कुमारेन्द्र सिंह सेंगर की रचनाएँ

रहस्य जीवन का

जीवन रूपी रहस्य को
मत खोज मानव,
डूब जायेगा
इसकी गहराई में।
तुम से न जाने कितने
डूब गये इसमें पर
न पा सके तल
जीवन रूपी सागर का।
छिपा है मात्र इसमें ढ़ेर
लाचारी का,
अंबार बेबसी का।
नदी है कहीं आँसुओं की,
तो कहीं आग है नफरत की।
चारों ओर बस लाचारी है,
कहीं गरीबी का उफान है
तो कहीं भूख का तूफान है।
नहीं रखा है कुछ भी
खोज में इसकी,
घिर कर इसमें पछतायेगा,
सिर टकरायेगा पर
न पा सकेगा रहस्य
इस जीवन का।

इच्छाएँ

गर्म तवे पर
छुन्न से गिरती
पानी की बूँदों की तरह
मनुष्य की असीमित
असंतृप्त आशाओं में
संतृप्त होती,
कुछ उसी तरह।
हमेशा से कुछ और ज्यादा
पाने की कोशिश
पर इसी में खो गया वह
अपना सर्वस्व।
नहीं संभलता है फिर भी
ठोकर खाकर
उठता है,
बढ़ता है, फिर
अगली ठोकर खाने को।
असंतृप्त इच्छाओं की
इस लालची दुनिया में
चला जा रहा है
अनवरत… अकेले…
निरन्तर अकेले।

भूख

भूख
मानव तन से लिपटी सिमटी
एक ऐसी लड़ी
जो जोड़ती है
जिन्दगी में अनेक कड़ी।
कहीं भूख है रोटी की,
तो कहीं दौलत की,
किसी को भूख शोहरत की,
तो किसी को ताकत की,
कत्ल हुआ किसी का भूख में,
लुट गया मानव तन भी भूख में।
भूख ने दिये अंजाम हमेशा
अच्छे और बुरे,
मिली हमें आजादी
भूखे रहकर
आजादी की भूख में,
पर
लुटा गये शांति अपनी
चन्द सिक्कों की भूख में।
कब खत्म होगी भूख
इस मानव मन की?
शायद आज,
शायद कल या
शायद कभी नहीं?

सत्यता 

जिन्दगी के इस अनोखे ढ़ेर से
ऐ मानव
तू ढ़ूँड़ता क्या है?
सोचता है तू
चन्द सिक्कों को लेकर
यही सार है
तेरी जिन्दगी का।
पर सोच खुद
जिन्दगी का यथार्थ क्या है?
छिपा है
जिन्दगी के साये में
बस तड़पना
मानव मन का,
मचलना दिल का।
पाकर हर खुशी
फिर
तड़पता तू क्यों है?
सोच अब भी कि
तूने खोया क्या है?
तूने पाया क्या है?
खोया है तूने बहुत
पर
न पा सका कुछ भी,
न समझा इस सार को,
बस समेटने में लगा है
हर चीज जहाँ की।
सोच अब भी कि
तू लाया क्या है?
न रहा है साथ किसी के
न तेरे साथ रहेगा।
खुशी का यह पल बस
क्षण भर को रहेगा
और अन्त में,
तू भी मिल जायेगा खाक में,
फिर सोच कि
पाकर इतना सब
तुझे फायदा क्या है?

