आनंद गुप्ता की रचनाएँ

तुम लौट आना

तुम लौट आना
जैसे किसी स्त्री के गर्भ में
लौटता है नया जीवन
जैसे लौट आती है आवाजें
चट्टानों से टकराकर हर बार
जैसे हर पराजय के बाद
फिर से लौट आती है उम्मीद।

तुम उस तरह मत लौटना
जैसे क्षणिक सुख बिखेर कर
वापस लौट आती है लम्बी उदासी।

तुम लौटना
जैसे गहरे जख्म के बाद
खिलखिलाती हुई
वापस लौट आती है शरीर पर त्वचा
जैसे पतझड़ में टूटी पत्तियाँ
लौट आती है वसंत में
जैसे आंगन में फुदकती शावक चिड़ियाँ
लौट आती है घोंसले में सुरक्षित

तुम लौट आना हर बार
जैसे लम्बी दूरी तय करके
प्रवासी पक्षियाँ
सही रास्ते लौट आती है अपने घर
तुम लौट आना
उन शब्दों की तरह
जिनसे मेरी हर कविता मुक्कमल होती है।

तुम्हारा प्रेम

तुम्हारा प्रेम बारिश की बूँदें है
कल सारी रात बरसता रहा आकाश
मैं एक पेड़ बन भीगता रहा
तुम मेरी जड़ों में घुलती रही रात भर!
देखो न तुम्हारी छुअन से
पत्ती-पत्ती,डाल-डाल,फूल-फूल
दूर तक फैले घास
झिलमिला रहा है सब कुछ
बारिश से धुल कर सुबह की धूप
तुम्हारी कोमल हँसी की तरह पवित्र बन
मेरे चेहरे पर गिरती है
मेरे अंदर खिल उठते हैं कई-कई कमल
तुम खिड़कियों से दूर बहती
हुगली नदी सा उद्दाम
इस वक्त बह रही हो मेरी नसों में
मेरा हृदय वह सागर जहाँ तुम्हें उतरना है
बंगाल की खाड़ी से उठती
मानसूनी हवाओं की नमी
तुम्हारे बालो को भिगोती
तुम्हारी आँखों में उतर आई है इस वक्त
इस वक्त तुम्हारी आँखें
पड़ोस का ‘मीठा तालाब’ हो गई है
जहाँ सदा आकाश बन झिलमिलाता हूँ
जिसे तैर पार किया अनगिनत बार
पर आज न जाने क्यूँ
मैं डूबा जा रहा हूँ?

प्रेम में रेत होना

रेत की देह पर
नदी की असंख्य प्रेम कहानियाँ है
नदी पत्थर को छूती है
पत्थर काँपता है
और बिना कुछ सोचे नदी को चूमता है
नदी उसका आलिंगन करती है
पत्थर उतरता है धीरे-धीरे
नदी के दिल में
गहरे और गहरे
नदी के साथ प्रेम क्रीड़ा करता हुआ
पत्थर बहता है नदी के साथ
पत्थर मदहोश हो
टकराता है पत्थरों से
टूटता है पिघलता है
और रेत बन जाता है
प्रेम में हर पत्थर
हर चट्टान को
अंततः रेत होना होता है
जिस पर बच्चे खेलते हैं
जिस पर एक प्रेमी लिखता है
अपनी प्रेमिका का नाम
जिससे घर बनते हैं।

वसंत एक उम्मीद का नाम है 

उम्मीद
एक नवजात चिड़ियाँ की आँखों में बसा
खुले आकाश की पहली उड़ान है
हर पतझड़ के बाद
खिलखिलाते वसंत का आगमन
एक उम्मीद लिए आती है
आम के पेड़ों पर लदी मंजरियाँ
डालियों पर छाये
पलाश,सेमल और कचनार
तेज धूप में
बहादुर सैनिक की तरह डँटा
दुपहरिया का फूल
कटे पेड़ की ठूँठ पर सिर उठाए
ताजे टटके पत्ते
एक उम्मीद की तरह उग आते हैं
उम्मीद एक नाविक की आँखों में
कलकल बहती नदी है
तुफानी रातों में समुद्र को
राह दिखाता आकाशदीप
धरती की आँखों पर आकार लेता
सबसे सुंदर सपना
वसंत एक उम्मीद का नाम है
इस वक्त धरती
उम्मीद से कितनी हरी-भरी लग रही है।

