कीर्ति चौधरी की रचनाएँ

लता-1 

बड़े-बड़े गुच्छों वाली
सुर्ख़ फूलों की लतर :
जिसके लिए कभी ज़िद थी —
’यह फूले तो मेरे ही घर !’

अब कहीं भी दिखती है
किसी के द्वार-वन-उपवन,
तो भला लगता है ।

धीरे-धीरे
जाने क्यों भूलती ही जाती हूँ मैं !
ख़ुद को, और अपनापन !

बस, भूलती नहीं है तो
बड़े-बड़े गुच्छों वाली
सुर्ख़ फूलों की लतर :
जिसके लिए कभी ज़िद थी —
’यह फूले तो मेरे ही घर !’

देव उवाच

उज्ज्वल हैं, उज्ज्वल लेंगे, उज्ज्वलतर देंगे–
माणिक-मुक्ता बोएँगे, जी भर काटेंगे ।
करने दो मंथन उनको यदि बड़ा चाव है–
अमृत तो हम लाएँगे, सबको बाँटेंगे ।

फूल झर गए

फूल झर गए।

क्षण-भर की ही तो देरी थी
अभी-अभी तो दृष्टि फेरी थी
इतने में सौरभ के प्राण हर गए ।
फूल झर गए ।

दिन-दो दिन जीने की बात थी,
आख़िर तो खानी ही मात थी;
फिर भी मुरझाए तो व्यथा हर गए
फूल झर गए ।

तुमको औ’ मुझको भी जाना है
सृष्टि का अटल विधान माना है
लौटे कब प्राण गेह बाहर गए ।
फूल झर गए ।

फूलों-सम आओ, हँस हम भी झरें
रंगों के बीच ही जिएँ औ’ मरें
पुष्प अरे गए, किंतु खिलकर गए ।
फूल झर गए ।

प्रस्तुत 

मैं प्रस्तुत हूँ,
इन कई दिनों के चिन्तन और संघर्ष बाद,
यह क्षण जो अब आ पाया है,
उस में बन्धकर मैं प्रस्तुत हूँ,
तुमसे सब कुछ कह देने को ।

वह जो अब तक यूँ छिपा चला आया,
ज्यों सागर तो रत्नाकर ही कहलाता है,
अन्दर क्या है, यह ऊपरवाला क्या जाने ।

मैं प्रस्तुत हूँ,
यह क्षण भी कहीं न खो जाए ।

अभिमान नाम का, पद का भी तो होता है ।
यह कछुए-सी मेरी आत्मा,
पंजे फैला,
असली स्वरूप जो तुम्हें दिखाने को,
उत्सुक हो बैठी है,
क्या जाने अगले क्षण को ही आहट को पा,
सब कुछ अपने में फिर समेट ले झट अन्दर ।

मैं प्रस्तुत हूँ
तुमसे सब कुछ कह देने को ।

इस सागर में तुम मणि-रत्नों की कौन कहे,
कुछ शंख-सीपियाँ भी तो कहीं न पाओगे ।
केवल घोंघे — केवल घोंघे ।
वे जो साधारण नदियों, तालाबों, धाराओं में भी
पाए जाते हैं ।

मैं प्रस्तुत हूँ — कह देने को,
मेरे गीतों, मेरी बातों को यहाँ-वहाँ
जो ज़िक्र असाधारणता के हैं दिख जाते,
वे सभी ग़लत ।
सारा जीवन मेरा साधारण ही बीता ।
हर सुबह उठा तो काम-काज दफ़्तर, फ़ाइल
झिड़की-फटकारें, वही-वही कहना-सहना ।

मैंने कोई भी बड़ा दर्द तो सहा नहीं ।
कुछ क्षण भी मुझ सँग बहुत हर्ष तो रहा नहीं ।
जो दृढ़ता-दर्प पंक्तियों में मैंने बान्धा,
वह मुझ में क्या,
मेरी अगली पीढ़ी में भी सम्भाव्य नहीं ।
वह गीत कि जिसका दर्द देखकर,
आँखें सब भर आई थीं,
मुझमें उसकी अनुभूति महज़
घर के झगड़ों से उपजी थी ।