याद तुम्हारी

एक याद तुम्हारी
मेरे सूने जीवन के
किसी कोने को झंकृत करती है।
ठीक उस नन्हीं चिड़िया की तरह
जो
रोज सुबह आकर
खिड़की पर मेरी
अपना मीठा सा गीत सुनाती है।
कर देती है गुँजायमान
मेरी हर सुबह।
ऐसे ही तुम्हारी यादों के
गूँजते मधुर तरानों में
मैं खो जाता हूँ।
भूल जाता हूँ
कुछ पल को
अपने समस्त दुःखों
और गमों को।
पर फिर भी
इन यादों के संगीत से
एक दर्द भरा नगमा उभरता है,
जो तड़पाता है,
रुलाता है,
तुमसे फिर न मिल पाने को,
बस याद में तुम्हारी
जिये जाने को।

उस प्यारे से बचपन में 

हर बात सुहानी लगती थी, उस प्यारे से बचपन में।
हम मौज मस्त में डूबे थे उस प्यारे से बचपन में॥

वो प्यारे संगी साथी सारे, वे गाँव की धूल भरी गलियां।
ओढ़ के चादर अल्ल्हड़ता की, गलिओं में दौड़ा करते थे।।
खेतों की वो हरियाली से, मन का मतवाला हो जाना।
वो बाग़ बगीचों की मस्ती, पेड़ों पर झूला करते थे॥
सुहानी भोर की प्यारी धुन, ढलती शाम का मस्त समां।
सब कुछ अलबेला लगता था, उस प्यारे से बचपन में॥

सावन के बलखाते झूलों से, उड़ करके नभ को छू लेना।
काले बादल की रिमझिम में, मस्ती में भीगा करते थे॥
थक करके जब भी आयें हम, माँ के आँचल की छाँव मिले।
दादी से किस्से सुन-सुन कर, सपनों में उड़ते रहते थे॥
पंछी की तरह से उड़ जाना, बहती नदिया जैसा बहना।
सब कुछ कितना मासूम सा था, उस प्यारे से बचपन में॥

जीवन के तंग झमेलों में फंस, भूले बचपन की मुस्कानें।
न दौड़ सके फ़िर बागों में, फ़िर बारिश में न भीग सके॥
रुपया, पैसा, रोटी, कपड़ा, इस चक्रव्यूह में उलझ गए।
बचपन रूठा, घर भी छूटा, माँ के आँचल में फ़िर सो न सके॥
याद सुहाने बचपन की अब, इस दिल को धड़का देती है।
सिरहन सी मचती है तन में, मन को चंचल कर जाती है।।
थके हुए इस टूटे दिल की, अब तो इतनी ख्वाहिश है।
ले जाए फ़िर से कोई हमें, उस प्यारे से बचपन में॥

मजबूरी 

मेरा मन और मैं
उड़ जाना चाहते हैं
दूर खुले गगन में,
उड़ते पंछियों की तरह।
मिल जाना चाहते हैं वैसे
जैसे नदिया मिलती है
किसी सागर से।
पर जब भी सोचता हूँ
निकलना बाहर
सांसारिक पिंजरे से
हो जाता हूँ बेबस
पैरों में पड़ी
रिश्तों की जंजीरों से।
सोचता हूँ तोड़ना
वो सारी जंजीरें,
वो सारे बंधन
जो रोके हैं मुझे
विचरने को स्वच्छन्द आकाश में,
मिलने को उमड़ कर
किसी सागर से।
पर हो जाता हूँ नाकाम,
आ जाता है हर बार
आँखों के सामने,
खुद का
बूढ़े बाप की लाठी होना,
माँ की आँखों की ज्योति होना,
होना छोटों का सहारा,
फिर
लौट आता हूँ
इसी पिंजरे में
और देखने लगता हूँ
स्वप्न फिर से
आकाश में उड़ने का,
सागर से मिलने का।

एक ज़िन्दगी यह भी 

खाली पड़े बरतनों की खनक से
कुछ होने का धोखा खाकर,
लहू का घूँट ऊपर से पीकर,
वो लेट गया
प्रकृति प्रदत्त बिछौने पर,
ओढ़ कर आसमान की चादर
क्योंकि वह एक
गरीब आदमी है,
जो रोज ही कुँआ खोद
पानी पीता है,
दिन कटता है सारा
कुछ पाने की आस में,
काट देता है सारी रात
अगले दिन की आस में।
वही भूखे पेट की आग
जिससे था उसका
रात-दिन का साथ,
कभी-कभी खाली बरतनों में
ख्याली पुलाव पकाता था,
पेट की आग को शान्त
ऐसे ही कराता था।
यह है उसका
रोज का सिलसिला,
भूख से भोजन का
वही फासला।
यदि आज है कुछ खाने को
तो, कल का भरोसा नहीं,
क्या पता कल
खाली बरतनों की खनक भी
रहे न रहे!

