कुमार मंगलम की रचनाएँ

नदी कथा

दिन ढ़लते
शाम
तट पर पानी में पैर डाले
नदी किनारे
रेत पर
औंधा पड़ा है

2.
नदी किनारे
रेत के खूंटे में
बजड़ा बंधा है

नदी के
प्रवाह में प्रतिबिम्बित
एक बजड़ा और है

यूँ नदी ने
बजड़े का चादर ओढ़ रखा है

3.
नदी के बीच धारा में
लौटते सूर्य की छाया

नदी के भाल को
सिंदूर तिलकित कर दिया है

यूँ नदी
सुहागन हो गयी है।

4.
नदी के तीर
एक शव जल रहा है

अग्नि शिखा
जल में
शीतलता पा रही है।

5.
सूर्योदय के वक्त
पश्चिम से
पूर्व की ओर देखता हूँ

नदी के गर्भ से
सूर्य बाहर आ रहा है।

6.
नदी किनारे
एक लड़की
जल में पैर डाले

बाल खोले
उदास हो
जल से अठखेलियाँ खेलती है

यूँ नदी से
हालचाल पूछती है।

7.
बीच धारा में
नाव
नहीं ठहरती

नदी के बीच में
भँवर है

8.
नदी
को देखा आज नंगा

पानी उसका
कोई पी गया है

नदी अपने रेत में
अपने को खोजती

एक बुल्डोजर
उस रेत को ट्रक में भर कर

नदी को शहर में
पहुंचा रहा है।

9.
नदी की अनगिनत
यादें हैं मन में

नदी अपने प्रवाह से
उदासी हर लेती है

उसकी उदासी को
हम नहीं हरते

10.
शाम ढले
उल्लसित मन से
गया नदी से मिलने नदी तट

नदी मिली नहीं
शहर चुप था
उसे अपने पड़ोसी की
खबर नहीं थी

नदी में जल था
प्रवाह नहीं था

नदी किनारे लोग थे
शोर था
चमकीला प्रकाश था

नदी नहीं थी

लौटता कि
आखिरी साँस लेती
नदी सिसकती मिल गयी

उसने कहा
यह आखिरी मुलाक़ात हमारी

दर्ज कर लो
तुम्हारे प्यास से नहीं
तुम्हारे भूख से मर रही हूं

यूँ एक नदी मर गयी

और मेरी नदी कथा
समाप्त हुई

भारी मन से
प्यासा ही
घर लौट आया।

सारंगी

1.
जब तारों पर
हड्डियाँ रगड़ता है बजवैया

तब फूटता है
कोई स्वर
सारंगी का

2.
जब कभी भी
सुनो सारंगी को
लोहे पर कान दो
किसी की हड्डी घिसती है
तब जाके आवाज में असर होता है।

3.
कोमल ऊँगलियों
से नहीं
निकलते हैं स्वर

रगड़ से
घट्टे पड़ जाते हैं
फिर बजता है सारंगी।

4.
सुनते हैं जो
सिसकी
बजते सारंगी में

हड्डियों के घिसने
के गीत हैं।

5.
बेजान बाजे में
जिंदा आवाजें नहीं होती

बजवैया के आत्मा पर
ट्यून होता है जब बाज
तब जाके निकलती है कोई आवाज

सुनने वाले
बजाने वाले के
आत्मा का गीत सुनते हैं।

अभिव्यक्ति

आग के बीचों-बीच
चुनता हूँ अग्निकणों को
सोने के भरम में

रेत के
चमकते सिकते
धँसाते हैं मुझको भीतर तक रेत में
पत्थर होता है वह

गहरे उतरता हूँ पानी में
तलाशता हूँ मोती
पर मिलता है सबार

सार्थकता की यह तलाश
हर बार निरर्थक हो जाता है
खोजता हूँ लगातार
पर नहीं पाता हूँ
जिसके लिए भटकता हूँ