वह अडिग, अविचलित पन्थ-ज्ञान,
जिसके ऊपर
भावुक हृदयों की श्रद्धा उमड़ी-मण्डराई
बस विवश, पराजित, तकिये में मुँह गाड़,
खीजकर लिया गया ।

वे स्थितियाँ जो रोज़ तुम्हारे, इसके, उसके जीवन में,
आती रहतीं,
मेरी भी हैं ।
पर चतुराई तो यह देखो
तुम सब के सब तो सहन कर रहे मौन खड़े
मुझमें क्या ख़ूबी,
किंचित दुख, किंचित सुख पर,
विश्वास-दर्द के गीत बनाकर गाता हूँ ।

कह सकता हूँ
क्या इतनी ही ख़ूबी सब कुछ !
इस बल पर मेरे हर्ष-पीर बड़भागी हैं ?
क्या इसीलिए अव्यक्त मूक रह जाओगे,
ओ मेरे बन्धु-सखा ज्ञानी-संज्ञानी ?

आओ तो मेरे सँग आओ
कुछ और नहीं तो, बस,
चीख़ो ही, चिल्लाओ ।
बेसुरा सही,
बेछन्द सही ।

कम से कम मेरा दर्प हटे
मैं जानूँ तो ।
जिस एक व्यथा से भटका-भटका मैं फिरता
वह तुम में, उस में,
इस-उस में, सभी जगह ।
मैं मानूँ तो —
अभिव्यक्त मुझे करनी है,
जन-मन की वाणी ।

मेरी प्रतिभा यदि कल्याणी
तो दर्द हरे,
सुख-सौख्य भरे,
यही नहीं कि —
अपने
तन के, मन के,
निजी, व्यक्तिगत
दुख-दर्दों में जिए मरे ।

अनुपस्थिति

सुबह हुई तो,
सूरज फीका-फीका निकला ।
वातायन की हवा नहीं गाती थी गीत ।
सजे हुए गुलदानों के रक्तिम गुलाब,
क्या जाने क्यों पड़ते जाते थे,
प्रतिक्षण पीत ।

बाहर बिखरा,
क्षितिज शून्य मुझसे निस्पृह था ।
आकर्षण भी नहीं, न था कुछ आमन्त्रण ।
चित्र-लिखी-सी सज्जा दीवारों-पर्दों की,
आप लौट आती आवाज़,
कैसा प्रण ।

साँझ घिरी तो,
लगा अचानक अब अन्धियारी,
चिर अभेद्य होकर यहाँ ही मण्डराएगी ।
भूले-भटके एक किरण भी नहीं यहाँ
ज्योतिर्मय काँचन तन से भू
छू जाएगी ।

दीप जला, पर
उसका भी प्रकाश मटमैला
लौ की दीप्ति क्षीण होती जाती छिन-छिन ।
निर्बल होते मन पर सहसा याद घिरी —
’केवल एक तुम्हीं इस गृह में नहीं,
आज के दिन ।’

स्वयंचेत

घाव तो अनगिन लगे,
कुछ भरे, कुछ रिसते रहे,
पर बान चलने की नहीं छूटी ।

चाव तो हर क्षण जगे,
कुछ कफ़न ओढ़े, किरन से सम्बन्ध जोड़े,
आस जीवन की नहीं टूटी ।

भाव तो हर पल उठे,
कुछ सिन्धुवाणी में समाए, कुछ किनारे,
प्रीति सपनों से नहीं रूठी ।