खामोशी

एक निस्तब्धता
हम दोनों के बीच
सदियों से छाई है।
हम दोनों साथ चलते रहे
जाने कब से मगर
इस मौन को न तोड़ सके।
वह बात
जो मैं सुनना चाहता था
तुम्हारी आवाज़ में,
उसे नज़रों की भाषा में
पढ़ सके।
हमारी बात दिल की
दिल में ही रह गई,
एक खामोश मौन की
गहराइयों में बह गई।
तुम्हारे लबों पर,
तुम्हारे विचारों की लय पर
पहरा लगा था समाज का,
परदा पड़ा था
शर्म और लाज़ का,
पर मैं… मैं क्यों मौन रहा?
क्यों खामोशी का दामन थामे
यूँ चलता रहा?
हवा के हर झोंके ने,
बादलों की हर अँगड़ाई ने
छूकर पास से,
सिरहन मचाकर तन में
मौन को तोड़ना चाहा,
पर….
सफर यूँ ही खामोश कटता रहा।
आज फिर तुम्हारी नज़रों ने
संग ले इस सुहाने मौसम का
कुछ पूछना चाहा,
खामोश दर्प को तोड़ना चाहा।
नज़रों ने
नज़रों की निस्तब्धता को तोड़ा,
हम फिर भी
वैसे ही खामोश रहे,
नज़रों के सहारे ही
कुछ कहते रहे।
और चल पड़े अगले पल
वैसे ही खामोश, मौन,
निस्तब्धता लिए।
न पता कब तक
यूँ अनवरत,
शायद जनम-जनम तक,
इस जनम से उस जनम तक।

तुम महसूस तो करो

सोचो न कभी खुद को तन्हा यहाँ
हम सब हैं साथ तुम्हारे सदा,
तुम्हारे साये की तरह,
तुम महसूस तो करो।

महसूस करो हमारा होना तुम,
अपने खून की रवानी में,
दिल की धड़कन में,
अपनी हर साँस में।
हर धड़कन में है संदेश
हमारे प्यार का।
हर साँस में है महक
स्नेह, दुलार की,
हम सभी के विश्वास की,
तुम महसूस तो करो।

गुजारे जो दोस्त, यारों के संग,
बचपन के वो सुहाने दिन,
गुजर गये वो
हवा के झोंकों की तरह।
लड़खड़ा कर गिरना,
सँभलना फिर
वो माता-पिता की बाँहों में।
वो अपनों से झगड़ने का
मीठा एहसास,
अब भी है
दिल के किसी कोने में,
बन करके याद तुम्हारे आसपास,
तुम महसूस तो करो।

