कुमार पाशी की रचनाएँ

रात! मेरे दिल में नाच

रात–प्यारी रात-नाच
चल रही है आज यादों की पवन–ऐ रात नाच
आसमानों की बहन–ऐ रात नाच

ऐ मेरी देरीना महबूबा, मेरी दिलदार नाच
वहशियों के हाथ की तलवार नाच
इस ज़मीन की सरहदों के पार–नाच

पर्बतों पर नाच, दरयाओं पे नाच
गुलशनों पर नाच, सहराओं पे नाच
दूर के फूलों भरे मधुबन में नाच
रात! मेरे घर मेरे आंगन में नाच

रात–प्यारी रात–आ
चांद तारों की दुलारी रात-आ
दो घड़ी अब दर्द की महफ़िल में नाच
रात! मेरे दिल में नाच

अलिफ की खुदकुशी

जलती बुझती रोशनियों में साया साया जलता था
सारा कमरा व्हिस्की और सिगरेट की बू में डूबा था
उबल रह था ज़हर रगों में, मौत का नशा छाया था
सारा मंज़र नुकता नुकता, मुहमल मुहमल सा लगता था
शायद कुछ दिन पहले तक यह कोई भूत बसेरा था

‘अलिफ’ निहत्था…’जीम’ निहत्थी…सारे बे-हथियार
अपने मुल्क और अपनी कौम के मुर्दा पहरेदार

‘जीम’ ने सारे रंग उतारे
और कहकहा मार के गरजी
है कोई दावेदार
सारे जाम उठा कर चीखे, तेरे एक हज़ार!
‘जीम’ अंधेरों से बाहर आयी, किया अलिफ पर वार
बाप तेरा मकरूज़ था, मेरा कर्ज़ उतार

आर-पार सब साए गुम, भूत बने दरवाज़े
प्रेत आत्माओं की सूरत खडी हुई दीवारें
गहरी–अपार खामोशी–गहरी अथाह अपार
बे-आवाज़ अँधेरे बरसे, बरसे मूसलाधार
बिजली बन कर कौंध रहे थे यही शब्द, ‘बाप तेरा मकरूज़ था मेरा’

एक अनोखी खबर छपी है शहर के सब अखबारों में
सब दुकानें बंद पडी हैं कोई नहीं बाजारों में
साएं साएं लू चलती है, मिटटी मिटटी मौसम है
आज अलिफ के जल मरने पर दुनिया भर में मातम है

जलती बुझती रोशनियों में साया साया जलता है
उबल रह है ज़हर रगों में मौत का नशा छाया है
सारा मन्ज़र नुकता नुकता मोहमल मोहमल लगता है
एलिपेना सच कहता था; यह कोई भूत बसेरा है

खुश हो ए दुनिया कि एक अच्छी खबर ले आये हैं 

खुश हो ए दुनिया कि एक अच्छी खबर ले आये हैं
सब ग़मों को हम मना कर अपने घर ले आये हैं

इस कदर महफूज़ गोशा इस ज़मीन पर अब कहाँ
हम उठा कर दश्त में दीवार-ओ-दर ले आये हैं

सनसनाते आसमान में उन पे क्या गुजरी न पूछ
आने वाले खून में तर बाल-ओ-पर ले आये हैं

देखता हूँ दुश्मनों का एक लश्कर हर तरफ
किस जगह मुझको यह मेरी हम-सफर ले आये हैं

मैं कि तारीकी का दुश्मन मैं अंधेरों का हरीफ़
इस लिए मुझको इधर अहल-ए-नज़र ले आये हैं

सब दरवाज़े 

मैंने अपने घर की सारी खिड़कियाँ सब दरवाज़े खोल दिए हैं।
सुर्ख़ सुनहरी गऊओं संग ऊषा भी आए
कच्चे दूध से मुँह धोकर चंदा भी आए
तेज़ नुकीली धूप भी झाँके
नर्म सुहानी हवा भी आए
ताज़ा खिले हुए फूलों की मनमोहक खु़शबू भी आए
देस देस की ख़ाक छानता हुआ कोई साधु भी आए
और कभी भूले से
शायद
तू भी आए
युगों युगों से
मैंने
अपने दिल की सब खिड़कियाँ सब दरवाज़े खोल दिए हैं।

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