इस तरह हँस-रो चले हम
पर किसी भी ओर से संकेत की
कोई किरन भी तो नहीं फूटी ।

दीठ ना मिलाओ 

सूर्य है, दीठ न मिलाओ
नहीं
आँख भर आएगी ।

पुष्प यह, डाल मत बिलगाओ–
गंध झर जाएगी ।
उस की सुवास से प्राण अभिराम करो ।

चन्र वह, हाथ मत फैलाओ–
आस मर जाएगी ।
छिटकी जुन्हाई में छाया ललाम करो ।

बदली का दिन

यह आज सुबह
जो बादल छाए
धुँधुआते
तो धूप
खिली ही नहीं
और दिन बीत गया।

यह नहीं कि
खेतों में ही
सोना बरसा हो
दिन तो बस
यों ही यों ही-सा
कुछ बीत गया।

ज्यों
बिन जाने
बिन खर्च किए
मन का मधुघट
हम सहसा देखें,
यह लो, यह तो रीत गया।

बरसते हैं मेघ झर-झर

बरसते हैं मेघ झर-झर

भीगती है धरा
उड़ती गंध
चाहता मन
छोड़ दूँ निर्बंध
तन को, यहीं भीगे
भीग जाए
देह का हर रंध्र

रंध्रों में समाती स्निग्ध रस की धार
प्राणों में अहर्निश जल रही
ज्वाला बुझाए
भीग जाए
भीगता रह जाए बस उत्ताप!

बरसते हैं मेघ झर-झर

अलक माथे पर
बिछलती बूँद मेरे
मैं नयन को मूँद
बाहों में अमिय रस धार घेरे
आह! हिमशीतल सुहानी शांति
बिखरी है चतुर्दिक
एक जो अभिशप्त
वह उत्तप्त अंतर
दहे ही जाता निरंतर

बरसते हैं मेघ झर-झर

कम्पनी बाग़

लतरें हैं, ख़ुशबू है,पौधे हैं, फूल हैं ।
ऊँचे दरख़्त कहीं, झाड़ कहीं ,शूल हैं ।

लान में उगाई तरतीबवार घास है ।
इधर-उधर बाक़ी सब मौसम उदास है ।

आधी से ज़्यादा तो ज़मीन बेकार है ।
उगे की सुरक्षा ही माली को भार है ।

लोहे का फाटक है, फाटक पर बोर्ड है ।
दृश्य कुछ यह पुराने माडल की फ़ोर्ड है ।

भँवरों का, बुलबुल का, सौरभ का भाग है ।
शहर में हमारे यही कम्पनी बाग़ है ।

एक साँझ 

वृक्षों की लम्बी छायाएँ कुछ सिमट थमीं ।
धूप तनिक धौली हो,
पिछवाड़े बिरम गई ।
घासों में उरझ-उरझ,
किरणें सब श्याम हुईं ।
साखू-शहतूतों की डालों पर,
लौटे प्रवासी जब,
नीड़ों में किलक उठी,
नीड़ों में किलक उठी,
दिशि-दिशि में गूँज रमी ।
पच्छिम की राह बीच,
सुर्ख़ चटक फूलों पर,
कोई पर, कूलों पर,
पलकें समेट उधर
साँझ ने सलोना सुख हौले से टेक दिया।
एकाएक जलते चिराग़ों को
चुपके से जैसे किसी ने ही मंद किया ।
दुग्ध-धवल गोल-गोल खम्भों पर,
छत पर, चिकों पर,
वहाँ काँपती बरौनियों की परछाहीं बिखर गई ।
आह ! यह सलोनी, यह साँझ नई !

मैं तो प्रवासी हूँ :
ऊँचा यह बारह-खम्भिया महल,
औरों का ।
दुग्ध-धवल आँखों में,
अंजन-सी अँजी साँझ
कजरारी, बाँकी, कँटीली,
उस चितवन-सी सजी साँझ
औरों की ।
मेरी तो
छज्जों, दरवाज़ों,
झरोखों, मुँडेरों पर
मँडराते,
घुमड़-घुमड़ भर जाते,
धुएँ बीच,
घुटती, सहमती, उदास साँझ
और–और–और वह शुक्रतारा !
सुबह तक जिस पर अँधियारे की परत जमी ।

कुहू

दिन बीते कभी इस शाख पर
किसी कोयल को कूकते सुना था ।

तब से जब भी इस ओर आती हूँ
बार-बार कानों में वही ‘कुहू’
गूँजती हुई पाती हूँ ।

जैसे मेरे मन के लिए
एक बार पा लेना ही हमेशा की थाती है ।
या वह कोयल की कूक है
जो अमराई में छा ही जाती है ।