घर 

घर,
महज एक ढांचा नहीं,
एक भरा-पूरा संसार है,
एक छोटा सा घरौंदा है,
हमारे प्यार का।
हमारे आपसी विश्वास का।
घर की छत और दीवारों पर
हमने देखे हैं
अपने पुरखों की
भावनाओं, महत्वाकांक्षाओं के छाप।
इसकी एक-एक ईंट,
एक-एक कोने पर
हमने महसूस किया है
उनका होना
जो आज न होने पर भी
मौजूद हैं किसी न किसी रूप में
साथ हमारे।
जिन्हों ने हमारे
भूत, भविष्य और वर्तमान को
संवारा है।
दरवाजे की चौखट पर खडी
उनकी अप्रत्यक्ष भावनाएं
तथा हमारे लिए उनका आशीष
हमें बचाता है
समाज के कलुषित विचारों से,
बचाता है हमारी इज्जत को
सड़क पर टहलती,
घरों में झांकती आवारा नजरों से।
लेकिन फ़िर हवा बदली,
गति बदली, हर मान्यता बदली,
सपने टूटे, रिश्ते टूटे,
बिखर गया
घर-परिवार के नाम पर बुना सपना।
जो घर कभी हमारे निराश-हताश होने पर
हमें देता था सहारा,
कभी खुशियों में मन बहलाता था हमारा
आज उस घर की
बदल गई है परिभाषा,
मिट चुकी है उससे परिवार, अपनत्व की भावना।
आ गई गाँठ
आपसी विश्वास के स्नेहमयी सूत्र में,
ठंडी हो गई रिश्तों की उष्णता।
घर,
अब बन गया है एक ढांचा,
एक खांचा,
अपने आप में सिमटे रहने का,
अपने ही लहू को बाँट कर
बहाते रहने का।
याद है अभी तक मुझे
अपने आँगन में वो धुप में खेलना,
नीम की मीठी छाँव तले,
सावन की फुहारों के साथ ही
गगन छूने को झूलों के संग उड़ जाना।
अभी भी वे यादें इस घर के आँगन की,
जिसके कोने में कभी बनाए थे हमने
मिट्टी के सपनीले घर,
कभी जलाया था एक चूल्हा,
कभी पकाया था ख्यालों में खाना।
तब कितना विशाल और
ख़ुद से जुड़ा लगता था
घर आँगन का हर एक कोना,
पर आज
कितना तन्हा खड़ा हूँ में
बीच में खिंची दीवार के इस पार,
दबी हैं, सिसकतीं हैं
अधूरी यादें कहीं उस पार।
फ़िर एक हूक सी उठती है मन में
नीम की छाँव को छूने की,
अपने बचपन के,
सपनों में बनाए घरों को देखने की,
लेकिन दीवार घर के आँगन की,
दीवार रिश्तों में आई नफरत और स्वार्थ की,
रोकती है मुझे जाने को उस पार।
दीवार के उस पार
तन्हा खड़े नीम के पेड़ सा मैं भी
इस ओर तन्हा खडा हूँ।
बस यादों को महसूस करता हूँ,
दिल ही दिल में रोता हूँ,
अपनत्व, स्नेह, आशीष भरे घर-परिवार को,
ईंट, पत्थर का घर
महज एक ढांचा बने देखता हूँ।

