नैनों की छन-छन बरसात
कभी स्नेह-कभी दुत्कार
दिवस के उस पार

जटिल प्रश्न पर्वतवासी का

शिवभूमि बनी शवभूमि अहे!
मानव-दम्भ के प्रासाद बहे।
दसों-दिशाएँ स्तब्ध, मूक खड़ी,
विलापमय काली क्रूर प्रलय घड़ी।
क्रन्दन की निशा-उषा साक्षी बनी,
शम्भु तृतीय नेत्र की जल-अग्नि।
पुष्प-मालाओं के ढोंगी अभिनन्दन,
असीम अभिलाषाओं के झूठे चन्दन।
न मुग्ध कर सके शिव-शक्ति को,
तरंगिणी बहाती आडंबर-भक्ति को।
निःशब्द हिमालय निहार रहा,
पावन मंत्र अधरों के छूट गए ।
प्रस्तर और प्रस्तर खंड बहे,
सूने शिव के शृंगार रहे।
जहाँ आनन्द था, सहस्र थे स्वप्न,
विषाद, बहा ले गया, शेष स्तम्भन।
कुछ शव भूमि पर निर्वस्त्र पड़े,
अन्य कुक्कुर मुख भोजन बने,
भोज हेतु काक -विवाद करते,
गिद्ध कुछ शवों पर मँडराते।
अस्त-व्यस्त और खंडहर,
केदार-भूमि में अवशेष जर्जर।
कोई कह रहा, था यह प्राकृत,
और कोई धिक्कारे मानवकृत।
आज प्रकृति ने व्यापारी मानव को,
दण्ड दिया दोहन का प्रकुपित हो,
उसकी ही अनुशासनहीनता का।
कौन उत्तरदायी इस दीनता का?
नाटकीयता दु्रतगति के उड़न खटोलों से,
विनाश देखा नेताओं ने अन्तरिक्ष डोलों से,
दो-चार श्वेतधारियों के रटे हुए भाषण,
दिखावे के चन्द मगरमच्छ के रुदन।
इससे क्या? मंथन-गहन चिंतन के विषय,
चाहिए विचारों के स्पंदन, दृढ़-निश्चय।
क्योंकि जटिल प्रश्न पर्वतवासी का बड़ा है,
जो देवभूमि-श्मशान पर विचलित खड़ा है।

जलते प्रश्न

क्रूर प्रतिशोध प्रकृति का था या,
भ्रष्ट मानव की धृष्टता का फल?
श्रद्धा-विश्वास पर कुठाराघात या,
मानव मृगतृष्णाओं का दल-दल?
जलते विचारों ने प्रश्नों का,
रूप कर लिया था धारण।
किन्तु उनकी बुद्धि-शुद्धि क्या?
जो विराज रहे थे सिंहासन।
डोल रहे अब भी श्वानों से,
बर्फ में दबे शव नोंच-खाने को।
मानव ही दानव बन बैठा,
निजबंधुओं के अस्थि-पंजर चबाने को।
कितनी भूख-कितनी प्यास है,
जो कभी भी मिटती ही नहीं।
कितनी छल-कपट की दीवारें,
जो आपदाओं से भी ढहती नहीं।
सब बहा ले गया पानी था,
जीवन-आशा-विश्वास-इच्छा के स्वर्णमहल।
किन्तु एक भी पत्थर न हिला,
भ्रष्टता-महल दृढ़ खड़ा अब भी प्रबल।
पेट अपना और कागजों का भरने वाले,
कहते काम हमने सब कुछ कर डाले।
जिनके कुछ सपने पानी ने बहाये,
उनकी बही आशाओं के कौन रखवाले।
उन्हीं के कुछ सपने बर्फ ने दबाये,
और कुछ सर्द हवाओं ने मृत कर डाले।
ऐसा नहीं कि सिंहासन वाले फिर नहीं आएँगे
आएँगें बर्फ में दबे सपनों को कचोटने।
और सर्द हवाओं से बेघरों को लगे
रिसते-दुखते घावों पर नमक बुरकने।

प्रिय! यदि तुम पास होते!

अगणित आशा-पत्रों से लदा,
प्रफुल्ल कल्पतरु जीवन सदा,
पतझड़ भी सुवासित मधुमास होते,
प्रिय! यदि तुम पास होते!
झर-झर प्रेम बरखा बरसती,
बूँद-बूँद न कोंपलें तरसती,
झूलती असंख्य कलियाँ, कामना प्रवास होते!
प्रिय! यदि तुम पास होते!
पुष्पगुच्छों के अधर पर,
कुछ तितलियाँ-चन्द भ्रमर,
रंग-स्वर लहरियों के सहवास होते
प्रिय! यदि तुम पास होते!
ये रातें-झिंगुरों की गान हैं जो,
शैलनद ध्वनियों की प्रस्थान हैं जो,
उनमें- आलिंगनरत धरती-आकाश होते,
प्रिय! यदि तुम पास होते!
जहाँ चिंतन है, वहाँ आनन्द होता!
हृद्य भाव-सिन्धु स्वच्छन्द होता!
छल की पीड़ा मिटाते, अटूट विश्वास होते।
प्रिय! यदि तुम पास होते!
पल-दिवस संघर्ष न होते,
आह्वलादों के प्रसार होते।
पूर्णता की श्वासें, कामनाओं के प्रश्वास होते।
प्रिय! यदि तुम पास होते!
धड़कन-स्वर कर्कश न होते,
चूर-चूर सब अवसाद होते।
वृक्ष-झुरमुट, मधुर-तानें, राधा-कृष्ण से रास होते
प्रिय! यदि तुम पास होते!
अविच्छिन्न आयाम निरन्तर साकार होते,
रेखाएँ-सीमाएँ और दिशान्तर लाचार होते।

अन्तहीन कल्पनाओं को; विराम के आभास होते
प्रिय! यदि तुम पास होते!

प्यासा पथिक

मीलों के पत्थर गिनते हुए बीते पहर,
आँखें अब तक भी सोयी नहीं।
एक भी धड़कन ऐसी नहीं जो,
स्मृतियों में तेरी कभी खोयी नहीं ।
पल-पल गूंथ रही सिसकियाँ आँखें,
परन्तु पलकें मैंने अभी भिगोयी नहीं।
जीवन की कहानी कटु होती गयी,
परन्तु आशा मैंने अभी डुबोयी नहीं।
प्यासा पथिक बन रातों को,
अंजुलियाँ तुमने कभी संजोयी नहीं।
झूठ हैं ये प्रणय की लड़ियाँ सपनीली,
यथार्थ में तुमने कभी पिरोयी नहीं।
अंकुरण हो न हो, तुम प्रस्फुटन चाहते,
कैसे हो, कतारें तुमने कभी बोयी नहीं।

विवश व्यवस्था 

विवश व्यवस्था
समय की गति में बहती रही है,
दलालों के हाथों की लंगड़ी व्यवस्था
निशिदिन कहानी कहती रही है,
बैशाखियों से कदमताल करती व्यवस्था।
सुना है- अब तो गूँगी हुई है,
मूक पीड़ाओं पर मुस्कुराती व्यवस्था।
बहुत चीखता रहा आये दिन भीड़ की ध्वनि में,
फिर भी, सुनती नहीं निर्लज्ज बहरी व्यवस्था।
विषमताओं पर अट्टाहास, कभी ठहाके लगाती,
समाचार-पत्रों में कराहा करती झूठी व्यवस्था।
यह नर्तकी बेच आई अब तो घूँघट भी अपना,
प्रजातन्त्र-राजाओं की ताल पर ठुमकती व्यवस्था।
चन्द कौड़ियों के लिए कभी इस हाथ,
भी उस हाथ, पत्तों- सी खेली जाती व्यवस्था।
बहुत रोता रहा था, वह रातों को चिंघाड़कर,
झोंपड़े जला, दिवाली मनाया करती व्यवस्था।
रात सारी डिग्रियाँ जला डालीं उसने घबराये हुए,
देख आया था, नोटों से हाथ मिलाती व्यवस्था।