अभिव्यक्ति या अपनी ही आवाज
की बेचैनी

जीवाशा

अंधेरी रातों के निचाट
सूनेपन में
तानपुरे की सी
झींगुर की आवाज
जीवाशा है।

जेठ की भरी दुपहरी में
जब गर्म हवाओं का शोर है
चारो-ओर
तभी बर्फ-गोले वाले की
घंटी की आवाज
जीवाशा है।

ठिठुरती सर्द रातों में
मड़ई में रजाई में पड़े पड़े
जब अपनी दाँत ही
कटकटा रही हो
रोते कुत्ते की करुण किकियाहट
जीवाशा है।

जीवन के कठिनतम समय में
भी
बची रहती है
एक जीवाशा।

ईद

तमाम शिकवें और शिकायतों को
परे रख

नफरतों के उफ़क़ को
प्रेम से पाट कर

अवढर उदारता से
गले मिलो

यह ईद का त्योहार है ।

चलो

चलो
कि चलने का वक्त है

चलो की चलते जाना है
चले चलो कि
मंजिल अभी नहीं आयी है

राह है कि पता नहीं
पर चलो

चलो पर देखो कि
जिस राह पर चल रहे हो
वह किस ओर जाती है

हत्या हो तो चलो
मर जाओ तो चलो
चलो जब झूठ अपनी सारी हदें पार कर जाये
चलो किसी मृतकभोज में
चलो किसी उत्सव में और दो कौर उठाओ

चलते चलो कि मंजिल करीब नहीं
तुम्हारे उद्धार के लिए कोई भागीरथी नहीं
चलो चलो कि
चलते चले जाना है
मर जाना है
जीते जीते
या मरते मरते भी चले जाना है

चलो कि हमारी कोई मंजिल नहीं
बस चलो.

हवा से चलते-फिरते माँग लिया एक श्वांस
आग से थोड़ी गर्मी मांग ली
अन्न से माँग लिया भोजन
फल से थोड़ा सा हिस्सा ले लिया उधार
और फूल से गंध

जीवन में जीते हुए
दुराशा से मांग ली थोड़ी लापरवाही
प्रत्याशाओं ने घेरा
और मुझे अकर्मण्य बना दिया

पहाड़, नदियाँ, प्रकृति आदि ने
मुझे दिया खुलेपन का उपहार दिया
मैं यूँ ही जीता गया
परजीवी होकर, उधार का खाया
उधार का जिया
उधार का हिसाब बन गया समंदर
एक दिन समंदर के लहर ने
दरवाजा खटखटाया
और कहा मेरे उधार को चुकता करो

कैसे चुकता करता
दुब की नोक भर हरियाली
दिए का टिमटिमाता प्रकाश
अंधेरे के गान का शोर
उजास की शांति
यह मेरे अकेलेपन, असमंजस की कथा
अकुलाहट में सहम कर चुप हुआ

बंद हुए सब दरवाजे
हर आहत का खटका
सूदखोर के आने का संकेत

यूँ भाग-भाग और डर-डर कर
उधार हुआ अपना जीवन
मैं रहा कृतघ्न
मैं मरा अकेले
प्यार विहीन

उस उधार के बदले
दे देता…

वसंत यहां जल्दी आता है

शीघ्रता में भी एक लय है
जल्दी-जल्दी हो जाने का लय
वसंत के आते ही
सभी पीले होने लगते हैं

पीले पात, पीले गात

पीलेपन की यह सामूहिकता
शीघ्रता की लय में घटित होती है

कुछ पत्ते पीले होकर डाल से झूलते रहते हैं
और कुछ पीलेपन की निस्तेज छटा के साथ
धरती से आ मिलते हैं।

शाम में डूबता सूर्य शीघ्रता के क्रम में
पीला होता है और फिर
काली और लम्बी रात में तब्दील हो जाता है

अचानक पीलेपन का सौंदर्य मोहने लगता है
लेकिन यह भी शीघ्रता में घटित होकर
लंबी उदासी या ऊब पैदा करता है

पीला अपने पीलेपन में
प्रेम और घृणा का सहमेल है
जीवन.

