क़ुली ‘क़ुतुब’ शाह की रचनाएँ

प्यारी के नयनाँ हैं जैसे कटारे 

प्यारी के नयनाँ हैं जैसे कटारे
न सम उस के अंगे कोई हैं धारे

असर तुज मोहब्बत का जिस कूँ चड़ेगा
तेरे लाल बिन उस कूँ कोई न उतारे

दो लोचन हैं तेरे निसंग चोर रावत
ओ नो सूँ दिलेरी न कर सब ही हारे

सुहाता है तुज कूँ गुमाँ होर ग़रूरी
के माते अहे तुज हुस्न के प्यारे

साकियाँ में तू है मिर्ग-नैनी छबेली
सजन तू नहीं होते तुज थे किनारे

अजब चपलख़ाई है तेरी नयन में
के खंजन नमन एक तिल कईं न ठारे

नबी सदक़े ‘कुतबा’ सूँ पद पीवे जम-जम
वो चंद मुख के जिस मुख थे जूती सिंगारे

साक़िया आ शराब-ए-नाब कहाँ 

साक़िया आ शराब-ए-नाब कहाँ
चंद के प्याले में आफ़ताब कहाँ

आशिक़ाँ मँगते हैं सिमा करन
चंद गाने कहाँ रूबाब कहाँ

सोक देखो कते हैं साजन कों
वले मेरे नयन कों ख़्वाब कहाँ

नींद की ख़ुमारी नयनाँ में
ऊ कँवल मुख धोवें गुलाब कहाँ

सब इख़्तियार मेरा तुज हात है प्यारा 

सब इख़्तियार मेरा तुज हात है प्यारा
जिस हाल सूँ रखेगा है ओ ख़ुशी हमारा

नयना अँझूँ सूँ धोऊँ पग अप पलक सूँ झाडूँ
जे कुई ख़बर सो लियावे मुख फूल का तुम्हारा

बुत-ख़ाने नयन तेरे होर बुत नयन कियाँ पुतलियाँ
मुज नयन में पुजारी पूजा अधान हमारा

उस पुतलियाँ की सूरत कुई ख़्वाब में जो देखे
रश्क आए मुज करे मत कोई सजदा उस दवारा

तुज ख़याल की हवस थे है जिउ हमन सो ज़िंदा
ओ ख़याल कद ने जावे हम सर थे टुक बहारा

सकी मुख सफ़हे पर तेरे लिखिया राक़िम मलक मिसरा 

सकी मुख सफ़हे पर तेरे लिखिया राक़िम मलक मिसरा
ख़फी ख़त सूँ लिखिया नाज़ुक तेरे दोनों पलक मिसरा

क़लम ले कर जली लिखिया जो कुछ भी ना सकें लिखने
लिखिया है वो कधिन मुख तेरे सफहे पर अलक मिसरा

सू लिख लिख कर परेशाँ हो क़लम लट आप कहते हैं
मुक़ाबिल उस के होसे न लिखेंगे गर दो लक मिसरा

बज़ाँ कर देख मुख धुन का दवानी हो बहाने सूँ
किए सब ख़ुश-नवेसाँ सट क़लम लिख नईं न सक मिसरा

क़लम मुखड़े सूँ नासिक ले लीखे है लब का सुर्ख़ी सूँ
जो कुई भी देख कहते हैं लिखिया है कया ख़ुबक मिसरा

सकी के कुच पे नाज़ुक ख़त न बूझे कोई किने लिखिया
‘कुतुब’ कूँ पूछते तो यूँ के लिखिया है मेरा नक मिसरा