प्रेम में पड़ी लड़की 

वह सारी रात आकाश बुहारती रही
उसका दुपट्टा तारों से भर गया
टेढ़े चाँद को तो उसने
अपने जूड़े मे खोंस लिया
खिलखिलाती हुई वह
रात भर हरसिंगार सी झरी
नदी के पास
वह नदी के साथ बहती रही
इच्छाओं के झरने तले
नहाती रही खूब-खूब
बादलों पर चढ़कर
वह काट आई आकाश के चक्कर
बारिश की बूँदों को तो सुंदर सपने की तरह
उसने अपनी आँखों में भर लिया
आईने में आज वह सबसे सुंदर दिखी
उसके हृदय के सारे बंद पन्ने खुलकर
सेमल के फाहे की तरह हवा में उड़ने लगे
रोटियाँ सेंकती हुई
कई बार जले उसके हाथ
उसने आज
आग से लड़ना सीख लिया।

पहली बार

पहली बार
हमने लुटाए
अंजुरी भर-भर कर तारें
पहली बार
हमने समेटे
बाँह भर कर आकाश
पहली बार
हमने सुनी
पृथ्वी के चलने की आवाज़
नदी के दिल की धड़कन
दो देहों के बीच बजने वाला संगीत
पहली बार हमने सुनी
धरती के किसी अँधेरे कोने से
बाहर आने को आतुर
अंकुरित बीज की किलकारी
पहली बार
हमने जाना
फूलों के हंसने का रहस्य
बसंत के आने का आनंद
जमे हुए मौन का अर्थ
पहली बार
समय से तेज भागते हुए
हमने मापी पूरी पृथ्वी
पहली बार हमने सीखा
जी-जी कर मरना
पहली बार हमने सीखा
मर-मर कर जीना।

सावन का प्रेम पत्र 

मानसूनी हवाओं की प्रेम अग्नि से
कतरा-कतरा पिघल रहा है आकाश
सावन वह स्याही है
आकाश जिससे लिखता है
धरती को प्रेम पत्र
मेरे असंख्य पत्र जमा है
तुम्हारी स्मृतियों के पिटारे में
शालिक पंक्षी का एक जोड़ा डाकिया बन
जिसे हर रोज
छत की मुंडेर पर तुम्हे सौंपता है
जिसे पढ़ न लो गर
तुम दिन भर रहती हो उदास
तुम्हारी आँखें निहारती रहती है आकाश
ओ सावन!
तुम इस बार लिख दो न
धरती के सीने पर असंख्य प्रेम पत्र
हर लो
अपने प्रियजनों के चेहरे पर फैली गहरी उदासी
ओ सावन!
कुछ ऐसे बरसो
कि किसी पेड़ से न टंगा मिले कोई किसान।

जुबिली ब्रिज 

हुगली नदी के दोनों किनारों को जोड़ता
एक सौ तीस वर्षों से खड़ा है
असंख्य यात्राओं का गवाह
यह पुराना और जर्जर जुबिली ब्रिज।
इसके समानांतर
इसकी जगह लेने को तैयार
शान से खड़ा है एक नया ब्रिज अनाम
जैसे बूढ़े पिता की जगह लेने
तैयार खड़ा हो एक युवक
छुटपन में यात्राओं पर जाते हुए
खड़खडाते ब्रिज पर रेंगती रेलगाड़ी देखकर
रोमांचित हो जाते थे हम
हमारी यात्राओं के रोमांच में
हमेशा शामिल होता था यह पुराना ब्रिज।
जब इसे पार करती थी रेलगाड़ी
माँ अपने बटुए से निकाल कर एक सिक्का
डाल देती थी नदी में
लेकर गंगा मैया का नाम
तब अक्सर सोचता था
क्या करती होगी नदी उन सिक्कों का
क्या खरीदती होगी अपने लिए मनपसंद सामान?
रेलगाड़ी की यात्रा से ज्यादा आकर्षित करता हमें
खड़खड़ाता ब्रिज
और उससे टकराती सिक्कों की खनक
जो संगीत की तरह गूँजती थी हमारे कानों में
जिसकी प्रतिध्वनि यात्राओं के बाद भी
करती थी हमें रोमांचित।
अब जबकि तैयार है एक नया ब्रिज
इस पुराने की जगह लेने
क्या सोचेगा वह पुराना ब्रिज
जब दौड़ेगी पूरे वेग से रेलगाड़ी
नए ब्रिज पर
पुराने को ठेंगा दिखाते हुए
उस दिन लौटेगी ब्रिज की पुरानी स्मृतियाँ
उस दिन स्मृतियों की अँधेरी गुफा में
खो जाएगा ब्रिज
उसके मौन सन्नाटे को तोड़ेगा
नए ब्रिज की खड़खड़ाहट
और सिक्कों की खनखनाहट
जिसकी प्रतिध्वनि उसे कर देगा बेचैन।
इस तेज भागते समय में
जबकि हमारी पुरानी स्मृतियाँ
तेजी से हो रही है क्षीण
वर्तमान को एक अंधे रफ्तार की जरूरत है
अपनी लाचारी पर सिसकते हुए
नि:सहाय बूढ़ा ब्रिज त्याग देगा अपने प्राण
उस दिन।