कलम की यात्रा 

थक गई कलम,
शब्द अर्थहीन हो गए,
सूख गई स्याही,
रचनाएं भी अब निष्प्रभावी हो गईं।
हो गया क्या यह सब?
क्यों हो गया यह सब?
समय की गति के आगे,
हर मंजर संज्ञा-शून्य हो गया है अब।
याद आता है अभी भी
इस भूलने वाली अवस्था में,
जब थाम कर हाथों में कलम,
पहली बार रची थी कुछ पंक्तियाँ,
सजाई थी कागज पर एक कविता।
बाल मन, बाल सुलभ उड़ान को
मिल गए थे कल्पनाओं के पर,
कभी सूरज, कभी चन्दा
उतर रहे थे आसमान से जमीं पर।
कभी तोता, मैना सजते,
कभी उड़ती थीं रंगीन तितलियाँ
कागज के जंगल पर।
कभी सरदी, कभी गरमी
तो कभी बारिश की रिमझिम होती रहती,
ऊंचे पहाडों, हरे-भरे मैदानों में दौड़ते रहते,
उड़ते रहते हम
सपनों में आती परियों के साथ
और यूँ ही
बाल मन की कल्पनाएँ सजती रहतीं।
समय उड़ता रहा,
वक्त गुजरता रहा,
परियों, तितलियों, तोता, मैना का संग
कहीं पीछे छूट गया।
यौवन कलम पर चढ़ा,
जवानी रचनाओं ने भी पाई,
युवा मन ने अपनी रचनाओं को
नवयौवना की चुनरी ओढाई।
मौसम, गगन विशाल,
वो रिमझिम बरसात,
जवाँ हो गया हर शमां,
जवाँ हो गए हर जज्बात।
शब्दों का बचपना
अब हँसी रूप धर रहा था,
रच रहा था
नारी के सुकोमल अंगों की नई परिभाषाएं,
सजा रहा था
श्रृंगार रस में पगी कवितायें।
सलोने मुखड़े की सादगी का दीवानापन,
सावन के झूले, बारिश में भीगे तन-मन।
कभी रात की तन्हाई,
कभी दो पल का मिलन।
झील सी आँखें, घनेरी जुल्फें,
छनकती पायल,
खनकती चूडियाँ,
हांथों की मेंहदी,
माथे की बिंदिया को सजाता, संवारता रहा।
लेकिन वक्त ने फ़िर करवट बदली,
कलम ने फ़िर
उम्र की दूसरी राह पकडी।
बिता कर एक अल्हड जोशीली दुनिया,
परिपक्वता के सागर में समा रही थी,
नवयौवना के हाव-भाव,
अंगों-प्रत्यंगों पर
हजार-हजार बार चली कलम
अपनी सार्थकता दर्शा रही थी।
अब रचनाओं में भविष्य के सपने नहीं,
किसी हसीन ख्वाब की तस्वीर नहीं,
मन का गुबार झलकता था,
अव्यवस्थित हो रहे ढांचे के प्रति
रोष झलकता था।
गरीबी, भूख, बेकारी, दंगे
और भी न जाने कितनी समस्याओं को
कविता की लड़ियों में पिरोया था,
अपने आसपास की प्रदूषित हवा को
शुद्ध करना चाहा था।
अब बुरा लगता था
यूँ नवयुवक-युवतियों का
बेबाक होकर चलना,
बांहों में बाँहें डाले गलियों में घूमना.
नहीं भाता था अब
समाज का चलन,
नहीं रास आती थी अब जीने की कला।
सुबह से शाम तक भटकना,
मशीन बने रहना और फ़िर
अगली सुबह से
वही क्रिया-कर्म दोहराना।
युवावस्था की आग जो विचरती थी
स्वप्लिन दुनिया में
उसे अब हकीकत की जमीं पर लाया जा रहा था।
सैकड़ों रचनाएँ, हजारों पन्ने रंग गए,
आज की अव्यवस्था पर सज गए
पर कुछ भी न बदल सका,
नहीं बदल सका
मानव का मशीन बनना,
नहीं रुक सका जुल्म
गरीबों पर अमीरों का,
सरकारें वैसे ही खामोश सोती रहीं,
नव-वधुएँ तड़प-तड़प कर
आग में खोती रहीं।
मिटती रही हमेशा की तरह अजन्मी बिटिया,
बढ़ती रही और भी
लोगों की अतृप्त लालसा।
कुछ भी तो नहीं बदल सका मैं,
समाज की बुराइयों, गंदगी को
मिटा न सका मैं।
समझ रहा था
कितना आसान है यूँ
शब्द क्रांति के सहारे दुनिया बदलना,
कितना सरल होगा इस तरह
लोगों को प्रेम-स्नेह में ढालना।
मिट सकेगी कविताओं, रचनाओं के सहारे
लोगों की भूख-प्यास,
नंगे बदन को ढंकने और
अपने घर की आस।
पर यह एक भूल थी,
कुछ भी तो नहीं बदला जा सकता
मात्र कुछ शब्दों के सहारे,
मन का बहलाव,
दिल की भडास को ही
मिटाया जा सकता है इसके सहारे।
फ़िर क्यों रंगे जा रहा हूँ मैं
कागज़ पर कागज़?
क्यों नहीं समझ पा रहा हूँ
आज वक्त की नजाकत?
आह! अब सोचता हूँ
उस नन्हीं सी,
बचपन की कलम के बारे में,
जो रचा करती थी सुनहरा संसार,
चारों ओर बस प्यार ही प्यार।
फ़िर वैसी ही कलम,
वही जादुई शब्दों की जरूरत है,
वही चाहत, वैसी कल्पना की जरूरत है।
इस परिपक्व कलम ने
बस लोगों का रोना ही रचा है,
दुःख व करुणा को ही लिखा है,
बिला-वजह के शब्द जाल को बुना है।
रोने-हंसने-जीने-मरने,
एक-एक पल का हिसाब रखा है।
लोगों के सीने में दफ़न दर्द को
उकेर कर कागजों पर रंगे
वो कलम नहीं चाहिए,
निरर्थक, नाकाम शब्दों को
मात्र रचती रहे
वो कलम नहीं चाहिए।
शायद यही जिन्दगी की थकान,
टूटन की पहचान है,
लगता है अब इस कलम का
यही आखिरी पड़ाव है,
या कहें कि
अब इस कलम का,
इस जिन्दगी का यही ठहराव है।

