कुँअर बेचैन की रचनाएँ

पिन बहुत सारे (कविता)

जिंदगी का अर्थ
मरना हो गया है
और जीने के लिये हैं
दिन बहुत सारे ।

इस
समय की मेज़ पर
रक्खी हुई
जिंदगी है ‘पिन-कुशन’ जैसी
दोस्ती का अर्थ
चुभना हो गया है
और चुभने के लिए हैं
पिन बहुत सारे।

निम्न-मध्यमवर्ग के
परिवार की
अल्पमासिक आय-सी
है जिंदगी
वेतनों का अर्थ
चुकना हो गया है
और चुकने के लिए हैं
ऋण बहुत सारे।

ज़िंदगी यूँ भी जली, यूँ भी जली मीलों तक

ज़िंदगी यूँ भी जली, यूँ भी जली मीलों तक
चाँदनी चार क‍़दम, धूप चली मीलों तक

प्यार का गाँव अजब गाँव है जिसमें अक्सर
ख़त्म होती ही नहीं दुख की गली मीलों तक

प्यार में कैसी थकन कहके ये घर से निकली
कृष्ण की खोज में वृषभानु-लली मीलों तक

घर से निकला तो चली साथ में बिटिया की हँसी
ख़ुशबुएँ देती रही नन्हीं कली मीलों तक

माँ के आँचल से जो लिपटी तो घुमड़कर बरसी
मेरी पलकों में जो इक पीर पली मीलों तक

मैं हुआ चुप तो कोई और उधर बोल उठा
बात यह है कि तेरी बात चली मीलों तक

हम तुम्हारे हैं ‘कुँअर’ उसने कहा था इक दिन
मन में घुलती रही मिसरी की डली मीलों तक

दिन दिवंगत हुए (कविता)

रोज़ आँसू बहे रोज़ आहत हुए
रात घायल हुई, दिन दिवंगत हुए
हम जिन्हें हर घड़ी याद करते रहे
रिक्त मन में नई प्यास भरते रहे
रोज़ जिनके हृदय में उतरते रहे
वे सभी दिन चिता की लपट पर रखे
रोज़ जलते हुए आख़िरी ख़त हुए
दिन दिवंगत हुए!

गीत के जितने कफ़न हैं

जिंदगी की लाश
ढकने के लिए
गीत के जितने कफ़न हैं
हैं बहुत छोटे ।
रात की
प्रतिमा
सुधाकर ने छुई
पीर यह
फिर से
सितारों सी हुई
आँख का आकाश
ढकने के लिए
प्रीत के जितने सपन हैं
हैं बहुत छोटे।
खोज में हो
जो
लरजती छाँव की
दर्द
पगडंडी नहीं
उस गाँव की
पीर का उपहास
ढकने के लिए
अश्रु के जितने रतन हैं
हैं बहुत छोटे।

बिके अभावों के हाथों

मन बेचारा एकवचन
लेकिन
दर्द हजार गुने ।
चाँदी की चम्मच लेकर
जन्में नहीं हमारे दिन
अँधियारी रातों के घर
रह आए भावुक पल-छिन
चंदा से सौ बातें कीं
सूरज ने जब घातें कीं
किंतु एक नक्कारगेह में
तूती की ध्वनि
कौन सुने ।
बिके अभावों के हाथों
सपने खील-बताशों के
भरे नुकीले शूलों से
आँगन-
खेल तमाशों के
कुछ को चूहे काट गए
कुछ को झींगुर चाट गए
नए-नए संकल्पों के
जो भी हमने जाल बुने।

पथ में किरण-छुरे

नित आवारा धूप घोंपती
पथ में किरण-छुरे।
आज के
दिन हैं बहुत बुरे ।
जो चाही
गाली फूलों को
कांटों ने बक दी
पगडंडी के
अधरों पर फिर
गर्म रेत रख दी
चारों ओर
तपन के निर्मम
सौ-सौ जाल पुरे।
आज के दिन हैं बहुत बुरे ।
सूखी हुई
झुकी शाखों पर
कोलाहल लटका
क्रुद्ध छाँव को
इधर-उधर
खो जाने का खटका
गाते हैं
अश्लील गीत अब
पावन तानपुरे।
आज के दिन हैं बहुत बुरे ।