पंख फैलाए

पंख फैलाए
त्वरित गति से अभी जो उड़ गए हैं
मुग्ध विस्मृत कर मुझे
वे अनगिनत जोड़े,
न जाने नाम क्या था,
ग्राम क्या था,
कहाँ के उड़ते यहाँ आए
पंख फैलाए ।

शुभ्र लहरों से भरे आकाश-ऊपर
तैरते
वन-हंस, वन-हंसी,
सुनहरे श्वेत पंखी
या कि भूरे और काले,
अजनबी सब नाम वाले
भूलती हूँ
कौन थे जो उड़े नभ में
उतर प्राणों में समाए ।

यह अजब सौन्दर्य
केवल एक क्षण का
उन्हें शायद :
वे कि जो हैं कर्मरत
चलते सतत
इस यात्रा में रुक
नहीं जो आँख भर कर देख पाए–
धरा पर बिखरा विपुल सौन्दर्य ।

उन्हीं के हित,
विजन पथ,
आकाश रथ
पर धरे अद्भुत वेश,
सुषमा स्वयं आए ।
पंख फैलाए–
त्वरित गति से…

वक़्त 

यह कैसा वक़्त है
कि किसी को कड़ी बात कहो
तो वह बुरा नहीं मानता|

जैसे घृणा और प्यार के जो नियम हैं
उन्हें कोई नहीं जानता|

ख़ूब खिले हुए फूल को देख कर
अचानक ख़ुश हो जाना,
बड़े स्नेही सुह्रद की हार पर
मन भर लाना,
झुंझलाना,
अभिव्यक्ति के इन सीधे-सादे रूपों को भी
सब भूल गए,
कोई नहीं पहचानता

यह कैसी लाचारी है
कि हमने अपनी सहजता ही
एकदम बिसारी है!

इसके बिना जीवन कुछ इतना कठिन है
कि फ़र्क़ जल्दी समझ में नहीं आता
यह दुर्दिन है या सुदिन है|

जो भी हो संघर्षों की बात तो ठीक है
बढ़ने वालों के लिए
यही तो एक लीक है|

फिर भी दुख-सुख से यह कैसी निस्संगता !
कि किसी को कड़ी बात कहो
तो भी वह बुरा नहीं मानता|

यह कैसा वक़्त है?

जो व्यक्त नहीं कर पाया हूँ

जो व्यक्त नहीं कर पाया हूँ
वह क्या मेरे मन में नहीं है ?
जो भी सोची जा सकती है
पीड़ा क्या नहीं तन ने सही है ?
वहाँ करुणा की धार उपजी
जो नहीं मुझ तक बही है ।
मैं ने तो अरे, पा कर लेने को
वह बाँह ही जा गही है ।

सुख 

रहता तो सब कुछ वही है
ये पर्दे, यह खिड़की, ये गमले…
बदलता तो कुछ भी नहीं है ।

लेकिन क्या होता है
कभी-कभी
फूलों में रंग उभर आते हैं
मेज़पोश-कुशनों पर कढ़े हुए
चित्र सभी बरबस मुस्काते हैं,
दीवारें : जैसे अब बोलेंगी
आसपास बिखरी क़िताबें सब
शब्द-शब्द
भेद सभी खोलेंगी ।
अनजाने होठों पर गीत आ जाता है ।

सुख क्या यही है ?
बदलता तो किंचित् नहीं है,
ये पर्दे–यह खिड़की–ये गमले…

प्रतीक्षा 

करूँगी प्रतीक्षा अभी ।
दृष्टि उस सुदूर भविष्य पर टिका कर
फिर करूँगी काम ।
प्रश्न नहीं पूछूँगी,
जिज्ञासा अन्तहीन होती है ।
मेरे लिए काम जैसे
जपने को एक नाम ।

मैं ही तो हूँ
जिसने उपवन में
बीजों को बोया है ।
अंकुर के उगने से बढ़ने तक
फलने तक
धैर्य नहीं खोया है
एक-एक कोंपल की चाव से
निहारी है बाट सदा ।