प्रेम 

हवा चली है पुरवाई
और महक उठा है कमरा
रजनीगंधा के सुगंध से

पूरब की तुम थी
और जब भी बहती है पुरवा
तुम्हारी देह गंध को महसूस करता हूँ

2
मेरे कमरे में
मेरी पत्नी ने गुलदान में रख दी है रजनीगंधा

रजनीगंधा के फूल जैसे आंखें हो तुम्हारी
उसे देखता हूँ तो लगता है
उनमें कुछ अनुत्तरित सवाल हैं
जिनके जबाब मेरे पास है

3
रजनीगंधा की फूल
मेरे मन को सहलाती हैं
और
याद आता है वो पल
जब तुम्हारी उंगलियां मेरे बालों को सहलाती थी

4
प्रेम के सबसे अकेले क्षण में
जब हम केलिरत थे
लाज छोड़ सिमट गई थी तुम मुझ में

तुम्हारे उन्नत उरोजों पर
फूलों की पंखुड़िया चिपकी रह गयी थी.

जीवाशा की जगह हमेशा आरक्षित होती है।

मेरे एक अकेले के लिए कितनी जगह चाहिए। मैं अकेले इस धरती से कितना अन्न खा जाऊंगा। मैं अकेले इस देश का कितना जगह घेरता हूँ। तुम्हारे स्मृतियों में मेरी जगह कितनी है। तुम्हारे विचारों में मेरी असहमतियों के लिए कितनी जगह है। मेरे जिंदा अस्तित्व का कौन सा हिस्सा तुम्हारी आँखों में गड़ता है। तुम्हारे नफरतों या प्यार में मेरी उपस्थिति कितनी है। मैं तुमसे कितना दूर और तुम्हरे निज के कितने पास हूँ।

अब मैं यहां से जा रहा हूँ। अब मैं सो जाता हूँ। अब मैं खो जाऊंगा। अब मैं वापस नहीं आऊंगा। मेरा साथी मैं ही हूँ। जितना मैं जगह लेता हूँ, दुनिया के किसी कोने में वो जगह सृजित नहीं हुई है। अब मैं जब तक माकूल दुनिया न बसा लूं, जिसमें मेरे लिए अभय और तुम्हारे लिए प्रेम की जगह न हो, मैं वापस नहीं आऊंगा। तुम अपनी नफरतों में मुझे तलाशती रहो, अब मैं तुम्हारे प्रेम से नहीं लौट आने के जीवाशा में यहां से जा रहा हूँ।
(गद्य कविता)

लौटा दो 

जैसे मैं तुझसे प्यार करता हूँ
और तुम तक आता हूँ हर बार

तुम मुझसे प्यार करो
और मुझे भूल जाओ

तुम मुझे वैसे ही किनारे से
लौटा दो
जैसे समुद्र से उठती लहरें
किनारों को छूकर
लौट आती है।