कहाँ आ गए हैं

पड़े थे खंडहर में
पत्थर की मानिंद,
उठाकर हमने सजाया है।
हाथ छलनी किए अपने मगर
देवता उनको बनाया है।
पत्थर के ये तराशे बुत,
हम ही को आँखें दिखाने लगे हैं,
कहाँ से चले थे कहाँ आ गए हैं?

बदन पर लिपटी है कालिख,
सफेदी तो बस दिखावा है।
भूखे को रोटी,
हर हाथ को काम,
इनका ये प्रिय नारा है।
भरने को पेट अपना
ये मुंह से निवाले छिना रहे हैं,
कहाँ से चले थे कहाँ आ गए हैं?

सियासत का बाज़ार रहे गर्म,
कोशिश में लगे रहते हैं।
राम-रहीम के नाम पर
उजाड़े हैं जो,
उन घरों को गिनते रहते हैं।
नौनिहालों की लाशों पर
गुजर कर,
ये अपनी कुर्सी बचा रहे हैं,
कहाँ से चले थे कहाँ आ गए हैं?

तुम्हारा अहसास

नहीं सोचा था कि तुम
इस तरह रूठ जाओगे,
हम पुकारेंगे तुम्हें
और तुम
लौट कर न आओगे।
जाना ही था इस तरह
मुंह मोड़ कर तो,
दिल इस तरह लगाना न था।
बेगाना होना था हम सभी से तो,
हमको अपना बनाना न था।
एक उम्र भी कम रहती वैसे तो
तुम्हारे साथ बिताने को
पर
जो गुजरे दो पल
काफी हैं वही अब
उम्र भर रुलाने को।
छवि जो बसी है दिल में
वही आंखों में सज गई है
पर
नसीब में नहीं है
उसे भी निहार पाना
क्योंकि आंख भी
आंसुओं से धुंधला गई है।
मन नहीं मानता है अभी भी
तुम्हारा न होना,
हर आहट,
हर दस्तक पर अहसास
कि हो तुम्हारा आना
पर
तुम तो चमक रहे
दूर आसमान पर बन कर सितारे,
यहाँ बेचैन हैं तुम्हें देखने को
वीरान गुलशन के नजारे।
फ़िर भी हम रखेंगे
तुम्हारा वजूद कायम,
उन सपनों के सहारे
जो तुमने देखे,
उन खिलौनों के सहारे
जो तुमने खेले।
तुम्हारी साँसों से रची-बसी
आँगन की हवा के सहारे।
तुम्हारी किलकारी,
तुम्हारी हँसी से गूंजती
फिजा के सहारे।
लड़खडाने पर तुम्हें संभालते
अपने हाथों के सहारे।
थकन भरे क्षणों में जो गुजारे
उस माँ के आँचल के सहारे,
कौन कहता है
कि तुम नहीं हो,
हर अहसास,
हर लम्हा,
हर याद,
हर तस्वीर बताती है
कि तुम हो,
यहीं हो,
कहीं बहुत नजदीक,
इस दिल के आसपास ही हो।