देखे हैं
शिशु की हथेली मसृण
हरित किसलय दल
कैसे बढ़ आते हैं।
दुर्बल कृश अंग लिए उपजे थे
वे ही परिपुष्ट बने
झूम लहराते हैं ।

मैं ही तो हूँ
जिसने प्यार से सँवारी है
डाल-डाल
आएँगी कलियाँ
फिर बड़े गझिन गुच्छों में
फूलेंगे फूल लाल
करूँगी प्रतीक्षा अभी
पौधा है वर्तमान
हर दिन हर क्षण ।

नव कोंपल पल्लव समान
हरियाए, लहराए,
यत्न से सँवारूँगी ।
आख़िर तो
बड़े गझिन गंध-युक्त गुच्छों-सा
आएगा भविष्य कभी ।

करूँगी प्रतीक्षा अभी ।

क्यों

ऐसा क्यों होता है?
ऐसा क्यों होता है?

उमर बीत जाती है करते खोज,
मीत मन का मिलता ही नहीं,
एक परस के बिना,
हृदय का कुसुम
पार कर आता कितनी ऋतुएँ, खिलता नहीं।
उलझा जीवन सुलझाने के लिए
अनेक गाँठें खुलतीं;
वह कसती ही जाती जिसमें छोर फँसे हैं।
ऊपर से हँसने वाला मन अन्दर-ही-अन्दर रोता है,
ऐसा क्यों होता है?
ऐसा क्यों होता है?

छोटी-सी आकांक्षा मन में ही रह जाती,
बड़े-बड़े सपने पूरे हो जाते, सहसा।
अन्दर तक का भेद सहज पा जाने वाली
दृष्टि,
देख न पाती
जीवन की संचित अभिलाषा,
साथ जोड़ता कितने मन
पर एकाकीपन बढ़ता जाता,
बाँट न पाता कोई
ऐसे सूनेपन को
हो कितना ही गहरा नाता,
भरी-पूरी दुनिया में भी मन ख़ुद अपना बोझा ढोता है।
ऐसा क्यों होता है?
ऐसा क्यों होता है?

कब तक यह अनहोनी घटती ही जाएगी?
कब हाथों को हाथ मिलेंगे
सुदृढ़ प्रेममय?
कब नयनों की भाषा
नयन समझ पाएंगे?
कब सच्चाई का पथ
काँटों भरा न होगा?
क्यों पाने की अभिलाषा में मन हरदम ही कुछ खोता है?
ऐसा क्यों होता है?
ऐसा क्यों होता है?

विगत 

यही तो था
जिसे चाहा था
सदा दूसरों के पास देख
मन में सराहा था
’अरे हमारे पास भी यदि होता
तो यह जीवन क्या सँकरी गलियों में
बे हिसाब खोता?
हम भी चलते
उस प्रशस्त राज-पथ पर
बढ़ने वालों के क़दमों से क़दम मिला
बोझे को फूल-सा समझते
हम भी चलते
गर्व से सर ऊँचा किए।

पर जो बीत गए हैं कठिन अभावों के क्षण
कहीं वहीं तो नहीं रह गया
वह सरल महत्त्वाकांक्षी मन
आह ! उसके बिना तो सब अहूरा है
वह हर सपना
जो हुआ पूरा है !

आगत का स्वागत 

मुँह ढाँक कर सोने से बहुत अच्छा है,

कि उठो ज़रा,

कमरे की गर्द को ही झाड़ लो।

शेल्फ़ में बिखरी किताबों का ढेर,

तनिक चुन दो।

छितरे-छितराए सब तिनकों को फेंको।

खिड़की के उढ़के हुए,

पल्लों को खोलो।

ज़रा हवा ही आए।

सब रौशन कर जाए।

… हाँ, अब ठीक

तनिक आहट से बैठो,

जाने किस क्षण कौन आ जाए।

खुली हुई फ़िज़ाँ में,

कोई गीत ही लहर जाए।

आहट में ऐसे प्रतीक्षातुर देख तुम्हें,

कोई फ़रिश्ता ही आ पड़े।

माँगने से जाने क्या दे जाए।

नहीं तो स्वर्ग से निर्वासित,

किसी अप्सरा को ही,

यहाँ आश्रय दीख पड़े।

खुले हुए द्वार से बड़ी संभावनाएँ हैं मित्र!