वो धोती-पगड़ी वाला

निरन्तर गतिशील जीवन,
अब लड़खड़ाने लगा।
सिर्फ़ दो निवालों के लिए,
संघर्ष मुँह की खाने लगा।
चमचमाते रजत अंश नहीं,
ये पसीने के रक्त बिन्दु हैं।
लुढ़क आये कपोलों पर
दुःख भरे ये सिन्धु हैं।
वातानुकूलन में मदभरे
प्यालों को पीने वाले।
मोल मेरे श्रम का क्या जानो,
तुम महलों में जीने वाले।
सभी को जीवन।-दान किया,
मौन, हल ही खींचा सदा।
अपनी ही रोटी ना मिली,
दरिद्र मैं, अभावों में जीवन कटा।
जीवित रहा एक झोंपड़ी में,
जो मौसमी घासों से थी बनी।
सिरलिपटा-आधेक मीटर पगड़ी में,
कृश देह दो मीटर धोती में।
दो रोटी, दो मीटर कपड़े में,
और दो-चार फुट के झोंपड़े में,
कल रहा था जो जीवित शव,
मृत भूमि पर लिपटा आज दो गज कपड़े में।
यह कपड़ा जिसे कफ़न कहते हैं,
महलस्वामी-दरिद्र सभी लिपटेंगे कल इसमें।
बहुत सोचा था सूखी भूमि पर चलूँगा,
फावड़ा लेकर कुछेक डग और भरूँगा।
जीवन पथ पर; किन्तु न भाव दिया मुझे,
अन्ततः थके हारे मौन अब पदचाप हुए।
दस रुपया जो बचा था,
बीज और खाद के बाद।
उससे विष भी जब ना मिला,
तो खरीदा कुछ ले उधार।
निःशब्द अब पड़ा हूँ हे प्रिये!
शिथिल हो तुम्हारी गोदी में।
चन्द पुरानी पीतल की चूड़ियाँ,
तोड़ दोगी तुम खिन्न होकर।
मैं तुम्हारा दोषी हूँ, किन्तु न धिक्कारना,
हूँ मैं व्यवस्था के लँगड़ेपन का प्रमाण।
त्याग रहा हूँ अब हारकर मैं,
व्यवस्था की चन्द कौड़ियों में सिमटा प्राण।
ऊँचे- ऊँचे उन कागज के महलों में,
निमग्न रहने वालों से एक बार तो पूछती है।
मेरी देह- स्थिर, निःशब्द और व्यथित,
कि वसीयत में अपने बेटे की, क्या लिखूँ मैं?
वही दो मीटर कपड़ा, विष की एक पुड़िया,
या आत्मघाती कर्ज का लम्बा-चौड़ा चिट्ठा।
झकझोर कर मैं पूछता हूँ मैं,
तुम निरुत्तर क्यों खड़े हो?
अपने अन्नदाता के शव को
रौंदते क्यों चल पड़े हो?
किन्तु हे प्रासादों के स्वामी!
तुम भी आखिर इस गर्व में,
कितना जिओगे, अन्नदाता मर गया तो,
तुम भी स्वयं ही मर जाओगे।
क्योंकि…
निरन्तर गतिशील जीवन,
अब लड़खड़ाने लगा।
मात्र दो निवालों के लिए,
संघर्ष मुँह की खाने लगा।

एक पुल जो इतिहास बन गया

सौ योजन पर सेतु बाँधा था, इनसे अच्छे तो बंदर थे,
मुँह चिढ़ा रहे आते-जाते चौरास पुल के अस्थि पंजर थे।

त्रिशंकु सा झूलता एक पुल जो इतिहास बन गया,
अपने भाग्य कोसता लोकतन्त्र का परिहास बन गया।

ढोती हुई निष्पाप भूखे- मजदूरों के पंजर,
अर्धनिर्मित अवशेष लोहा-सरिये-पिल्लर।
हर लहर भूखे लोकतन्त्र की कहानी कहती है,
उपहास करती, नीचे इसके जो नदी बहती है।

भूख उन मजदूरों की, जिनका पाप मात्र था-रोटी,
भूख उनकी भी, असीम थी जिनकी पाचन-शक्ति ।
लोहा तो वे यूँ ही पचा जाते हैं, बिना जुगाली,
और सरिया-सीमेंट तो प्रशिक्षण में ही चबा ली।
सौ योजन सेतु बाँधा था, इनसे अच्छे तो त्रेता के बंदर थे,
मुँह चिढ़ा रहे आते-जाते चौरास पुल के अस्थि पंजर थे।

त्रिशंकु सा झूलता एक पुल जो इतिहास बन गया,
अपने भाग्य कोसता लोकतन्त्र का परिहास बन गया।


अब सुनते हैं कि इस पुल की कथा पर
इसके असफल निर्माताओं का क्या है अनुभव?
निर्लज्ज कहते- हँसी आती, उन मूर्ख बंदरों पर,
जो किसी अपरिचित की स्त्री के हरण पर।
सेतु हेतु वर्षों भूखे-प्यासे संघर्ष करते थे,
और सोने की लंका को जला डालते थे।
हम तो कमीशन की मलाई, लालच-ब्रेड को लगाकर,
कभी इस फ्लेवर और कभी उस फ्लेवर में खाते हैं ।
फिर भी हमारे लोहे, सरिया और सीमेण्ट के पुल
कुछ कृशकाय मजदूरों के शरीरों से ढह जाते हैं।
यदि त्रेता में राम अपने पुल का टेंडर हमसे भरवाते,
हम घाटे सौदा न करते पुल बनाकर भी नहीं बनाते
और मूल्यवान् सोने की सम्पूर्ण लंका बचा लेते।
कुछ बिस्किट ले-देकर ही मामला निबटा लेते।

दूर पहाड़ी गाँव में 

वीराने से एक मौन सी चीख निकलती है,
दूर पहाड़ी गाँव में जब साँझ ढलती है।
किसी के होने की गवाही देती,
दो बूढे़ शरीरों को ढाँढ़स देती
बरखा-हवाओं से संघर्ष करती,
चिम्नी काँपते हुए आह भरती,
।खंडहर की खिड़की में विवश मचलती है,
दूर पहाड़ी गाँव में जब साँझ ढलती है।
नौनिहाल हँसी बीते दिनों की बातें,
बूढ़े तन, पूस, करवट बदलती रातें।
बस मुठ्ठी भर राख है बुझे चूल्हे में,
तन में थमती हुई चन्द लम्बीसाँसें।
झेंपती-एक धीमी चिंगारी धुआँ उगलती है,
दूर पहाड़ी गाँव में जब साँझ ढलती है।
बर्फ हो चुके हाथों की झुर्रियाँ शेष,
सिमटती धमनियाँ, कुछ गर्मियाँ शेष,
खंडहर दीवारों पर दो बूढ़ी परछाइयाँ,
चिम्नी-शिथिल प्रकाश सुस्त अँगड़ाइयाँ।
कमजोर बुझती सी लौ अब भी जलती है।
दूर पहाड़ी गाँव में जब साँझढलती है।
बूढ़ी साँसों की इतिश्री कर डाली,
बसाने के लिए भावी युवा पीढ़ी।
मेरे पहाड़ी गांवों की वह जवानी,
महानगरों की चादरों में रेशमी।
पैबन्द की तरह सिमट हाथ मलती है।
दूर पहाड़ी गाँव में जब साँझ ढलती है।
जागती है जवानी बसों में लदने के लिए,
भगाती रहतीं, अन्तहीन नागिन -सी सड़कें।
बू़ढ़ी नब्जों की आवाज़ दबती ही जाती है,
बस के कोने वाली सीट पर, कोलाहल में,
उधेड़बुन में, मंजिल की तलाश चलती है,
दूर पहाड़ी गाँव में जब साँझ ढलती है।
कदमों की आहटें पूछती हैं पता उसी का,
जैसे जानते ही नहीं, और नहीं पाते बता,
खो -सी जाती है हँसी, रोटी का भार उठा,
ओंस से नहायी रोशनियाँ, कोहरे में लौटता,
स्नेह-स्पर्श को तरसती, भावना उबलती हैं,
दूर पहाड़ी गाँव में जब साँझ ढलती है।

तुम और मैं 

निर्जन नीलांचल की नदी मैं
तुम प्यासे पथिक प्रेम प्रगाढ लिये।
मैं सुरभित स्वप्नों की स्वर्ण-शृंखला
तुम प्रहर प्रशान्त पुण्य प्रकाश लिये।
विरह वेदना रातों की मैं,
तुम प्रतीक्षित प्रणय के प्रयास लिये।
मैं अप्रकट अधखुले अधरों की कामना,
तुम प्रफुल्लता का प्रशस्त प्रवास लिये।
निःसंग किंतु निरंतर गति मैं,
तुम प्रखर प्रतिछाया का प्रतिभास लिये।
मैं निष्पाप ,निश्छल निमित्त निबंधन,
तुम प्रकृष्ट प्रयोजन के प्रत्याश लिये।
लतिका धरणीतल से उगती मैं,
तुम तरुवर के प्रबल प्रसार लिये।
मैं मूक मंत्र मानसिक जप में,
तुम उच्चारित प्रार्थनाओं का प्रसाद लिये ।
मंद मधुर लयबद्ध गीत मैं,
तुम उन्मुक्त गान का प्रतिध्वनित प्रहास लिये।