सोने में देखिया के पीता हूँ शराब 

सोने में देखिया के पीता हूँ शराब
आशिक़ाँ का दिल हुआ उस थे कबाब

मेरे बुत कों पूजते सारे बुताँ
सभी रम्मालाँ कहो उस का जवाब

शुक्र ओ शुक्र ओ शुक्र लाखाँ शुक्र है
मेरी मजलिस कों मुल्क ना देखें ख़वाब

आसमाँ कहने कुनह मुश्किल बहुत
गर कहेंगे तो कहेंगे बु-तुराब

आशिकाँ के शेर थे जगमग उठे
मेरी आह का आग है ज्यूँ आफ़ता

कुतुब शह, बंदा गुनह-गार अब अहे
सब करो याराँ दुआ होगा सवाब

तेरे क़द थे सर्व ताज़ा है जम 

तेरे क़द थे सर्व ताज़ा है जम
ऊ चाया है या नौ-चमन में अलम

तू है चंद तारे हैं लश्कर तेरे
तूँ है शाह-ख़ूबाँ में तेरा हश्म

वरक़ सना परनीं लिखया तुज सा होर
अज़ल के मुसव्विर का हरगिज़ क़लम

सिकंदर कूँ थी आरसी जम कूँ जाम
तेरे हस्त है दरपन होर जाम-जम

तेरे मुख के फुल बन कूँ देख लाज थे
छुपाया है मुख आपने कूँ इरम

तुज बिन नींद टुक नैनाँ में मुंज आती नहीं

तुज बिन नींद टुक नैनाँ में मुंज आती नहीं
रन्नी अँध्यारी है कठिन तुज बिन कटी जाती नहीं

तेरा ख़बर ऐ मोहनी मुंज कूँ क्या है बे-ख़बर
दिल थे ख़बर की जाद सूँ अपने की जल्लाती नहीं

कीता सुबूरी मैं करूँ जूँ मीन पानी थे बिछड़ त
तू गल सुनाती है वले की मुंज गले लाती नहीं

कीता अपस कूँ नाज हौर छंद में पवानगी ऐ सकी
आ सेज पर मिल हिल गमीं तुज बिन मुंजे राती नहीं

ऐ धन घूँघट में नाज़ के कीता छुपा के आप से
की मुंज नैन तारियाँ में तुज मुख चंद झमकाती नहीं

ख़ाना नबी सदके ‘कुतुब’ आशिक़ कहाता है तेरा
उस बिन यक़ीं पहचान तूँ भी कोई तुज साती नहीं

उजाला जग मने झमकिया जो बाँदे बाल भोली जौं

उजाला जग मने झमकिया जो बाँदे बाल भोली जौं
हुआ फिर रेन अँधारा बंदे सो केस खोली जौं

लटकती जब चली सो धन सके हैं चालं हंस की काँ
बने बिन फूल सब भरे जो हँस कर बात बोली जौं

करो अब आशिकाँ दिल घट बचन माशूक़ का एक नईं
वफा के अच्छराँ जो थे सो अपने दिल थे धूली जौं

मुहम्मद का मोहब्बत आ किया है ठार मुंज दिल में
अली घर भीक मँगने थे भरी मुंज दिल की झोली जौं

ऐ नार है इस जग मने तुज मुख अजब रौशन चराग़ 

ऐ नार है इस जग मने तुज मुख अजब रौशन चराग़
देखे नहीं अजनों कहीं इस धात का नोखन चराग़

मुल्ला है ख़िदमत-गार तिल धन मुख की मसजीद में
पलकाँ बतियाँ काजल धुआँ देता है लहे लौ बन चराग़

धन देखने कूँ आएगी यक देस तूए उस सबब
फूलाँ करे शोलियाँ सीते रौशन हुआ गुलशन चराग़

उश्शाक़ परवाने हो कर चोंधेर थे पड़ना ककर
अप तन उपर हर यक रतन झमकाए है सू धन चराग़

क्या रस्म है तुज फाम नईं इश्क के मनधीर में
जो आशिकाँ सितमें अपे आ जालते अप मन चराग़