नहीं तो जाने क्या कौन,

दस्तक दे-देकर लौट जाएँगे।

सुनो,

किसी आगत की प्रतीक्षा में बैठना,

मुँह ढाँक कर सोने से बहुत बेहतर है।

मुझे फिर से लुभाया

खुले हुए आसमान के छोटे से टुकड़े ने,
मुझे फिर से लुभाया|
अरे! मेरे इस कातर भूले हुए मन को
मोहने,
कोई और नहीं आया
उसी खुले आसमान के टुकड़े ने मुझे
फिर से लुभाया|

दुख मेरा तब से कितना ही बड़ा हो
वह वज्र सा कठोर,
मेरी राह में अड़ा हो
पर उसको बिसराने का,
सुखी हो जाने का,
साधन तो वैसा ही
छोटा सहज है|

वही चिड़ियों का गाना
कजरारे मेघों का
नभ से ले धरती तक धूम मचाना
पौधों का अकस्मात उग आना
सूरज का पूरब में चढ़ना औ
पच्छिम में ढल जाना
जो प्रतिक्षण सुलभ,
मुझे उसी ने लुभाया

मेरे कातर भूले हुए मन के हित
कोई और नहीं आया

दुख मेरा भले ही कठिन हो
पर सुख भी तो उतना ही सहज है

मुझे कम नहीं दिया है
देने वाले ने
कृतज्ञ हूँ
मुझे उसके विधान पर अचरज है|

केवल एक बात थी 

केवल एक बात थी

कितनी आवृत्ति

विविध रूप में करके तुमसे कही

फिर भी हर क्षण

कह लेने के बाद

कहीं कुछ रह जाने की पीड़ा बहुत सही

उमग-उमग भावों की

सरिता यों अनचाहे

शब्द-कूल से परे सदा ही बही

सागर मेरे ! फिर भी

इसकी सीमा-परिणति

सदा तुम्हीं ने भुज भर गही, गही ।

परिस्थितियाँ 

ऊबड़-खाबड़ बेतरतीब पत्थरों में

थोड़ी जगह बनी।

बादलों की छाँह कभी दूर

कभी हुई घनी।

पास ही निर्झर की छल-छल

छलती रही।

जल सामीप्य की आस

पलती रही।

कँकरीली पथरीली एक चप्पा जगह

माटी की उर्वरता दूर से कर संग्रह

पौधा बढ़ता गया

मार्ग गढ़ता गया।

घाव तो अनगिन लगे

घाव तो अनगिन लगे
कुछ भरे, कुछ रिसते रहे,
पर बान चलने की नहीं छूटी !

चाव तो हर क्षण जगे
कुछ कफ़न ओढ़े, किरन से सम्बन्ध जोड़े,
आस जीवन की नहीं टूटी !

भाव तो हर पल उठे
कुछ सिन्धु वाणी में समाए, कुछ किनारे
प्रीति सपनों से नहीं रूठी !

इस तरह हँस-रो चले हम
पर किसी भी ओर से संकेत की
कोई किरन भी तो नहीं फूटी !

यथास्थान

नहीं,वहीं कार्निस पर

फूलों को रहने दो।

दर्पण में रंगों की छवि को

उभरने दो।

दर्द :उसे यहीं

मेरे मन में सुलगने दो।

प्यास : और कहाँ

इन्हीं आँखों में जगने दो।

बिखरी-अधूरी अभिव्यक्तियाँ

समेटो,लाओ सबको छिपा दूँ

कोई आ जाए!

छि:,इतना अस्तव्यस्त

सबको दिखा दूँ!

पर्दे की डोर ज़रा खीचों

वह उजली रुपहली किरन

यहाँ आए

कमरे का दुर्वह अंधियारा तो भागे

फिर चाहे इन प्राणों में

जाए समाए

उसे वहीं रहने दो।

कमरे में अपने

तरतीब मुझे प्यारी है।

चीजें हों यथास्थान

यह तो लाचारी है।

तुझसे नेह लगाया

क्या पाया

तुझ से जो नेह लगाया

सुख-दु:ख सब कह डाला

मन में कोई भेद न पाला

क्या पाया पर

खड़ा रह गया हाथ पसारे

झूठे होकर मंद पड़े

वे उज्जवल तारे प्रेम-प्रीति के

आह ! देह का धर्म अकेला मैं ही झेलूँ?