मेरे शब्दों 

शब्दों में ही जन्मा हूँ
शब्दों में ही पला
मैं शब्द ओढ़ता बिछाता हूँ
जैसे सभ्यता के भीतर
सरपट दौड़ता है उसका इतिहास
सदियों का सफर तय करते हुए
ये शब्द मेरे लहू में दौड़ रहे हैं
मैं शब्दों की यात्रा करते हुए
खुद को आज
ऐसे शब्दों के टीले पर खड़ा
महसूस कर रहा हूँ
गोकि
ढेर सारे झूठे और मक्कार शब्दों के बीच
धर दिया गया हूँ
क्या करूँगा उन शब्दों का
जिससे एक बच्चे को हँसी तक न दे सकूँ
एक बूढ़ी माँ की आखिरी उम्मीद भी
नहीं बन सकते मेरे शब्द
मेरे शब्द नहीं बन सकते
भूखे की रोटी
एक बेकार युवक का सपना भी नहीं
क्या करूँगा उन शब्दों का
जिनसे मौत की इबारतें लिखी जाती है
जिनसे फरेबी नारे बनते है
मेरे शब्दों!
तुम वापस जाओ
जंगलों को पार करो
खेतों में लहलहाओ
किसी चिड़िया की आँखों में बस जाओ
नदियों को पार करो
सागर सा लहराओ
जाओ!
कि तुम्हे लंबी दूरी तय करनी है
बनना है अभी थोड़ा सभ्य।

बुद्ध तुम उठो! 

(अपने मित्र स्वपन रॉय की पेंटिंग देखकर)
बुद्ध तुम उठो!
कि घायल है बोधिवृक्ष
काँप रहे हैं मठों के दरों-दीवार
लहूलुहान प्रार्थनास्थल
लगातार गहरा रहे अंधकार में
आदमी के चेहरे को नहीं सूझ रहा
आदमी का चेहरा
बदहवास आदमी
बुदबुदा रहा है तुम्हारा नाम
टकटकी लगाए तुम्हारी ओर।

बुद्ध तुम उठो!
कि आदमी की स्मृतियों के घेरे से
बाहर हो रहे हैं तुम्हारे संदेश
अब शांति और अहिंसा जैसे शब्द
एक मुहावरा बन कर रह गया है मात्र
जो आजकल राष्ट्राध्यक्षों के जुबान की
शोभा बढ़ाने के आते है काम।

बुद्ध तुम उठो!
कि तुम्हारी आँखों के खुलने से
हो एक नया उजियारा
दूर हो अनंत अंधकार
रक्त-रंजित धरती
हरहरा जाए फिर एकबार
आदमी का पहाड़ सा दर्द थोड़ा कम हो।

बुद्ध तुम उठो!
इस धरती का संताप थोड़ा हर लो
क्योंकि देवताओं ने छेड़ रखी है लड़ाइयाँ
देवताओं के खिलाफ।

नई किताब की गंध 

अभी-अभी खोली है नई किताब
और भक्क से आई सुवासित गंध ने
किया है मेरा स्वागत।

नई किताब की गंध में
मैं अक्षरों की सुगंध
महसूस कर पा रहा हूँ कहीं भीतर
उन विचारों की सुगंध भी
जो इन अक्षरों के भीतर कहीं दबी पड़ी है।