हर आँख द्रौपदी है

आँखों में सिर्फ़ बादल, सुनसान बिजलियाँ हैं,
अंगार है अधर पर सब साँस आँधियाँ हैं
रग-रग में तैरती-सी इस आग की नदी है।
यह बीसवीं सदी है।
इक डूबती भँवर ने सब केशगुच्छ बाँधे
बारूद की दुल्हन को देकर हज़ार काँधे
हर पालकी दुल्हन से करने लगी वदी है।
यह बीसवीं सदी है ।
बीमार बाग-सी ही है यह अजीब दुनिया
इस प्राणवान तरू की मृतप्राय हम टहनियाँ
इक काँपती उदासी हर शाख पर लदी है।
यह बीसवीं सदी है।
हर मोड़ पर गली के ये शर्मनाक बातें
टूटी हुई सड़क पर दुर्गंध की बरातें
हर डूबती सुबह ने फिर सुर्ख शाम दी है।
यह बीसवीं सदी है।
हर सत्य का युद्धिष्ठिर, बैठा है मौन पहने
ये पार्थ, भीम सारे आए हैं, जुल्म सहने
आँसू हैंचीर जैसे हर आँख द्रौपदी है।
यह बीसवीं सदी है।

सुरसा-सा मुँह फाड़ रही है

गलियों में
चौराहों पर
घर-घर में मचे तुफ़ैल-सी।
बाल बिखेरे फिरती है
महँगाई किसी चुड़ैल सी।
सूखा पेटों के खेतों को
वर्षा नयनाकाश को
शीत- हडि्डयों की ठठरी को
जीवन दिया विनाश को
भूखी है हर साँस
जुती लेकिन कोल्हू के बैल-सी।
जो भी स्वप्न संत हैं
वे तो अब भी कुंठाग्रस्त हैं
जो झूठे, बदमाश, लफंगे
वे दुनिया में मस्त हैं
हर वेतन के घर बैठी है
रिश्वत किसी रखैल-सी।
सुरसा-सा मुँह फाड़ रही है
बाजारों में कीमतें
बारूदी दीवारों पर
बैठी हैं जीवन की छतें
टूट रही है आज ज़िंदगी
इक टूटी खपरैल-सी।

जिंदगी अपनी नहीं 

दिवस खरीदे मजदूरी ने
मजबूरी ने रात
शाम हुई नीलाम थकन को
कुंठाओं को प्रात
जिंदगी अपनी नहीं रही ।
काली सड़कों पर पहरा है
अनजाने तम का
नभ में डरा डरा रहता है
चंदा पूनम का
नभ के उर में
चुभी कील-सी
तारों की बारात
कौन सी पीड़ा नहीं सही ?
जिंदगी अपनी नहीं रही।
रोज तीर सी चुभ जाती है
पहली सूर्य-किरन
सूरज
शेर बना फिरता है
मेरे प्राण हिरन
कर जाती है
धूप निगोड़िन
पल-पल पर आघात
जिंदगी आँसू बनी वही।
जिंदगी अपनी नहीं रही।

और मैं लाचार पति निर्धन

काँटों में बिंधे हुए फूलों के हार-सी
लेटी है प्राण-प्रिया पत्नी बीमार-सी
और मैं लाचार पति, निर्धन ।
समय-पर्यंक
आयु-चादर अति अल्पकाय,
सिमटी-सी
समझाती जीने का अभिप्राय,
आह-वणिक
करता है साँसों का व्यवसाय
खुशियों के मौसम में घायल त्यौहार-सी
आशाएँ महलों की गिरती दीवार-सी
और मैं विमूढ़मति, आँगन।
ज्योतिलग्न लौटी
तम-पाहन से टकरायी
हृदय-कक्ष सूना,
हर पूजा भी घबरायी
मृत्युदान-याचक है,
जीवन यह विषपायी
भस्म-भरी कालिख़ में बुझते अंगार-सी
तस्वीरें मिटी हुईं टूटे श्रृंगार-सी
और मैं पतझर-गति, साजन ।

बनेंगी साँपिन

बंद हैं मुट्ठी में
चंद सुर्ख-पंक्तियाँ
मुट्ठी के खुलते ही
धरती पर रेंगकर-बनेंगी साँपिन।
अपने ही आपमें
हम इतना डूबे
बदल गए अनजाने
सारे मंसूबे
बंद हैं मुट्ठी में
थोथी आसक्तियाँ
मुट्ठी के खुलते ही
सबको खा जाएगी पीड़ा डायन।
एक अदद गुलदस्ता
टूक-टूक बिखरा
झरी हुई पत्तियाँ
जाते जाते भी
धरती पर फेंक गईं
एक नया “फिकरा”-
बंद हैं मुट्ठी में
अनजानी शक्तियाँ
मुट्ठी के खुलते ही
खुद ही खुल जाएँगे-कैदी सब दिन।

