कुँअर उदयसिंह ‘अनुज’ की रचनाएँ

कुँअर उदयसिंह अनुज के दोहे-1 

कैसा सींचा आपने, कैसी करी सँवार।
उपजाऊ इस खेत की, फ़सलें हैं बीमार।

ग़लत जुटाया आपने, यह साज़ो-सामान।
बनते-बनते ढह गया, अपना एक मकान।

डंका जिनके नाम का, यहाँ बजे दिन-रात।
वे डंके की चोट पर, मचा रहे उत्पात।

कालर उनकी खींचिए, चाबी जिनके पास।
यहाँ निरर्थक कर रहे, तुम धरना उपवास।

काँटे कष्टों के जलें, दुख जायेगा भाग।
बुझने कभी न दीजिये, यह छाती की आग।

गूँज उठेगी चीख जब, नभ की छाती चीर।
दहला देगी यह धरा, वंचित गूँगी पीर।

भटका अपना कारवाँ, हासिल हुआ न ठौर।
जिस मुक़ाम परआ गये, यह मुक़ाम कुछ और।

रहा सफ़र में हमसफ़र, करता हम पर वार।
अपनों ही के हाथ से, अपना हुआ शिकार।

बढ़-चढ़ मीठा बोलता, छलिया अफलातून।
किया इसी ने आपके, अरमानों का खून।

श्वेत वसन बहुरूपिये, लूट रहे जन कोष।
जन-सेवा की आड़ में, ढाँपें अपने दोष।

कुँअर उदयसिंह अनुज के दोहे-2 

चुभे पाँव में कील सी, लोकतंत्र की बाट।
गाँवों में छल बो गये, दिल्ली के कुल-भाट।

हंसों का जब हो गया, बगुलों से गठजोड़।
निर्णय सुनकर मछलियाँ, बैठी हैं सर फोड़।

लोकतंत्र के भाग में, यह कैसा संजोग।
संसद और तिहाड़ में, एक सरीखे लोग।

मरहम जिनके हाथ में, लोग कुटिल मतिमंद।
नमक छिड़कने में मिले, उन्हें अधिक आनंद।

खेती खरपतवार की, दिल्ली तक है आम।
अच्छी फसलों बीज के, नहीं रहे अब दाम।

झंडों से छत पट गई, पोस्टर से दीवार।
पीकर चहके टापरी, अच्छे दिन हैं यार।

सूखे टिक्कड़ खा जिएँ, घेर खड़े दुर्योग।
ऐसों की किस्मत लिखें, हलुवा खाते लोग।

सत्य दबाकर चोंच में, उड़ी झूठ की चील।
ढूँढ रहा हूँ मैं जला, शब्दों की क़न्दील।

सुबह अगर चूल्हा जला, भूखी सोयी साँझ।
सुख कब जनती झोंपड़ी, रही तरक़्क़ी बाँझ।

सिकुड़ पेट से सट रहे, और मनाई ख़ैर।
चादर तो थी ही नहीं, कहाँ पसरते पैर।

कुँअर उदयसिंह अनुज के दोहे-3

राजघाट से लौटकर, दावत होगी ख़ास।
दो अक्टूबर साब का, मुर्ग़ा रहा उदास।

दस-दस माथे दुष्ट के, कुटिल सभी हैं साथ।
कई राम अब चाहिए, करने दो-दो हाथ।

जंगल से आ साँप ने, बोला मेरे कान।
ज़हरीला ज़्यादा हुआ, गाँव शहर इन्सान।

खेत मशीनें जोततीं, फुरसत में हल-बैल।
रखे बनाकर गाँव को, पूँजीवाद रखैल।

रेडिमेड से पट गया, गाँवों का बाज़ार।
दीनू दरजी हाथ पर, हाथ धरे लाचार।

मन्दिर से सट खुल गयी, सट्टे की दूकान।
उससे सटा कलाल का, घर है आलीशान।

तोड़ गया दम गाँव से, अब ढोली का ढोल।
साँसें फूलीं बेंड की, सुन डी जे के बोल।

टप्पर-टप्पर टँग गये, ब्यूटी-पार्लर बोर्ड।
करे मजूरी गोमती, खर्चा करे अफोर्ड।

लोक-पर्व ने तोड़ दी, लोक-गीत से प्रीत।
गलियाँ गाएँ गाँव में, पेरोडी के गीत।

अब नन्हें से गाँव के, पनघट सब वीरान।
हेंडपम्प ने छीन ली, बची-खुची पहचान।

कुँअर उदयसिंह अनुज के दोहे-4

साफ़ा पगड़ी धोतियाँ, रहा न इनका साथ।
लाल छींट की लूगड़ी, अब हो गयी अनाथ।

हँसली पाजब करधनी, खिलते बाजूबंद।
नये दौर में पड़ गयी, इनकी आभा मंद।

अब दुल्हन का घूँघटा, चला गया है चीन।
मण्डप में खी-खी करे, नयना संग नवीन।

गाँवों से गुम पालकी, डोली लिये कहार।
फुर्र हुईं अब दुल्हिनें, बैठ इनोवा कार।

बाहर जैसा हो गया, घर में भी व्यवहार।
बहू सुनाये सास को, दो के बदले चार।

दादी भूलीं वारता, नानी लोरी गीत।
जादू टी वी का चला, हुई उसी की जीत।

दूध होटलें पी गईं, छाछ बिलौना बन्द।
मथनी गाती थी कभी, माखन लिपटे छन्द।

दादाजी गुमसुम हुए, घर में ही अनजान।
कम्प्यूटर में फँस गई, बच्चों की मुस्कान।

मैं आया घर आपके, नहीं दिया कुछ ध्यान।
आँखें टी वी पर टिकीं, मोबाइल पर कान।

उमर अढ़ाई की हुई, बस्ता लादे पीठ।
आँसू लुढ़के देखती, मम्मी कितनी ढीठ।

कुँअर उदयसिंह अनुज के दोहे-5

देख देख कर सीरियल, आये कितने मोड़।
पूत जना अपने लिए, बहू उड़ी ले फोड़।

धूल फाँकती ढोलकी, और मौन है चंग।
थमी थिरकती उँगलियाँ, मीठी लय है भंग।

इंटरनेट कहार सा, फेंक रहा है जाल।
अब ‘सुजान’ चलने लगी, ‘घनानन्द’ से चाल।

माँ लोरी है साँझ की, माँ प्रभात का गीत।
गिर-पड़ चलना सीखता, उस छुटपन की मीत।

गरमी में ठंडी हवा, जाड़े मीठी धूप।
बारिश में छत सी तने, माँ के कितने रूप।

बया सरीखी माँ बुने, छोटे-छोटे ख़्वाब।
आना-पाई जोड़कर, रहती ढाँपे आब।

ओर-छोर अज्ञात है, ऐसा पारावार।
जो डूबा वह तर गया, पा अम्मा का प्यार।

शीश झुकाकर टाँकती, लुगड़ी में पैबंद।
अनपढ़ अम्मा लिख रही, संघर्षों के छंद।

कुदरत के वरदान को, रहे देख सब दंग।
माँ चंदन के पेड़-सी, बेटा भले भुजंग।

ताँता कष्टों का लगा, कभी न मानी हार।
दिखलाती उनको रही, माँ बाहर का द्वार।

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