नई किताब की गंध में
उम्र के तपे दिनों
स्याह रातों की सुगंध है
और कुछ अधूरे सपनो का भी।
नई किताब की गंध में
उस आदमी के पसीने की सुगंध है
जिनके हाथों ने टांके हैं अक्षर।

नई किताब की गंध में
शामिल है एक कटे हुए पेड़ की घायल इच्छाएँ
एक चिड़ियाँ का उजड़ा हुआ आशियाना
और किसी बच्चे के
स्मृतियों में गुम गए बचपन की गंध।

अभी-अभी खोली है नई किताब
मैं विचारों के साथ-साथ
एक पेड़,एक चिड़ियाँ,
कुछ अधूरे सपनों,छूटी स्मृतियों
और पन्नों पर अक्षर टाँकते
दो हाथों की कहानी पढ़ रहा हूँ।

सावन की बूँदें

केले के पत्तों पर
बूँदें मोतियों सी उछल रही है
नीचे उछलते कूदते बच्चे
अंजुरी भर ‌‌‌भर कर
लूट रहे हैं सृष्टि का वैभव
सावन
बच्चों की हँसी मे झर झर बरस रहा है ।

चुप्पियाँ 

चारों तरफ चुप्पियाँ थी
सारे पेड़ चुप थे
जबकि उसके विरुद्ध तमाम साजिशें जारी थी
एक कोयल की कूक से टूटी खामोशी
आकाश का सीना छलनी
फिर भी चुप्पियाँ तारी
बादलों के लिए असहनीय थी यह स्थिति
गरज पड़ा बादल
पहाड़ चुप था
जबकि सैकड़ों ज़ख्मों के निशान स्पष्ट थे
एक प्रेमी ने
अपनी प्रेमिका का नाम जोर से पुकारा
पहाड़ बोलने लगा
सिकुड़ते तलाब की चुप्पी
तो एक बच्चे के लिए बिल्कुल असहनीय थी
उसने तलाब की तरफ एक कंकड़ उछाला
एक कंकड़ से काँप उठा तलाब
शहरों,कस्बों और गाँवों में
अब भी कुछ लोग थे
चुप्पियों के खिलाफ
हवा में लहराती जिनकी मुट्ठियों की अनुगूँज
सत्ता के गलियारे तक पहुँच ही जाती थी
पर आश्चर्य है
तुम्हारी चुप्पियाँ कभी क्यूँ नहीं टूटती?

इस स्वपन वर्जित समय में 

(प्रो. एम. एम. कलबुर्गी के लिए)

इस वक्त
जबकि सपने देखना
किया जा रहा है निषिद्ध
जारी हो रहे हैं फतवे
सपनों के विरूद्घ।
इस वक्त
जबकि सपने देखना देशद्रोही होना है
मैं
इस स्वप्नवर्जित देश में
सपनों की खेती करना चाहता हूँ।

जानता हूँ हांक दिया जाऊँगा एक दिन
उनकी तरह
जिनके सपनों के पीछे
हत्यारों के झुंड
लगी है पहरेदारी में।
एकदिन उठूंगा नींद से
और देखूंगा
हमारे सपनों को छलनी करने
तानाशाह की फौज खड़ी हैं दरवाजे पर।
वे हमसे हमारा आकाश छीनने आए हैं
वे हमारी नदियों का प्रवाह छीनने आए हैं
वे हमारे पहाड़, हमारा जंगल छीनने आए हैं
वे पेड़ों की छाया, फूलों की सुगंध छीनने आए हैं
वे हमारे बच्चो की मसूमीयत
उनकी हँसी छीनने आए हैं
वे हमारे शब्द छीनने आए हैं।

इस स्वप्न वर्जित समय में
जबकि विकृत की जा रही हैं
हमारे बच्चों के किताबों की भाषा
और उगाई जा रही हैं उसमें
धर्म के विष-बेल।
इस वक्त
जबकि वे तोड़ लेना चाहते हैं
हमारी आँखों से सपने
मैं
सपनों की खेती करना चाहता हूँ।