माँसाहारी जग-होटल में

माँसाहारी जग-होटल में
शाकाहारी मन
कैसे करे गुजारा?
होटल-
जिसमें एक-दूसरे को
मानव खा जाता
सुरा समझकर
जिसमें शोणित नर का,
नर पी जाता
“बैरा-झूठ”, घृणा-बावर्चिन”
फेंक रहे हर दिन
कोई गलत इशारा।
होटल-
जिसके दरवाजे हैं
बड़े सजे-संवरे
लेकिन हैं
अश्लील जहाँ के
नाजा़यज कमरे
रखे जगत के वेश्यालय में
कब तक साँस-दुल्हन
आँचल पर ध्रुवतारा?

जीवन उखड़ा सा नाखून 

जीवन’
उखड़ा-सा नाखून
समय की
चोट लगी उंगली का।
हर पीड़ा की
फाँस लगी
मन में
इतनी गहरी
जिसे
निकाल न पाए
अनगिन
खुशियों के प्रहरी
हर सपना
निष्फल निकला
ज्यों छिलका मूँगफली का।
चौराहों पर
बिक जाती हैं
पतिव्रता साँसें
फिर भी
तृप्त नहीं हो पातीं
इस मन की प्यासें
मन सुनता रहता है
सबकी,
जैसे मोड़ गली का।

प्राण लिपिक–से 

दुनिया के “ऑफिस” में अब तो
बैठे हैं यह प्राण
लिपिक से ।

परित्यक्ता सी
कई फाइलें
अलग-अलग मेजों पर चुप हैं
उनके घूंघट
जैसे अंधे कोटपीस की-
छिपी तुरूप हैं
कई रिश्वतें
“गर्ल फ्रेंड्स-सी
झाँक रहीं बाहर की
“चिक” से ।
कॉफी के
प्यालों पर क्रमश:
बिखरे हुए प्यारे के किस्से
कुछ मँहगाई के पत्थर से
चटखे हुए
हृदय के हिस्से
सोच रहे
अब हम आफिस से
भागें कहाँ,
कौन सी
“ट्रिक से।

मटमैले मेज़पोश 

जीने का एक दिन
मरने के चार।
हमने लिए हैं उधार।
मटमैले मेज़पोश
लँगड़े ये स्टूल
ग़मलों में
गंधहीन काग़ज के फूल
रेतीली दीवारें
लोहे के द्वार।
हमने लिए हैं उधार।
दो गज़ की देहों को
दस-इंची वस्त्र
इस्पाती दुश्मन को
लकड़ी के शस्त्र
झुकी हुई पीठों पर
पर्वत के भार।
हमने लिए हैं उधार।
घाव-भरे पाँवों को
पथरीले पंथ
अनपढ़ की आँखों को
एम.ए. के ग्रंथ
फूलों-से हृदयों को
कांटों के हार।
हमने लिए हैं उधार।

भारी-भारी तोपे हैं 

ऑफिस के
दरवाजों पर
कौन कह रहा चपरासी?
भारी-भारी तोपें हैं ।
कुछ कागज के
नोटों से
इनके मुँह खुल जाते हैं
वज़न कुर्सियों के,
इनकी बातों से
तुल जाते हैं
रिश्वतखोरी के
घर से
इनके बड़े “घरोपे” हैं।
भारी-भारी तोपें हैं।
लौटा दिया
इन्होंने ही
लंबी-चौड़ी
भीड़ों को
ये जेबों में
रखते हैं
ज़हर–उगलते
कीड़ों को
भीतर ज्वालामुखी अचल
बाहर चंदन थोपे हैं।
भारी-भारी तोपें हैं।

हाइकु 

जल चढ़ाया
तो सूर्य ने लौटाए
घने बादल ।

तटों के पास
नौकाएं तो हैं,किन्तु
पाँव कहाँ हैं?

ज़मीन पर
बच्चों ने लिखा’घर’
रहे बेघर ।

रहता मौन
तो ऐ झरने तुझे
देखता कौन?

चिड़िया उड़ी
किन्तु मैं पींजरे में
वहीं का वहीं !

ओ रे कैक्टस
बहुत चुभ लिया
अब तो बस

आपका नाम
फिर उसके बाद
पूर्ण विराम!

लौट आ रे

लौट आ रे !
ओ प्रवासी जल !
फिर से लौट आ !