एक भोर रिक्शेवाले की

एक भोर रिक्शेवाले की-
पीड़ाओं के लिए जब ठहरी थी,
भोर के तारे के उगते ही,
पगली -सी मटकती कहाँ चली थी ?
इसी भोर की आहट को सुनते ही,
खींचने को बोझ करवट धीरे से बदली थी।
रात, रिक्शा सड़क के कोने लगा,
धीरे सी चुभती कराह एक निकली थी।
शायद किसी ने भी न सुनी हो,
जो धनिकों के कोलाहल में मचली थी।
पांच रुपया हाथ में ही रह गया,
लोकतन्त्र की थाली अपरिभाषित धुँधली थी।
कोहरे की चादर में लेटा था,
जमती हुई सिसकारियाँ कुछ निकली थी।
व्यवस्था की निर्लज्जता को ढकने को आतुर,
वही कफन बन गयी जो उसने ओढ़ ली थी।

तुम कभी तो आ जाते

तुम कभी तो आ जाते,
प्रस्तर खंडों पर चलते हुए।
इतनी रेलें चलती हैं भारत में,
गिरते कभी सँभलते हुए।
अब हैं, आहटों की प्रतीक्षा करते,
श्वासों के स्वर ढ़लते हुए।
चुपचाप हँसी विदा हो गयी,
अन्तर्द्वन्द्वों में मचलते हुए।
कुछ झुर्रियों से था संघर्ष,
चुनौतियों के स्वर बदलते हुए।
झकझोर रही, निर्लज्जता से,
बूँदें नयनों से निकलते हुए।
इन्हीं सिकुड़ी आँखों को भिगोकर,
रातें बुढ़ापे ने बितायी करवट बदलते हुए।
तुम क्या जानों मेरी व्याकुलता,
अभी तो जवानी आयी है, आँखें मलते हुए।
अब भोर, फिर दोपहर,
फिर जर्जरता आएगी उछलते हुए।
तुम्हारे पाले हुए शिशु युवा होंगें,
और तुम नर-कंकाल समान जीर्ण झूलते हुए।
तब तुम्हें अनुभव हमारी पीड़ा होगी,
जब तुम भी होगे चिता पर जलते हुए।

ठेके का टेण्डर

मदमस्त हो रही हैं धीरे-धीरे पहाड़ियाँ,
जीवन को विदा कह रही हैं जवानियाँ।
कल ही तोड़े थे शीशे ठेके के उसकी माँ ने,
नारे लगाये, लगवाया बाहर से ताला, बुआ ने ।
अब भी नहीं कर पाया वह मनन,
किसने की विषैली यहाँ की पवन?
चार किताबें हाथों में लिए कॉपी और एक पेन,
भेजा था बेटे को स्कूल और पढाया था ट्यूशन।
कुशासन ने उसको रोटी नहीं कई बरस दी,
कड़वे घूँट, कई बोतलें व्हिस्की की परस दी।
अबके रोया था वह माँ की गोदी में बिलखकर,
क्या उसमें खूबी नहीं रोटी खाने की कमाकर?
आज सोया है चिरनिद्रा में थककर,
न उठेगा न माँगेगा रोटी कभी फिर।
बैठी मन में जो ठेका बन्द करना, ठानकर
चकित थी माँ उसकी आज यह जानकर,
जिस सखी ने उठाया था ठेके पर पत्थर,
उसी के नाम खुला है अबके ठेके का टेण्डर।

नीरवता के स्पंदन

मनध्वनियाँ प्रतिध्वनित करते, ओढ़कर एकाकीपन
प्रचुर संख्या में, चले आते हैं नीरवता के स्पंदन।
नीरवता के स्पंदनों को निर्जीव किसने कहा है?
प्रतिक्षण इन्होंने ही मन को रोमांचित किया है।
साँझ के आकाश पर कुछ बादल विभा के घनेरे से,
स्मृतियों में प्रणय-क्षण कुछ उस साथी के-मेरे से।
अन्तर्द्वन्द्वों के भँवर में खोया उद्विग्न सा मन,
बीते कल संग खोजता ही रहा उन्मुक्त क्षण,
और अब, चादर की सलवट से कभी बोलते हैं,
मेरे बनकर, परदों की हलचल से बहुत डोलते हैं।
हैं प्रतिबद्ध, यद्यपि हो निशा की कल-कल,
हैं चेतन प्रतिक्षण, यद्यपि दिवस जाये भी ढल।
मानव स्वभाव में व्यर्थ इनको न कहना,
ध्वनिमद के अहं स्वरों में कदापि न बहना।
अस्तित्व में विमुखता-अनिश्चितता है ही नहीं,
परन्तु संदेह-उद्वेगों की विकलता है ही कहीं।
अस्तित्व रखते हैं-नीरवता के स्पंदन,
निःसंदेह, हाँ वही-नीरवता के स्पंदन-
जिनमें है प्रशंसा, माधुर्य, स्मरण, चिंतन,
अपने भाव अपनी ही प्रतिक्रिया के टंकण।
सफलता-असफलता में वे ही पुचकारते हैं,
धीरे से- अधर माथे स्पर्श कर सिसकारते हैं।
रात को निश्छल किंतु सकुचाए चले आते हैं,
नीरवता के स्पंदन अकस्मात् मेरा दर खटकाते हैं।

बूढ़ा पहाड़ी घर

तुम्हें बुला रहा, मैं, तुम्हारा, बूढ़ा पहाड़ी घर,
कंक्रीट-अरण्यों से चले आओ निकलकर।
माना तुम्हारे आस-पास होंगें आकाशचुम्बी भवन,
परन्तु क्या ये घरौंदा नहीं अब तुम्हें नहीं स्मरण?
खेले-कूदे जिसकी गोदी में, धूल-मिट्टी से सन
जहाँ तुमने बिताया, अपना प्यारा-नन्हा सा बचपन।
तुम्हें बुला रहा, मैं, तुम्हारा, बूढ़ा पहाड़ी घर,
कंक्रीट-अरण्यों से चले आओ निकलकर।
तुम्हारे पिता को मैं अतिशय था प्यारा,
उन्होंने उम्र भर मेरी छत-आँगन को सँवारा।
चार पत्थर चिने थे, लगा मिट्टी और कंकर,
लीपा था मेरी चार दीवारों पर मिट्टी-गोबर।
उन्होंने तराशे थे जो चौखट और लकड़ी के दर,
लगी उनमें दीमक हुए जीर्ण-शीर्ण और जर्जर।
तुम्हें बुला रहा, मैं, तुम्हारा, बूढ़ा पहाड़ी घर,
कंक्रीट-अरण्यों से चले आओ निकलकर।
चार पौधे लगाए थे जो पसीना बहाकर,
सिर्फ़ वे ही खड़े हैं मुझ बूढ़े के पास बूढ़े वृक्ष बनकर।
जो संदूक रखे थे मेरी छत के नीचे ढककर,
जंग खा गए वो पठालि़यों से पानी टपककर।
उसी में रखी थी तुम्हारे बचपन की स्मृतियाँ सँजोकर,
धगुलियाँ, हँसुल़ी, कपड़े तुम्हारी माँ ने सँभालकर।
तुम्हें बुला रहा, मैं, तुम्हारा, बूढ़ा पहाड़ी घर,
कंक्रीट-अरण्यों से चले आओ निकलकर।
थी रसोई, चूल्हा बनाया था, माँ ने लगा मिट्टी-गोबर,
मुंगरी-कोदे की रोटी बनाई थी करारी सेंककर।
मेरी स्मृतियों में कर रहा है विचरण,
तुम्हारा ठुमकना, रोटी का टुकड़ा हाथों में लेकर।
काल-परिवर्तन का मुझे आभास न था तब,
तुम्हें ले जाएगा, यह रोटी का टुकड़ा मीलों दूर अब।
और खो जाएँगी तुम्हारी अठखेलियाँ सिमटकर,
रह जाओगे तुम कंक्रीट के भवनों में खोकर।
तुम्हें बुला रहा, मैं, तुम्हारा, बूढ़ा पहाड़ी घर,
कंक्रीट-अरण्यों से चले आओ निकलकर।
तुम्हें तो मैं विस्मरित हो चुका हूँ,
किंतु तुम्हारी प्रतीक्षा में मैं बूढ़ा घर खड़ा हूँ।
अभी भी मैं हर घड़ी-पल यही सोचता हूँ,
अभी भी मैं रोता हूँ और समय को कोसता हूँ।
क्या अब मैं मात्र भूखापन ही परोस सकता हूँ?
या वह रोटी का टुकड़ा तुम्हें मैं पुनः दे सकता हूँ?
कहीं न उलझ जाना इन प्रश्नों में खोकर,
अब भी रह सकते हैं हम सहजीवी बनकर।
तुम्हें बुला रहा, मैं, तुम्हारा, बूढ़ा पहाड़ी घर,
कंक्रीट-अरण्यों से चले आओ निकलकर।
तुमको मैं दूँगा बिना मोल आश्रय-प्रेम जी भर,
और तुम मुझको देना वही बचपन का आभास भर।
अपनी संतानों के बचपन में जाना ढल,
और दे देना मुझे बचपन का वह प्रेम निश्छल।
आ सकोगे मुझ बूढे़ का मर्मस्पर्शी निमंत्रण पाकर?
माता-पिता की अंतिम इच्छाओं को सम्मान देकर।
निर्णय तुम्हारा है़………..आमंत्रण मेरा है!
तुम्हारी प्रतीक्षा में मैं, तुम्हारा, बूढ़ा पहाड़ी घर,
कंक्रीट-अरण्यों से चले आओ निकलकर।

कितने दिन बच पायेगा?