बिरह की अग खिला समंदर कूँ 

बिरह की अग खिला समंदर कूँ
मैं हुमा हों खिलाओ मुंज ना बात

क़द-ए-राना व होर लटकता चाल
पाया दो सुना थे दो जग लमआत

जुल्फ-ए-सेहराँ में तालिबाँ हिलजे
बतिल-अल-सेहर नईं है इस अबियात

नयन दरिया में उबलें हैं मोती
इश्क़ गुडरी बिकावे हाते हात

हुस्न के दावे होर की करते
इस दिए है अज़ल थे हुस्न बरात

शेरा तेरा मआनी सदके़ नबी
लिख लेते हाते गाते पिलात

छबेली केस ख़ब ख़ब देख मेरे ख़यालाँ के

छबेली केस ख़ब ख़ब देख मेरे ख़यालाँ के
कहीं कजली सिजिल मोजाँ के हिन्दू स्याम ढालाँ के

खबाँ सूँ कज-सिजिल है कर नयन प्याले हो दौड़े सू
सो जल सम रंग सराबाँ है जवानी धूप झालाँ के

छूटा आ झप सो घुँघर वालियाँ लिटाँ नयनाँ पे चुलबुलतियाँ
सो जूँ दीं नीर कूँ लहराँ कँवर निर रूप चालाँ के

जो मोती ढाल सरवन के नचावे फूल गालाँ पर
तो जुल्फाँ के सौ हल्क़ियाँ कों नमूने कर ले बालाँ के

सो तूँ मुख सूर राजे पर रूमालाँ जुल्फ़ मुश्कीं के
ओड़ाता हो महल दार आप देश छुंद उस रूमालाँ के

जू बन जैसे कमल और पर भनर भटें अहीं यादो
पीने बैठे हैं कुण्डल कर जो दिखया रास मालाँ के

भरे मय लाल प्याले लाल में अप लाल सों पीने
सो तिस बंद लाल मय थे हो मय ओख रंग लाले-लालाँ के

अचंबे भेद तश्बीहाँ नवियाँ कुतबाँ थे सुन कर सब
लगे करने सिफत मेरी चमन में फूल डालाँ के

ख़बर लिया दो के मेरे तईं सो उस बे-रहम आलम का 

ख़बर लिया दो के मेरे तईं सो उस बे-रहम आलम का
न जानूँ मैं के ओ बे-रहम है सब जग में आदम का

अगर वो मुल्तफित होवे हमारी बात पर यक छन
निवारूँ में ख़जीना उस उपर इस दिल के दिरहम का

गदा तुज इश्क का हूँ दे जकात-ए-इश्क़ मुंज सांईं
के है एजाज़ मंुज मन कूँ के जिओ ईसा-ए-मरयम का

मेरा क़द है सो तुज नेह बाओ थे लऱजाँ सो ज्यूँ जैफ़ा
असा दे हाथ में मेरे के ज्यूँ मूसा-ए-मरहम का

तूँ है ख़ुर्शीद ख़ावर ज़र्रे में जब नागने मुंज कूँ
गिनो या ना गिनो तुज हात है सब हुक्म ख़ातम का

पिया तुज बंद में हिलजा हूँ कर आज़ाद मुंज बंद थे
मआनी कूँ ग़ुलामाँ में ख़िताब अब दे मुकर्रम का

ख़बर लियाया है हुदहुद मेरे तईं उस यार-ए-जानी का 

ख़बर लियाया है हुदहुद मेरे तईं उस यार-ए-जानी का
ख़ुशी का वक़्त है ज़ाहिर करूँ राज़-ए-निहानी का

मेरे जिओ आरसी में ख़याल तुज मुख का सो दिस्ता है
करे ऊ ख़याल मुंज दिल में निशानी ज़र-फ़िशानी का

चिता हो इश्क़ के जंगल में बैठा है दरी ले कर
लिया है झाँप सूँ आहो नमन दिल मुंज अयानी का

ख़ुदा का शुक्र है तुज सल्तनत थे काम पाया हूँ
दंनदी दुश्मन के मुख पर पियूता मय अर्ग़ुवानी का