यह कैसी दूरी

केसी मेरी मज़बूरी

देख रहा हूँ

छू सकता हूँ

आँखों ही आँखों तुझ को पी सकता हूँ

सुख पाता हूँ

उठा हाथ से दु:ख क्यों तुझको बाँट न पाया

मुझे नियति ने क्यों इतना असहाय बनाया

क्या पाया यदि मैंने तुझ से नेह लगाया?

तू भी किसी डाल पर होता खिले फूल-सा

तू भी सकला जाता माथा

गंध बसे मलयानिल के चंचल दुकूल-सा

क्यों मैंने तुझसे प्रत्याशा ही की होती?

संग-संग कितने दिवस बिताए

सुख-दु:ख के अनगिनती चित्र बनाए रंग-रंग

आह ! दु:ख की एक मार ने

सब बिसराया

क्या पाया, यदि मैंने तुझसे नेह लगाया ?

ऐसा क्यों होता है 

ऐसा क्यों होता है ?

ऐसा क्यों होता है ?

उमर बीत जाती है करते खोज

मीत मन का मिलता ही नहीं

एक परस के बिना हृदय का कुसुम

पार कर कितनी ऋतुएँ

खिलता नहीं

उलझा जीवन सुलझाने के लिए

अनेकों गाँठें खुलतीं

वह कसती ही जाती

जिसमें छोर फँसे हैं

ऊपर से हँसने वाला मन अंदर ही अंदर रोता है

ऐसा क्यों होता है?

ऐसा क्यों होता है ?

छोटी-सी आकांक्षा मन में ही रह जाती

बड़े-बड़े सपने पूरे हो जाते सहसा

अंदर तक का भेद

सहज पा जाने वाली दृष्टि

देख न पाती

जीवन की संचित अभिलाषा

साथ जोड़ता कितने मन पर

एकाकीपन बढ़ता जाता

बाँट न पाता

कोई से सूनेपन को

हो कितना ही गहरा नाता

भरी-पूरी दुनिया में भी मन खुद अपना बोझा ढोता है

ऐसा क्यों होता है ?

ऐसा क्यों होता है ?

कब तक यह अनहोनी घटती ही जाएगी

कब हाथों को हाथ मिलेगा

सुदृढ़ प्रेममय

कब नयनों की भाषा

नयन समझ पाएंगे

कब सच्चाई का पथ

काँटों भरा न होगा

क्यों पाने की अभिलाषा में

मन हरदम ही कुछ खोता है!

ऐसा क्यों होता है ?

ऐसा क्यों होता है ?

प्रेम 

तुमने हाथ पकड़कर कहा
तुम्हीं हो मेरे मित्र
तुम्हारे बग़ैर अधूरा हूँ मैं
क्या वह तुम्हारा प्रेम था ?

मैंने हाथ छुड़ाकर
मुँह फेर लिया
मेरी आँखों में आँसू थे
यह भी तो प्रेम था ।
उस हाथ से दुःख क्यों तुझको बांट न पाया
मुझे नियति ने क्यों इतना असहाय बनाया
क्या पाया यदि मैंने तुझसे नेह लगाया?

तू भी किसी डाल पर होता खिले फूल-सा
तू भी सहला जाता माथा
गंध बसे मलयानिल के चंचल दुकूल-सा
क्यों मैंने तुझसे प्रत्याशा ही की होती?