अपने लाचार बूढे़ वृक्ष साथी से
सिसकते हुए पहाड़ की चोटी से,
बोला एक बूढ़ा-जर्जर वृक्ष हाँफता।
सिमटती नदी-घाटी की ओर झाँकता।
अबके जब सावन आएगा,
तुम्हारे-मेरे अंग सहलायेगा।
आओ हम-तुम शुभेच्छा करें।
अमृत धाराओं की प्रतीक्षा करें।
चिंतातुर- अतीत और भविष्य में डूबा,
स्वयं के छिन्न-विछिन्न रूप से ऊबा।
बोला-मैं उन्मुक्त था, प्रफुल्ल था,
शीतलनीर-समीर से चुलबुल था।
नृत्य करती थी-मेरी पत्ती-शाखाएँ,
और मेरे उर में थी- पक्षियों की मालाएँ।
अकस्मात् हो उठा प्रकुपित मानव-मन,
जिसका साक्षी है मेरा अधजला तन।
अपनी क्षणिक स्वार्थवशता में,
या किंचित् संवेदनहीन मूर्खता में।
अहंवश छोड़ी एक दग्ध-क्रूर ज्वाला,
जिसने तुम्हें और मुझे झुलसा डाला।
जला डाले हमारे संग कुछ घोंसले,
और कुछ चहकते मचलते घरौंदे।
फिर रहे-अब वे पशु बिदकते,
भय से- लाचार और सिहरते।
उनका ही मानव से अन्तहीन संघर्ष होगा,
हमसे निर्मित संतुलन का विध्वंस होगा।
साथी! हम दो पग भी चल सकते नहीं,
अपनी दुर्दशा का प्रतिशोध ले सकते नही।
किन्तु, सभी हमारे साथी पशु घरौंदों वाले,
मानव से संघर्ष करेंगे प्रतिशोध के मतवाले।
किन्तु; दुःखद है, हाय! दुःखद, हश्र हो जायेगा,
जीवन-संघर्ष जब मानव विरुद्ध कहा जायेगा।
निरीह पशुओं में से कोई भी न बचेगा,
तो व्यूह-रचयिता मानव भी कितने दिन रहेगा?

प्रिय जब तुम पास थे!

आँचल फैलाए, निःशब्द-मूक पड़े थे,
दो बूँदों की आशा में, अधखुले नैन-स्वप्नाकाश थे!
रुक्ष-धरा को नीर भरे घन बरसने के विश्वास थे।
प्रिय जब तुम पास थे।

कामनाओं के झरते निर्झर,
धरा के घर्षण करते झर-झर।
कुछ तृप्ति तो कुछ मृगतृष्णा जैसे ये आभास थे।
प्रिय जब तुम पास थे।

तप्त अधर ,स्पर्श को व्याकुल,
किन्तु नैनों में कुछ संकोच-चपल!
हृदय-ध्वनि सकुचाई, किन्तु साहसी-प्रेम के उच्छ्वास थे।
प्रिय जब तुम पास थे।

उन्मुक्त हँसी की स्वर्णशृंखलाएँ,
गूँथ रहीं थीं मन में नव-अभिलाषाएँ
प्रतिध्वनित हो चले स्वर-लहरियों के पल अनायास थे।
प्रिय जब तुम पास थे।

अविस्मरणीय, अकल्पित, अद्भुत!
प्रेम चरम शिखर आरूढ़ होने को उन्मुख।
विगत विछोह- विदा, दुःख-विस्मरण के आभास थे।
प्रिय जब तुम पास थे।

रुदन प्रारम्भ में और रुदन अंत में
मिलन सुखद किन्तु नीर-जल दुःखद अंत में।
एक ओर संयोग, किन्तु कहीं विरह के भी तीक्ष्ण त्रास थे।
प्रिय जब तुम पास थे।

क्या होगा कभी पुनर्मिलन
अब नित्यप्रति है यही प्रश्न
निरुत्तर तुम्हारे-मेरे अधरों के उसी दिन से प्रयास थे।
प्रिय जब तुम पास थे।

उन पाप के नोटों का क्या होगा?

प्रस्तर खंडों से टकराती,
चल रही मेरी व्याकुल धारा।
हिमाला से विदा हो रही,
सागर ही मेरा प्रेमी प्यारा।
असंख्य कामनाएँ मिलन की
तन पर अपने शृंगार लिये।
सोचा- स्नेहमय ससुराल होगा, किंतु
तुमने मायके में भी व्यभिचार किये।
मुझे कैद कर डाला तुमने,
रेत सीमेंट की दीवारों में।
अपनी सुख-सुविधा के लिए
अपने फैलते अन्धे व्यापारों में।
मूक कहानी सुना रही हूँ,
मीलों चलकर ये क्या पाया?
धाराओं में झनझना रही हूँ।
काली कर दी चम्पयी काया।
स्वच्छ धवल नीर बहाया था,
स्तब्ध खड़ा- पर्वत मेरा पिता लाचार।
फूट-फूट रोता और अश्रु बहाता,
देख अपनी बेटी का हाय! तिरस्कार।
कहने को कुम्भ नहाते हो,
अगणित मुझमें पाप बहाते हो।
उन पाप के नोटों का क्या होगा?
जो तकियों में छिपाये जाते हो।

मेरे टूटे मकान में 

क्या मेरे टूटे मकान में वो फिर से आएँगे,
जिनके आते ही मेरे सपने रंगीन हो जाएँगे।
वो आये और आकर चले गए,
मेरे मन में अपनी याद जगाकर चले गए।
जब मैंने उन्हें विदाई दी तो उनकी याद आती थी,
जब आयी मैं अपने मिट्टी और पठालि़यों के-
बरसात में- रिसते-टपकते मकान में,
उन्हें छोड़कर वापस तो उसकी याद सताती थी।
किचन-बाथरूम न कोई सुविधा जिसमें,
टीवी, फ्रिज, कम्प्यूटर न ही मोबाइल।
चारों ओर घने पेड़ थे देवदार-अँयार के,
और मिट्टी पत्थर के उस घर में-
वह कुछ न था जो उन्हें चाहिए था,
पर मेरे उसी घर में सुख-शांति थे
जहाँ मैं आती थी खेतों से थककर,
खाती थी रोटी कोदे की-
घी और हरी सब्जी लगाकर,
दूध पीती थी मन भर कर और,
फिर सोती थी गहरी नींदें लेकर,
जबकि मेरे पास नहीं थे बिस्तर।
मैंने सोचा शायद वे,
अपने घर चले गए ।
कुछ दिन बाद पता चला कि,
दो चार दिन सुविधाओं में कहीं और रुक गए।
मैंने सोचा अब मैंने उनको भुला दिया,
पर उसकी यादों ने मुझको रुला दिया।
अब सोचती हूँ यही रह-रह कर कि क्या?
मेरे टूटे मकान में वो फिर से आएँगे?
जिनके आते ही मेरे सपने रंगीन हो जाएँगे।

पटेल की स्मृति में! 

तिनका-तिनका बिखरे राष्ट्र को,
जोड़ा तुमने चहकते घोंसलें सा।

सम्बल दिया विकट घड़ी में,
सिसकते शिशु को बुलंद हौसले सा।

लौहपुरुष! हे नायक-अधिनायक!
राष्ट्रवाद, एकीकरण के परिचायक!