रह गया है प्रण मन में
रेत, केवल रेत जलता
खो गई है हर लहर की
मौन लहराती तरलता
कह रहा है चीख कर मरुथल
फिर से लौट आ रे!

लौट आ रे !
ओ प्रवासी जल !
फिर से लौट आ !

सिंधु सूखे, नदी सूखी
झील सूखी, ताल सूखे
नाव, ये पतवार सूखे
पाल सूखे, जाल सूखे
सूखने अब लग गए उत्पल,
फिर से लौट आ रे !

लौट आ रे !
ओ प्रवासी जल !
फिर से लौट आ !

प्यासे होंठों से

प्यासे होंठों से जब कोई झील न बोली बाबू जी
हमने अपने ही आँसू से आँख भिगो ली बाबू जी

भोर नहीं काला सपना था पलकों के दरवाज़े पर
हमने यों ही डर के मारे आँख न खोली बाबू जी

दिल के अंदर ज़ख्म बहुत हैं इनका भी उपचार करो
जिसने हम पर तीर चलाए मारो गोली बाबू जी

हम पर कोई वार न करना हैं कहार हम शब्द नहीं
अपने ही कंधों पर है कविता की डोली बाबू जी

यह मत पूछो हमको क्या-क्या दुनिया ने त्यौहार दिए
मिली हमें अंधी दीवाली गूँगी होली बाबू जी

सुबह सवेरे जिन हाथों को मेहनत के घर भेजा था
वही शाम को लेकर लौटे खाली झोली बाबू जी

जिस मृग पर कस्तूरी है 

मिलना और बिछुड़ना दोनों
जीवन की मजबूरी है।
उतने ही हम पास रहेंगे,
जितनी हममें दूरी है।

शाखों से फूलों की बिछुड़न
फूलों से पंखुड़ियों की
आँखों से आँसू की बिछुड़न
होंठों से बाँसुरियों की
तट से नव लहरों की बिछुड़न
पनघट से गागरियों की
सागर से बादल की बिछुड़न
बादल से बीजुरियों की
जंगल जंगल भटकेगा ही
जिस मृग पर कस्तूरी है।
उतने ही हम पास रहेंगे,
जितनी हममें दूरी है।

सुबह हुए तो मिले रात-दिन
माना रोज बिछुड़ते हैं
धरती पर आते हैं पंछी
चाहे ऊँचा उड़ते हैं
सीधे सादे रस्ते भी तो
कहीं कहीं पर मुड़ते हैं
अगर हृदय में प्यार रहे तो
टूट टूटकर जुड़ते हैं
हमने देखा है बिछुड़ों को
मिलना बहुत जरूरी है।
उतने ही हम पास रहेंगे,
जितनी हममें दूरी है।

सोख न लेना पानी 

सूरज !
सोख न लेना पानी !

तड़प तड़प कर मर जाएगी
मन की मीन सयानी !
सूरज, सोख न लेना पानी !

बहती नदिया सारा जीवन
साँसें जल की धारा
जिस पर तैर रहा नावों-सा
अंधियारा उजियारा
बूंद-बूंद में गूँज रही है
कोई प्रेम कहानी !
सूरज, सोख न लेना पानी !

यह दुनिया पनघट की हलचल
पनिहारिन का मेला
नाच रहा है मन पायल का
हर घुंघुरू अलबेला
लहरें बाँच रही हैं
मन की कोई बात पुरानी !
सूरज, सोख न लेना पानी !

दो दिलों के दरमियाँ 

दो दिलों के दरमियाँ दीवार-सा अंतर न फेंक
चहचहाती बुलबुलों पर विषबुझे खंजर न फेंक

हो सके तो चल किसी की आरजू के साथ-साथ
मुस्कराती ज़िंदगी पर मौत का मंतर न फेंक

जो धरा से कर रही है कम गगन का फासला
उन उड़ानों पर अंधेरी आँधियों का डर न फेंक

फेंकने ही हैं अगर पत्थर तो पानी पर उछाल
तैरती मछली, मचलती नाव पर पत्थर न फेंक

यह तेरी काँवर नहीं कर्तव्य का अहसास है
अपने कंधे से श्रवण! संबंध का काँवर न फेंक

चल हवा 

चल हवा, उस ओर मेरे साथ चल
चल वहाँ तक जिस जगह मेरी प्रिया
गा रही होगी नई ताजा गजल
चल हवा, उस ओर मेरे साथ चल।