आदमखोर लोकतंत्र

जो बड़ा हो रहा था
बढ़ रहा था
वह लोकतंत्र था

वह पहले भीड़ में बदला
फिर शोर में
और फिर हत्याओं में

वह आदमकद था
और देस लघुमानव
फिर वह आदमकद
आदमखोर में तब्दील हो गया

इस तरह लोकतंत्र
आदमखोर लोकतंत्र में प्रतिष्ठित हुआ ।

अफ़साने प्रेम के

1
दरख़्त अफ़साने सुनायेंगे
प्रेम के

सदियों तक गवाही देते रहेंगे
कि हमने जो किया वह
प्रेम नहीं
विद्रोह था ।

2
सफर के गवाह
केवल प्रतीकों में नहीं

छवियों में
कैद हैं

कुछ घटनाएं
अनकही हैं
उन्मुक्त मन की उड़ान में
याद आयेंगी कभी

3
जमाना गुजरा
कदमों के निशान
बहुतेरे होंगे
पत्थर कुछ मुलायम जरूर हुए होंगे

प्रस्तर और मूर्तियों में
जो बचा
वो अठखेलियां होंगी हमारी

बनारस और बिल्ली 

बनारस में जिंदा ही मृत नहीं होता
जो मृत हैं वो भी मरते हैं बनारस में

बनारस एक स्थगित शहर है
जहाँ बिल्लियां दूध की ही नहीं
खून की भी प्यासी है
उनकी प्यास चिरंतन है

बनारस की बिल्लियाँ
मृदुभाषी होकर निकलती हैं शिकार पर

नजरें उठा कर ही नहीं नजरें झुका कर भी
हया से करती हैं शिकार
वहाँ एक बिल्लौटा भी चुनाव जीत कर बनता है प्रधान
और उछालता है जुमले

बनारस अपना रहस्य जाहिर नहीं होने देता
मृत्यु के देव का यह शहर मृत्यु-बोध का शहर भी है
जहां बिल्ली की तरह ही दबे पाँव प्रवेश पाती है मृत्यु भी
बनारस सिर्फ मणिकर्णिका में ही नहीं
वह सीमांचलों और खेतों में भी रहता है
जहां जवान और किसान एक साथ मरते हैं

बनारस और बिल्ली रहस्य ही है ।

रूप-अरूप

1.
शुभ
अचानक बदल जाता है
अशुभ में

और
शुभचिंतक बन जाते हैं ठेकेदार
ठेकेदार काम पूरा होने पर
लग जाते हैं किसी और काम पर ।

2.
जब कभी
किसी ने किसी को
पहचानने से किया है इंकार

उसनेअपने आप को छला है ।

3.
नाहक ही
टूट जाते हैं बड़े से बड़े बंधन

जो दिखने में सबसे विश्वसनीय होता है
सबसे पहला घात वही करता है ।

4
यादें
छतनार हैं
और तुम रौशनी
जब भी याद आती है तुम्हारी
धूप और छांव का तारामंडल बनता है ।

अर्धरात्रि में
तुम्हारी यादों की तुर्शी से ही
महक उठता है छितवन सा
मेरे मन का जंगल

5
पलाश, टेसू, गुलमोहर,
नीम, पारिजात, छितवन
कचनार, आम्र-बौर
और रजनीगंधा
मुझे प्रिय है
इनका झरना प्रिय है

इनके जैसा हो जाना प्रिय है
क्योंकि मुझमें इनके जैसा
वियोग का स्थाई भाव है ।

मायाविनी

स्वदेश दीपक की मायाविनी की एक याद

गहरे स्वप्न में
आती है मायाविनी
हिरणी-सी कुलाँचे भरती

मायाविनी चीर विरहिणी है
कुलधरा के खण्डहरों में
करती है इन्तज़ार उस पालीवाल का
जो भागते-भागते मर गया था
सालम सिंह के जुल्मों से

उसकी सखी है रूपमती
और बाज बहादुर दिखता है उस
पालीवाल-सा
मायाविनी ने कहा था
मैंने माण्डू नहीं देखा है

मायाविनी अथक सहचरी है
वियोग के क्षणों में
स्पर्श होता है उसकी आत्मा का
मन के सूने में विचरती है
कि अचानक आत्मा का जासूस कमज़ोर
पड़ जाता है और वो बन जाती है
आत्मा की परछाईं

फ़ासले ऐसे हो जाते हैं कि
शरीर से आत्मा की दूरी बढ़ने लगती है
कि सब अपना बेगाना हो जाता है

उसकी छुवन है काला जादू
छुवन जो मानसिक है
और स्मृतियों की सहचर है
मैं उसे पा लेना चाहता हूँ
जिसे मैंने ही रचा है

