क़ाज़ी सलीम की रचनाएँ

टूरिस्ट 

हमारे पास कुछ नहीं
जाओ अब हमारे पास कुछ नहीं

बीते सत-जगों की सर्द राख में
इक शरार भी नहीं
दाग़ दाग़ ज़िंदगी पे सोच के लिबास का
एक तार भी नहीं
धड़क धड़क धड़क धड़क
जाने थाप कब पड़े
नंगे वहशियों के ग़ोल शहर की
सड़क सड़क पे नाच उठें
मूली गाजरों की तरह सर कटें
बर्फ़-पोश चोटियों पे सैकड़ों बरस
पुराने गिध परों को फड़ फड़ा रहे हैं
अब हमारे पास कुछ नहीं
खंडर खंडर तलाश कर चुके
सब ख़ज़ाने ख़त्म हो गए
तुम्हारे म्यूज़ियम में सज गए
अब हमारे पास कुछ नहीं
सपेरे राजे जादूगर
एअर इंडिया का बटलरी निशान बन गए
जाओ अब हमारे पास कुछ नहीं

रूस्तगारी 

ज़ख़्म फिर हरे हुए
फिर लहू तड़प तड़प उठा
अंधे रास्तों पे बे-तकान उड़ान के लिए
बंद आँख की बहिश्त में
सब दरीचे सब किवाड़ खुल गए
और फिर
अपनी ख़ल्क़ की हुई बसीत काएनात में
धुँद बन के फैलता सिमटता जा रहा हूँ मैं
ख़ुदा-ए-लम-यज़ल के साँस की तरह
मेरे आगे आगे इक हुजूम है
जिस को जो भी नाम दे दिया वो हो गया
मेरे वास्ते से सब के सिलसिले
बंधे हुए हैं सब की मौत ज़िंदगी
मेरे वास्ते से है
ज़मीन ओ आसमाँ के बीच
जिस को भी पनाह न मिल सके
वो आए मेरे साथ साथ
मुंतज़िर है आज भी
फ़ज़ा जो लफ़्ज़ लफ़्ज़ पर मुहीत है
अमीक़ और बसीत है

मुझे भी आज तक न मिल सका
तमाशा-गाह-ए-रोज़-ओ-शब का बीज
अपने तौर पर
नए सिरे से जिस को बो सकूँ
कहाँ के सिलसिले
कैसे वास्ते
रगों में सिर्फ़ इस क़दर लहू बचा है
पँख पँख में
कुछ हवा समेट कर
आख़िरी उड़ान भर सकूँ
बे-मुहाबा सोच
आँधियों सी सोच में
सर्फ़ हो रहा हूँ मैं
हर थपेड़ा मिरे नक़्श चाट चाट कर
धुँद बन रहा है
धुँद गहरी हो रही है
गुज़रते वक़्त से मैं जुड़ रहा हूँ
जुड़ गया हूँ
अपना काम कर चुका हूँ

वायरस

मसीह-ए-वक़्त तुम बताओ क्या हुआ
ज़बाँ पे ये कसीला-पन कहाँ से आ गया
ज़रा सी देर के लिए पलक झपक गई
तो राख किस तरह झड़ी

सुना है दूर देस से
कुछ ऐसे वायरस हमारे साहिलों पे आ गए
जिन के ताब-कार-ए-सहर के लिए
अमृत और ज़हर एक हैं
अब किसी के दरमियान कोई राब्ता नहीं
किसी दवा का दर्द से कोई वास्ता नहीं
हम हवा की मौज मौज से
दर्द खींचते हैं छोड़ते हैं साँस की तरह
लहू की एक एक बूँद ज़ख़्म बन गई
रगों में जैसे बद-दुआएँ तैरती हैं
फाँस की तरह
मसीह-ए-वक़्त तुम बताओ क्या हुआ
देव इल्म के चारग़ का
क्यूँ भला बिफर गया
धुआँ धुआँ बिखर गया
सुनो कि चीख़ता है काम काम
कोई काम
जाओ साहिलों की सम्त हो सके तो रोक लो
इस नए अज़ाब को
नाख़ुदा की आख़िरी शिकस्त तक
समुंदरों की रेत छानते रहो

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