शत्-शत् नमन तुम्हें, हे! निजस्वार्थ से विमुख वैरागी।
कृषक-पुत्र अमर विभूति तुम दृढ़ देशानुरागी।

अंतिम कामना 

तुम्हारी स्मृतियों का आलम्बन लिये,
गर्वित हो चलती हूँ जीवन पथ पर
तुम ही तो हो-जिसने चुन डाले,
अपनी पलकों से मेरी राहों के कंकर
निज स्वार्थ से विमुख विलग हे!
आलंबन में लिये- तृष्णा मिटाते निर्झर
तुम ही तो हो जो बिना शर्त के
पोषित करते हो स्वप्नों के नवांकुर
शिथिल कभी गतिशील कभी
प्रफुल्ल कभी उन्माद के कभी स्वर
मधुमास के आते ही जैसे-
सुगंध की रट लिये होंठों पर निरंतर
तुम ही तो हो जिसने मृत देह में
जीवन प्राण फूँके प्रतिपल आकर
अंतिम संध्या जीवन की जब होवे,
और शेष नहीं होगा कोई भी प्रहर।
अंतस् में पवित्र कामना ये ही रहेगी,
संग तुम्हारा, स्पर्श तुम्हारा अधर पर !

मानवता का मनु से निवेदन 

विकृत मानव- त्रस्त मानवता को कहीं मनु मिल गए ,
व्याकुल मुख पर आशा छायी भाग्य जैसे खिल गए ।
प्रणाम तुम्हें हे मानव-पितृ! कह तनिक सकुचायी,
क्या पीड़ा की औषध होगी या रोग रहेगा चिरस्थायी?
न कहना चाह रही थी, किन्तु पुत्रों से विवश तुम्हारे,
विचर रही चिर काल से-निराश अब मात्र तुम्ही सहारे।
किंचित रेखाएँ चिंता की मनु-भाल उभर आयी,
बोले स्पष्ट कहो मानवता क्यों तुम विकल सकुचायी?
बोली मानवता आकाश-चुम्बी भवनस्वामी- मानवों के,
पीड़ित हूँ मैं निम्न होते- अधोगामी चेतना स्तरों से।
मन-कलुषित, हिय- उद्वेलित, अब हुए तुम्हारे पुत्रों के,
कितना सुना पाऊँगी दुश्चिंतन मैं इन अन्तरिक्ष चरों के?
नभ-विजय का उद्घोष करने, ग्रह-नक्षत्र जीतने वाले,
जीत सके न मन स्वयं के, ईर्ष्या-द्वेषों के मत वाले।
घृणित, भ्रष्ट, कलुषित वसुधा-कुटुम्ब विखंडन का हेतु,
भौतिक विकास-निरंतर, कहाँ नैतिक चिंतन का सेतु?
अब नहीं सौहार्द, श्रेयस् युक्त तुम्हारे पुत्रों का व्यवहार,
मात्र त्रासदी-मूल्यों की, मेरा नित्य घोर- तिरस्कार।
भार उपेक्षा का, अति विषाद इस युग में मेरे मन पर है,
क्या तुम निवारण कर पाओगे जो दुःख इस जीवन पर है?
जान मानवता के विषाद का कारण मनु तनिक मुस्काए,
क्या तुम यह न समझ पायी युग-परिवर्तन होते आए।
संक्रमण का युग है यह नहीं रहेगा अधिक अवधि तक,
करेगी प्रकृति संतुलन मेरे पुत्रों का सृष्टि परिधि तक।
होगा नवीन युग का आगमन वही होगा सुखदायी,
धरणी पर पाप है अधिक पर नहीं यह चिरस्थायी।
पुनः मूल्यों का प्रतिस्थापन होगा उन्मूलन संक्रमण का,
आओ हम-तुम पथ निहारें मानव के नव-सृजन का।

इस आशा में 

कभी रातों में जुगनूँ सी टिमटिमाती है,
कभी सूरज कभी चंदा कभी तारों में झिलमिलाती है,
है अँधेरों को बहुत गुस्सा इस पर
फिर भी कविता तो हर हाल में मुस्कुराती है।
हमेशा आँचल में काँटे ही आया करते हैं,
और फूलों के होंठों को ओस ही झुलसाती है।
हर बार तुषारापात हुआ नयी पंखुड़ियों पर
फिर भी डाली है कि माली को निहारे जाती है।
आज होगा नहीं तो कल होगा,
कविता के फटे आँचल में भी मखमल होगा,
पत्थरों के कर्कश सीने पर सोती है ये,
इस आशा में कि कभी तो बसन्ती हवाओं का टहल होगा।

भूखा शिशु हिमाला 

सिंहासन के कड़वे सच के-
धरातल पर पथरीले,
सरकता, भूखा शिशु हिमाला,
घुटने लहूलुहान छिले।
प्रजातन्त्र राजाओं के
फर्श पर फिसलता हुआ,
ठोकरें खाता, गिरता
कभी- सम्भलता हुआ।
थककर, रुककर कभी
भूख से मचलता हुआ,
उच्छ्ववासें कभी और
कराहता सिसकता हुआ।
चुपड़ी न मिले सूखी ही सही,
भूख मेरी मिट ले,
दूध पीकर, शैशव हो-
सुपोषित, झटपट खिले।
काँपती हुई विवश
हथेलियों को फैलाकर,
माँगता एक टुकड़ा
रोटी का सकुचाकर।
व्यथित, व्यग्र और
क्रन्दित दृष्टि उठाकर,
छलावे-भरे घोषणापत्रों
को साक्षी बनाकर।
कुछ दिन ही तो बीते,
अभी क्या वो भूले?
या चाहते नहीं रखना
याद, पन्ने सपनीले ।
सपना तो भोर का था
और लोग हैं कहते,
भोर के सपने तो हैं-
सच में सच होते।
तो फिर सपनों का
क्या इस शिशु के?
क्या दोष इसी का है,
क्यों देखे सपने?
या उनका- जिन्होंने
बनाए झूठे काफिले,
जिनके सिंहासन जड़े
मोती, माला-फूल खिले!
गरजदार हुई थी बरसात,
चुनावों के बाद अबके,
वायदों के कागज,
आपदा में-चीथड़ें बन बह गए ।
जो बचे थे बहाव से,
दब गए – बर्फ के भार तले,
चलो अच्छा …………ठंडे पड़े
और कुछ गल गए ।
सिंहासन बैठे दानव,
शिशु-रुदन पर हँसते ही रहे
आश्वासन-दुत्कारों में
शिशु-सपने फँसते ही रहे।
अरे मूर्ख! तुम्हारी जिस
रोटी का था बहाना
उसे तुम्हारे लिए नहीं
अपने लिए था सजाना।
क्या तुम्हें इसीलिए
जन्मा ओ शिशु हिमाला।
तुम रोटी माँगो, नहीं
अब मत यह दोहराना।
हम तेरे सपनों के सौदागर,
सपनों का सौदा करते,
तो फिर हो अकारण ही………
हमसे क्यों हठ करते?
अब हैं कहते-
घोषणाओं के झोले वाले,
मेरी चाँदी की-
चौखट से जाओ चले।
सपने मत देखना
अब, कभी तुम रंगीले,
चुपड़ी खा गए हम,
तेरे पथ कंकरीले।
तू भटक आधी खुदी हुई
सड़कों पर या फिर,
पटक- चीखते हुए-
मेरी चौखट पर अपना सिर।
तुझे रोटी- चुपड़ी क्या-
सूखी भी न मिलेगी,
चुनाव की लोरी और,
कुछ घूँट रम ही चलेगी।
सुनता रह, आँखें मूँदे,
एक-दो चम्मच पी ले।
तुझे हम जितना कहते हैं,
उतनी साँसें जी ले।
सपनों में नहीं यथार्थ में,
फिर आज रात को सो जाओ,
खो जाओ तुम……खो जाओ
चिरनिद्रा में सो जाओ।
खो जाओ तुम……खो जाओ
चिरनिद्रा में सो जाओ।

तुम्हारी प्रतीक्षा में 

ठंडी रातों को पेड़ों के पत्तों से टपकती व्यथा है
बसन्त की आगन्तुक रंगीन परन्तु मौन कथा है
तुम्हारी प्रतीक्षा में…

चौंककर जागती हूँ जब कभी रात में
पास अपने न पाती हूं तुम्हें रात में
विरहिणी बनी मैं न अब सोऊँगी
इसी पीड़ा के कड़ुवे सच में खोऊँगी
तुम्हारी प्रतीक्षा में…

बसंत है परन्तु उदास है बुरांसों की लाली
रंगों की होली होगी फीकी खाली थी दिवाली
खुशिया॥ण खोखली और हथेलियाँ हैं खाली
राहें देख लौटती आँखें उनींदी ,बनी हैं रुदाली
तुम्हारी प्रतीक्षा में…

प्रेमी पर्वत के सीने पर सिर रखकर सोती नदी ये
धीमे से अँगड़ाई लेकर पलटती सरकती नदी ये
कहती मुझे चिढ़ा कहाँ गया प्रेमी दिखाकर सपने झूठे
चाय की मीठी चुस्कियाँ बिस्तर की चन्द सिलवटें हैं
तुम्हारी प्रतीक्षा में…

अब तो चले आओं ताकि साँसों में गर्मी रहे
मेरे होंठों पर मदभरी लालियों की नर्मी रहे
चाहो तो दे दो चन्द उष्ण पलों का आलिंगन
बर्फीली पहाड़ी हवाओं से सिहरता तन-मन
तुम्हारी प्रतीक्षा में…

अपने प्रेमी पहाड़ के सीने पर
सिर रखकर करवटें बदलती नदी,
बूढ़े-कर्कश पाषाण-हृदय पहाड़ संग,
बुदबुदाती, हिचकती, मचलती नदी।
तुम्हारी प्रतीक्षा में…

माँ शारदे

खोल किवाड़ हँसी के घरों में
मात बिखेर हरियाली बंजरों में
बसंत को तेरा उपकार लिखूँगी
माँ शारदे तेरा प्यार लिखूँगी !