चल जहाँ मेरा अमर विश्वास है
आत्माओं में मिलन की प्यास है
आज तक का तो यही इतिहास है
है जहाँ मधुवन वहीं पर रास है
मिल गया जिसको कि कान्हा का पता
कौन राधा है जरा तू ही बता
जो कन्हैया से करेगी प्रीति छल
चल हवा, उस ओर मेरे साथ चल।

मत फँसा सुख चक्र दुख की कील में
मत उठा तूफान दुख की झील में
हो सके तो रख नये जलते दिये
आस के बुझते हुए कंदील में
तू हवा है कर सुरभि का आचमन
छोड़कर अपने पुराने ये बसन
तू नए अहसास के कपड़े बदल
चल हवा, उस ओर मेरे साथ चल।

चल जहाँ तक बाँसुरी की धुन चले
फूल की खुशबू चले, गुनगुन चले
भीग जा तू प्रीति के हर रंग में
साथ जब तक प्राण का फागुन चले
पूछ मत अब जा रहा हूँ मैं कहाँ
चल प्रतीक्षा में खड़े होंगे जहाँ
एक नीली झील, दो नीले कमल
चल हवा, उस ओर मेरे साथ चल।

दो चार बार हम जो कभी

दो चार बार हम जो कभी हँस-हँसा लिए
सारे जहाँ ने हाथ में पत्थर उठा लिए

रहते हमारे पास तो ये टूटते जरूर
अच्छा किया जो आपने सपने चुरा लिए

चाहा था एक फूल ने तड़पे उसी के पास
हमने खुशी के पाँवों में काँटे चुभा लिए

सुख, जैसे बादलों में नहाती हों बिजलियाँ
दुख, बिजलियों की आग में बादल नहा लिए

जब हो सकी न बात तो हमने यही किया
अपनी गजल के शेर कहीं गुनगुना लिए

अब भी किसी दराज में मिल जाएँगे तुम्हें
वो खत जो तुम्हें दे न सके लिख लिखा लिए।

उँगलियाँ थाम के खुद

उँगलियाँ थाम के खुद चलना सिखाया था जिसे
राह में छोड़ गया राह पे लाया था जिसे

उसने पोंछे ही नहीं अश्क मेरी आँखों से
मैंने खुद रोके बहुत देर हँसाया था जिसे

बस उसी दिन से खफा है वो मेरा इक चेहरा
धूप में आइना इक रोज दिखाया था जिसे

छू के होंठों को मेरे वो भी कहीं दूर गई
इक गजल शौक से मैंने कभी गाया था जिसे

दे गया घाव वो ऐसे कि जो भरते ही नहीं
अपने सीने से कभी मैंने लगाया था जिसे

होश आया तो हुआ यह कि मेरा इक दुश्मन
याद फिर आने लगा मैंने भुलाया था जिसे

वो बड़ा क्या हुआ सर पर ही चढ़ा जाता है
मैंने काँधे पे `कुँअर’ हँस के बिठाया था जिसे

शाख़ पर एक फूल भी है 

है समय प्रतिकूल माना
पर समय अनुकूल भी है।
शाख पर इक फूल भी है॥

घन तिमिर में इक दिये की
टिमटिमाहट भी बहुत है
एक सूने द्वार पर
बेजान आहट भी बहुत है

लाख भंवरें हों नदी में
पर कहीं पर कूल भी है।
शाख पर इक फूल भी है॥

विरह-पल है पर इसी में
एक मीठा गान भी है
मरुस्थलों में रेत भी है
और नखलिस्तान भी है

साथ में ठंडी हवा के
मानता हूं धूल भी है।
शाख पर इक फूल भी है॥

है परम सौभाग्य अपना
अधर पर यह प्यास तो है
है मिलन माना अनिश्चित
पर मिलन की आस तो है

प्यार इक वरदान भी है
प्यार माना भूल भी है।
शाख पर इक फूल भी है॥

बेटियाँ

बेटियाँ-
शीतल हवाएँ हैं
जो पिता के घर बहुत दिन तक नहीं रहतीं
ये तरल जल की परातें हैं
लाज़ की उज़ली कनातें हैं
है पिता का घर हृदय-जैसा
ये हृदय की स्वच्छ बातें हैं

बेटियाँ –
पवन-ऋचाएँ हैं
बात जो दिल की, कभी खुलकर नहीं कहतीं
हैं चपलता तरल पारे की
और दृढता ध्रुव-सितारे की
कुछ दिनों इस पार हैं लेकिन
नाव हैं ये उस किनारे की

बेटियाँ-
ऐसी घटाएँ हैं
जो छलकती हैं, नदी बनकर नहीं बहतीं

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