छबीले मस्त साक़ी के पिछें दौड़े सौ मख़मूराँ
पिलाओ मय हवा अब तो हुआ है गुल-फ़शानी का

हमें है इश्क़ के पंनथ में दोनो आलम थे बे-परवा
लगया है दाग़ मुंज दिल पर उस हिन्दोस्तानी का

पड़े दुम्बाल में मेरे सो उस नैनाँ के दुम्बाले
ख़ुदा इश्क़ मुश्किल है भरम रख तूँ मआनी का

नयन तुज घनेरू तो मंतर भर के सटाती की 

नयन तुज घनेरू तो मंतर भर के सटाती की
दे सो के टुकड़े बिजलियाँ के अनन हित खान बाती की

नयन उश्शाक़ खोजी हो के पा कर खोज यूँ खेलें
जो पुतलियाँ नईं चुरातियाँ तो नयन पर माग जाती की

नयन इश्वियाँ के शहराँ में करिश्मे तेरे कुतवालाँ
दे बतियाँ नाज़ के ग़मज़ियाँ कूँ सो नौबत कराती की

पता ढेटागी क्या प्यारी जो अँख मुज अँख खोले लक
चवाँ बे-गिनत लेने कूँ नहीं तुज आर आती की

अगर तुज मद जवानी का नहीं तूँ मीत कीता तू
क़ुतुब शह कूँ बयाँ लिक लिक मना कर सेज लाती की

पिया बाज पियाला जाए ना

पिया बाज पियाला जाए ना
पिया बाज यक तिल जिया जाए ना

कही थे पिया बिन सुबूरी करूँ
कहया जाए अम्मा किया जाए ना

नहीं इश्क़ जिस दो बड़ा कोड़ है
कर्धी उस से मिल बे-सिया जाए ना

‘क़ुतुब’ शह ने दे मुज दिवाने को पंद
दिवाने कूँ कुच पंद दिया जाए ना

पिया तुज आश्ना मैं तूँ बे-गाना न कर मुंज कूँ

पिया तुज आश्ना मैं तूँ बे-गाना न कर मुंज कूँ
रनी नईं यक रती तुज याद बिन तूँ न बिसर मुंज कूँ

तेरे पग तल रखी हूँ सीस अज़ल दिन थे अबद लक भी
अजब क्या है जो नित सर भईं धरें सा तो अंबर मुंज कूँ

जहाँ तूँ वाँ हूँ मैं प्यारे मुंजे क्या काम है किस सूँ
न बुत-ख़ाना का मुंज परवा न मस्जिद का ख़बर मंुज कूँ

जन्नत होर दोज़ख होर एराफ़ कुच नीं है मेरे लीखे
जिधर तूँ वाँ मेरा जन्नत जिधर नईं वाँ सक़र मुंज कूँ

जन्नत कूँ होर दोज़ख कूँ सो मस्जिद बुत-ख़ाना क्या
किसे ना जानूँ मैं मालुम नईं कोई तुज ब़गैर मुंज कूँ

पिया तुल इश्क़ कूँ देती हों सुद-बुद-हूर जियू दिल में 

पिया तुल इश्क़ कूँ देती हों सुद-बुद-हूर जियू दिल में
हुनूज़ यक होक नईं मिलता किसे बोलूँ तू मुश्किल में

ख़ुशी के अँझवाँ सेती भराई समदाराँ सा तो
के शह के वस्ल की दौलत गिर दुरगंज हासिल में

भँवर काला किया है भेज तेरे मुख कमल के तईं
वले इस भौरे थे तेरे पीरत में हुईं कामिल में

अज़ल थे साईं का दिल होर मेरा दिल के हैं एक
बिछड़ कर क्यूँ रहूँ ऐसे जीवन प्यारे थे यक तिल में

नबी सदके़ रयन सारी दो तन जूँ शम्मा जलती थी
जो तोर के नमन रही थी ‘क़ुतुब’ शह चाँद सूँ मिल में

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