पहाड़ी पगडण्डी पर घोर अँधेरे
गाँव के जीवन में कर दे सवेरे
गीतों में इनका शृंगार लिखूँगी
माँ शारदे तेरा प्यार लिखूँगी !

सुन्दर शब्दों के फूल मैं चुनकर
मनहर भावों के धागे में बुनकर
नदी-वृक्ष-लता-शैल- शृंगार लिखूँगी
माँ शारदे तेरा प्यार लिखूँगी !

जीवन से ताप-संताप मिटा माँ
आशा-अनुराग-आलाप सुना माँ
निश्छल मन के उद्गार लिखूँगी
माँ शारदे तेरा प्यार लिखूँगी !

कुँवर चन्द्र-सा

(कविवर चंद्र कुँवर बर्त्वाल को समर्पित शब्द-पुष्प)

प्रेम उसे सीढ़ी खेतों से
वह वृक्ष लता अनुरागी था

कुर्सी, कोलाहल, ध्वनि-करतल टंकण,
मुद्रण और प्रकाशन विरक्ति
उसे मान प्रतिष्ठा से
सरस्वती में रत निष्ठा से

सरस्वती का प्रखर पुत्र
वह धन समृद्धि से वैरागी था

बुग्यालों में विरह जिया वह
नदी झरनों में उसका रुदन झरा
उन्मत्त हिरन से मन ने उसके
शैल-पुष्प-लता- शृंगार किया

धवल शिखर से गाया उसने
वह प्रेम गीत का वादी था

सिखलाने को सत्त्व प्रेम समाश्रित
वह इस पुण्य हिमधरा पर आया
हिम आलिंगन, धरा का चुम्बन
और पक्षियों का वह मंगल गान

अल्प काल रहा फिर भी
वह जीवंत कल्पशक्ति उन्मादी था

उसके छंदों की अनुपस्थिति से
सूखी नदियाँ पतझड़ नंदन वन
रूखी हो गई सरित वाहिनी
सूने बसंत पावस ऋतु परिवर्तन

प्रेमी संन्यासी और वियोगी वह
नीर समीर प्रतियोगी था

जीवन गान पढ़ाने आया था
अध्यात्म-प्रेम-निष्काम-कर्म
कर्त्तव्य, बोध विस्तृत धर्म
वह पाठ भी था पाठशाला भी

मंद सुगंध सुदूर शैल मंदिर में
वह पावन प्रतिष्ठापित योगी था 

इनमें खो जाऊँ

ये घुँघरू बजाती अप्सराओं-सी नदियाँ
अभिसार को आतुर ये सलोनी बदलियाँ

बर्फीले बिछौनों पर ये अनुपम आलिंगन
सुरीली हवाओं के उन्नत पर्वतों को चुम्बन

ये घाटी, ये चोटी, ये उन्नत हिमाला
कन्या-सी सजी शांति लिये पुष्पमाला

कभी गुनगुनाती, कभी गुदगुदाती
धूप प्रेयसी-सी उँगलियाँ फिराती

मंगल गाते वृक्ष-लताएँ लिपटे समवेत
स्वर्ग को जाती सुन्दर सीढ़ियों-से खेत

पक्षी-युगल की ये प्रणय रत कतारें
मृग-कस्तूरी-सी सुगन्धित अनुपम बयारें

अपनी ही प्रतिध्वनि कुछ ऐसे लौट आए
जैसे प्रेयसी को उसका प्रियतम बुलाए

इस प्रतिध्वनि में डूब ऐसे खो जाऊँ
पद-धन-मान छोड़ बस इनमें खो जाऊँ  !!

बुराँस की नई कली

बुराँस की नई कली किवाड़ खोलकर चली
सखी बसंत आ गया, दिशा-दिगंत छा गया

पहाड़ियों का यह नगर
प्रेम गीत गुनगुना रहा
मुक्त भाव नदी-निर्झर
सुर-संगीत झनझना रहा
पर्वतों के कंठ में सुवास-सुरा घोल कर चली
सखी बसंत आ गया, धवल हिमवंत भा गया

ये डाल-डाल झूमेगा
नव पात-पात घूमेगा
मन में आस है भरी
शाख सब होंगी हरी
एक किरण छू गई नन्ही-सी डोल कर चली
सखी बसंत आ गया, अम्बर-पर्यंत छा गया

किवाड़ गाँव के विकल
झूम कर खुलेंगे कल
अब रंग जाएँगे बदल
पहाड़ सब जाएँगे संवर
कानों में प्रेम के मीठे बोल, बोलकर चली
सखी बसंत आ गया, शकुंतला-हिय दुष्यंत छा गया 

प्रिय! अब जाने की करो नहीं हठ

प्रिय ! हम स्वप्न-पाश में आलिंगनरत
अधर धरे अधरों पर, प्रेम-प्रतिध्वनित
बस कुछ ही शेष है जीवन घट-घट
टपकती बूँदें, सिसकती साँसें सिमट
असीम संघर्ष मेरी घुँघराली लट-लट
कुछ समय हो, दो प्रिय इन्हें सुलट
कम्पित कलियाँ, नीरवता का जमघट
इन्हें खिला दो प्रिय पुनः दृष्टि पलट
पलकें खुलना ही ना चाहे मदिरा-घट
अब मुँद जाएँ, तुमसे ये नयना लिपट
दोनों नयना उलझाए गंगा के तट
प्रिय ! अब जाने की करो नहीं हठ! 

हे प्रिया! मैं तुम्हारे पास आना चाहता हूँ

हे प्रिया ! मैं तुम्हारे पास आना चाहता हूँ
दूर पहाड़ी नदी के एक तट पर
सर्दी में तुम्हें, बाहों में भरकर
वासना से रहित प्रेम आलिंगन
ध्वनित हों प्रेम के अनहद गुंजन
हे प्रिया ! मैं पावन गीत गाना चाहता हूँ
उँगलियाँ अलकों में फेरूँ, अवसाद भागे ?
होंठ माथे धरूँ तो, तो उन्माद जागे
तुम्हारे मन की पीड़ा को सुनकर
आँखों से बातों के धागों को बुनकर
हे प्रिया ! पीड़ा से दूर ले जाना चाहता हूँ
दिन भर सुनहरी धूप गुनगुनाए
सूरज पेड़ों के झुरमुट में डूब जाए
फिर साँझ की चूनर में तुमको लपेटे
मैं पास रख लूँ गर्म बाँहों में समेटे
हे प्रिया ! तुम संग दूर जाना चाहता हूँ

साँझ रँगीली आई है 

साँझ रंगीली आई है नवपोषित यौवन शृंगार लिये
मुक्त छंद के गीतों का सृजन कुसुमित प्रसार लिये

अपरिचित अनछुआ व्योम भी आज सुपरिचित लगता है
तम में दीप शिखाओं का विजयगान सुनिश्चित लगता है

मंद श्वास की वृद्ध गति में यौवन का संचार लिये
जीवन से मिले प्रहारों के आशान्वित उपचार लिये

आलोक तिमिर को चीर चला, निशा का मौन समर्पण है
कोई खड़ा कपाट खोलकर, रश्मियों का आलिंगन क्षण है

नर्म उष्ण लालिमामय अधरों पर झंकृत स्वर उद्गार लिये
बिना पदचाप ऋतुओं का परिवर्तित स्वप्नमय संसार लिये

ये कौन मूक निमंत्रण पाकर, प्रणय-अभिसार लिये
साँझ रंगीली आई है नवपोषित यौवन शृंगार लिये