संग-संग कितने दिवस बिताए
सुख-दुःख के अनगिनत चित्र बनाए रंग-रंग
आह! दुःख की एक मार ने
सब बिसराया

क्या पाया यदि मैंने तुझसे नेह लगाया?
खुले हुए आसमान के छोटे-से टुकड़े ने
मुझे फिर से लुभाया
अरे! मेरे इस कातर भूले हुए मन को
मोहने
कोई और नहीं आया
उसी खुले आसमान के टुकड़े ने मुझे
फिर से लुभाया

दुःख मेरा तबसे कितना ही बड़ा हो
वह वज्र-सा कठोर
मेरी राह में अड़ा हो
पर उसको बिसराने का
सुखी हो जाने का
साधन तो वैसा ही
छोटा सहज है

वही चिड़ियों का गाना
कजरारे मेघों का
नभ से ले धरती तक धूम मचाना
पौधों का अकस्मात उग आना
सूरज का पूरब में चढ़ना और
पश्चिम में ढल जाना
जो प्रतिक्षण सुलभ
मुझे उसी ने लुभाया

मेरे कातर भूले हुए मन के हित
कोई और नहीं आया

दुःख मेरा भले ही कठिन हो
पर सुख भी तो उतना ही सहज है

मुझे काम नहीं दिया है
देने वाले ने
कृतज्ञ हूं
मुझे उसके विधान पर अचरज है!

एक सुनहली किरण उसे भी दे दो 

एक सुनहली किरण उसे भी दे दो
भटक गया जो अंधियारे के वन में,
लेकिन जिसके मन में,
अभी शेष है चलने की अभिलाषा
एक सुनहली किरण उसे भी दे दो

मौन कर्म में निरत
बध्द पिंजर में व्याकुल
भूल गया जो
दुख जतलाने वाली भाषा
उसको भी वाणी के कुछ क्षण दे दो

तुम जो सजा रहे हो
ऊंची फुनगी पर के ऊर्ध्वमुखी
नव पल्लव पर आभा की किरनें
तुम जो जगा रहे हो
दल के दल कमलों की ऑंखों के
सब सोये सपने

तुम जो बिखराते हो भू पर
राशि राशि सोना
पथ को उद्भासित करने

एक किरण से
उसका भी माथा आलोकित कर दो

एक स्वप्न
उसके भी सोये मन में
जागृत कर दो।

हर ओर जिधर देखो 

हर ओर जिधर देखो

रोशनी दिखाई देती है

अनगिन रूप रंगों वाली

मैं किसको अपना ध्रुव मानूं

किससे अपना पथ पहचानूं

अंधियारे में तो एक किरन काफी होती

मैं इस प्रकाश के पथ पर आकर भटक गया।

चलने वालों की यह कैसी मजबूरी है

पथ है – प्रकाश है

दूरी फिर भी दूरी है।

क्या उजियाला भी यों सबको भरमाता है?

क्या खुला हुआ पथ भी

सबको झुठलाता है?

मैने तो माना था

लड़ना अंधियारे से ही होता है

मैने तो जाना था

पथ बस अवरोधों में ही खोता है

वह मैं अवाक् दिग्भ्रमित चकित-सा

देख रहा-

यह सुविधाओं, साधनों,

सुखों की रेल पेल।

यह भूल भुलैया

रंगों रोशनियों का,

अद्भुत नया खेल।

इसमें भी कोई ज्योति साथ ले जाएगी?

क्या राह यहां पर आकर भी मिल पाएगी?

संस्कार

अब र किसी को भला कहूँ क्या !
ख़ुद यह मेरा मन
असफल करता रहता है
मेरी उक्ति सदा
प्रतिदिन प्रतिक्षण उससे बदला लेना है
उससे नफ़रत करनी है
इस पर आड़े सीधे, जैसे भी बने
मगर हारों की ज़िम्मेदारी रखनी है…
पर मिलने पर बस
वही नमन वंदन सिहरन ।

चिड़िया 

काले गँदले जल के अन्दर
घुस जाती है
लम्बी गर्दन वाली चिड़िया
ऊँचे उड़कर
बैठ डाल पर
फिर मनहर स्वर में गाती है ।

दर्द हो तो 

दर्द हो तो बँटाने को लोग तो बहुतेरे ।
ज़रा बोलो तो सही, दूर हो व्यथा जो घेरे ।
लेकिन आख़िर उसे कुछ कहा भी तो जाए-
दौड़-दौड़ ख़ुद ही जो दर्द से करता है फेरे ।

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