उसे पकड़ने का करता हूँ
अन्तहीन निरर्थक प्रयास
वह मुझसे उतनी ही दूर है
जितनी मेरी अभिव्यक्ति ।

गोधूलि

ज्ञान और मूर्खता का सन्धि-स्थल

मूर्खता जब ज्ञान पर
हावी होने लगती है
धीरे-धीरे
समाप्त होने लगती है प्रज्ञा
नहीं कर पाते आप तर्क
एक अकुण्ठ श्रद्धा-भाव से
उपजती है मूर्खता
ज्ञान की रक्तिम आभा को
भस्मीभूत कर
उपजता है अन्धेरा
तब जन्मते है मूर्ख

मूर्खों के साम्राज्य में
नहीं जगह है
बुद्ध, गैलीलियो, कोपरनिकस, कबीर और मार्क्स की

अन्धेरे का भी अपना प्रकाश होता है
जिसे अक्सर लोग
ज्ञान की चकाचौंध समझ लेते हैं
वे नव्यता को नकार देते हैं
वे अपने खोल में जीते हैं

उस अन्धेरे में पलता हैं कहीं न कहीं
ज्ञान का विचार
कि उसका तेज अपने को समेट लेता है
धीरे-धीरे टूटता है
अन्धेरे का आवरण

फैलता है प्रकाश भी उसी तरह
जैसे अपने को समेट लेता है
गोधूलि और फजेरे का वक़्त एक सा होता है
अन्तर सिर्फ़ इतना कि

गोधूलि की प्रकृति उदास है
तो भोर की उल्लसित ।

दृश्य आजकल 

एक
कुछ इतिहास थे
जो मिथक में तब्दील हो रहे थे
और उसकी आड़ में
लोग होते जा रहे थे
बलवाई और अराजक

अचानक इतिहास पुरुष की
आँखों से ख़ून बहने लगा
मिथक अब अपना रूप बदल रहे हैं ।

दो

अचानक एक बहुत
बहुत चुप आवाज़

बोल पड़ती है
तुम्हारे कानों से लहू बहने लगता है ।

तीन

प्रतिमा पूजने वाले
प्रतिमा गढ़ने वाले

भागने लगते हैं
जब प्रतिमान निर्मित होते हैं ।

चार

धरती के गर्भ में पलती हैं
तुम्हारी

अहमन्यताएँ
तुम्हारे ज़ुल्म

तुम्हारे सारे कर्म-कुकर्म
एक लम्बे इन्तज़ार के बाद
निर्मित होता है कोई ज्वालामुखी

पाँच

कई बार फट चुके हैं ज्वालामुखी
फटकर भी उगलें हैं उन्होंने खनिज
और तुम्हारे अय्याशी के साधन
कि तुम समझौता कर सको
बेच सको हिण्डाल्को, अडानी और अम्बानियों को
मार सको उनको जो आख़िरी जन हैं
तुम्हारे सबसे बड़े जनतन्त्र के

जो तुम्हारे भोग से पैदा हुआ है
नाजायज़ ही कहलाया

पर सावधान !
ज्वालामुखी फटते रहेंगे
और उनमें से नहीं निकलेगा सिर्फ़ खनिज ।

टैंक

एक

टैंक
में भरे बारूद से ज़्यादा
ख़तरनाक होता है
दिमाग में भरा बारूद

दो

बारूद की गन्ध
क्षत-विक्षत शरीर
चिपचिपे, सूख के पपड़ी बने
ख़ून के धब्बों से
राष्ट्र नहीं
हिंसा पैदा होती है ।

तीन

टैंक के उपयोग में
आने वाले बारूद के गोले से
कहीं ज्यादा ख़तरनाक है
नागपुरी मस्तिष्क से उपजे फ़रमान