सागर का विस्तार गगन तक

सागर का विस्तार गगन तक
हे प्रिय सागर का विस्तार
क्षण पल मृदु कण सत्त्व-समाश्रित
कुछ अनंत और शेष अपार,
बूँद निरर्थक नहीं प्रेम की
हे प्रिय मोती-सीप अपार
मेरे मन से तेरे मन तक
बादल प्रतिफल अमृत के प्रसार
सागर का विस्तार गगन तक
हे प्रिय सागर का विस्तार 

ज़िन्दगी

कभी छत पर कभी गलियों में आते-जाते हुए
एक दिन ज़िन्दगी मिली थी मुस्कुराते हुए
उसका पूछा जो पता तो वो तनिक सकुचाई
वो सीता और सलमा, घूँघट-बुर्के में शरमाते हुए
कभी कोई एक मंजा खरीदकर लाया
और डोरी में बँधकर उसे जो उचकाया
वो पतंग बनकर बहुत ऊँचा उड़ना चाहती थी
काट डाले पर किसी ने उसके फड़फड़ाते हुए
कहते हैं गीता जिसे वो हरेक मंदिर में
और कुरआन जिसे कहते हैं हर मस्जिद में
हैं बहुत शर्मनाक उनकी करतूतें
उन्हें ही देखा उसके पन्ने फाड़कर जलाते हुए
है जिनको गर्व बहुत अपनी संस्कृति पर
उनसे लुटती रही सलमा और निर्भया बनकर
जिनका इतिहास दुर्गा और रानी झाँसी हैं
उन्हें ही देखा चीरहरण पे सर झुकाए हुए
आज भिखारिन सही वो उनकी गलियों की
कल कटोरे में उसके कुछ न कुछ तो होगा ही
आज होगा नहीं तो फिर कल होगा
उसके फटे आँचल में कभी न कभी मखमल होगा 

फूलदेई

आज चौंक पूछ बैठी मुझसे
एक सखी- क्या है फूलदेई?
मैं बोली पुरखों की विरासत है-
पहाड़ी लोकपर्व- फूलदेई

मैं नहीं थी हैरान, सुदूर प्रान्त की
सखी क्या जाने- फूलदेई
किन्तु, गहन थी पीड़ा,
पहाड़ी बच्चा भी नहीं जानता- फूलदेई

आँख मूँदकर तब मैं
अपने बचपन में तैरती चली गई
चैत्र संक्रांति से बैशाखी तक
उमड़ती थी फुलारों की टोली

रंग-रँगीले फूल चुनकर
साँझ-सवेरे सजती डलिया फूलों की
सरसों, बाँसा, किन्गोड़, बुराँस,
मुस्कुराती नन्ही फ्रयोंली-सी

उमड़-घुमड़ गीत गाते थे
मैं और मेरे झूमते संगी-सखी
इस, कभी उस खेत के बीठों से
चुन-चुन फूल डलिया भरी

गोधूलि-मधुर बेला,
बैलों के गलघंटियों से धुन-ताल मिलाती
सुन्दर महकती डलिया को
छज्जे के ऊपर लटका देती थी

प्रत्येक सवेरे सूरज दादा से पहले,
अँगड़ाई ले मैं जग जाती थी
मुख धो, डलिया लिए देहरियाँ
फूलों से सुगंधित कर आती थी

सबको मंगलकामनाएँ गुंजन-भरे
गीत मैं गाती-मुस्कुराती थी
दादी-दादा, माँ-पिता, चाची-चाचा,
ताई-ताऊ के पाँय लगती थी

सुन्दर फूलों सा खिलता-हँसता
बचपनः पकवान लिये- फूलदेई
मिलते थे पैसे, पकवान नन्हे-मुन्हों को:
पूरे चैत्र मास- फूलदेई
अठ्ठानवे प्रतिशत की दौड़
निगल गई बचपन के गीत-
फूलदेई बोझा-बस्ता-
कम्प्यूटर-स्टेटस सिंबल
झूठा निगल गया- फूलदेई
ना बड़े-बूढ़े, न चरण-वंदना, मशीनें- शेष,
घायल परिंदा है- फूलदेई
अगली पीढ़ी अंजान, हैरान,
परेशान है और शर्मिंदा है- फूलदेई

बासी संस्कृति को कह भूले,
अब गुड मॉर्निंग का पुलिंदा है- फूलदेई
फूल खोए बचपन खोया,
बस व्हाट्स एप्प में िज़न्दा है- फूलदेई

कितना अच्छा था, खेल-कूद-पढ़ाई साथ-साथ:
फूलों में हँसता- फूलदेई गाता-नाचता, आशीष, संस्कार,
मंदिर की घंटियों सा पवित्र- फूलदेई

मेरा बचपन- उसी छज्जे पर
लटकी टोकरी में, खोजो तो कोई- फूलदेई
हो सके ताजा कर दो फूल पानी छिड़ककर,
अब भी बासी नहीं- फूलदेई 

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शब्दार्थ  :
फूलदेई- चैत्र संक्रांति से एक माह तक मनाया जाने वाला उत्तराखंड का लोकपर्व
फूलारे- खेतों से फूल चुनकर देहलियों में फूल सजाने वाले बच्चे
बाँसा, बुराँस, किन्गोड़। फ्रयोंली- चैत्र मास में पहाड़ी खेतों के बीठों
पर उगने वाले प्राकृतिक औषधीय फूल
बीठा- पत्थरों से निर्मित पहाड़ी सीढ़ीनुमा खेतों की दीवारें
छज्जा- पुराने पहाड़ी घरों में लकड़ी-पत्थर से बने विशेष शैली में बैठने हेतु निर्मित लगभग एक-डेढ़ फीट चौड़ा स्थान

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शैलबाला

पहाड़ियों पर बिखरे सुन्दर समवेत
देवत्व की सीढ़ियों-से सुन्दर खेत
ध्वनित नित विश्वहित प्रार्थना मुखर
पंक्तिबद्ध खड़े अनुशासन में तरु-शिखर
घाटी में गूँजते शैल-बालाओं के मंगलगान
वह स्वामिनी, अनुचरी कौन कहे अनजान
पहाड़ी-सूरज से पहले ही, उसकी उनींदी भोर
रात्रि उसे विश्राम न देती, बस देती झकझोर
हाड़ कँपाती शीत देती, गर्म कहानी झुलसाती
चारा-पत्ती, पानी ढोने में मधुमास बिताती
विकट संघर्ष, किन्तु अधरों पर मुस्कान दृढ़,
सबल, श्रेष्ठ वह, है तपस्विनी महान
और वहीं पर कहीं रम गया मेरा वैरागी मन
वहीं बसी हैं चेतन, उपचेतन और अवचेतन
सब के सब करते वंदन जड़ चेतन अविराम
देवदूत नतमस्तक कर्मयोगिनी तुम्हें प्रणाम ! 

पहाड़ की नारी

लोहे का सिर और वज्र कमर संघर्ष तेरा बलशाली
रुकती न कभी थकती न कभी तू हे पहाड़ की नारी !

तू पहाड़ पर चलती है, हौसले लिये पहाड़ी
रुकती न कभी, थकती न कभी तू, हे पहाड़ की नारी !

चंडी-सी चमकती चलती है, जीवन संग्राम है जारी
रुकती न कभी, थकती न कभी तू, हे पहाड़ की नारी !

एक-एक हुनर तेरे समझो सौ-सौ पुरुषों पर भारी
रुकती न कभी, थकती न कभी तू, हे पहाड़ की नारी !

बुद्धि-विवेक शारीरिक-क्षमता तू असीम बलशाली
रुकती न कभी, थकती न कभी तू, हे पहाड़ की नारी !

सैनिक की मैया, पत्नी-बहिन मैं तुम पर बलिहारी
रुकती न कभी, थकती न कभी तू, हे पहाड़ की नारी !

समर्पित करती कविता तुमको, शब्दों की ये फुलवारी
रुकती न कभी थकती न कभी तू, हे पहाड़ की नारी ! 