पहचान के साथ ही… 

अपराध करने के बाद भी
अपराध-बोध का
तनिक भी भान नहीं,
नहीं एहसास कि
वह अपने हाथों से
मिटा चुका है एक सृष्टि को,
वो हाथ जो
झुला सकते थे झूला,
दे सकते थे थपकी,
सिखा सकते थे चलना,
जमाने के साथ बढ़ना,
उन्हीं हाथों ने
सुला दिया मौत की नींद,
मिटा दिये सपने,
अवरुद्ध कर दिया विकास,
बिना उसकी आंखें खुले,
बिना उसके संसार देखे,
बिना अपना परिवार जाने,
समाप्त हो गया उसका अस्तित्व,
समाप्त हो गया एक जीवन,
मिट गई एक मुस्कान
क्योंकि
समाज में आने के पूर्व ही
समाज के कथित ठेकेदार
कर चुके थे उसकी पहचान।

शाश्वत मौन 

एक मौन,
शाश्वत मौन,
तोड़ने की कोशिश में
और बिखर-बिखर जाता मौन।
कितना आसान लगता है
कभी-कभी
एक कदम उठाना
और फिर उसे बापस रखना,
और कभी-कभी
कितना ही मुश्किल सा लगता है
एक कदम उठाना भी।
डरना आपने आपसे और
चल देना डर को मिटाने,
कहीं हो न जाये कुछ अलग,
कहीं हो जाये न कुछ विलग।
अपने को अपने में समेटना,
अपने को अपने में सहेजना,
भागना अपने से दूर,
देखना अपने को मजबूर,
क्यों…. क्यों…. क्यों???
कौन देगा
इन प्रश्नों के जवाब?
फिर पसर सा जाता है
वही मौन… वही मौन…
जैसे कुछ हुआ ही न हो,
जैसे कुछ घटा ही न हो।

मुझे एक बार जन्मने तो दो

माँ,
मुझे एक बार जन्मने तो दो।
मैं खेलना चाहती हूँ
तुम्हारी गोद में,
लगना चाहती हूँ
तुम्हारे सीने से,
सुनना चाहती हूँ
मैं भी लोरी प्यार भरी,
मुझे एक बार जन्मने तो दो।

माँ,
क्या तुम नारी होकर भी
ऐसा कर सकती हो,
एक माँ होकर भी
अपनी कोख उजाड़ सकती हो,
क्या मैं तुम्हारी चाह नहीं,
क्या मैं तुम्हारा प्यार नहीं,
मैं भी जीना चाहती हूँ
मुझे एक बार जन्मने तो दो।

माँ,
मैं तो बस तुम्हें ही जानती हूँ,
तुम्हारी धड़कन ही पहचानती हूँ,
मेरी हर हलचल का
एहसास है तुम्हें,
मेरे आँसुओं को भी
तुम जरूर पहचानती होगी,
मेरे आँसुओं से
तुम्हारी भी आँखें भीगती होंगी,
मेरे आँसुओं की पहचान
मेरे पिता को कराओ,
मैं उनका भी अंश हूँ
यह एहसास तो कराओ,
मैं बनके दिखाऊँगी
उन्हें उनका बेटा,
मुझे एक बार जन्मने तो दो।

माँ,
तुम खामोश क्यों हो,
तुम इतनी उदास क्यों हो,
क्या तुम नहीं रोक सकती हो
मेरा जाना,
क्या तुम्हें भी प्रिय नहीं
मेरा आना,
तुम्हारी क्या मजबूरी है,
ऐसी कौन सी लाचारी है,
मजबूरी? लाचारी??
मैं अभी यही नहीं जानती,
क्योंकि
मैं कभी जन्मी ही नहीं,
कभी माँ बनी ही नहीं,
माँ,
मैं मिटाऊँगी तुम्हारी लाचारी,
दूर कर दूँगी मजबूरी,
बस,
मुझे एक बार जन्मने तो दो।

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