चार

टैंक
शक्तिशाली हाथी के बल का पर्याय है
और विश्वविद्यालयों का ज्ञान
चींटी के सूक्ष्म लगन और क्रियाशीलता के
ज्ञान से बड़े सूरमा भी डरते हैं
बलों के रक्तिम इतिहास को
पर्दाफाश कर देता है ज्ञान
तर्क़ कसौटी है तुम्हारे झूठे सच को उकेरने का
जब भी ज्ञान से ख़तरा हो सरकार को
ज्ञान और तर्क़ के गढ़ पर टैंक रखे जाने के प्रस्ताव पारित होते हैं ।

पाँच

टैंक
प्रतीक है युद्धोन्माद और हिंसा का
उससे जँग जीती जाती है
दिलो – दिमाग नहीं
जहाँ दिलों – दिमाग के सौदागर बसते है
वे बारूदों से उड़ा देना चाहते हैं

ज्ञान और तर्क़ के मस्तिष्क को
वे पक्ष चाहते हैं किसी की पक्षधरता नहीं
वे क्रिया के व्यापारी हैं प्रतिक्रिया उन्हें बर्दाश्त नहीं
वे उद्वेलित हो जाते हैं
उन्हें ख़तरे का भय सताता रहता है
वे दिमागों में भी टैंक रखना चाहते हैं
अदृश्य टैंक
जिसे पहले विरोध के साथ ही ट्रिगर कर दिया जाए
फिर भी कुछ सिरफिरे होते हैं
जो किसी टैंक से नहीं डरते
वे बारूद में पानी डाल देते हैं
तुम्हारी अनन्त इच्छाओं पर वे
गिरते हैं वज्रपात-से ।

सन्तन को कहा सीकरी सों काम

अरे चुप करो
कुम्भन
क्या तुम देशद्रोही हो
सन्त वही जिसे सीकरी सों काम
कुम्भनदास

योगी अब भोगी…
नाथ गाँवों में घूम भरथरी गाते थे कभी
अब वे राजधानियों में गाएँगे
भरथरी के गीत अब करुण नहीं हिंसक हैं
भरथरी की सारँगी से निकलेगा युद्धोन्माद का गीत

जब मैं छोटा था
मेरे गाँव में आते थे जोगी
जब हम नहीं खाते, ज़िद करते तो
दादी कहती जोगी झोले में लेकर चला जाएगा
जब दादी उनके झोले में अन्न देती
दादी का पल्लू पकड़ उनसे चिपका रहता
जोगी सुनाता ‘सुन सारँगी कान कटबऽ’
सारँगी कहती ‘हूँ’ और मैं डर जाता
अब सारंगी गला काटेगी
लोग हँसेंगे, उनका मनोरँजन होगा
अख़बार छुपा ले जाएगा ख़बर
विज्ञापनों से भरा अख़बार
नहीं बताएगा
किसी सांसद की असंसदीय हरकत को
हम किसी भी अख़बार में नहीं पढ़ पाएँगे

किसानों ने सत्ता के हृदय पर कपाल लेकर अपने बेबसी का रोना रोया
किसानों में माया बहुत है वे नहीं कर सकते कपाल लेकर ताण्डव
वे मरना जानते हैं पर खेती छोड़ना नहीं जानते
वे छोड़ सकते हैं अपना शरीर पर खेत नहीं छोड़ सकते
वे असल सर्जक हैं
जिस दिन उनका ताण्डव होगा
पृथ्वी पर अन्न नहीं सिर्फ़ कँक्रीट के जँगल बचेंगे

हे कुम्भन
तुम बूढ़े हो गए हो
तुम्हारे प्रतिनिधि सठिया गए हैं
देखा नहीं, कैसा जनादेश है
नहीं दिखता जनादेश