रोता हुआ बच्चा

यह आधी रात का समय है
जब सारे खाए पीए अघाए लोग
अपने दड़बे में चैन की नींद सोए है
सड़क के पार एक बच्चा रोए जा रहा है
रोते हुए बच्चे की भूख
मकानों से बार-बार टकराकर
घायल हो गिर रही है जमीन पर

यह कैसा समय है
कि बच्चे रोते चले जा रहे हैं
फिलीस्तीन से वियतनाम तक
नामीबिया से सीरिया तक
कालीहांडी से मराठवाड़ा तक
और वातानुकूलित कमरों के कान बंद हैं
राष्ट्रीय योजनाओं और घोषणा पत्रों से बाहर है
रोते हुए बच्चे
देश के नक्शे पर पड़े जिन्दा धब्बे

यह कैसा समय है
जब देश के अनाज का एक चौथाई
चील, कौवों और चूहों के नाम कर छोड़ा गया है
रोते हुए भूखे बच्चे का हिस्सा
किसी फाइल में दर्ज नहीं है

बच्चा रोए जा रहा है
गोल-गोल रोटी सा चाँद आकाश में हँसता है
बच्चे के पीछे विज्ञापन में मुस्कुराता एक चेहरा
देश की यशगाथा गा रहा है
और बच्चा है कि रोए जा रहा है।

अँधेरे वक्त में 

(बेटे के लिए)

अँधेरे से
तुम मत घबराना
मेरे बच्चे!
रखना विश्वास अपने मन के सूरज पर
क्या हुआ जो दूर है तुम्हारी सुबह
अँधेरे में भी तुम खोज लेना अपनी राह
याद रखना बाँध कर गांठ
घने अँधेरे में ही फूटते हैं बीज
पहली बार
पौधे लेते हैं साँस
सबसे अँधेरे समय में ही
लिखी जाती है
सबसे अच्छी कविताएं
अँधेरे के रथ पर सवार हो कर ही
आती है ख्वाबों की बारात।

मेरे बच्चे!
इस अँधेरे वक्त में
नहीं कुछ मेरे पास
तुम्हे उत्तराधिकार में देने को
सिवाय थोड़े आग के
इसे अपने सीने में संभाल कर रखना
हर क्षण ठंडी पड़ती धरती को
एकदम ठंडा होने से बचाने के लिए
बुझने मत देना ये आग
देना अपने बच्चो को
इसे उपहार की तरह।

मेरे बच्चे !
इस अंधेरे वक़्त में
गर न बन सको मशाल
छोड़ना मत आस
लड़ना अँधेरे के खिलाफ
चमकना जुगनूओं की तरह।

बेशर्म समय में प्रेम 

वे हमेशा धारा के विरूद्ध तैरने वाले लोग थे
अंधियाँ उन्हें छूने से डरती थी
ज़िद पकड़ ली तो
वे आसमान को भी अपने सीने पर झुका लेते थे
पास से गुजरने पर
फूल भी उन्हें सलामी देते
दुनिया में कोमलता बचाए रखने के लिए
उन्होने हमेशा काँटों भरी राह चुनी
उनकी आँखें बेहतर दुनिया के ख्वाब बुनी

तेज हवा में जैसे
दो हथेलियाँ लौ को बुझने से बचा लेती है
वे घने अंधेरे में भी
अपने दिलों में बचा लेते थे
प्रेम की थोड़ी उजास
और उम्मीद की टिमटिमाती रोशनी

वे ऐसी चट्टानें थी
जो खुद पर घास और शैवाल उगने देने के बावजूद
अपने अंदर दावानल बचाए रखती थी
वे युद्ध ,हिंसा ,नफरत
और दुनिया के तमाम छल प्रपंच के विरुद्ध थे
इसलिए राजा,सम्राट,शासक
यहाँ तक की ईश्वर को उनसे सबसे ज्यादा खतरा था

वे दीवारों में चुनवा दिये गए
गोलियों से छलनी किए गए
वे ज़िंदा जलाए गए
सूलियों पर लटकाए गए

वे इस दुनिया में बचे उन थोड़े लोगों में से थे
जिन्हें यह आशा थी
कि वे इस दुनिया को ख़त्म होने से बचा लेंगे
जिन्होने इस बेशर्म समय में
मरने से इंकार किया था।

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