घुँघरी तब ही मनाएगी

सिसकते-प्रश्नों के उत्तर,
ये पहाड़न जब पा जाएगी
झुकी कमर में प्राण-संचार होगा
झुर्रियों में धँसी हँसी-आँख नचाएगी
लोकतन्त्र का उत्सव घुँघरी तब ही मनाएगी

ऊँची-नीची पहाड़ी पगडण्डी पर
कोई गर्भवती प्राण नहीं गवाँएगी
गाँव-गाँव कस्बे-कस्बे प्रसूति-डॉक्टर
स्वास्थ्य-सुविधा जब भी पा जाएगी
लोकतन्त्र का उत्सव घुँघरी तब ही मनाएगी

जब अल्ट्रा साउंड, साउंड करेगा
एक्सरे स्वास्थ्य किरण फहराएगी
स्वस्थ वार्ड अस्पताल पदचाप करेगा
खुश होकर ग्लूकोज़ की बोतल लहराएगी
लोकतन्त्र का उत्सव घुँघरी तब ही मनाएगी

ठेकों से निकले शराबी पति को
जब अपना निष्प्राण तन न थमाएगी
चेहरे पर झुर्री उगाते बोझिल दिनों और
घरेलू हिंसक रातों से जब मुक्ति पा जाएगी
लोकतन्त्र का उत्सव घुँघरी तब ही मनाएगी

देश को बिजली-पानी देता प्रदेश
जब स्वयं बिजली-पेयजल पा जाएगा
उसकी बिटिया उसके जैसे बोझ न ढोकर
पढ़-लिखकर इतिहास रच नाम कमाएगी
लोकतन्त्र का उत्सव घुँघरी तब ही मनाएगी

शिक्षित बेरोज़गार बेटे की जवानी
सुदूर कहीं पलायन की भेंट न चढ़ेगी
खस्ताहाल रोड-एक्सीडेंट में अपना खोकर
जब यह पहाड़न रो-रो पत्थर न हो जाएगी
लोकतन्त्र का उत्सव घुँघरी तब ही मनाएगी 

बिछुआ उसके पैर का

प्रेम भरे दिनों की स्मृतियों में खोया हुआ,
जब प्रिय था उसके संग टहलता हुआ

कन्च-बर्फ के फर्श पर सर्द सुबहें लिये,
काँपता ही रहा मैं सिर के बल चलता हुआ

जेठ की धूप में गर्म श्वांसें भरते हुए,
एक-एक बूँद को रहा तरसता जलता हुआ

हूँ गवाह- उसके पैरों की बिवाइयों का,
ढलती उम्र की उँगलियों से फिसलता हुआ

सिमटा हुआ सा गिरा हूँ- आहें लिये,
सीढ़ीनुमा खेत- किसी मेड पर सँभलता हुआ

ढली उम्र, लेकिन मैं बिछुआ-उसके पैर का
अब भी हूँ, पहाड़ी नदी सा मचलता हुआ

रागिनी छेड़कर रंग-सा बिखेरकर,
कुछ गुनगुनाता हूँ अब भी पहाड़ सा पिघलता हुआ

वृक्षों के रुदन-सा भरी बरसात में,
आपदा के मौन का वीभत्स स्वर निगलता हुआ
मैं हराता गया- ओलों-बर्फ को, तपन-सिहरन को,
अंधियारे के गर्त से बाहर निकलता हुआ

चोटी पे बज रही धुन मेरे संघर्ष की,
गाथाओं के गर्भ में मेरा संकल्प पलता हुआ 

-0-

पहाड़ी-नारी 

अस्थियों के कंकाल शरीर को
वह आहें भर, अब भी ढो रही है,
जब अटूट श्वासों की उष्णता,
जीवन की परिभाषा खो रही है।
अब भी पल्लू सिर पर रखे हुए,
आडम्बर के संस्कारों में जीवन डुबो रही है।
क्या लौहनिर्मित है यह सिर या कमर?
जिस पर पहाड़ी नारी पशुवत् बोझे ढो रही है।
जहाँ मानवाधिकार तक नहीं प्राप्य
वहाँ महिला-अधिकारों की बात हो रही है।
इस लोकतन्त्र पंचायतराज में वह अब भी,
वास्तविक प्रधान-हस्ताक्षर की बाट जोह रही है।
नशे में झूम रहा है पुरुषत्व किन्तु,
ठेकों को बन्द करने के सपने सँजो रही है।
कहीं तो सवेरा होगा इस आस में,
रात का अँधियारा अश्रुओं से धो रही है।
पशुवत् पुरुषत्व की प्रताड़नाएँ,
ममतामयी फिर भी परम्परा ढो रही है।
पत्थर-मिट्टी के छप्पर जैसे घर में,
धुएँ में घुटी, खेतों में खपकर मिट्टी हो रही है।
शहरी संवर्ग का प्रश्न नहीं,
पीड़ा ग्रामीण अंचलों को हो रही है
वातानुकूलित कक्षों की वार्त्ताएँ- निरर्थक, निष्फल,
यहाँ पहाड़ी-ग्रामीण महिलाओं की चर्चा हो रही है।
एक ओर महिलाओं की सफलता है बुलंदियों पर,
दूसरी ओर महिला स्वतन्त्रता- बैसाखियाँ सँजो रही है। 

कुछ याद-सी है

नदी के किनारे जोड़ती
एक पुलिया से चलकर,
वृक्ष-कतारों के झुरमुट
वहीं है मेरा पुराना घर

मिट्टी और पत्थरों की
खुरदुरी दीवारों के ऊपर,
पठालियों से छत है बनी
लकड़ी-जंगला उस पर

घर के किसी कोने में
उसी जंगले से सटकर,
बैठी होगी आँखें गड़ाए
ओढ़कर वह अस्थि-पंजर

घने पेड़ों के बीच निरन्तर
व्याकुल हो मन डोलता है
पाँखले वाली बूढ़ी औरतों को
सुनता और कुछ बोलता है

कुछ याद-सी है- धुंधली
बुराँस-चीड़-बाँज-अँयार
बूढ़ी आँखें जो ज़ोर देकर,
पिघल आती होंगी गालों पर

चूल्हे से लग पूछती होंगी
पता दिल्ली की सँकरी गलियों का
और रोटी की खातिर भटकते
गुम अपने बहू और बेटे का 

गढ़वाली-शब्दार्थ :
पठालि़यों- पत्थर की स्लेटें, जो छत पर लगती हैं,
पाँखले- बर्फीले ठंडे हिमालयी क्षेत्र में महिलाओं का पहनावा, जो ऊनी कम्बल से निर्मित होता है।
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कौन-सी चर्चा चलती है

पहाड़-पीठ पर बँधे बच्चे-सा
फिर भी शान से चलती है
खेतों में खपती है हर दिन
इसके पालन को निकलती है
हँसती, चेहरे पर झुर्री पहने
पानी-गोबर-मिट्टी में पलती है
हर दिन उसका अठारह घंटे का
रात कराहती करवट बदलती है
पीटता उसे जो, माथे पर सिंदूर सजा
सवेरे की आस प्रतिदिन मचलती है
मेरे पहाड़ की एक-एक ‘घुँघरी’
हर रोज़ अग्निपरीक्षा से निकलती है
रात वाले घाव आँसुओं से धोकर
बोझे ढोती, गिरती और सँभलती है
वैज्ञानिक युग में महिला विकास की
न जाने कौन-सी चर्चा चलती है 

पहाड़ी-पथिक अब शेष नहीं 

तुम खोए रहे व्यापार में
हम उलझे रहे निज हार में
उस कोंपल को क्या आशा
जो झुलसाई गई बहार में

सब व्यस्त यहाँ उपहार में
मन रमता नहीं उद्गार में
पहाड़ी-पथिक अब शेष
नहीं जीवन बीता पल चार में

पवन चल रही मरु-थार में
झरने-नदियाँ बिके बाज़ार में
निर्ममता से हिमखंड ऐसे गले
ज्यों घी गल जाए अंगार में

तुम भी डूबे व्यभिचार में
हम खोए वृथा प्रचार में
ओ पहाड़ से नीचे बहने वालो!
क्या पाओगे दूषित संसार में 

पहाड़ी गाँव में 

पहाड़ी गाँव की पगडंडी
और सड़क पर बिखरी
कुछ टूटी हुई शीशियाँ
कुछ बोतलों के ढक्कन

आँखें भरी याद आए
युवा लड़खड़ाते कदम
कुछ टूटी हुई चूड़ियाँ
कुछ बिखरे हुए कंगन

बिखरे बाल डूबी साँसें
गहरे दुःख परदे झलमल
आह निकली एक दिल से
और तब थम गई धड़कन

गाढ़ा पसीना संस्कार मान
सब नशे में घोल आया
शेष- कुछ टूटी शीशियाँ
कुछ बोतलों के ढक्कन

ताश में सब झोंक आया
पास पत्नी के बचीं अब
कुछ टूटी हुई चूड़ियाँ
और चन्द टूटे हुए कंगन

पत्नी झुर्रियाँ ओढ़ बैठी
अपने समय से पहले ही
बच गए बच्चों के पास
टूटे खिलौने , कुछ बर्तन

बस्ते और कॉपी पेन को
मिला था निश्छल बचपन
बीता ढाबों की टेबल पर
सोते बोरी पर, धोते जूठन

ऊँची पहाड़ी पर ऊँघता है
ढलते सूरज सा प्रतिदिन
शेष- कुछ टूटी शीशियाँ
कुछ बोतलों के ढक्कन 

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