उन्माद का कोई जनादेश नहीं होता
सिर्फ़ उन्माद होता है

उन्माद शोर है
कभी बहुत शोर में दब जाता है

एक भूखे के पेट से निकला अन्तिम शब्द
रोऽऽऽटीऽऽऽ

देखा नहीं रँग भी बता देते हैं तुम नहीं हो उनके जैसे
अभी तुम चले जा रहे हो

कि कोई सामने से आता है
और तुम्हारे पेट को भभोड़कर चला जाता है
तुम्हारे पेट से रिसता लहू नहीं दिखता किसी को

लोग तुम्हें देशविरोधी और पागल कह कर
जश्न मनाते हैं

लहू का रंग लाल नहीं
उन्हें केसरिया दिखता है महाकवि

वे जश्न मनाते हैं कि एक देशद्रोही ख़त्म हुआ
और तुम जो कभी भक्त थे अब कहे जाते हो देशद्रोही

कुम्भनदास जी
मुस्कुराइए कि आप …… हैं
मुस्कुराइए कि आप अभी तक ज़िन्दा हैं
मुस्कुराइए कि गदहों का लोकवृत है
मुस्कुराइए कि सीकरी अब जंगल है

मुस्कुराइए कि सन्त अब सीकरी में हों, जंगल में हों, संसद में हों,
विधानपालिका में हों, कार्यपालिका में हों, न्यायपालिका में हों
सन्त हैं

और आप असन्त क्योंकि
सन्त वही जिसे सीकरी सों काम ।

हम एक ऐसे समय में जी रहे हैं

जहाँ भारत भाग्य विधाता का
गुणगान करते हुए
हरिचरना कब का सरग
सिधार गया है

हमने सरकारें बनाईं
फिर उसी सरकार को रहे गरियाते

इस उम्मीद में की वे सुनेंगे हमारी बात
वो भी तो हमारे बीच से आते हैं
पर उनके गणित की सत्ता

चिरन्तन रही
सत्तासीन तो सत्ता में हैं ही
जो नहीं हैं सत्ता में
उनकी सत्ता भी मुक़ाबिल है
हर बार जोड़ा उन्होंने जाति का गणित
कभी धर्म कभी सँख्या के बल पर
ठगते रहे

उनके गणित के हर प्रश्न
का जबाब विजय ही रहा हर बार
चाहे वो सत्ता में रहे या विपक्ष में

वो गणतन्त्र के दिन
लेते रहे भव्य सलामी
और
गणतन्त्र का आख़िरी आदमी
अपने आख़िरी सांस को बचाने के लिए
आख़िरी दम तक लड़ता रहा
गणतन्त्र और आज़ादी के फ़रेब में
वो हमें बदलते रहे
और हम उन्हें बदलने का भरम पाले रहे
हमारा निशाना भी तो हमेशा से चुकता रहा
हमारी मर्यादा हमें भीम नहीं बनने दे रही थी
कि हम करें प्रहार उनके मर्मस्थलों पर
हम करते रहे वज्र पर प्रहार वज्र से
पर इस महाभारत में वे बने रहे

अभिमन्यु को घेर कर मारने वाले
कभी द्रोण, कभी भीष्म,
कभी दुर्योधन तो कभी जयद्रथ भी

इस महाभारत के अन्त में
नहीं बने विजेता पाण्डव
राजनीति के महाभारत में

विजेता दुर्योधन ही रहा
मरती गई पाण्डवों की सम्वेदना
वो अब किसी ग़रीब के लिए नहीं लगाते
जान की बाज़ी
चूकती सम्वेदना, मरती आदमियत
और चारों तरफ़ शोर ही शोर में
उन्होंने बदल दिए गणतन्त्र के मायने
हम भी कब बदल गए
पता ही नहीं चला

हरिचरना अब स्वप्न में भी नहीं आता
अब तो, बस, शोर है, शोर ही
आपकी चुप्पी आपकी जान का
सबसे बड़ा शत्रु है
आप भी शोर में शामिल हो जाइए

नहीं तो क्या पता
आपके बगल से एक उन्मादी भीड़ गुज़रे
और उस शोर में दब जाए आपकी चीख़
चीख़ जो पूरी जान लगाकर निकली होगी

अन्तिम बार
शामिल हो जाइए भीड़ में
चिल्लाइए — भारत माता की जय
कानफोड़ू आवाज़ में कहिए — वन्देमातरम
आपकी स्वतन्त्रता का शोर से अलग करके
नहीं किया जाएगा मूल्याँकन
कि स्वतन्त्रता भी अब एकमात्र शोर है
जश्न मनाइए कि हर गणतन्त्र
हरिचरना का श्राद्ध होता रहे

हरिचरना नहीं है
अब तो, बस, शोर है चारों तरफ़
भारत माता की जय और वन्दे मातरम के उद्घोष में
हर बार मृत हो जाता है कोई इस विशाल माता का सुपूत
उसके घर के ख़ालीपन को
शोर से नहीं भरा जा सकता
गणतन्त्र ने हमें नहीं
हमने बदल दिया है शोर से गणतन्त्र को

अब तो गणतन्त्र मने सिर्फ़
शोर
शोर, शोर, शोर, शोर, शोर

तुम्हारा जन्मदिन

तुम्हारा जन्मदिन
चुप्पियों के साये में
चहलक़दमी करते
मेरे मौन को खुरचता है

असावरी के कोमल ऋषभ
कि तरह आती है तुम्हारी याद
“मुन्दरी मोरी काहे को छीन लई[1]
कि मेरी आँखों में बसती है
तुम्हारी यादों की मुन्ददरी

तुम्हारी याद राग सोहनी है
जिसकी प्रकृति चँचल है
तुम्हारी तरह
यूँ तुम्हारी याद
जैसे राग तोड़ी में गाँधार
और तुम्हारे जन्मदिन पर तुम्हारी याद
जैसे कुमार जी की धनवसन्ती
जो कभी पूरिया धनाश्री तो कभी वसन्त का आभास
ये मेरे मौन के साथी हैं
मेरी वाचालता में भी
मेरा मौन साथ चलता है

नहीं समझ पाया जुगलबन्दी को
तुमने ही तो कहा था
सँगत करने से हम आत्ममोह से बचे रहते हैं
यह कैसी सँगत है, प्रिये !
कि तुम लगातार आगे बढ़ती गईं
और मैं ठहरा ही रहा

कभी पीछे मुड़ कर देखना
मैं यहीं इन्तज़ार करता मिलूँगा
तुम्हारे जन्मदिन के दिन तक
बस, तुम ही नहीं होती हो
अपने ही जन्मदिन पर ।

शब्दार्थ
  1. ऊपर जायें राग अड़ाना की चर्चित बन्दिश

कवि और पुरस्कार 

हे कवि
तुम्हारी यह कविता
बहुत अच्छी नहीं है
इसे तुम डाल दो कचरे की पेटी में

कवि
तुमने कैसे स्वीकार कर लिया
कोई पुरस्कार,
कई बेहतर कविताओं के बीच
अपनी इस वाहियात कविता पर,
इस वर्ष की सर्वश्रेष्ठ कविता तो मैंने लिखी है

इसी वर्ष तो तुम पर
लगे हैं कई आरोप
एक आलोचक ने एक कवि के बारे में लिखते हुए कहा
एक आलोचक के कहने पर कवि ने लिखी
है कविता में गाली
उनकी दाँव-पेंच वाली राजनीति
और रस-रँजन तुम्हारी विनम्रता पर भारी है

जब भी कोई पुरस्कृत होता है
होने लगती है कई कई व्याख्याएँ
शब्दों में अनर्थ भरे जाते हैं
तुम्हारी सफलता पर
प्रश्नचिन्ह लगाए जाते हैं
जानते हो कवि
तुम्हारी सफलता पर उनकी
अनाशक्त तिलमिलाहट
कविता को मिले पुरस्कारों से ज़्यादा भारी है

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